झारखंड हाईकोट
मध्यस्थता में समझौते पर हस्ताक्षर के बाद महज मन बदलने पर सहमति वापस नहीं ले सकता पक्ष: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि अदालत से जुड़ी मध्यस्थता प्रक्रिया के दौरान यदि पक्षकारों के बीच लिखित समझौता हो जाता है और दोनों उस पर हस्ताक्षर कर देते हैं तो बाद में केवल मन बदल जाने के आधार पर कोई एक पक्ष अपनी सहमति से पीछे नहीं हट सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि सहमति वापस लेने का अधिकार मध्यस्थता की प्रक्रिया चलने तक ही रहता है। समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद वह बाध्यकारी हो जाता है।जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने पति की ओर से दायर अपील पर...
लोन की रकम 'सौंपी गई संपत्ति' नहीं; सिर्फ़ लोन न चुका पाना 'क्रिमिनल ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट' नहीं: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि लोन के तौर पर दी गई रकम को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 के तहत 'क्रिमिनल ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट' (भरोसा तोड़ने का अपराध) के मकसद से उधार लेने वाले को 'सौंपी गई संपत्ति' नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि लोन लेने वाला लोन की रकम का इस्तेमाल करने के लिए आज़ाद होता है, जबकि किसी को सौंपी गई संपत्ति पाने वाले व्यक्ति को मालिक के निर्देशों के अनुसार ही उसका इस्तेमाल करना होता है।जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की सिंगल जज बेंच ने बकाया लोन की रकम न चुकाने के आरोप में धोखाधड़ी और...
बिना कानूनी अधिकार दुकान तोड़ने पर मुआवजे के आदेश के खिलाफ राज्य की अपील खारिज: झारखंड हाईकोर्ट ने कार्रवाई को बताया मनमाना
झारखंड हाईकोर्ट ने बिना कानूनी अधिकार के दुकान तोड़े जाने के मामले में दुकानदार को मुआवजा देने के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार की अपील खारिज की। कोर्ट ने कहा कि यह अपील न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है और ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारियों ने खुद पर मुआवजे की जिम्मेदारी तय होने के डर से इसे दाखिल किया।चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार 13 साल तक चली रिट कार्यवाही के दौरान भूमि से जुड़े कोई स्वामित्व दस्तावेज पेश नहीं कर सकी और एकल पीठ के आदेश तथा अवमानना...
अंतरिम कस्टडी की मुख्य मांग पर फैसला दिए बिना केवल मुलाकात का अधिकार नहीं दिया जा सकता : झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी अभिभावक ने अदालत में अंतरिम अभिरक्षा (कस्टडी) की मुख्य मांग की और उसके विकल्प के रूप में मुलाकात के अधिकार की मांग की है तो फैमिली कोर्ट मुख्य मांग पर कारण सहित फैसला दिए बिना सीधे वैकल्पिक राहत नहीं दे सकता।जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने रांची की एडिशनल प्रिंसिपल फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए नाबालिग बच्ची की अंतरिम अभिरक्षा उसकी मां को सौंपने का निर्देश दिया।हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था केवल अस्थायी होगी और...
5 साल तक सहमति से बने संबंधों को शादी न होने पर रेप नहीं कहा जा सकता: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने शादी का झूठा वादा कर दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि यदि दो वयस्क लंबे समय तक सहमति से रिश्ते में रहे हों, तो केवल शादी नहीं होने के आधार पर उसे रेप नहीं माना जा सकता।जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने आईपीसी की धारा 376 के तहत ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा रद्द कर आरोपी को बरी कर दिया।अभियोजन के अनुसार, पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा कर लगभग पांच वर्षों तक उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। ट्रायल कोर्ट ने...
