सुप्रीम कोर्ट
क्या अलग-अलग कमिटल ऑर्डर होने के बावजूद सेशंस कोर्ट जॉइंट ट्रायल कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने समझाया
सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि कमिटल ऑर्डर यह तय नहीं करते कि ट्रायल जॉइंट होगा या अलग-अलग; यह फ़ैसला पूरी तरह से ट्रायल कोर्ट का होता है।जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा,"...कमिटल ऑर्डर यह तय नहीं करते कि ट्रायल सिंगल, अलग-अलग या जॉइंट होगा; यह पूरी तरह से कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में है।" कोर्ट ने कहा कि "कमिटल ऑर्डर सेशंस कोर्ट को उन लोगों के ट्रायल का संज्ञान (कॉग्निज़ेंस) लेने का अधिकार देता है जिन्हें भेजा गया है, लेकिन यह ट्रायल के लिए संज्ञान लेने का आधार नहीं...
पिछली तारीख से टैक्स की देनदारी सही, लेकिन जुर्माना नहीं : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही कानूनी संशोधन के ज़रिए पिछली तारीख से टैक्स की देनदारी सही तरीके से लागू की जा सकती है, लेकिन किसी डीलर पर पिछली तारीख से जुर्माना नहीं लगाया जा सकता, जिसने उस समय कानून का पालन किया था जब लेन-देन हुआ था।जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने यह अंतर तब स्पष्ट किया, जब उन्होंने कर्नाटक सेल्स टैक्स एक्ट, 1957 में 2001 के संशोधन की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी। इस संशोधन ने चीनी पर मिलने वाली छूट को पिछली तारीख से केवल "भारत में उत्पादित या...
S.101(2) JJ Act | JJB के आदेश के खिलाफ अपील की सुनवाई में चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट की मदद लेना ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में साफ़ किया कि कानून के दायरे में आए बच्चे (Child in Conflict with Law) की शुरुआती जांच (Preliminary Assessment) करते समय चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट एक्सपर्ट की मदद लेने का नियम, जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और सुरक्षा) एक्ट, 2015 की धारा 101(2) पर उसी तरह लागू नहीं होगा।धारा 15(1) के प्रावधान के अनुसार, जब यह तय किया जा रहा हो कि कानून के दायरे में आए बच्चे पर बालिग की तरह मुकदमा चलाया जाए या नहीं तो बोर्ड के लिए चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट की एक्सपर्ट मदद लेना ज़रूरी है, बशर्ते...
दोषी लोगों की अपील में देरी को माफ़ करने में अदालतों को उदार रवैया अपनाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अदालतों को दोषी लोगों की अपील में देरी को माफ़ करने की अर्ज़ी पर विचार करते समय उदार और सक्रिय रवैया अपनाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि प्रक्रियात्मक देरी किसी कैदी के उस अधिकार के रास्ते में नहीं आनी चाहिए जिसके तहत वह अपनी आज़ादी पर असर डालने वाली सज़ा को चुनौती दे सकता है।जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने यह टिप्पणी ओडिशा के एक व्यक्ति की सज़ा रद्द करते हुए की, जिसने ट्रिपल मर्डर केस में 22 साल जेल में बिताए। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन...
वकीलों को कोर्ट परिसर में सभी के साथ शालीन व्यवहार करना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वकीलों का कोर्ट परिसर में शालीन और मर्यादित व्यवहार करना जरूरी है। वकील का कर्तव्य केवल अपने मुवक्किल के साथ ही नहीं, बल्कि विपक्षी वकील और उसके मुवक्किल के प्रति भी सम्मानजनक व्यवहार करना है।जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने कहा कि कोर्ट परिसर में वकील का अनुचित व्यवहार Advocates Act, 1961 के तहत पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) माना जा सकता है। ऐसे मामले में संबंधित State Bar Council या Bar Council of India संज्ञान ले सकती है।यह...
