सुप्रीम कोर्ट

आपसी सहमति से शादी से पहले बने शारीरिक संबंध को अकेले खराब चरित्र का सबूत नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस में नियुक्ति की मंज़ूरी दी
आपसी सहमति से शादी से पहले बने शारीरिक संबंध को अकेले खराब चरित्र का सबूत नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस में नियुक्ति की मंज़ूरी दी

सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड को ऐसे उम्मीदवार को नियुक्त करने का निर्देश दिया, जिसे पुलिस कॉन्स्टेबल के तौर पर चुने जाने के बाद भी इसलिए हटा दिया गया, क्योंकि वह एक असफल प्रेम संबंध से जुड़े आपराधिक मामले में शामिल था। कोर्ट ने कहा कि दो अविवाहित बालिगों के बीच आपसी सहमति से शादी से पहले बने संबंधों को अकेले खराब नैतिक चरित्र का सबूत नहीं माना जा सकता।जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने गजुल थिरुपति की अपील को मंज़ूरी दी और तेलंगाना हाईकोर्ट के सिंगल जज का...

TIP के बिना कोर्ट में पहली बार आरोपी की पहचान हमेशा अभियोजन पक्ष के लिए नुकसानदायक नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट
TIP के बिना कोर्ट में पहली बार आरोपी की पहचान हमेशा अभियोजन पक्ष के लिए नुकसानदायक नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर शिकायत में आरोपी का ठीक से वर्णन किया गया या अपराध होने के तुरंत बाद उसे मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया गया, तो टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) के बिना कोर्ट में आरोपी की पहचान (डॉक आइडेंटिफिकेशन) अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर नहीं करेगी।जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने फिरौती के लिए अपहरण का अपराध करने के आरोपी दो व्यक्तियों की सजा बरकरार रखी।आरोपी ने सजा के खिलाफ तर्क दिया कि घटना के कई साल बाद बिना किसी TIP के गवाह द्वारा कोर्ट में पहली बार...

S. 138 NI Act | NGO की तरफ़ से चेक पर साइन करने वाले अधिकृत व्यक्ति को ड्रॉअर माना जाएगा, बाउंस होने पर वही ज़िम्मेदार होगा: सुप्रीम कोर्ट
S. 138 NI Act | NGO की तरफ़ से चेक पर साइन करने वाले अधिकृत व्यक्ति को 'ड्रॉअर' माना जाएगा, बाउंस होने पर वही ज़िम्मेदार होगा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कोई कंपनी किसी व्यक्ति को अपनी तरफ़ से चेक जारी करने और उन पर साइन करने (जिसमें पेमेंट करने की ज़िम्मेदारी भी शामिल है) के लिए अधिकृत करती है तो ऐसे व्यक्ति को 'ड्रॉअर' माना जाएगा और उस पर नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) की धारा 138 के तहत ज़िम्मेदारी लागू होगी।जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने NGO के ट्रेज़रर की सज़ा बरकरार रखा। उन्हें NGO का अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता (Authorized Signatory) नियुक्त किया गया था ताकि वह चेक जारी कर...

Specific Relief Act | खरीदार द्वारा विक्रेता को कानूनी नोटिस भेजने में देरी स्पेसिफिक परफॉर्मेंस से इनकार करने का आधार नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट
Specific Relief Act | खरीदार द्वारा विक्रेता को कानूनी नोटिस भेजने में देरी 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' से इनकार करने का आधार नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी (डिफेंडेंट) को बाकी रकम लेने और सेल डीड (बिक्री विलेख) निष्पादित करने के लिए कानूनी नोटिस भेजने में केवल देरी होने को वादी (प्लांटिफ) की अनुबंध पूरा करने की तत्परता और इच्छा की कमी नहीं माना जा सकता।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। इसमें अपीलकर्ता-वादी ने प्रतिवादी-डिफेंडेंट को बिक्री की कुल रकम का 93% भुगतान कर दिया था और बार-बार सेल डीड निष्पादित करने और बाकी रकम लेने के लिए कहा था। फिर भी उसे अनुबंध पूरा करने के...

ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत आरोपी को चार्जशीट में शामिल दस्तावेज़ देने से मना नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत आरोपी को चार्जशीट में शामिल दस्तावेज़ देने से मना नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (OSA) के तहत आरोपी व्यक्ति के खिलाफ़ अभियोजन पक्ष (Prosecution) द्वारा इस्तेमाल किए गए दस्तावेज़ों को उसे देने से सिर्फ़ इस आशंका के आधार पर मना नहीं किया जा सकता कि ऐसे गोपनीय या अहम दस्तावेज़ देने से देश की सुरक्षा और संरक्षा को खतरा हो सकता है।जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने कहा,"...हमारी पक्की राय है कि अपीलकर्ताओं को दस्तावेज़ देने से सिर्फ़ इस आधार पर मना नहीं किया जा सकता कि उनके खिलाफ़ OSA के प्रावधान...

