इलाहाबाद हाईकोट

अश्लील तस्वीरों से ब्लैकमेल के आरोपी की मानसिक जांच के आदेश, मैसेज देखकर लगा स्वस्थ मस्तिष्क का व्यक्ति नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
अश्लील तस्वीरों से ब्लैकमेल के आरोपी की मानसिक जांच के आदेश, मैसेज देखकर लगा स्वस्थ मस्तिष्क का व्यक्ति नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अश्लील तस्वीरों के जरिए एक युवती को कथित रूप से ब्लैकमेल करने के आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए उसकी मानसिक जांच कराने का निर्देश दिया। कोर्ट ने आरोपी द्वारा भेजे गए आपत्तिजनक मैसेज और सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट का अवलोकन करने के बाद कहा कि प्रथम दृष्टया वह स्वस्थ मस्तिष्क का व्यक्ति प्रतीत नहीं होता।जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी, कौशांबी को आरोपी की मानसिक जांच कराकर उसकी रिपोर्ट संबंधित जिला अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश...

खनन पट्टा समाप्त करने में राज्य की देरी का बोझ पट्टाधारक पर नहीं डाला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
खनन पट्टा समाप्त करने में राज्य की देरी का बोझ पट्टाधारक पर नहीं डाला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि रॉयल्टी का भुगतान न करने के कारण राज्य सरकार के पास खनन पट्टा समाप्त करने का आधार मौजूद है, तो उत्तर प्रदेश उपखनिज (रियायत) नियमावली, 1963 के नियम 58 के तहत कार्रवाई करने में राज्य की बिना कारण देरी मनमानी मानी जाएगी। ऐसी स्थिति में केवल राज्य की देरी के कारण बाद में देय हुई किस्तों का भुगतान करने के लिए पट्टाधारक को बाध्य नहीं किया जा सकता।जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने कहा कि यदि सक्षम प्राधिकारी के पास...

फैसले में धारा 34 का उल्लेख छूटना घातक नहीं, यदि साझा मंशा साबित हो: इलाहाबाद हाईकोर्ट
फैसले में धारा 34 का उल्लेख छूटना घातक नहीं, यदि साझा मंशा साबित हो: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि अभियोजन पक्ष आरोपियों की साझा मंशा साबित करने में सफल रहा है, तो निर्णय के अंतिम भाग में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 34 का उल्लेख छूट जाना मामले के लिए घातक नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 34 कोई स्वतंत्र अपराध नहीं है, बल्कि यह साझा मंशा के आधार पर सामूहिक दायित्व तय करने का एक विधिक सिद्धांत है।यह टिप्पणी जस्टिस सलील कुमार राय और जस्टिस अजय कुमार-द्वितीय की खंडपीठ ने वर्ष 2008 के हत्या के एक मामले में दोषसिद्ध चार...

संयुक्त हिंदू परिवार का सदस्य अपने पैसे से अलग संपत्ति खरीद सकता है; दूसरे सह-उत्तराधिकारी उस पर अपना हक नहीं जता सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट
संयुक्त हिंदू परिवार का सदस्य अपने पैसे से अलग संपत्ति खरीद सकता है; दूसरे सह-उत्तराधिकारी उस पर अपना हक नहीं जता सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ संयुक्त हिंदू परिवार होने से यह नहीं माना जा सकता कि कोई खास ज़मीन संयुक्त परिवार की संपत्ति है।कोर्ट ने कहा कि संयुक्त हिंदू परिवार का कोई सदस्य अपने नाम पर अलग से संपत्ति खरीद और रख सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे सदस्य को ज़मीन पर सह-स्वामित्व का अधिकार तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक वे यह साबित न कर दें कि वह ज़मीन संयुक्त परिवार के फंड से खरीदी गई।यह विवाद बस्ती ज़िले के बारो गाँव में खाता नंबर 277 के तीन प्लॉट से जुड़ा था। चकबंदी प्रक्रिया के शुरुआती...

ट्रायल कोर्ट CrPC की धारा 125 के तहत दायर गुज़ारा-भत्ते की अर्ज़ी पर फ़ैसला सुनाने में देरी करने के लिए बाध्य नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
ट्रायल कोर्ट CrPC की धारा 125 के तहत दायर गुज़ारा-भत्ते की अर्ज़ी पर फ़ैसला सुनाने में देरी करने के लिए बाध्य नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि ट्रायल कोर्ट CrPC की धारा 125 के तहत दायर गुज़ारा-भत्ते की अर्ज़ी पर फ़ैसला सुनाने में देरी करने के लिए बाध्य नहीं हैं, सिर्फ़ इसलिए कि फ़ैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद CrPC की धारा 340 के तहत कोई अर्ज़ी दायर की गई।जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की बेंच ने कहा कि CrPC की धारा 340 के तहत होने वाली कार्यवाही अपनी प्रकृति में स्वतंत्र होती है और CrPC की धारा 125 के तहत कार्यवाही के फ़ैसले से जुड़ी नहीं होती है।बेंच ने आगे कहा कि संबंधित पक्ष के पास हमेशा यह विकल्प होता...

वकालत के पेशे में गैंगस्टर और माफियाओं की घुसपैठ: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर अपराधों के आरोपी वकीलों की प्रैक्टिस पर लगाई रोक
वकालत के पेशे में गैंगस्टर और माफियाओं की घुसपैठ: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर अपराधों के आरोपी वकीलों की प्रैक्टिस पर लगाई रोक

एक अहम फैसले में यह देखते हुए कि गैंगस्टर और माफिया तत्वों ने कानूनी पेशे को "सुरक्षित पनाहगाह" बना लिया है, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में गंभीर अपराधों के आरोपी वकीलों को राज्य की किसी भी अदालत या ट्रिब्यूनल में प्रैक्टिस करने से रोक दिया। यह रोक उनके खिलाफ चल रही अनुशासनात्मक कार्यवाही या मुकदमों के खत्म होने तक लागू रहेगी।हाईकोर्ट ने सवाल किया,"ऐसे में आपराधिक आरोपों का सामना कर रहा कोई व्यक्ति 'कोर्ट के अधिकारी' के तौर पर और 'एडवोकेट्स एक्ट, 1961' के तहत मिले अधिकारों और सुविधाओं का लाभ...

S.47 CPC | डिक्री में मुकदमे की प्रॉपर्टी के बारे में क्लर्क की गलती से हुई गलत जानकारी को एग्जीक्यूटिंग कोर्ट ठीक कर सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
S.47 CPC | डिक्री में मुकदमे की प्रॉपर्टी के बारे में क्लर्क की गलती से हुई गलत जानकारी को एग्जीक्यूटिंग कोर्ट ठीक कर सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट, सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 47 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, डिक्री में मुकदमे की प्रॉपर्टी के बारे में क्लर्क की गलती या टाइपिंग की गलती से हुई गलत जानकारी को ठीक कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा सुधार सिर्फ़ उसी कोर्ट तक सीमित नहीं है जिसने डिक्री पास की थी।जस्टिस मनीष कुमार निगम ने कहा,“जहां डिक्री की शर्तें साफ़ और स्पष्ट हैं, वहां उन शर्तों को लागू किया जाना चाहिए। हालांकि, जहां डिक्री अस्पष्ट या उलझन भरी है, वहां...

सेशन जज के ट्रांसफर ऑर्डर को CrPC की धारा 482 के तहत चुनौती दी जा सकती है, धारा 407 के तहत नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
सेशन जज के ट्रांसफर ऑर्डर को CrPC की धारा 482 के तहत चुनौती दी जा सकती है, धारा 407 के तहत नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई सेशन जज CrPC की धारा 408 के तहत किसी क्रिमिनल केस को ट्रांसफर करने की अर्ज़ी मंज़ूर करता है, तो उस आदेश से प्रभावित व्यक्ति CrPC की धारा 407 के तहत नई ट्रांसफर अर्ज़ी दाखिल करके उसे चुनौती नहीं दे सकता।कोर्ट ने कहा कि ट्रांसफर की मंज़ूरी देने वाले आदेश को केवल CrPC की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है।बता दें, CrPC की धारा 408 सेशन जज को अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर क्रिमिनल ट्रायल/अपील को ट्रांसफर करने का अधिकार देती है।धारा 407 हाईकोर्ट को...

POCSO | क्या कथित रक्तस्राव से पेनेट्रेशन का अनुमान लगाया जा सकता है, जब मेडिकल रिपोर्ट में कोई चोट नहीं दिखाई गई हो? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया जवाब
POCSO | क्या कथित रक्तस्राव से पेनेट्रेशन का अनुमान लगाया जा सकता है, जब मेडिकल रिपोर्ट में कोई चोट नहीं दिखाई गई हो? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि चोटों की अनुपस्थिति, अपने आप में बलात्कार या प्रवेशन यौन उत्पीड़न के आरोपों को खारिज नहीं करती। हालांकि, कथित रक्तस्राव से प्रवेश का अनुमान अत्यधिक संदिग्ध हो जाता है जब एक समसामयिक मेडिकल रिपोर्ट संतोषजनक स्पष्टीकरण के बिना किसी भी शारीरिक चोट को पूरी तरह से खारिज कर देती है।जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने कहा कि हालांकि भरोसेमंद नेत्र संबंधी गवाही आम तौर पर चिकित्सा राय पर हावी होती है, लेकिन समसामयिक चिकित्सा निष्कर्षों को नजरअंदाज...

Krishna Janmabhoomi Dispute | साइट पर एंट्री और कार सेवा पर रोक की मांग वाली याचिका: हाईकोर्ट ने DM और SSP से मांगी रिपोर्ट
Krishna Janmabhoomi Dispute | साइट पर एंट्री और 'कार सेवा' पर रोक की मांग वाली याचिका: हाईकोर्ट ने DM और SSP से मांगी रिपोर्ट

श्री कृष्ण जन्मभूमि मालिकाना हक विवाद के चल रहे मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक अर्ज़ी दी गई। इसमें अधिकारियों से मांग की गई कि वे किसी भी व्यक्ति या समूह को विवादित जगह पर मीटिंग करने, "कार सेवा" करने या कोई कार्यक्रम आयोजित करने से रोकें।यह अर्ज़ी आशुतोष महाराज ने वकील रीना एन. सिंह के ज़रिए दायर की। वह खुद को मथुरा के श्री कृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट (रजिस्टर्ड) का अध्यक्ष बताते हैं।अर्ज़ी में खास तौर पर राज्य सरकार और प्रशासन से मांग की गई कि वे किसी भी व्यक्ति या समूह को...

तारीख पर तारीख आपराधिक न्याय व्यवस्था की पहचान नहीं बन सकती: 24 साल से लंबित अपहरण मुकदमे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
तारीख पर तारीख आपराधिक न्याय व्यवस्था की पहचान नहीं बन सकती: 24 साल से लंबित अपहरण मुकदमे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 24 वर्षों से लंबित एक अपहरण के मुकदमे पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि तारीख पर तारीख आपराधिक न्याय व्यवस्था की पहचान नहीं बन सकती। अदालत ने कहा कि वर्षों तक बिना किसी सार्थक प्रगति के मुकदमा लंबित रहना न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष एवं शीघ्र सुनवाई के अधिकार के विपरीत है।जस्टिस राजीव भारती की पीठ ने वर्ष 2001 के अपहरण के एक मामले में दो आरोपियों को अग्रिम जमानत देते हुए यह टिप्पणी की।अदालत ने कहा,"वर्षों तक कार्यवाही...

इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के निरस्त होने के बाद जारी हुई अधिसूचना पर कार्रवाई अवैध
इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के निरस्त होने के बाद जारी हुई अधिसूचना पर कार्रवाई अवैध

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत जारी अधिसूचना पर भले ही 1 जनवरी 2014 से पहले की तारीख अंकित हो, लेकिन उसका प्रकाशन 1 जनवरी 2014 के बाद हुआ है, तो ऐसी पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू से ही अवैध मानी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुराने कानून के निरस्त होने के बाद उसके तहत नई अधिग्रहण कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि अधिसूचना पर लिखी तारीख का कोई कानूनी महत्व नहीं है। महत्वपूर्ण यह...

लिखित बयान दाखिल करने का अधिकार खत्म होने पर प्रतिवादी अपना साक्ष्य पेश नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
लिखित बयान दाखिल करने का अधिकार खत्म होने पर प्रतिवादी अपना साक्ष्य पेश नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी प्रतिवादी का लिखित बयान दाखिल करने का अधिकार समाप्त हो गया है, तो उसे अपने पक्ष में साक्ष्य पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि साक्ष्य केवल उन्हीं तथ्यों को सिद्ध करने के लिए दिया जा सकता है, जिनका उल्लेख पक्षकार ने अपनी दलीलों में किया हो। जब लिखित बयान ही नहीं है, तो उसके समर्थन में साक्ष्य देने का भी कोई आधार नहीं बनता।जस्टिस मनीष कुमार निगम ने कहा,"यदि कोई पक्षकार किसी महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख अपनी दलीलों में नहीं करता तो वह उस...

निर्माता पर कार्रवाई से पहले निरीक्षण और जांच की प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट
निर्माता पर कार्रवाई से पहले निरीक्षण और जांच की प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी निर्माता के खिलाफ विधिक माप विज्ञान (पैकेज्ड वस्तु) नियम, 2011 के तहत कार्रवाई करने से पहले नियम 19 और 21 में निर्धारित निरीक्षण एवं परीक्षण की प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। इन नियमों की अनदेखी कर की गई कार्रवाई कानूनन टिकाऊ नहीं होगी।जस्टिस आलोक माथुर ने कहा,"नियम 19 और 21 में निर्धारित पूर्व शर्तें अनिवार्य हैं। इनका उद्देश्य निर्माता और विक्रेता दोनों के हितों की रक्षा करना तथा यह सुनिश्चित करना है कि केवल वास्तविक दोषी के खिलाफ ही कार्रवाई हो।" मामला...

₹6.33 करोड़ रियल एस्टेट धोखाधड़ी मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाजी इकबाल के खिलाफ जांच STF से SFIO को सौंपी, FIR रद्द करने से इनकार
₹6.33 करोड़ रियल एस्टेट धोखाधड़ी मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाजी इकबाल के खिलाफ जांच STF से SFIO को सौंपी, FIR रद्द करने से इनकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ₹6.33 करोड़ के कथित रियल एस्टेट धोखाधड़ी मामले में पूर्व एमएलसी हाजी इकबाल उर्फ बाला के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए जांच उत्तर प्रदेश एसटीएफ (STF) से लेकर सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) को सौंपने का आदेश दिया है।जस्टिस चंद्रधारी सिंह और जस्टिस लक्ष्मीकांत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि जब आरोप स्पष्ट हों और प्रथम दृष्टया अपराध बनता हो, तब शुरुआती चरण में आपराधिक कार्यवाही को रोका नहीं जा सकता। अदालत ने कहा कि एफआईआर रद्द करने से शिकायतकर्ता के पास कोई...

फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेजों के इस्तेमाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, याचिकाकर्ता और उसके वकील के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का आदेश
फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेजों के इस्तेमाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, याचिकाकर्ता और उसके वकील के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका (PIL) में फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेजों के इस्तेमाल का प्रथम दृष्टया मामला पाए जाने पर याचिकाकर्ता और उसके अधिवक्ता के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट से रिकॉर्ड पर मौजूद हस्ताक्षरों में गंभीर विसंगतियां सामने आई हैं, जिससे जालसाजी और दस्तावेजों में हेरफेर की आशंका बनती है।चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कुशीनगर...

वकालतनामे पर हस्ताक्षर विवाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फॉरेंसिक जांच के दिए आदेश
वकालतनामे पर हस्ताक्षर विवाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फॉरेंसिक जांच के दिए आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजीपुर स्थित नेहरू विद्यापीठ इंटर कॉलेज के प्रबंधन से जुड़े मामले में विवादित वकालतनामे पर किए गए हस्ताक्षरों की फॉरेंसिक जांच कराने का आदेश दिया है। अदालत के समक्ष एक पक्षकार ने दावा किया कि उसने न तो वकालतनामे पर हस्ताक्षर किए और न ही संबंधित अधिवक्ता को अपनी ओर से पेश होने के लिए अधिकृत किया था।जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकलपीठ के समक्ष यह विवाद पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ता शिव शंकर सिंह ने कहा कि उन्होंने संबंधित अधिवक्ता को कभी नियुक्त नहीं...

चुनाव याचिका में जाति प्रमाणपत्र की वैधता की जांच नहीं कर सकता चुनाव न्यायाधिकरण: इलाहाबाद हाईकोर्ट
चुनाव याचिका में जाति प्रमाणपत्र की वैधता की जांच नहीं कर सकता चुनाव न्यायाधिकरण: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि चुनाव याचिका की सुनवाई के दौरान चुनाव न्यायाधिकरण किसी जाति प्रमाणपत्र की वैधता की जांच नहीं कर सकता और न ही उसे फर्जी घोषित करने का अधिकार रखता है।जस्टिस नीरज तिवारी ने स्पष्ट किया कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी जाति प्रमाणपत्र की वैधता तय करने या उसे निरस्त करने का अधिकार केवल राज्य सरकार द्वारा गठित जिला, मंडलीय और राज्य स्तरीय जांच समितियों को है। चुनाव न्यायाधिकरण इस विषय पर निर्णय देने का अधिकार नहीं रखता।कोर्ट ने कहा,"अब यह पूरी तरह...