जानिए हमारा कानून
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24-25: वाद के लंबित रहने के दौरान और स्थायी भरण-पोषण एवं गुजारा भत्ता
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) न केवल वैवाहिक संबंधों की स्थिति को परिभाषित करता है, बल्कि यह उन वित्तीय चुनौतियों (Financial Challenges) को भी संबोधित करता है जो वैवाहिक विवादों (Matrimonial Disputes) के दौरान और बाद में उत्पन्न होती हैं। धारा 24 (Section 24) "वाद के लंबित रहने के दौरान भरण-पोषण" (Maintenance Pendente Lite) का प्रावधान करती है, जिसका उद्देश्य कार्यवाही के दौरान जरूरतमंद पति या पत्नी को सहायता प्रदान करना है। वहीं, धारा 25 (Section 25) "स्थायी गुजारा...
Registration Act, 1908 की धारा 17 के तहत संपत्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाले दस्तावेजों का अनिवार्य पंजीकरण
17. जिन दस्तावेजों का पंजीकरण अनिवार्य है (Documents of which registration is compulsory)यह धारा उन विशिष्ट दस्तावेजों की सूची देती है जिनका पंजीकरण (registration) अनिवार्य (compulsory) है। यह सुनिश्चित करता है कि संपत्ति (property) से संबंधित महत्वपूर्ण लेनदेन (transactions) सार्वजनिक रिकॉर्ड (public record) में दर्ज हों, जिससे पारदर्शिता (transparency) और कानूनी सुरक्षा (legal security) बढ़े। उपधारा (1) उन दस्तावेजों की सूची देती है जिन्हें पंजीकृत किया जाना चाहिए, बशर्ते कि वे उस जिले में...
Hindu Marriage Act में किसी भी विवाह के Voidable होने के लिए आधार
Hindu Marriage Act 1955 के अधीन किसी विवाह को Voidable विवाह घोषित किए जाने के लिए चार आधार दिए गए हैं। अधिनियम की धारा 12 के अनुसार यह चार आधार निम्न है-प्रत्यर्थी पति या पत्नी की नपुंसकता के कारण विवाह के पश्चात संभोग नहीं होना-विवाह इस अधिनियम की धारा 5 के खंड (2) में विनिर्दिष्ट शर्तों का उल्लंघन करता है-आवेदक याचिकाकर्ता की सम्मति बल प्रयोग द्वारा या कर्मकांड की प्रकृति के बारे में इत्यादि से संबंधित किसी तात्विक तथ्य या परिस्थिति के बारे में कपट द्वारा अभिप्राप्त की गई है-प्रत्यर्थी पत्नी...
Hindu Marriage Act की धारा 12 के प्रावधान
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 12 शून्यकरणीय विवाह के संदर्भ में उल्लेख कर रही है। इस धारा के अधीन उन आधारों को वर्णित किया गया है जिनके कारण हिन्दू विवाह शून्यकरणीय हो जाता है। शून्यकरणीय विवाह ऐसा विवाह होता है जो प्रारंभ से शून्य नहीं होता है तथा प्रारंभ से इस विवाह को विधिमान्यता प्राप्त होती है परंतु कोर्ट द्वारा अकृतता (nullity) की डिक्री प्रदान कर दिए जाने के पश्चात इस प्रकार का विवाह शून्यकरणीय हो जाता है।शून्य विवाह वह विवाह होता है जो प्रारंभ से ही शून्य होता है। इसका रूप अकृत (null)...
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 22 और 23 : गोपनीय कार्यवाही और कार्यवाही में डिक्री
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) के तहत वैवाहिक कार्यवाही (Matrimonial Proceedings) की प्रकृति संवेदनशील और व्यक्तिगत होती है। धारा 22 (Section 22) गोपनीयता (Confidentiality) सुनिश्चित करने के लिए इन कैमरा कार्यवाही (In Camera Proceedings) का प्रावधान करती है, जबकि धारा 23 (Section 23) उस आधारशिला (Cornerstone) के रूप में कार्य करती है जिस पर अदालतें वैवाहिक मामलों में राहत (Relief) प्रदान करती हैं।यह धारा न्याय के सिद्धांत (Principle of Justice) को बनाए रखते हुए, सुलह...
