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हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 28, 28A और 29: अपील, डिक्री का प्रवर्तन और बचत खंड
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) न केवल वैवाहिक संबंधों को नियंत्रित करता है बल्कि न्यायिक निर्णयों (Judicial Decisions) की अंतिम अपील (Finality of Appeals) और उनके प्रवर्तन (Enforcement) के लिए भी प्रक्रियाएँ प्रदान करता है।धारा 28 (Section 28) और धारा 28A (Section 28A) यह सुनिश्चित करती हैं कि वैवाहिक मामलों में पारित आदेशों को चुनौती दी जा सके और उन्हें प्रभावी बनाया जा सके। वहीं, धारा 29 (Section 29), एक महत्वपूर्ण बचत खंड (Savings Clause) के रूप में, अधिनियम के लागू होने...
पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 21 और 22 के अनुसार संपत्ति के नक्शे, योजनाएँ और सरकारी सर्वेक्षणों का अनिवार्य उपयोग
21. संपत्ति का विवरण और नक्शे या योजनाएँ (Description of property and maps or plans)यह धारा इस बात पर जोर देती है कि अचल संपत्ति (immovable property) से संबंधित दस्तावेजों में संपत्ति का स्पष्ट और पर्याप्त विवरण होना चाहिए ताकि उसे पहचाना जा सके। यह धोखाधड़ी को रोकने और भविष्य में संपत्ति के सीमा विवादों (boundary disputes) को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है। उपधारा (1) स्पष्ट रूप से बताती है कि अचल संपत्ति से संबंधित कोई भी गैर-वसीयती दस्तावेज (non-testamentary document) पंजीकरण (registration) के...
मुस्लिम निकाह का अनुबंध: विवाह की शर्तें, विघटन के तरीके और न्यायपालिका का हस्तक्षेप
भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ (Personal Law) इस्लामी शरिया कानून (Islamic Sharia Law) पर आधारित है, लेकिन इसे भारतीय अदालतों (Indian Courts) की विभिन्न कानूनी ढाँचों (Legal Frameworks) और व्याख्याओं (Interpretations) ने भी आकार दिया है। इसका मतलब है कि इसमें धार्मिक सिद्धांतों (Religious Principles) और भारतीय कानूनी मिसालों (Legal Precedents) का मिश्रण है।मुस्लिम विवाह का सार: एक पवित्र अनुबंध (The Essence of Muslim Marriage: A Sacred Contract) मुस्लिम विवाह, जिसे "निकाह" (Nikah) के नाम से जाना...
क्या धारा 143A के तहत अंतरिम मुआवजा देना जरूरी है या अदालत का विवेकाधिकार?
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर आधारित है क्या Negotiable Instruments Act, 1881 की धारा 143A(1) में 'interim compensation' (अंतरिम मुआवज़ा) देने का आदेश अनिवार्य (Mandatory) है या यह सिर्फ़ अदालत का विवेकाधिकार (Discretionary) है। इस निर्णय में अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यह प्रावधान अनिवार्य नहीं, बल्कि निर्देशात्मक (Directory) है।धारा 143A की भूमिका और उद्देश्य (Purpose and Context of Section 143A)साल 2018 में अधिनियम संख्या 20 के माध्यम से धारा 143A कानून में...
Hindu Marriage Act में म्यूच्युअल कॉन्सेट से Divorce
म्यूच्यूअल कॉन्सेट से डिवोर्स आधुनिक परिकल्पना है। प्राचीन शास्त्रीय हिंदू विधि के अधीन विवाह एक संस्कार है तथा जन्म जन्मांतरों का संबंध है परंतु आधुनिक परिवेश में तलाक भी समाज की बड़ी आवश्यकता बन कर उभरी है। यदि आपसी मतभेद के बीच रह रहे पति पत्नी के बीच तलाक नहीं हो तो यह बड़े अपराधों को जन्म दे सकता है।Hindu Marriage Act 1955 में जिस समय भारत की संसद द्वारा बनाया गया था तब इसमें पारस्परिक सहमति से विवाह विच्छेद का कोई प्रावधान नहीं था। हिंदू विवाह अधिनियम 1979 में किए गए संशोधनों के अधीन हिंदू...
