सुप्रीम कोर्ट

कोई नुकसान न होने पर गिरफ्तारी के आधार बताने में प्रक्रियात्मक कमी होने पर भी आरोपी को जमानत नहीं मिलेगी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (28 अक्टूबर) को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के लिए जासूसी करने के आरोपी एक व्यक्ति की जमानत रद्द की। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के आधार बताने में अगर कोई प्रक्रियात्मक चूक हुई भी है तो भी इससे आरोपी को अपने बचाव का मौका न मिलने जैसा कोई नुकसान नहीं हुआ, इसलिए केवल इस आधार पर उसे जमानत नहीं दी जा सकती।जस्टिस एम.एम. सुंदेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें आरोपी को जमानत दी गई। आरोपी पर 'ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट' (Official...

कारगिल में तैनात सैनिक को युद्ध चोट पेंशन देने का फैसला बक़रार, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की केंद्र सरकार की आपत्ति

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (28 अक्टूबर) को पूर्व सैनिक को 'युद्ध चोट पेंशन' (War Injury Pension) देने के फैसले को बरकरार रखा। यह पेंशन उन्हें उस बीमारी के लिए दी गई है, जो 'ऑपरेशन रक्षक' के तहत कारगिल में उनकी तैनाती के दौरान हुई थी।जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने केंद्र सरकार की उस अपील को खारिज किया, जिसमें हाईकोर्ट और आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत पूर्व सैनिक को 'विकलांगता पेंशन' (Disability Pension) की जगह 'युद्ध चोट पेंशन'...

अलग-अलग अपराधों में उम्रकैद की सजा लगातार नहीं चल सकती, एक मामले में छूट से दूसरे की सजा खत्म नहीं होगी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि अलग-अलग अपराधों में दी गई उम्रकैद की सजाएं लगातार यानी एक के बाद एक नहीं चल सकतीं। हालांकि, दोनों सजाओं को इस तरह एक-दूसरे के ऊपर लागू किया जा सकता है कि एक अपराध में सजा में छूट या उसे कम किए जाने से दूसरे अपराध की उम्रकैद अपने आप समाप्त न हो।जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने 2016 में संविधान पीठ द्वारा दिए गए मुथुरामलिंगम एवं अन्य बनाम राज्य फैसले पर भरोसा करते हुए यह टिप्पणी की।कोर्ट ने निर्देश दिया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत...

UAPA | सिर्फ विदेशी नागरिक होने के आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता, भारत में अवैध प्रवेश साबित करना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (27 अक्टूबर) को कहा कि 'गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम' (UAPA) के तहत किसी विदेशी नागरिक को जमानत देने पर कोई रोक नहीं है।भारत सरकार की अपील खारिज करते हुए जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें श्रीलंका का नागरिक होने के आरोपी एक व्यक्ति को जमानत दी गई थी।कोर्ट ने कहा कि धारा 43D (7) के तहत किसी विदेशी नागरिक को जमानत देने के लिए कड़े नियम होने के बावजूद, अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा...

सुप्रीम कोर्ट: डिक्री के खिलाफ तीसरे पक्ष को अलग मुकदमा दायर करने की जरूरत नहीं, निष्पादन की कार्यवाही में उठा सकता है दावा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी सिविल डिक्री में पक्षकार नहीं रहा व्यक्ति भी संपत्ति पर अपने स्वतंत्र अधिकार, स्वामित्व या हित का दावा करते हुए सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के Order XXI Rules 97–101 के तहत डिक्री के निष्पादन का विरोध कर सकता है। ऐसे व्यक्ति को अपना दावा साबित करने के लिए अलग से मुकदमा दायर करने की जरूरत नहीं है।जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की खंडपीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें तीसरे पक्ष की आपत्ति खारिज करने के निचली अदालत के आदेश को...

S. 319 CrPC | अतिरिक्त आरोपी को समन करने से पहले क्रॉस-एग्जामिनेशन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने CrPC की धारा 319 (अब BNSS की धारा 358) के तहत महिला को अतिरिक्त आरोपी बनाए जाने का आदेश रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने उस गवाह की जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) पर ध्यान नहीं दिया, जिसके बयान के आधार पर उस महिला को आरोपी के तौर पर समन किया गया।जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने जोर देकर कहा कि किसी अतिरिक्त आरोपी को समन करने से पहले गवाह के पूरे बयान पर विचार किया जाना चाहिए। ऐसा तब और भी जरूरी हो जाता है, जब जिरह के दौरान दिए गए बयान उस मुख्य...

मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए अनिवार्य ग्रामीण सेवा के लिए दिशा-निर्देश तय करेंगे: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए अनिवार्य ग्रामीण सेवा को लेकर, संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित कुछ दिशा-निर्देश तय करने का संकेत दिया।जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने यह बात तब कही, जब इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का रुख स्पष्ट नहीं था। गौरतलब है कि यह बेंच कर्नाटक सरकार की अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही है। इस अधिसूचना के तहत कर्नाटक मेडिकल काउंसिल में स्थायी पंजीकरण पाने के लिए मेडिकल छात्रों को एक साल की अनिवार्य ग्रामीण सेवा पूरी...

UP पुलिस को जांच करना सिखाने की जरूरत: छह साल जेल में रहने के बाद बरी हुए व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने दिलाया ₹6 लाख मुआवजा

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को अपहरण और हत्या के मामले में छह साल तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहे एक व्यक्ति को ₹6 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया है। ट्रायल कोर्ट ने बाद में उसे बरी कर दिया था। मामले की जांच और अभियोजन की प्रक्रिया पर कड़ी नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे 'न्याय का मजाक' (Travesty of Justice) बताया।जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि पुलिस की लापरवाही भरी जांच और अभियोजन की अव्यवस्थित कार्यवाही के कारण एक व्यक्ति को छह साल...

पक्की कानूनी सहमति होने से पहले सार्वजनिक संपत्ति की कीमत बढ़ाने के लिए सार्वजनिक प्राधिकरण नीलामी पर फिर से विचार कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी सार्वजनिक संपत्ति के मामले में, पक्की कानूनी सहमति (बाइंडिंग कॉन्ट्रैक्ट) होने से पहले, उसकी कीमत अधिकतम करने के लिए सार्वजनिक प्राधिकरण नीलामी पर फिर से विचार कर सकता है।इसके साथ ही कोर्ट ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का वह फैसला रद्द किया, जिसमें चंडीगढ़ प्रशासन के उस निर्णय को खारिज कर दिया गया था, जिसके तहत बेदी अस्पताल की ₹12.58 करोड़ की बोली (नर्सिंग होम साइट के लिए) को रद्द कर दिया गया था।कोर्ट ने माना कि अलॉटमेंट लेटर जारी होने और कन्वेयंस डीड (संपत्ति...

विवादित व्हाट्सएप मैसेज के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में व्यक्ति को बरी किया

सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी किया। कोर्ट ने कहा कि जिन व्हाट्सएप मैसेज के जरिए उसे अपराध से जोड़ने का दावा किया गया था, वे उसकी सजा को बरकरार रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मैसेज भेजने वाले व्यक्ति ने इसे भेजने से इनकार कर दिया और अभियोजन पक्ष के गवाहों ने भी घटना के बारे में अभियोजन पक्ष के दावों का समर्थन नहीं किया।जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। इसमें आरोपी को अन्य बातों के अलावा, अभियोजन...

ट्रायल से पहले की हिरासत को बिना ट्रायल के सजा में नहीं बदला जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल से पहले की लंबी हिरासत को 'बिना ट्रायल के सजा' में नहीं बदला जा सकता। कोर्ट ने दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विचाराधीन कैदी (अंडरट्रायल) को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जल्द ट्रायल का अधिकार है। वित्तीय गड़बड़ी के गंभीर आरोपों वाले मामलों में भी इस अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए।जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने महेश चंद्र जोशी (पूर्व कांग्रेस मंत्री) और मुकेश पाठक को नियमित जमानत देते समय यह टिप्पणी की। इन दोनों पर राजस्थान में 'जल जीवन मिशन'...

BNSS में लोक सेवकों के लिए सुरक्षा उपायों का विस्तार: FIR दर्ज करने के न्यायिक आदेश से पहले मिलेगी सुरक्षा- पिनाराई विजयन केस में सुप्रीम कोर्ट ने किया स्पष्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (21 अक्टूबर) को कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(4) के तहत लोक सेवकों को मिलने वाले सुरक्षा उपायों का दायरा बढ़ाया गया। इसके तहत मजिस्ट्रेट द्वारा उनके खिलाफ जांच का आदेश देने से पहले उन्हें सुरक्षा मिलती है। यह CrPC की पुरानी धारा 156(3) से अलग है।जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने यह टिप्पणी तब की, जब उन्होंने केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और अन्य याचिकाकर्ताओं को CMRL-एक्सलॉजिक (Exalogic) मामले में FIR दर्ज करने के...