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 की धारा 63-67: फर्मों में परिवर्तनों का अभिलेखन, गलतियों का सुधार, और रिकॉर्ड का निरीक्षण
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 के ये खंड पंजीकृत (Registered) फर्मों से संबंधित महत्वपूर्ण परिवर्तनों को आधिकारिक रूप से दर्ज करने, रजिस्ट्रार के पास उपलब्ध जानकारी में किसी भी गलती को सुधारने, और सार्वजनिक रिकॉर्ड के निरीक्षण (Inspection) व प्रतियों (Copies) के प्रावधानों को निर्धारित करते हैं। ये धाराएँ फर्मों के बारे में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी की सटीकता, पारदर्शिता और पहुंच सुनिश्चित करती हैं, जो तीसरे पक्षों और फर्म के स्वयं के लिए महत्वपूर्ण है।धारा 63: फर्म में परिवर्तनों और विघटन...
Registration Act, 1908 की धारा 15-16A: कार्यालयों की मुहरें, रजिस्टर पुस्तकें और डिजिटल रिकॉर्ड के रखरखाव संबंधी प्रावधान
15. पंजीकरण अधिकारियों की मुहर (Seal of registering officers)यह धारा पंजीकरण अधिकारियों द्वारा उपयोग की जाने वाली आधिकारिक मुहर (seal) का वर्णन करती है। इसमें कहा गया है कि विभिन्न रजिस्ट्रार (Registrars) और उप-रजिस्ट्रार (Sub-Registrars) एक मुहर का उपयोग करेंगे जिस पर अंग्रेजी में और राज्य सरकार (State Government) द्वारा निर्देशित किसी अन्य भाषा में यह लिखा होगा: "द सील ऑफ द रजिस्ट्रार (या ऑफ द सब-रजिस्ट्रार) ऑफ... (The seal of the Registrar (or of the Sub-Registrar) of...)"। यह मुहर आधिकारिक...
क्या बिना वैध कानून के सरकार रिटायर्ड जजों को पोस्ट-रिटायरमेंट सुविधाएं दे सकती है?
उत्तर प्रदेश राज्य बनाम रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जजों का संघ (3 जनवरी 2024) के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह तय किया कि क्या रिटायर्ड जजों को सरकारी आदेशों (Government Orders – GOs) के ज़रिए पोस्ट-रिटायरमेंट सुविधाएं जैसे सरकारी आवास, वाहन और स्टाफ दिए जा सकते हैं, जब तक कि उसके लिए कोई वैध कानून न हो।कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि इस प्रकार की सुविधाएं केवल विधायिका (Legislature) द्वारा बनाए गए कानून (Law) से ही दी जा सकती हैं, न कि सरकार की कृपा (Executive Discretion) से। क्या...
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 19, 20 और 21: वह न्यायालय जहाँ याचिका प्रस्तुत की जाएगी
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) के तहत वैवाहिक विवादों (Matrimonial Disputes) का न्यायनिर्णय (Adjudication) करने के लिए, प्रक्रियात्मक पहलुओं (Procedural Aspects) को समझना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि अंतर्निहित (Substantive) कानूनों को समझना।धारा 19 (Section 19) स्पष्ट करती है कि किस न्यायालय (Court) में याचिका दायर की जानी चाहिए, धारा 20 (Section 20) याचिका की सामग्री (Contents) और सत्यापन (Verification) के लिए दिशानिर्देश निर्धारित करती है, और धारा 21 (Section 21)...
पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 10, 11 और 12 : प्रशासनिक ढाँचा और कार्यालय संचालन की निरंतरता
धारा 10. Registrar की अनुपस्थिति या उसके कार्यालय में रिक्ति (Absence of Registrar or vacancy in his office)यह धारा रजिस्ट्रार (Registrar) की अनुपस्थिति (absence) या उसके कार्यालय में अस्थायी रिक्ति (temporary vacancy) की स्थिति में कौन उसके कर्तव्यों का पालन करेगा, इस पर प्रकाश डालती है। उपधारा (1) उन रजिस्ट्रारों के लिए है जो प्रेसिडेंसी-टाउन (Presidency-town) (जैसे मुंबई, कोलकाता, चेन्नई) वाले जिलों के रजिस्ट्रार नहीं हैं। यदि ऐसा रजिस्ट्रार अपने जिले में ड्यूटी पर न होकर किसी और कारण से...