जांच के दौरान केस रिकॉर्ड खोना आपराधिक न्याय प्रणाली की जड़ों पर प्रहार: सुप्रीम कोर्ट
जांच के दौरान केस रिकॉर्ड खोना आपराधिक न्याय प्रणाली की जड़ों पर प्रहार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात में 19 साल पुराने एक आपराधिक मामले की जांच के दौरान केस रिकॉर्ड खो जाने पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं आपराधिक न्याय प्रणाली की जड़ों पर प्रहार करती हैं और वास्तविक शिकायतों को निष्प्रभावी बना देती हैं।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने गुजरात सरकार को यह बताने का निर्देश दिया कि रिकॉर्ड खोने के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारी के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है। साथ ही अदालत ने लंबित जांच छह सप्ताह के भीतर पूरी कर रिपोर्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट के...

S.35L Central Excise Act | एक्साइज़ेबिलिटी के सवाल पर अपील का फ़ैसला सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट कर सकता है, हाईकोर्ट नहीं: एससी
S.35L Central Excise Act | एक्साइज़ेबिलिटी के सवाल पर अपील का फ़ैसला सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट कर सकता है, हाईकोर्ट नहीं: एससी

सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि सामान की एक्साइज़ेबिलिटी से जुड़े विवाद उसके खास अपीलीय अधिकार क्षेत्र में आते हैं और सेंट्रल एक्साइज़ एक्ट, 1944 की धारा 35G के तहत हाईकोर्ट उनका फ़ैसला नहीं कर सकते।कोर्ट ने फ़ैसला दिया,"एक्साइज़ ड्यूटी की दर या असेसमेंट के मकसद से सामान की कीमत से जुड़े किसी भी सवाल के निर्धारण के संबंध में अपीलीय ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेश के खिलाफ़ अपील इस कोर्ट में की जा सकती है, हाईकोर्ट में नहीं। हालांकि, यह रोक ड्यूटी की दर या सामान की कीमत से जुड़े हर सवाल पर लागू नहीं...

2003 में ग्रामीण टेलीफ़ोन एक्सचेंज से CDR न मिलना कोई बड़ी बात नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने अपहरण मामले में सज़ा सही ठहराई
2003 में ग्रामीण टेलीफ़ोन एक्सचेंज से CDR न मिलना कोई बड़ी बात नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने अपहरण मामले में सज़ा सही ठहराई

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि अगर ठोस मौखिक सबूत मज़बूत, भरोसेमंद और पूरी तरह से बेदाग हों तो कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) पेश न करना अभियोजन पक्ष के मामले के लिए घातक नहीं होगा।जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने दो लोगों की सज़ा को सही ठहराया। इन पर 2003 में दर्ज FIR के सिलसिले में IPC की धारा 346A के तहत फिरौती के लिए अपहरण करने का आरोप था।अपील करने वाले आरोपियों ने दलील दी कि फिरौती की मांग से जुड़ा CDR पेश न करना अभियोजन पक्ष के मामले के लिए घातक साबित होगा। उन्होंने...

Hindu Minority & Guardianship Act | सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग की संपत्ति के लिए अभिभावक द्वारा धारा 8 के तहत आवेदन पर सिद्धांतों को स्पष्ट किया
Hindu Minority & Guardianship Act | सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग की संपत्ति के लिए अभिभावक द्वारा धारा 8 के तहत आवेदन पर सिद्धांतों को स्पष्ट किया

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (3 जून) को फैसला सुनाया कि हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 (HMGA) की धारा 8 के तहत प्राकृतिक अभिभावकों के उन आवेदनों की जांच करते समय, जिनमें वे नाबालिग की संपत्ति के प्रबंधन की मांग करते हैं, अदालतों को इस बात का यथार्थवादी मूल्यांकन करना चाहिए कि क्या प्रस्तावित लेनदेन से नाबालिग को "स्पष्ट लाभ" मिल रहा है; न कि ऐसे आवेदनों को तकनीकी या अनुमानित आधारों पर खारिज कर देना चाहिए।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकपम कोटिसवार सिंह की खंडपीठ ने टिप्पणी...

कोई सार्वभौमिक नियम नहीं कि रिक्तियां उन्हीं नियमों के अनुसार भरी जानी चाहिए, जो रिक्तियां उत्पन्न होने के समय मौजूद थे: सुप्रीम कोर्ट
कोई सार्वभौमिक नियम नहीं कि रिक्तियां उन्हीं नियमों के अनुसार भरी जानी चाहिए, जो रिक्तियां उत्पन्न होने के समय मौजूद थे: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यह फैसला दिया कि सरकारी कर्मचारियों के पास भर्ती नियमों के तहत पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का कोई निहित अधिकार नहीं होता, भले ही वे नियम रिक्तियाँ उत्पन्न होने के समय मौजूद रहे हों। इसके बजाय, लागू नियम वे होते हैं जो उस तारीख को प्रभावी होते हैं, जब पदोन्नति प्रक्रिया पर वास्तव में विचार किया जाता है।कोर्ट ने State of Odisha & Ors. v. Sreepati Ranjan Dash, 2026 LiveLaw (SC) 514 मामले में यह फैसला सुनाया था,"एक कर्मचारी के पास पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का...

ज़्यादा क्वालिफिकेशन वाले व्यक्ति को कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए तय पद के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
ज़्यादा क्वालिफिकेशन वाले व्यक्ति को कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए तय पद के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी ऐसी नौकरी के लिए अपनी ज़्यादा क्वालिफिकेशन छिपाना, जो खास तौर पर कम क्वालिफिकेशन वाले लोगों के लिए रिज़र्व है, असल में काबिल और हकदार उम्मीदवारों को नौकरी से वंचित करने जैसा है।जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा,"...जब कोई पद खास तौर पर कम क्वालिफिकेशन वाले उम्मीदवारों के लिए तय किया गया हो तो ज़्यादा क्वालिफिकेशन वाले किसी व्यक्ति को वह नौकरी पाने की इजाज़त देने का नतीजा यह होगा कि कोई असल में काबिल और हकदार उम्मीदवार उस मौके से वंचित...

लंबे समय तक वैवाहिक अलगाव मानसिक क्रूरता माना जा सकता है; खत्म हो चुके रिश्ते को बनाए रखना ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
लंबे समय तक वैवाहिक अलगाव 'मानसिक क्रूरता' माना जा सकता है; खत्म हो चुके रिश्ते को बनाए रखना ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक व्यक्ति को दी गई तलाक की डिक्री सही ठहराई। उस व्यक्ति की पत्नी पिछले 15 सालों से उससे अलग रह रही थी। कोर्ट ने कहा कि जब पति-पत्नी अलग-अलग पेशेवर और भौगोलिक रास्ते चुन लेते हैं और बिना दूरी कम करने की कोई कोशिश किए सालों तक एक-दूसरे से अलग रहते हैं तो वैवाहिक ढांचा ही खत्म माना जाता है।कोर्ट ने कहा,"ऐसी परिस्थितियों में अलगाव सिर्फ़ व्यक्तिगत द्वेष या एकतरफ़ा गलती का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह वैवाहिक बंधन को दोनों पक्षों द्वारा असल में छोड़ देने का रूप ले लेता...

हर मोबाइल फ़ोन एक वर्चुअल गैंबलिंग हाउस बन गया है, ऑनलाइन गेमिंग की लत सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा: सुप्रीम कोर्ट
हर मोबाइल फ़ोन एक 'वर्चुअल गैंबलिंग हाउस' बन गया है, ऑनलाइन गेमिंग की लत सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए का व्यापक प्रसार सार्वजनिक व्यवस्था, सार्वजनिक शांति और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि तकनीकी विकास ने हर मोबाइल फ़ोन को एक "वर्चुअल आम जुआ घर" में बदल दिया और सट्टेबाजी व जुए को पूरे समाज में ज़्यादा सामान्य और सुलभ बना दिया।जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि राज्य संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 1 के तहत "सार्वजनिक व्यवस्था" पर अपनी विधायी शक्ति...

दूसरी शिकायत में नए गंभीर आरोप जोड़ने से अभियोजन पर संदेह: सुप्रीम कोर्ट ने FIR रद्द की
दूसरी शिकायत में नए गंभीर आरोप जोड़ने से अभियोजन पर संदेह: सुप्रीम कोर्ट ने FIR रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि दूसरी शिकायत में ऐसे महत्वपूर्ण आरोप जोड़े जाते हैं जो पहली शिकायत में मौजूद नहीं थे, तो इससे अभियोजन की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा होता है और ऐसी स्थिति में आपराधिक कार्यवाही रद्द की जा सकती है।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ एक भूमि विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी। शिकायतकर्ता ने दूसरी शिकायत में पहली बार जबरन वसूली, धन की मांग और धमकी के आरोप लगाए थे, जबकि मई 2009 में दर्ज पहली शिकायत में ऐसे आरोप नहीं थे।अदालत ने पाया कि वर्ष 2000...