Hindu Marriage Act में पत्नी को प्राप्त Divorce का विशेषाधिकार
इस एक्ट की धारा धारा 13 की उपधारा (2) के अनुसार पत्नी को तलाक के कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं उन विशेषाधिकारों में पति द्वारा दूसरी शादी करने और बलात्कार पशुगमन, मेंटेनेंस की डिक्री मिलने इत्यादि के आधार पर भी तलाक मांगने का अधिकार है।पति द्वारा एक से अधिक पत्नियां रखनावर्तमान हिंदू विवाह अधिनियम एक पत्नी के सिद्धांत पर अधिनियमित किया गया है। यह अधिनियम बहुपत्नी प्रथा का समर्थन नहीं करता है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 की उपधारा 2 के खंड 1 के अंतर्गत कोई भी...
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 की धारा 70-72 : झूठी जानकारी के लिए दंड, नियम बनाने की शक्ति और सार्वजनिक सूचना देने का तरीका
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 के ये खंड फर्मों के पंजीकरण (Registration) से संबंधित अंतिम महत्वपूर्ण प्रावधानों पर प्रकाश डालते हैं। ये धाराएँ पंजीकरण प्रक्रिया में सत्यनिष्ठा (Integrity) बनाए रखने के लिए दंड का प्रावधान करती हैं, अधिनियम के प्रशासन (Administration) के लिए नियम बनाने की सरकार की शक्ति को परिभाषित करती हैं, और सार्वजनिक सूचना (Public Notice) देने के लिए आवश्यक प्रक्रियाओं को निर्धारित करती हैं। ये प्रावधान समग्र रूप से यह सुनिश्चित करते हैं कि फर्मों का पंजीकरण और उनसे संबंधित...
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 26-27: बच्चों की अभिरक्षा और संपत्ति का निपटारा
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) न केवल विवाह को नियंत्रित करता है बल्कि इसके विघटन (Dissolution) से उत्पन्न होने वाले महत्वपूर्ण पहलुओं, विशेष रूप से बच्चों के कल्याण (Welfare of Children) और विवाह के समय प्राप्त संपत्ति (Property acquired during marriage) के निपटारे पर भी ध्यान केंद्रित करता है।धारा 26 (Section 26) नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा (Custody of Minor Children), भरण-पोषण (Maintenance) और शिक्षा (Education) से संबंधित है, जबकि धारा 27 (Section 27) विवाह से संबंधित...
क्या पुलिस द्वारा चार्जशीट में प्रक्रियात्मक कमी आरोपी को स्वतः ज़मानत का अधिकार देती है?
सुप्रीम कोर्ट ने डब्लू कुजुर बनाम झारखंड राज्य (2024 INSC 197) के हालिया निर्णय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण आपराधिक प्रक्रिया से जुड़ा सवाल उठाया क्या पुलिस द्वारा प्रस्तुत की गई चार्जशीट (Chargesheet) यदि अधूरी हो, यानी बिना आवश्यक विवरण और दस्तावेज़ों के हो, तो क्या इसे वैध माना जा सकता है? और क्या ऐसी स्थिति में आरोपी धारा 167(2) CrPC के तहत डिफॉल्ट ज़मानत (Default Bail) का हकदार हो जाता है?इस फैसले में न केवल चार्जशीट की वैधता (Validity) पर विचार किया गया, बल्कि धारा 173(2) की अनदेखी के गंभीर...
पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 18, 19, 20 के तहत विवेकाधीन दस्तावेज और प्रस्तुति के नियम
18. जिन दस्तावेजों का पंजीकरण वैकल्पिक है (Documents of which registration is optional)यह धारा उन दस्तावेजों की सूची प्रदान करती है जिनका पंजीकरण (registration) अनिवार्य (compulsory) नहीं है, बल्कि वैकल्पिक (optional) है। इसका मतलब है कि इन दस्तावेजों को पंजीकृत कराना या न कराना व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है। हालांकि, पंजीकरण कराने से ऐसे दस्तावेजों को कानूनी वैधता और सार्वजनिक रिकॉर्ड में स्थान मिलता है, जो भविष्य के विवादों से बचने में सहायक हो सकता है। निम्नलिखित दस्तावेज इस अधिनियम के...
Hindu Marriage Act में Divorce के आधार
इस एक्ट की धारा 13 डिवोर्स के वह आधार दिए गए हैं जिन पर विवाह का कोई भी पक्षकार अदालत से तलाक मांग सकता है। धारा 13 के अनुसार-एडल्टरीएडल्टरी अर्थात व्यभिचार। विवाह का कोई पक्षकार अपनी पत्नी या पति से भिन्न किसी अन्य व्यक्ति से स्वेच्छा पूर्वक मैथुन करता है अर्थात सेक्स करता है तो इस आधार पर विवाह का व्यथित पक्षकार कोर्ट के समक्ष विवाह विच्छेद के लिए अर्जी प्रस्तुत कर सकता है।गीताबाई बनाम फत्तू एआईआर 1966 मध्य प्रदेश 130 के प्रकरण में कहा गया है कि एक विवाहित व्यक्ति अथवा एक दूसरे विपरीत लिंग के...
Hindu Marriage Act में Divorce के प्रावधान
हिन्दू विवाह एक संस्कार है जो पति पत्नी के बीच जन्मों का नाता है। समय और परिस्थितियां बदलती गई मनुष्य की आवश्यकताएं तथा उसके आचरण में परिवर्तन आता गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात वर्ष 1955 में आधुनिक हिंदू विधि की रचना की गई।इस विधि के अधीन आधुनिक हिंदू विवाह अधिनियम बनाया गया तथा इस अधिनियम के अंतर्गत विवाह के स्वरूप को संस्कार के साथ ही संविदा का भी रूप दिया गया। वर्तमान हिंदू विवाह हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अधीन संस्कार और संविदा का एक मिश्रित रूप है।अब यदि हिंदू विवाह संस्कार है तो इस...
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 की धारा 68-69: साक्ष्य के नियम और गैर-पंजीकरण के प्रभाव
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 के ये अंतिम खंड पंजीकरण (Registration) से संबंधित महत्वपूर्ण कानूनी प्रभावों पर प्रकाश डालते हैं। ये धाराएँ पंजीकृत फर्मों के रिकॉर्ड को साक्ष्य (Evidence) के रूप में स्वीकार करने के नियम और फर्म के पंजीकरण न होने पर उत्पन्न होने वाले गंभीर परिणामों को निर्धारित करती हैं। यह समझना महत्वपूर्ण है कि यद्यपि पंजीकरण अनिवार्य नहीं है, इसके अभाव में फर्म को कानूनी कार्यवाही में महत्वपूर्ण बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।धारा 68: साक्ष्य के नियम (Rules of Evidence) ...
क्या सांसद या विधायक घूस लेने पर संविधान में दी गई छूट का दावा कर सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सीता सोरेन बनाम भारत संघ (2024 INSC 161) के फैसले में एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल पर निर्णय दिया है — क्या कोई सांसद (MP) या विधायक (MLA) यह दावा कर सकता है कि उसने वोट देने या सदन में बोलने के लिए घूस (Bribe) ली हो तो उस पर अदालत में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता क्योंकि उसे संविधान के अनुच्छेद 105(2) या 194(2) में छूट (Immunity) दी गई है?सात जजों की पीठ ने पुराने फैसले पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम सीबीआई (1998) को पलटते हुए साफ किया कि संसद या विधान सभा के सदस्य अगर...
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24-25: वाद के लंबित रहने के दौरान और स्थायी भरण-पोषण एवं गुजारा भत्ता
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) न केवल वैवाहिक संबंधों की स्थिति को परिभाषित करता है, बल्कि यह उन वित्तीय चुनौतियों (Financial Challenges) को भी संबोधित करता है जो वैवाहिक विवादों (Matrimonial Disputes) के दौरान और बाद में उत्पन्न होती हैं। धारा 24 (Section 24) "वाद के लंबित रहने के दौरान भरण-पोषण" (Maintenance Pendente Lite) का प्रावधान करती है, जिसका उद्देश्य कार्यवाही के दौरान जरूरतमंद पति या पत्नी को सहायता प्रदान करना है। वहीं, धारा 25 (Section 25) "स्थायी गुजारा...
Registration Act, 1908 की धारा 17 के तहत संपत्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाले दस्तावेजों का अनिवार्य पंजीकरण
17. जिन दस्तावेजों का पंजीकरण अनिवार्य है (Documents of which registration is compulsory)यह धारा उन विशिष्ट दस्तावेजों की सूची देती है जिनका पंजीकरण (registration) अनिवार्य (compulsory) है। यह सुनिश्चित करता है कि संपत्ति (property) से संबंधित महत्वपूर्ण लेनदेन (transactions) सार्वजनिक रिकॉर्ड (public record) में दर्ज हों, जिससे पारदर्शिता (transparency) और कानूनी सुरक्षा (legal security) बढ़े। उपधारा (1) उन दस्तावेजों की सूची देती है जिन्हें पंजीकृत किया जाना चाहिए, बशर्ते कि वे उस जिले में...
Hindu Marriage Act में किसी भी विवाह के Voidable होने के लिए आधार
Hindu Marriage Act 1955 के अधीन किसी विवाह को Voidable विवाह घोषित किए जाने के लिए चार आधार दिए गए हैं। अधिनियम की धारा 12 के अनुसार यह चार आधार निम्न है-प्रत्यर्थी पति या पत्नी की नपुंसकता के कारण विवाह के पश्चात संभोग नहीं होना-विवाह इस अधिनियम की धारा 5 के खंड (2) में विनिर्दिष्ट शर्तों का उल्लंघन करता है-आवेदक याचिकाकर्ता की सम्मति बल प्रयोग द्वारा या कर्मकांड की प्रकृति के बारे में इत्यादि से संबंधित किसी तात्विक तथ्य या परिस्थिति के बारे में कपट द्वारा अभिप्राप्त की गई है-प्रत्यर्थी पत्नी...
Hindu Marriage Act की धारा 12 के प्रावधान
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 12 शून्यकरणीय विवाह के संदर्भ में उल्लेख कर रही है। इस धारा के अधीन उन आधारों को वर्णित किया गया है जिनके कारण हिन्दू विवाह शून्यकरणीय हो जाता है। शून्यकरणीय विवाह ऐसा विवाह होता है जो प्रारंभ से शून्य नहीं होता है तथा प्रारंभ से इस विवाह को विधिमान्यता प्राप्त होती है परंतु कोर्ट द्वारा अकृतता (nullity) की डिक्री प्रदान कर दिए जाने के पश्चात इस प्रकार का विवाह शून्यकरणीय हो जाता है।शून्य विवाह वह विवाह होता है जो प्रारंभ से ही शून्य होता है। इसका रूप अकृत (null)...
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 22 और 23 : गोपनीय कार्यवाही और कार्यवाही में डिक्री
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) के तहत वैवाहिक कार्यवाही (Matrimonial Proceedings) की प्रकृति संवेदनशील और व्यक्तिगत होती है। धारा 22 (Section 22) गोपनीयता (Confidentiality) सुनिश्चित करने के लिए इन कैमरा कार्यवाही (In Camera Proceedings) का प्रावधान करती है, जबकि धारा 23 (Section 23) उस आधारशिला (Cornerstone) के रूप में कार्य करती है जिस पर अदालतें वैवाहिक मामलों में राहत (Relief) प्रदान करती हैं।यह धारा न्याय के सिद्धांत (Principle of Justice) को बनाए रखते हुए, सुलह...
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 की धारा 63-67: फर्मों में परिवर्तनों का अभिलेखन, गलतियों का सुधार, और रिकॉर्ड का निरीक्षण
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 के ये खंड पंजीकृत (Registered) फर्मों से संबंधित महत्वपूर्ण परिवर्तनों को आधिकारिक रूप से दर्ज करने, रजिस्ट्रार के पास उपलब्ध जानकारी में किसी भी गलती को सुधारने, और सार्वजनिक रिकॉर्ड के निरीक्षण (Inspection) व प्रतियों (Copies) के प्रावधानों को निर्धारित करते हैं। ये धाराएँ फर्मों के बारे में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी की सटीकता, पारदर्शिता और पहुंच सुनिश्चित करती हैं, जो तीसरे पक्षों और फर्म के स्वयं के लिए महत्वपूर्ण है।धारा 63: फर्म में परिवर्तनों और विघटन...



















