इलाहाबाद हाईकोट

धोखाधड़ी से घर खरीदा, 13 साल तक किया परेशान: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिल्डर पर लगाया ₹2.5 लाख का जुर्माना
धोखाधड़ी से घर खरीदा, 13 साल तक किया परेशान: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिल्डर पर लगाया ₹2.5 लाख का जुर्माना

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बिल्डर पर घर खरीदने वाले को 13 वर्षों तक तुच्छ मुकदमेबाजी के कई दौर से गुजरने के लिए 2.5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया।जस्टिस प्रशांत कुमार ने कहा,"घर-खरीदारों के सामने आने वाली कठिनाइयों और कमजोरियों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने रियल एस्टेट क्षेत्र में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने और आवंटियों की शिकायतों के निवारण के लिए एक त्वरित और प्रभावी तंत्र प्रदान करने के उद्देश्य से रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 लागू किया था। हालांकि, वर्तमान...

कर्मचारी की मौत से नियमितीकरण का अधिकार खत्म नहीं होता, कानूनी वारिसों को मिलता है लाभ: इलाहाबाद हाईकोर्ट
कर्मचारी की मौत से नियमितीकरण का अधिकार खत्म नहीं होता, कानूनी वारिसों को मिलता है लाभ: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी कर्मचारी के जीवनकाल में उसके नियमितीकरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, तो उसकी मृत्यु के साथ नियमितीकरण पर विचार करने का अधिकार समाप्त नहीं होता। ऐसा अधिकार उसके कानूनी वारिसों के माध्यम से जीवित रहता है और आवश्यक होने पर कर्मचारी को काल्पनिक रूप से उस तारीख से नियमित मानते हुए सेवा संबंधी लाभ उसके कानूनी वारिसों को दिए जा सकते हैं।जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला ने यह फैसला मृत कर्मचारी के बेटे की याचिका पर सुनाया। अदालत ने याचिकाकर्ता के...

एग्जाम में लॉ स्टूडेंट को मिले ज़ीरो-मार्क्स: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने BCI और लॉ कमीशन को भेजी आंसर बुक, कानूनी शिक्षा के गिरते स्तर पर जताई चिंता
एग्जाम में लॉ स्टूडेंट को मिले ज़ीरो-मार्क्स: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने BCI और लॉ कमीशन को भेजी आंसर बुक, कानूनी शिक्षा के गिरते स्तर पर जताई चिंता

लॉ कॉलेजों में कानूनी शिक्षा के गिरते स्तर पर गंभीर चिंता जताते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में निर्देश दिया कि लॉ स्टूडेंट की जांची गई आंसर बुक (जिसमें उसे ज़ीरो मार्क्स मिले थे) की एडिट की हुई कॉपी और क्वेश्चन पेपर, बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) और लॉ कमीशन ऑफ़ इंडिया को भेजा जाए।कोर्ट ने BCI से इस बात पर विचार करने को कहा कि क्या कानूनी शिक्षा के मौजूदा स्तर और लॉ संस्थानों की मंज़ूरी, एफिलिएशन और समय-समय पर होने वाली जांच के मौजूदा सिस्टम को "ग्लोबली कॉम्पिटिटिव कानूनी शिक्षा मानकों का...

RTI Act का गलत इस्तेमाल और कोर्ट कार्यवाही में बाधा डालने का मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाया ₹6.7 लाख का जुर्माना
RTI Act का गलत इस्तेमाल और कोर्ट कार्यवाही में बाधा डालने का मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाया ₹6.7 लाख का जुर्माना

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में खुद अपना केस लड़ने वाले व्यक्ति (पार्टी-इन-पर्सन) पर ₹6.70 लाख का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने पाया कि उसने RTI Act, 2005 का गलत इस्तेमाल किया; उसने कोर्ट के अंदरूनी कामकाज के बारे में बार-बार अस्पष्ट RTI एप्लीकेशन दाखिल कीं और न्यायिक कार्यवाही में बाधा भी डाली।जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की बेंच ने स्टेट इंफॉर्मेशन कमीशन (SIC) के आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका खारिज की और याचिकाकर्ता को 4 हफ़्ते के अंदर पूरी रकम हाईकोर्ट लीगल सर्विस कमेटी के पास जमा करने का...