कौशल वाले खेलों पर सट्टेबाजी के लिए कोई संवैधानिक सुरक्षा नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने दांव वाले ऑनलाइन गेम्स पर रोक वाले कानूनों को सही ठहराया
'कौशल वाले खेलों पर सट्टेबाजी के लिए कोई संवैधानिक सुरक्षा नहीं': सुप्रीम कोर्ट ने दांव वाले ऑनलाइन गेम्स पर रोक वाले कानूनों को सही ठहराया

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में तमिलनाडु और कर्नाटक के उन कानूनों की संवैधानिक वैधता को सही ठहराया, जो खेलों पर ऑनलाइन सट्टेबाजी और दांव लगाने पर रोक लगाते हैं। कोर्ट ने कहा कि राज्य की विधायिकाएं सट्टेबाजी पर कानून बनाने में सक्षम हैं, भले ही वह खेल कौशल पर आधारित हो।जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने फैसला सुनाया कि राज्यों के पास संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 34 के तहत कौशल वाले खेलों पर सट्टेबाजी को विनियमित करने और उस पर रोक लगाने की शक्ति है। यह प्रविष्टि...

जब देश पर ड्रग्स के व्यापार से खतरा हो तो व्यक्तिगत आज़ादी से ऊपर देश की संप्रभुता होती है: सुप्रीम कोर्ट
जब देश पर ड्रग्स के व्यापार से खतरा हो तो व्यक्तिगत आज़ादी से ऊपर देश की संप्रभुता होती है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हेरोइन की तस्करी के एक मामले में आरोपी को दी गई रेगुलर ज़मानत रद्द की। कोर्ट ने कहा कि देश की संप्रभुता निजी आज़ादी से ऊपर होनी चाहिए, खासकर उन मामलों में जिनमें ड्रग्स की सप्लाई शामिल हो, क्योंकि इससे लोगों की सेहत और देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है।कोर्ट ने कहा,"अगर देश की संप्रभुता और निजी आज़ादी के बीच कोई टकराव होता है तो बिना किसी शक के, देश की संप्रभुता ही ऊपर मानी जाएगी। खासकर तब, जब देश के खिलाफ कोई जंग छेड़ी गई हो - चाहे वह ड्रग्स की सप्लाई के रूप...

शादी के बाद बेटी अपने मायके से रिश्ते नहीं तोड़ती, ऐसी लैंगिक रूढ़िवादिता संविधान के खिलाफ है: सुप्रीम कोर्ट
शादी के बाद बेटी अपने मायके से रिश्ते नहीं तोड़ती, ऐसी लैंगिक रूढ़िवादिता संविधान के खिलाफ है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मानना ​​कि शादीशुदा बेटी अपने माता-पिता के परिवार की सदस्य नहीं रहती, लैंगिक रूढ़िवादिता पर आधारित है और समानता के संवैधानिक सिद्धांत के अनुसार इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।यह टिप्पणी जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने एक ऐसे मामले में की, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शादीशुदा बेटी को उसकी माँ की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति देने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि उत्तर प्रदेश सरकार के 2019 के एक आदेश के अनुसार, 'शादीशुदा बेटी' को परिवार की परिभाषा से...

Prevention Of Corruption Act | अधीनस्थों के लिए रिश्वत मांगने वाला सरकारी कर्मचारी भी दोषी माना जाएगा: सुप्रीम कोर्ट
Prevention Of Corruption Act | अधीनस्थों के लिए रिश्वत मांगने वाला सरकारी कर्मचारी भी दोषी माना जाएगा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention Of Corruption Act) की धारा 7 के तहत दोषी ठहराए जाने के लिए किसी सरकारी कर्मचारी का रिश्वत की मांग करना या उसे खुद स्वीकार करना ज़रूरी नहीं है। यह मानते हुए कि यह प्रावधान तीसरे पक्षों के माध्यम से और किसी अन्य व्यक्ति के लाभ के लिए अनुचित लाभ प्राप्त करने के प्रयासों को भी शामिल करता है, कोर्ट ने कर्नाटक पुलिस के सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ भ्रष्टाचार की FIR को बहाल किया। इस सब-इंस्पेक्टर पर अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से...

शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना असंवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट ने पलटा इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला
शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना असंवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट ने पलटा इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

देश की सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि केवल विवाह हो जाने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति या उससे जुड़े लाभों से बाहर नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उन फैसलों को निरस्त कर दिया, जिनमें विवाहित बेटियों को परिवार की परिभाषा से बाहर मानते हुए अनुकंपा नियुक्ति का लाभ देने से इनकार किया गया था।जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि वैवाहिक स्थिति किसी पात्र बेटी को कल्याणकारी योजना से वंचित...