Know The Law | अनुसमर्थन का सिद्धांत (Doctrine Of Ratification): सुप्रीम कोर्ट ने सिद्धांतों को समझाया
प्रशासनिक कानून में अनुसमर्थन के सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब सक्षम अधिकारी किसी ऐसे काम को मंज़ूरी (अनुसमर्थन) देता है, जो शुरू में बिना अधिकार के किया गया तो वह मंज़ूरी मूल काम की तारीख से ही प्रभावी मानी जाती है। इससे वह काम ऐसा ही वैध हो जाता है जैसे कि शुरू से ही उसके लिए अधिकार मौजूद था।जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इस सिद्धांत के दायरे और असर को समझाया। वे एक कर्मचारी के इस्तीफ़े को मंज़ूरी देने की वैधता से जुड़े विवाद पर फ़ैसला...
यूक्रेन के पास Black Sea में लापता दो भारतीय नाविकों का अब तक पता नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने बीमा क्लेम में मदद के लिए कहा
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि MV AGN Ragnar पर Black Sea में हुए ड्रोन हमले के बाद लापता हुए दो भारतीय नाविकों दीपक कुमार गुप्ता और रामचंद्र का व्यापक Search and Rescue (SAR) अभियान के बावजूद अब तक पता नहीं चल पाया है।चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की खंडपीठ के समक्ष शुक्रवार को केंद्र ने बताया कि यूक्रेनी अधिकारियों, Romanian Maritime Rescue Coordination Centre (MRCC), Romanian Coast Guard और अन्य Rescue Services ने व्यापक तलाश की, लेकिन दोनों...
किसी डॉक्यूमेंट को सबूत के तौर पर पेश के तौर पर मार्क करना ही उसकी सामग्री का सबूत नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (7 अगस्त) को कहा कि किसी ऐसे डॉक्यूमेंट को स्वीकार करने पर उठाई गई आपत्तियों पर, जो केस के फ़ैसले के लिए शुरुआती तौर पर ज़रूरी है, आम तौर पर शुरुआती स्टेज पर ही फ़ैसला नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ इसलिए कि डॉक्यूमेंट को 'एग्ज़िबिट' के तौर पर पेश किया गया।कोर्ट ने कहा कि ट्रायल के शुरुआती स्टेज में किसी डॉक्यूमेंट को 'एग्ज़िबिट' (सबूत के तौर पर पेश) के तौर पर पेश करने का मतलब यह नहीं है कि उसकी सामग्री साबित हो गई; इसलिए 'एग्ज़िबिट' किए गए डॉक्यूमेंट्स को कानून के अनुसार...
Preventive Detention | प्रतिनिधित्व करने के अधिकार के बारे में न बताना गंभीर चूक, नज़रबंद व्यक्ति के खुद आवेदन करने पर भी यह कमी पूरी नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर नज़रबंद करने वाला अधिकारी नज़रबंद व्यक्ति को उसके सामने अपना पक्ष रखने (यानी प्रतिनिधित्व करने) के अधिकार के बारे में नहीं बताता है तो नज़रबंदी का आदेश गैर-कानूनी हो जाएगा। ऐसा तब भी होगा, जब नज़रबंद व्यक्ति ने खुद ही ऐसा कोई आवेदन या पक्ष रखा हो।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने 'नशीले पदार्थों और साइकोट्रोपिक पदार्थों की अवैध तस्करी की रोकथाम अधिनियम, 1988' के तहत की गई नज़रबंदी रद्द की। बेंच ने पाया कि नज़रबंद करने वाले अधिकारी ने नज़रबंद व्यक्ति...
National Highways Act | रेफ़रेंस कोर्ट मुआवज़े के हक के लिए मालिकाना हक़ तय कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फ़ैसला सुनाया कि नेशनल हाईवेज़ एक्ट के तहत रेफ़रेंस कोर्ट मुआवज़े के हक को तय करने के लिए मालिकाना हक़ से जुड़े सवालों पर भी विचार कर सकता है।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,"इसलिए धारा 3H (4) के तहत रेफ़रेंस कोर्ट का अधिकार क्षेत्र इतना व्यापक है कि वह मालिकाना हक़ से जुड़े सवालों पर भी विचार कर सकता है, बशर्ते ऐसा करना ज़मीन अधिग्रहण से मिलने वाले मुआवज़े के हकदार व्यक्ति को तय करने के लिए ज़रूरी हो। इसके उलट कोई भी व्याख्या विधायी योजना को...