Lucknow Fire Tragedy | हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा विस्तृत जवाब, राज्य ने कहा- फायर सेफ्टी SOP लगभग तैयार
Lucknow Fire Tragedy | हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा विस्तृत जवाब, राज्य ने कहा- फायर सेफ्टी SOP 'लगभग तैयार'

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस साल जून में लखनऊ कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग की घटना, जिसमें 15 लोगों की जान चली गई, उससे जुड़ी जनहित याचिका (PIL) पर यूपी सरकार से विस्तृत जवाब मांगा। राज्य ने कोर्ट को बताया कि फायर सेफ्टी पर प्रस्तावित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) "लगभग तैयार" है।राज्य की बात को रिकॉर्ड करते हुए जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए 1 हफ़्ते का समय दिया।हालांकि, बेंच ने साफ़ कर दिया कि हलफनामे में रिट याचिका में उठाए गए सभी मुद्दों और...

बीफ़ नहीं मिला, न ही वध के लिए ले जाने का कोई सबूत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गैर-कानूनी तरीके से गाड़ी ज़ब्त करने पर दिया ₹4.75 लाख मुआवज़ा
बीफ़ नहीं मिला, न ही वध के लिए ले जाने का कोई सबूत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गैर-कानूनी तरीके से गाड़ी ज़ब्त करने पर दिया ₹4.75 लाख मुआवज़ा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को उत्तर प्रदेश गो-वध निवारण अधिनियम, 1955 के तहत गैर-कानूनी तरीके से ज़ब्त की गई गाड़ी का ज़ब्ती आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों ने पूरी तरह से इस धारणा के आधार पर कार्रवाई की कि मवेशियों को वध के लिए उत्तर प्रदेश से बाहर ले जाया जा रहा था।जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने पाया कि गाड़ी से न तो कोई बीफ़ और न ही वध किए गए मवेशियों के अवशेष मिले थे, और ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह पता चले कि जानवरों को बिहार या किसी बूचड़खाने ले जाया जा रहा है।कोर्ट ने...

सिर्फ़ दोषी ठहराए जाने के आधार पर पुलिस कॉन्स्टेबल को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
सिर्फ़ दोषी ठहराए जाने के आधार पर पुलिस कॉन्स्टेबल को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'यूपी पुलिस ऑफिसर्स ऑफ़ द सबऑर्डिनेट रैंक्स (पनिशमेंट एंड अपील) रूल्स, 1991' के नियम 8(2)(a) के तहत किसी पुलिस अधिकारी को सिर्फ़ इसलिए नौकरी से नहीं निकाला जा सकता कि उसे किसी आपराधिक आरोप में दोषी ठहराया गया, जब तक कि अनुशासनात्मक अधिकारी ने पहले उस आचरण पर विचार न किया हो जिसके कारण दोषसिद्धि हुई।कोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी की सज़ा देने का अधिकार पाने के लिए ऐसा विचार करना एक ज़रूरी शर्त है।1991 के नियमों का नियम 8(2) उचित जांच और अनुशासनात्मक कार्यवाही के बिना पुलिस...

PC Act | आरोप तय करने के चरण में अपराध साबित होना ज़रूरत नहीं, सिर्फ़ मज़बूत शक काफ़ी: हाईकोर्ट का पूर्व GST अधिकारी को राहत देने से इनकार
PC Act | आरोप तय करने के चरण में अपराध साबित होना ज़रूरत नहीं, सिर्फ़ मज़बूत शक काफ़ी: हाईकोर्ट का पूर्व GST अधिकारी को राहत देने से इनकार

भ्रष्टाचार के मामले में पूर्व GST अधिकारी को राहत देने से इनकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि आरोप तय करने के चरण में कोर्ट का ध्यान केवल इस बात पर होता है कि क्या आरोपी के खिलाफ़ अपराध करने का "मज़बूत शक" है; इस चरण में अपराध साबित होने की अंतिम कसौटी लागू नहीं होती।जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की बेंच ने कहा,"...आरोपी/रिविज़न याचिकाकर्ता को आरोपमुक्त करने के सवाल पर विचार करते समय कोर्ट जांच के दौरान इकट्ठा की गई सामग्री की विस्तृत छानबीन नहीं करता है। अभियोजन पक्ष द्वारा...

नगर निकाय किराए की बकाया रकम को ज़मीन के लगान की तरह वसूल नहीं कर सकते, वे सिविल केस कर सकते हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
नगर निकाय किराए की बकाया रकम को ज़मीन के लगान की तरह वसूल नहीं कर सकते, वे सिविल केस कर सकते हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि नगर पालिका परिषद को अपने किराएदार से मिलने वाला बकाया किराया ज़मीन के लगान के बकाये की तरह वसूल नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा किराया एक कॉन्ट्रैक्ट के तहत देय राशि है, न कि कोई टैक्स।उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1916 की धारा 173-A नगरपालिका को कलेक्टर से वसूली के लिए आवेदन करने की अनुमति देती है, जैसे कि यह ज़मीन के लगान का बकाया हो, किसी ऐसी राशि के लिए जो बोर्ड को टैक्स के तौर पर देनी हो (सिवाय उस टैक्स के जो तुरंत मांग पर देय हो)। कलेक्टर इस बात से संतुष्ट होने...

UP Police Rules | कर्मचारी का जवाब मांगे बिना जांच रिपोर्ट से सहमत होने से अनुशासनात्मक कार्यवाही अमान्य नहीं होती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
UP Police Rules | कर्मचारी का जवाब मांगे बिना जांच रिपोर्ट से सहमत होने से अनुशासनात्मक कार्यवाही अमान्य नहीं होती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक अधिकारी का 'कारण बताओ नोटिस' (Show Cause Notice) में जांच अधिकारी के निष्कर्षों से सहमति जताना, बाद में दिए गए सजा के आदेश को अमान्य नहीं करता। कोर्ट ने माना कि ऐसी सहमति 'कारण बताओ नोटिस' जारी करने की एक पूर्व-शर्त है।कोर्ट ने देखा कि सजा के लिए जांच अधिकारी की सिफारिश का स्पष्ट रूप से 'यू.पी. पुलिस ऑफिसर्स ऑफ सबऑर्डिनेट रैंक्स (डिसिप्लिन एंड अपील) रूल्स, 1991' के नियम 14(1) के अपेंडिक्स I में प्रावधान है।कोर्ट के अनुसार, 1991 के नियमों के नियम 14(1) का...

रिटायरमेंट के बाद एकेडमिक सेशन के आखिर तक नौकरी जारी रखने का हक रिसर्च ड्यूटी पर तैनात टीचर को नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
रिटायरमेंट के बाद एकेडमिक सेशन के आखिर तक नौकरी जारी रखने का हक रिसर्च ड्यूटी पर तैनात टीचर को नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि रिटायरमेंट के बाद एकेडमिक सेशन के आखिर तक नौकरी जारी रखना एक रियायत है, न कि कोई कानूनी अधिकार। इसका दावा सिर्फ़ वही टीचर कर सकता है जो असल में रेगुलर टीचिंग (नियमित शिक्षण) में लगा हो।कोर्ट ने कहा कि एक एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर, जिन्हें रिसर्च स्टेशन का इंचार्ज बनाया गया था, वह सिर्फ़ इसलिए इस फ़ायदे का दावा नहीं कर सकते कि वे एक मुख्य टीचिंग पोस्ट पर बने रहे और उसके बदले सैलरी लेते रहे।जस्टिस मंजू रानी चौहान ने कहा,"कानून बनाने वालों की मंशा, लागू...

हाईकोर्ट का आदेश- लखनऊ में वकीलों के अवैध रूप से बने चैंबरों को गिराने से पहले जारी करें नए नोटिस
हाईकोर्ट का आदेश- लखनऊ में वकीलों के अवैध रूप से बने चैंबरों को गिराने से पहले जारी करें नए नोटिस

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 72 कथित अतिक्रमणकारियों (जिनमें से ज़्यादातर वकील हैं) को एक आखिरी मौका दिया। उन्हें लखनऊ ज़िला कोर्ट कॉम्प्लेक्स के पास सार्वजनिक रास्ते या सार्वजनिक उपयोग की ज़मीन पर बने चैंबरों को खाली करने या उन पर अपना वैध दावा साबित करने का निर्देश दिया गया। ऐसा न करने पर लखनऊ नगर निगम (LMC) को उन्हें गिराने का आदेश दिया गया।जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राजीव भारती की बेंच ने LMC को निर्देश दिया कि वह सभी 72 कथित अतिक्रमणकारियों को एक हफ़्ते के भीतर नए नोटिस जारी करे।अगर वे नोटिस...

सहकर्मी की आलोचना या भर्ती प्रक्रिया पर चर्चा करना अपने आप में कदाचार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
सहकर्मी की आलोचना या भर्ती प्रक्रिया पर चर्चा करना अपने आप में कदाचार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी सेवा नियम में कर्मचारियों को सहकर्मियों के प्रति शिष्टाचार बनाए रखने की अपेक्षा का यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि हर असहमति, निष्पक्ष आलोचना या संस्थान के मामलों पर चर्चा को कदाचार (Misconduct) मान लिया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई फैकल्टी सदस्य भर्ती प्रक्रिया को लेकर चिंता व्यक्त करने के लिए बैठक बुलाता है, तो केवल इसी आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि उसका उद्देश्य किसी सहकर्मी को अपमानित, प्रताड़ित या उसकी छवि खराब करना...

संज्ञान लेने से पहले कोर्ट गवाह से पूछताछ कर नया साक्ष्य नहीं जुटा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
संज्ञान लेने से पहले कोर्ट गवाह से पूछताछ कर नया साक्ष्य नहीं जुटा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि संज्ञान (Cognizance) लेने से पहले ट्रायल कोर्ट किसी गवाह से पूछताछ कर नया साक्ष्य (Evidence) नहीं जुटा सकती, क्योंकि ऐसी शक्ति CrPC की धारा 190 के तहत उपलब्ध नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर अदालत का काम केवल जांच एजेंसी द्वारा प्रस्तुत रिकॉर्ड पर न्यायिक विचार करना है, न कि अतिरिक्त साक्ष्य एकत्र करना।जस्टिस संतोष राय ने यह टिप्पणी सहारनपुर की एक ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए की। ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लेने से पहले मेडिकल ऑफिसर को अदालत में...

उम्र सत्यापन में लापरवाही पर सख्त हुआ इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ के आर्य समाज मंदिर में विवाह कराने और प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक
उम्र सत्यापन में लापरवाही पर सख्त हुआ इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ के आर्य समाज मंदिर में विवाह कराने और प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया यह पाए जाने के बाद कि लखनऊ के अलीगंज स्थित एक आर्य समाज मंदिर में विवाह योग्य आयु का सत्यापन किए बिना विवाह कराए जा रहे हैं, अगली सुनवाई तक मंदिर को विवाह संपन्न कराने और विवाह प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक लगाई।जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस बबीता रानी की खंडपीठ ने यह अंतरिम आदेश दंपति द्वारा विवाह के बाद पुलिस सुरक्षा की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया।सुनवाई के दौरान अदालत ने आर्य समाज मंदिर, सेक्टर-एच (हर्ष विहार पुरनिया), अलीगंज, लखनऊ द्वारा...

प्रधान से पंचायत फंड के नुकसान की वसूली के लिए समय-सीमा में मौजूद विरोधाभास को ठीक करे राज्य सरकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट
प्रधान से पंचायत फंड के नुकसान की वसूली के लिए समय-सीमा में मौजूद विरोधाभास को ठीक करे राज्य सरकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ग्राम पंचायत के पैसे या संपत्ति के नुकसान, बर्बादी या गलत इस्तेमाल के लिए ग्राम प्रधान पर सरचार्ज (अतिरिक्त शुल्क) लगाने की समय-सीमा यूपी पंचायत राज एक्ट, 1947 की धारा 27 के प्रावधान से तय होती है, न कि यूपी पंचायत राज नियम 1947 के नियम 257(2) के तीसरे प्रावधान में बताई गई कम समय-सीमा से। कोर्ट ने माना कि यह नियम एक्ट के प्रावधानों के खिलाफ है।यूपी पंचायत राज एक्ट, 1947 की धारा 27 के प्रावधान के तहत सरचार्ज की जिम्मेदारी नुकसान, बर्बादी या गलत इस्तेमाल होने के दस साल...

गिरफ्तारी में मौलिक अधिकारों की अनदेखी कर रही पुलिस, न्यायिक फैसलों को भी तवज्जो नहीं देती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
गिरफ्तारी में मौलिक अधिकारों की अनदेखी कर रही पुलिस, न्यायिक फैसलों को भी तवज्जो नहीं देती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी के दौरान संवैधानिक सुरक्षा उपायों के पालन को लेकर पुलिस के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस ने परंपरागत रूप से संविधान के अनुच्छेद 22(1) के प्रावधानों की "घोर उपेक्षा" की। अदालत ने कहा कि पुलिस अक्सर गिरफ्तारी की शक्ति का प्रयोग करते समय मौलिक अधिकारों के महत्व को समझने में विफल रहती है और इन अधिकारों को लागू करने वाले न्यायिक फैसलों को भी तिरस्कार की दृष्टि से देखती है।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक व्यक्ति की...