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव असंवैधानिक या अवैध तरीकों से दूषित हो जाए तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि संवैधानिक अदालतें आमतौर पर चुनाव प्रक्रिया में दखल नहीं देतीं, लेकिन जब यह सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करना जरूरी हो कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव असंवैधानिक या अवैध तरीकों से दूषित न हों, तो उनके हाथ बंधे नहीं होते।कोर्ट ने यह टिप्पणी आंध्र प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी युवाजन श्रमिक रायतू कांग्रेस पार्टी (YSRCP) को अंतरिम राहत देते हुए की। पार्टी ने आरोप लगाया कि हिंसा और कानून-व्यवस्था की खराब स्थिति के कारण उसके उम्मीदवारों को शहरी स्थानीय निकाय चुनावों...

मेडिकल रिपोर्ट में 75.5% दिव्यांगता, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने माना 100% कार्यात्मक दिव्यांगता; मुआवजा ₹77.84 लाख किया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति जीवनभर दूसरों पर निर्भर रहने और अटेंडेंट की सहायता लेने के लिए मजबूर है, तो उसे 100% कार्यात्मक दिव्यांगता से पीड़ित माना जा सकता है, भले ही मेडिकल बोर्ड ने उसकी शारीरिक दिव्यांगता का प्रतिशत इससे कम आंका हो।जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने मोटर दुर्घटना के एक मामले में यह टिप्पणी करते हुए पीड़ित सुनील कुमार का मुआवजा ₹36.22 लाख से बढ़ाकर ₹77.84 लाख कर दिया।क्या है पूरा मामला?यह मामला 22 अक्टूबर 2016 को केरल में त्रिशूर-कोडकारा...

अतिरिक्त भुगतान की वसूली रोकने वाले पुराने फैसलों में कॉन्ट्रैक्ट एक्ट की धारा 72 पर विचार नहीं किया गया: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि अतिरिक्त भुगतान की वसूली से जुड़े मामलों में अब तक आए किसी भी फैसले में 'इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872' की धारा 72 के लागू होने पर कोई चर्चा नहीं की गई।जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने यह टिप्पणी उन शिक्षकों की अपील खारिज करते हुए की, जिनके 'एकेडमिक ग्रेड पे' (Academic Grade Pay) लाभ वापस ले लिए गए, क्योंकि ये लाभ गलती से दिए गए। यह मामला अपीलकर्ताओं (शिक्षकों) को 'एकेडमिक ग्रेड पे' दिए जाने से जुड़ा है। उन्हें ये वित्तीय लाभ अक्टूबर 2009 के...

रिश्वत मांगने के मामले में PC Act की धारा 17A लागू नहीं होती, क्योंकि इसका सरकारी कर्तव्यों से कोई लेना-देना नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' (Prevention of Corruption Act), 1988 की धारा 17A, जिसके तहत सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ किसी जांच या पूछताछ से पहले पूर्व अनुमति लेना जरूरी होता है, वह रिश्वत मांगने के मामलों में लागू नहीं होगी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि रिश्वत मांगना सरकारी कर्तव्यों के पालन से जुड़ा हुआ काम नहीं है।जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने कहा कि यह प्रावधान केवल तब लागू होता है, जब कथित अपराध किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा अपने आधिकारिक कार्यों या...

संपत्ति सौंपना आपराधिक विश्वासघात का मुख्य आधार: सुप्रीम कोर्ट ने टेलीफोन विभाग के कैशियर को बरी करने के फैसले को बहाल रखा

सुप्रीम कोर्ट ने टेलीफोन विभाग के कैशियर-सह-काउंटर क्लर्क को बरी करने के फैसले को बहाल रखा। यह मामला भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 409 (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023/BNS की धारा 316(5)) के तहत दर्ज किया गया।कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि आरोपी को संपत्ति सौंपी गई, या उसने उसका गबन किया, या उसकी मंशा बेईमान थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी करने के फैसले को पलटने में हाई कोर्ट से गलती हुई। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस....