इलाहाबाद हाईकोट

इकबालिया बयान पुलिस जांच को दिशा दे सकते हैं, भले ही वे चार्जशीट का हिस्सा न बन सकें: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इकबालिया बयान पुलिस जांच को दिशा दे सकते हैं, भले ही वे चार्जशीट का हिस्सा न बन सकें: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ किया कि संजू बंसल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, भले ही पुलिस द्वारा दर्ज किए गए इकबालिया बयान चार्जशीट का हिस्सा नहीं बन सकते, लेकिन यह पुलिस को चल रही जांच में आगे बढ़ने के लिए ऐसे बयानों पर भरोसा करने से नहीं रोकता है।जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की बेंच ने किशन यादव नाम के एक व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। आरोपी पर गोरखपुर में मानसिक रूप से कमजोर 20 साल के एक युवक की हत्या करने का आरोप है।आरोपी का कहना...

लिव-इन संबंध पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी—विवाहित पुरुष और वयस्क महिला साथ रहें तो अपराध नहीं
लिव-इन संबंध पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी—विवाहित पुरुष और वयस्क महिला साथ रहें तो अपराध नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि कोई विवाहित पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन संबंध में रहता है, तो यह किसी भी प्रकार का अपराध नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून और नैतिकता को अलग-अलग रखा जाना चाहिए और सामाजिक धारणा अदालत के फैसलों को प्रभावित नहीं कर सकती।जस्टिस जे जे मुनीर और जस्टिस करून सक्सेना की खंडपीठ यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान कर रही थी, जिसमें एक लिव-इन कपल ने महिला के परिवार से मिल रही धमकियों के खिलाफ सुरक्षा की...

अनुच्छेद 226 के तहत आपराधिक कोर्ट के आदेश को चुनौती नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
अनुच्छेद 226 के तहत आपराधिक कोर्ट के आदेश को चुनौती नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी आपराधिक अदालत द्वारा पारित न्यायिक आदेश को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दाखिल कर चुनौती नहीं दी जा सकती।जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एक याचिका खारिज कर दी, जिसमें लखनऊ के स्पेशल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (कस्टम) द्वारा फरवरी 2026 में पारित आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी।सुनवाई के दौरान राज्य ने याचिका की सुनवाई योग्य होने पर प्रारंभिक आपत्ति उठाई और नीता सिंह बनाम राज्य, 2024 के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि...

किसी एक धर्म को एकमात्र सच्चा धर्म बताना गलत, इससे दूसरे धर्मों का अपमान होता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने IPC की धारा 295A के तहत दर्ज केस रद्द करने से इनकार किया
किसी एक धर्म को 'एकमात्र सच्चा धर्म' बताना गलत, इससे दूसरे धर्मों का अपमान होता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने IPC की धारा 295A के तहत दर्ज केस रद्द करने से इनकार किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि धर्मनिरपेक्ष भारत में किसी भी व्यक्ति के लिए यह दावा करना 'गलत' है कि कोई विशेष धर्म ही "एकमात्र सच्चा धर्म" है, क्योंकि ऐसा करने का मतलब है कि वह दूसरे धर्मों का 'अपमान' कर रहा है, और पहली नज़र में इस पर IPC की धारा 295A लागू होती है।जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की बेंच ने यह टिप्पणी रेवरेंड फादर विनीत विंसेंट परेरा द्वारा दायर याचिका खारिज करते हुए की। परेरा पर IPC की धारा 295A [जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्य, जिसका उद्देश्य किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक...

POCSO मामले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को इलाहाबाद हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत
POCSO मामले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को इलाहाबाद हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आज प्रयागराज POCSO मामले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को अग्रिम जमानत दे दी है।इससे पहले 27 फरवरी को जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की पीठ ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका पर आदेश सुरक्षित रख लिया था और निर्देश दिया था कि अंतिम फैसला होने तक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य की गिरफ्तारी न की जाए।गौरतलब है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर POCSO एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत गंभीर आरोप लगाए गए हैं। उन पर आरोप है कि प्रयागराज में आयोजित हालिया माघ मेला के दौरान...