कर्मचारी को नौकरी में बनाए रखने के फ़ैसले में 'वॉश्ड-ऑफ़ थ्योरी' लागू नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (6 अगस्त) को कहा कि नौकरी में बनाए रखने के लिए कर्मचारी की उपयुक्तता का आकलन करते समय नियोक्ता (Employer) केवल कर्मचारी के हालिया सर्विस रिकॉर्ड के आधार पर फ़ैसला लेने के लिए बाध्य नहीं है; बल्कि, फ़ैसला कर्मचारी के पूरे सर्विस रिकॉर्ड को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए।इसका मतलब है कि "वॉश्ड-ऑफ़ थ्योरी" - जिसके तहत प्रमोशन मिलने के बाद पिछली खराब एंट्रीज़ (Adverse Entries) को खत्म मान लिया जाता है - नौकरी में बनाए रखने के लिए कर्मचारी की उपयुक्तता का आकलन करते समय लागू...
जयपुर में कमर्शियल एरिया से नहीं हटे कोचिंग सेंटर, सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता; JDA से मांगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर में कमर्शियल क्षेत्रों में संचालित हो रहे कोचिंग संस्थानों पर चिंता जताते हुए कहा कि उनके लिए अलग से बहुमंजिला इमारतें बनाए जाने के बावजूद उन्हें अब तक वहां स्थानांतरित नहीं किया गया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इन इमारतों का आवंटन किसी अन्य व्यक्ति या संस्था को किया गया है, तो वह इस मामले में अदालत के अंतिम फैसले के अधीन रहेगा।जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) को तीन सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल कर यह...
आसाराम को सुप्रीम कोर्ट से राहत, पसंद के प्रशिक्षित Caregiver की 24 घंटे सेवा लेने की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने 2013 के दुष्कर्म मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को बड़ी राहत देते हुए अपनी पसंद के प्रशिक्षित Caregiver की 24 घंटे सेवा लेने की अनुमति दे दी है। हालांकि, कोर्ट ने उनकी सजा निलंबित (Suspension of Sentence) करने की मांग पर फिलहाल कोई फैसला नहीं दिया और मामले को लंबित रखा।जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस पी.बी. वराले की खंडपीठ ने AIIMS की मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर यह आदेश पारित किया। रिपोर्ट में कहा गया था कि आसाराम को फिलहाल अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत...
न्यायिक अधिकारी सरकारी कर्मचारी नहीं, उनकी रिटायरमेंट की उम्र अलग हो सकती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि न्यायिक अधिकारी सरकारी कर्मचारी नहीं होते और वे एक अलग और खास वर्ग बनाते हैं। कोर्ट ज़िला जजों की रिटायरमेंट की उम्र 60 से बढ़ाकर 62 साल करने के प्रस्ताव पर विचार कर रहा था।चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह बात तब कही जब वे कुछ राज्य सरकारों द्वारा इस प्रस्तावित बढ़ोतरी पर उठाए गए एक विरोध पर विचार कर रहे हैं।कोर्ट ने 22 जुलाई को हाई कोर्ट्स से कहा था कि वे न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट की उम्र...
Shiv Sena Case | सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा: विधायक दल के बहुमत पर राजनीतिक दल का ही फ़ैसला मान्य होगा
शिवसेना विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने आज मौखिक रूप से कहा कि मौजूदा कानून के अनुसार, लेजिस्लेटिव पार्टी पर पॉलिटिकल पार्टी का नियंत्रण बना रहता है और पॉलिटिकल पार्टी का कोई भी फ़ैसला लेजिस्लेटिव पार्टी के बहुमत की इच्छा पर हावी होगा (यानी उसी को माना जाएगा)।चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच उद्धव ठाकरे गुट के सदस्य सुनील प्रभु की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के उस फ़ैसले को चुनौती दी गई, जिसमें उन्होंने...
कॉम्प्रिहेंसिव/पैकेज मोटर इंश्योरेंस में गाड़ी में बैठे लोग भी कवर होते हैं: सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग तरह की पॉलिसी के बारे में बताया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कॉम्प्रिहेंसिव मोटर इंश्योरेंस पॉलिसी में गाड़ी के मालिक और उसमें बैठे लोग कवर होते हैं और इसे बेसिक थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस पॉलिसी के बराबर नहीं माना जा सकता। साथ ही कोर्ट ने इंश्योरेंस कंपनियों को एक स्टैंडर्ड "ऑप्ट-इन" सिस्टम अपनाने की सलाह दी है, जिससे ग्राहक इंश्योरेंस खरीदते समय अतिरिक्त कवर चुन सकें।यह फैसला नेशनल इंश्योरेंस कंपनी की उस अपील पर आया, जो तेलंगाना हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर की गई। हाईकोर्ट ने टी. रामू के परिवार को मुआवज़ा देने का आदेश दिया,...
फैसले तब तक पुराने समय से लागू माने जाते हैं, जब तक कि उन्हें खास तौर पर भविष्य से लागू न बताया जाए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फिर से कहा कि जब तक उसके फैसले में साफ़ तौर पर यह न कहा जाए कि फैसला भविष्य से लागू होगा, तब तक वह पुराने समय से लागू माना जाएगा।जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने कहा,"अगर सुप्रीम कोर्ट का कोई फैसला साफ़ तौर पर यह नहीं कहता कि उसे भविष्य से लागू किया जाना है, तो यह तय कानून है कि इस कोर्ट के सभी फैसले पुराने समय से लागू होते हैं..." बेंच ने यह बात कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के उस हिस्से को रद्द करते हुए कही, जिसमें अपील करने वाली पार्टी, केंद्र और राज्य सरकारों...
22 साल जेल में रहा निर्दोष, न्याय व्यवस्था की सामूहिक विफलता पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने एक हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि यह मामला आपराधिक न्याय प्रणाली की सामूहिक विफलता का उदाहरण है। अदालत ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर व्यक्ति को हिरासत में लिया गया, उससे थर्ड डिग्री यातना देकर स्वीकारोक्ति कराई गई, ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और हाईकोर्ट भी "मूकदर्शक" बना रहा। इन सबके कारण एक व्यक्ति ने 22 वर्ष जेल में बिताए, जबकि उसके खिलाफ विश्वसनीय साक्ष्य नहीं थे।जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की...
राज्य न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट आयु बढ़ाने का वित्तीय बोझ का बहाना नहीं बना सकते: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि राज्य सरकारें न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष करने का विरोध केवल अतिरिक्त वित्तीय बोझ या सरकारी कर्मचारियों की रिटायरमेंट आयु अलग होने का हवाला देकर नहीं कर सकतीं।अदालत ने इन दोनों आधारों को अस्वीकार्य बताते हुए राज्यों को इस मुद्दे पर दो सप्ताह के भीतर नए सिरे से स्वतंत्र निर्णय लेने का निर्देश दिया।मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ...
चेक बाउंस मामले में कंपनी को आरोपी न बनाना CrPC की धारा 319 के तहत समन भेजकर ठीक नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत चेक बाउंस की शिकायत में कंपनी को आरोपी न बनाना एक ऐसी गंभीर कमी है, जिसे बाद में ट्रायल के दौरान क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 319 के तहत कंपनी को अतिरिक्त आरोपी के तौर पर समन भेजकर ठीक नहीं किया जा सकता।जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने फैसला सुनाया कि जब कोई चेक कंपनी के बैंक अकाउंट से जारी किया जाता है तो NI Act की धारा 141 के तहत कंपनी के डायरेक्टर या अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं...



