Indian Partnership Act, 1932 की धारा 59-62: फर्मों का पंजीकरण और परिवर्तनों का अभिलेखन
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (Indian Partnership Act, 1932) का यह खंड फर्मों के पंजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है और पंजीकृत (Registered) फर्मों से संबंधित विभिन्न परिवर्तनों (Alterations) को आधिकारिक रिकॉर्ड (Official Record) में दर्ज करने के महत्व पर प्रकाश डालता है। ये प्रावधान फर्म के कानूनी रिकॉर्ड की सटीकता (Accuracy) और पारदर्शिता (Transparency) सुनिश्चित करते हैं, जो तीसरे पक्षों (Third Parties) के लिए और फर्म के अपने हित के लिए महत्वपूर्ण है।धारा 59: पंजीकरण (Registration) भारतीय...
क्या सरकार बिना किसी कानून के रिटायर्ड जजों को विशेष सुविधाएं देने के लिए अधिकृत है?
State of Uttar Pradesh v. Association of Retired Supreme Court and High Court Judges के 3 जनवरी 2024 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सवाल का जवाब दिया — क्या सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट से रिटायर हुए जजों को बंगला, सरकारी गाड़ी, स्टाफ जैसी पोस्ट-रिटायरमेंट (Post-Retirement) सुविधाएं किसी कानूनी अधिकार (Legal Right) के तहत मिलती हैं या ये सिर्फ सरकार की मर्जी (Discretion) पर आधारित होती हैं?इस केस में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा रिटायर्ड जजों को दी गई सुविधाओं को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम...
Hindu Marriage Act में शून्य विवाह की शर्त
हिंदू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 11 के अनुसार यह वह तीन शर्ते हैं जो किसी भी विवाह को शून्य घोषित कर देती है। यदि इन तीनों या फिर इनमे से किसी एक शर्त का उल्लंघन कर दिया गया है और विवाह संपन्न किया गया है तो ऐसा विवाह प्रारंभ से ही संपन्न नहीं माना जाएगा। इस विवाह को शून्य घोषित करवाने हेतु विवाह का कोई भी पक्षकार कोर्ट के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकता है।पहले शादीशुदा होते हुए दूसरा विवाह संपन्न करनायह किसी भी हिंदू विवाह को शून्य घोषित करने हेतु इस अधिनियम की धारा 11 के अनुसार पहली शर्त है। सन...
Hindu Marriage Act में विवाह का शून्य होना
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 11 शून्य विवाह से संबंधित है। धारा 11 उन विवाहों का उल्लेख कर रही है जो विवाह इस अधिनियम के अंतर्गत शून्य होते हैं, अर्थात वह विवाह प्रारंभ से ही कोई वजूद नहीं रखते हैं तथा उस विवाह के अधीन विवाह के पक्षकार पति पत्नी नहीं होते। शून्य विवाह वह विवाह है जिसे मौजूद ही नहीं माना जाता है।शून्य विवाह का अर्थ है कि वह विवाह जिसका कोई अस्तित्व ही न हो अर्थात अस्तित्वहीन विवाह है। किसी भी वैध विवाह के संपन्न होने के बाद पुरुष और नारी के मध्य विधिक वैवाहिक संबंध स्थापित...
Hindu Marriage Act में Judicial Separation के आधार
जब भी किसी पक्षकार द्वारा न्यायिक पृथक्करण के लिए डिक्री पारित करने हेतु कोर्ट के समक्ष आवेदन किया जाता है तो ऐसा आवेदन कुछ आधारों पर किया जाता है। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 10 के अधीन न्यायिक पृथक्करण के आधार भी उल्लेखित किए गए हैं। 1976 के संशोधनों के बाद न्यायिक पृथक्करण के लिए वही आधार होते हैं जो विवाह विच्छेद के लिए होते हैं।हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 की उपधारा 1 उल्लेखित आधारों में से किसी आधार पर विवाह का कोई भी पक्षकार न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के लिए जिला कोर्ट के...