संभल हिंसा मामला: पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR के आदेश पर हाईकोर्ट 21 अप्रैल तक बढ़ाई रोक
संभल हिंसा मामला: पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR के आदेश पर हाईकोर्ट 21 अप्रैल तक बढ़ाई रोक

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने नवंबर 2024 के संभल हिंसा मामले में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश पर लगी अंतरिम रोक को 21 अप्रैल 2026 तक बढ़ा दिया।जस्टिस समित गोपाल की पीठ ने यह आदेश पूर्व संभल क्षेत्राधिकारी अनुज कुमार चौधरी और तत्कालीन कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। दोनों अधिकारियों ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उनके खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया गया।अदालत ने कहा कि अगली सुनवाई तक अंतरिम आदेश प्रभावी रहेगा। साथ ही...

1984 कानपुर दंगों पर हाइकोर्ट सख्त: नरसंहार बताकर केस रद्द करने से किया इनकार
1984 कानपुर दंगों पर हाइकोर्ट सख्त: नरसंहार बताकर केस रद्द करने से किया इनकार

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने 1984 के कानपुर सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में बड़ा फैसला देते हुए आरोपियों की याचिकाएं खारिज की। साथ ही आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का आदेश दिया। अदालत ने इन घटनाओं को नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराध करार दिया।जस्टिस अनिश कुमार गुप्ता की पीठ ने 9 आरोपियों द्वारा दायर 7 याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि केवल देरी या मूल रिकॉर्ड के अभाव के आधार पर मुकदमा समाप्त नहीं किया जा सकता।अदालत ने कहा,“यह घटनाएं देशभर में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख समुदाय...

बकाया न चुकाने पर सिविल जेल भेजने से पति की मासिक भरण-पोषण देने की ज़िम्मेदारी खत्म नहीं होती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
बकाया न चुकाने पर सिविल जेल भेजने से पति की मासिक भरण-पोषण देने की ज़िम्मेदारी खत्म नहीं होती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि किसी व्यक्ति को उसकी पत्नी या बच्चों को भरण-पोषण (Maintenance) न देने के कारण सिविल जेल भेजने से उसकी आगे का मासिक भरण-पोषण का बकाया चुकाने की कानूनी ज़िम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की बेंच ने साफ किया कि CrPC की धारा 300 के तहत 'डबल जिओपार्डी' (दोहरी सज़ा) का सिद्धांत, 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005' के तहत भरण-पोषण के आदेशों को लागू करने के मामले में बिल्कुल भी लागू नहीं होता।बेंच ने आगे कहा कि भरण-पोषण से जुड़ी...

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज़मानत मिलने के बाद अपील की सुनवाई टालने की मुक़दमेबाज़ों की आपत्तिजनक चाल पर नाराज़गी जताई, कहा- बेंच या बार को दोष न दें
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज़मानत मिलने के बाद अपील की सुनवाई टालने की मुक़दमेबाज़ों की 'आपत्तिजनक' चाल पर नाराज़गी जताई, कहा- बेंच या बार को दोष न दें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक अपीलों में ज़मानत हासिल करने और उसके बाद अपने वकीलों को अंतिम सुनवाई के लिए पेश न होने का निर्देश देने की मुक़दमेबाज़ों की "आपत्तिजनक प्रवृत्ति" की कड़ी आलोचना और निंदा की।कोर्ट ने टिप्पणी की कि सेमिनारों में जब अदालतों में देरी के कारणों पर बहस होती है तो मुक़दमेबाज़ों की भूमिका को ज़्यादातर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। मुक़दमेबाज़ को बार और बेंच के हाथों में एक बेबस इंसान के तौर पर देखा जाता है। हालाँकि, असल में ऐसा नहीं है।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार...

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जारी किया नया रोस्टर, जस्टिस श्रीधरन अब सुनेंगे पारिवारिक अपीलें और सीनियर सिटीजन एक्ट से जुड़े मामले
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जारी किया नया रोस्टर, जस्टिस श्रीधरन अब सुनेंगे पारिवारिक अपीलें और सीनियर सिटीजन एक्ट से जुड़े मामले

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते बेंचों के गठन/रोस्टर की नई अधिसूचना जारी की, जो आज (सोमवार) से लागू हो गई। चीफ जस्टिस अरुण भंसाली के आदेश पर 19 मार्च को पारित प्रशासनिक आदेश में कई डिवीजनों और सिंगल जज बेंचों में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।यह अधिसूचना पिछले रोस्टर की जगह लेती है, जो 5 जनवरी, 2026 से लागू था।नए अधिसूचित रोस्टर में जस्टिस अतुल श्रीधरन, जस्टिस विवेक सरन के साथ बैठकर वर्ष 2021 से आगे की फैमिली कोर्ट की अपीलें सुनेंगे। साथ ही माता-पिता और सीनियर सिटीजन के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम से...

देरी की माफ़ी के लिए दी गई सफ़ाई की विश्वसनीयता पहले जांची जानी चाहिए: इलाहाबाद हाईकोर्ट
देरी की माफ़ी के लिए दी गई सफ़ाई की विश्वसनीयता पहले जांची जानी चाहिए: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि देरी की माफ़ी पर विचार करते समय कोर्ट को सबसे पहले उस पक्ष द्वारा दी गई सफ़ाई की विश्वसनीयता (Bona Fides) की जांच करनी चाहिए, जो ऐसी माफ़ी चाहता है।एक शादी को अमान्य घोषित करने वाले फ़ैसले के ख़िलाफ़ 654 दिनों की देरी से दायर एक अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्य वीर सिंह की बेंच ने कहा,“कोर्ट का यह फ़र्ज़ है कि वह सबसे पहले उस पक्ष द्वारा दी गई सफ़ाई की विश्वसनीयता की जांच करे, जो माफ़ी चाहता है। केवल तभी, जब मुक़दमा लड़ने वाले पक्ष...

लंबे समय तक आउटसोर्सिंग से भर्ती टालना अनुचित: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने राज्य को लगाई फटकार
लंबे समय तक आउटसोर्सिंग से भर्ती टालना अनुचित: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने राज्य को लगाई फटकार

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने सरकारी संस्थानों द्वारा नियमित नियुक्तियों को दरकिनार कर लंबे समय तक आउटसोर्सिंग के जरिए कर्मचारियों से काम लेने की प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने इसे शोषण और अन्याय को बढ़ावा देने वाला बताया।जस्टिस विक्रम डी चौहान की पीठ ने बरेली नगर निगम को निर्देश दिया कि 13 वर्षों से आउटसोर्स आधार पर काम कर रहे कंप्यूटर ऑपरेटर के नियमितीकरण पर पुनर्विचार किया जाए।कोर्ट ने कहा कि जब किसी कर्मचारी से लंबे समय तक लगातार काम लिया जाता है और उसका कार्य विभाग के लिए आवश्यक और स्थायी...

पति की मृत्यु के बाद एक्स-पार्टी तलाक रद्द नहीं हो सकता: इलाहाबाद हाइकोर्ट का अहम फैसला
पति की मृत्यु के बाद एक्स-पार्टी तलाक रद्द नहीं हो सकता: इलाहाबाद हाइकोर्ट का अहम फैसला

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पति या पत्नी की मृत्यु के बाद एक्स-पार्टी तलाक के डिक्री को रद्द नहीं किया जा सकता।अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में मुकदमा आगे नहीं बढ़ सकता और इसे पुनर्जीवित करना कानूनन संभव नहीं है।जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने यह निर्णय देते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें 30 साल पुराने तलाक को बहाल कर दिया गया था।मामले में पहली पत्नी का विवाह 1991 में एक्स-पार्टी डिक्री के जरिए समाप्त हो गया। इसके बाद पति ने...