Hindu Marriage Act में Judicial Separation
इस एक्ट की धारा 10 के अधीन Judicial Separation को उल्लेखित किया गया है। विवाह के दोनों पक्षकारों में से कोई भी पक्षकार कोर्ट के समक्ष आवेदन करके Judicial Separation की डिक्री पारित करने हेतु निवेदन कर सकता है।कोर्ट की डिक्री से विवाह को कुछ समय के लिए मृत कर दिया जाता है। इस उपचार का यह मूल आधार है कि यदि विवाह पुनर्जीवित हो सकता हो तो कर लिया जाए क्योंकि विवाह के उपरांत संतान भी उत्पन्न होती है पति और पत्नी के विवाह विच्छेद के परिणामस्वरूप बच्चों का पालन पोषण अत्यधिक कष्टदायक हो जाता है। विवाह...
क्या केंद्र सरकार सेवा से जुड़े मामलों में विधायी या कार्यपालिका कार्रवाई के ज़रिए दिल्ली की निर्वाचित सरकार की शक्तियों को निरस्त कर सकती है?
Government of NCT of Delhi v. Union of India (29 नवंबर 2023) के ऐतिहासिक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच लंबे समय से चले आ रहे संवैधानिक और प्रशासनिक विवाद पर फैसला दिया। इस मामले में मुख्य प्रश्न यह था कि दिल्ली सरकार के अधिकारियों की नियुक्ति (Appointment), स्थानांतरण (Transfer), और अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Action) जैसे सेवा संबंधी मामलों पर नियंत्रण किसका होगा – चुनी हुई दिल्ली सरकार का या केंद्र सरकार का।यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 239AA (Article...
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 15-16: तलाक के बाद पुनर्विवाह और शून्य/शून्यकरणीय विवाहों के बच्चों की वैधता
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) न केवल विवाह को भंग करने के लिए आधार (Grounds for Dissolution) प्रदान करता है, बल्कि यह तलाक के बाद की महत्वपूर्ण कानूनी स्थितियों (Crucial Legal Situations) को भी संबोधित करता है।धारा 15 (Section 15) तलाकशुदा व्यक्तियों (Divorced Persons) के पुनर्विवाह (Remarriage) के अधिकारों को नियंत्रित करती है, जबकि धारा 16 (Section 16) विवाह की कानूनी वैधता (Legal Validity) में अनियमितताओं (Irregularities) के बावजूद बच्चों की वैधता (Legitimacy of...
Indian Partnership Act, 1932 की धारा 59-62: फर्मों का पंजीकरण और परिवर्तनों का अभिलेखन
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (Indian Partnership Act, 1932) का यह खंड फर्मों के पंजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है और पंजीकृत (Registered) फर्मों से संबंधित विभिन्न परिवर्तनों (Alterations) को आधिकारिक रिकॉर्ड (Official Record) में दर्ज करने के महत्व पर प्रकाश डालता है। ये प्रावधान फर्म के कानूनी रिकॉर्ड की सटीकता (Accuracy) और पारदर्शिता (Transparency) सुनिश्चित करते हैं, जो तीसरे पक्षों (Third Parties) के लिए और फर्म के अपने हित के लिए महत्वपूर्ण है।धारा 59: पंजीकरण (Registration) भारतीय...
पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 3-8 : रजिस्ट्रार और उप-रजिस्ट्रार
यह लेख पंजीकरण अधिनियम, 1908 (Registration Act, 1908) के कुछ महत्वपूर्ण अनुभागों (sections) को समझाता है, जो पंजीकरण से संबंधित सरकारी ढांचे और कामकाज के बारे में हैं।धारा 3. पंजीकरण महानिरीक्षक (Inspector-General of Registration) इस धारा के अनुसार, राज्य सरकार (State Government) को अपने अधिकार क्षेत्र (territories) में एक अधिकारी को पंजीकरण महानिरीक्षक (Inspector-General of Registration) नियुक्त करना होता है। यह व्यक्ति राज्य में पंजीकरण से जुड़े सभी मामलों का सबसे बड़ा अधिकारी होता है।...


