पिता का अपनी नाबालिग संतान को उसकी माँ की कस्टडी से ले जाना किडनैपिंग नहीं: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि पिता, जो अपनी नाबालिग संतान का स्वाभाविक संरक्षक (Natural Guardian) होता है, उस पर अपनी पत्नी की कस्टडी से अपने ही बेटे को ले जाने के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363 के तहत किडनैपिंग का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। कोर्ट ने माना कि जब आरोपी खुद बच्चे का स्वाभाविक संरक्षक हो तो अपराध के ज़रूरी तत्व पूरे नहीं होते।जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की सिंगल जज बेंच ने एक व्यक्ति के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द की। उस व्यक्ति पर अपने चार साल के बेटे को किडनैप करने,...
पत्नी के चरित्र पर बेबुनियाद आरोप और बच्चे का पिता होने से इनकार करना वैवाहिक क्रूरता: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी के चरित्र (पवित्रता) पर सवाल उठाने वाले बेबुनियाद आरोप और उसके बच्चे का पिता होने से इनकार करना उसके चरित्र, सम्मान और प्रतिष्ठा पर गंभीर हमला है और यह वैवाहिक क्रूरता के दायरे में आता है।जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की डिवीजन बेंच ने पति की अपील खारिज की, जिसमें उसने स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 की धारा 27(1)(b) और 27(1)(d) के तहत क्रूरता और परित्याग (छोड़ देने) के आधार पर शादी खत्म करने से फैमिली कोर्ट के इनकार को चुनौती दी थी।दोनों पक्षों ने 25...
10 साल की बच्ची का हाथ पकड़कर शादी का प्रस्ताव देना मात्र से धारा 354 लागू नहीं होगी, गलत मंशा साबित होना जरूरी: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति 10 वर्षीय बच्ची का हाथ पकड़कर उससे शादी का प्रस्ताव देता है, लेकिन उसके पीछे कोई यौन या अशोभनीय मंशा साबित नहीं होती, तो मात्र इस आधार पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना) का अपराध नहीं बनता।जस्टिस राजेश कुमार की सिंगल बेंच ने आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए धारा 354 के तहत दोषी ठहराए गए आरोपी को बरी किया। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के अपने बयान से ही इस अपराध के आवश्यक तत्व साबित नहीं होते।यह अपील सरायकेला-खरसावां के विशेष अदालत...
सिर्फ उग्रवादी की पत्नी होना और मुठभेड़ स्थल पर बच्चे के साथ मौजूद रहना दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि सिर्फ किसी उग्रवादी की पत्नी होना और डेढ़ साल की बच्ची के साथ मुठभेड़ स्थल पर मौजूद रहना किसी महिला को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि जब तक अभियोजन यह साबित न करे कि आरोपी ने कोई आपराधिक कृत्य किया या वह किसी उग्रवादी संगठन की सदस्य थी, तब तक उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।यह फैसला जस्टिस अनुभा रावत चौधरी ने प्रमिला देवी की अपील स्वीकार करते हुए सुनाया। अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा रद्द करते हुए...
झारखंड हाईकोर्ट ने ज़मीन विवाद के बीच कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जारी प्रशासनिक आदेश में दखल देने से इनकार किया
झारखंड हाईकोर्ट ने ज़मीन विवाद के बीच कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सब-डिविजनल ऑफिसर (SDO) द्वारा जारी प्रशासनिक आदेश में दखल देने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि ज़मीन पर कब्ज़े और उसकी पहचान से जुड़े विवादित सवालों का निपटारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत कार्यवाही में नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने माना कि ऐसे विवादों के लिए सबूतों की ज़रूरत होती है और इनका सही निपटारा सिविल कोर्ट में ही हो सकता है, न कि रिट अधिकार क्षेत्र (writ jurisdiction) में।जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की सिंगल जज बेंच एक...
केवल नियंत्रण से तय नहीं होगा मालिक-कर्मचारी संबंध, सभी परिस्थितियों पर होगा विचार: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम के तहत मालिक और कर्मचारी के संबंध का निर्धारण केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि काम पर किसका नियंत्रण था। अदालत ने स्पष्ट किया कि 'नियंत्रण परीक्षण' कई मानकों में से केवल एक है और अंतिम निर्णय सभी तथ्यों, परिस्थितियों तथा अनुबंध की शर्तों को ध्यान में रखकर ही किया जाएगा।जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की सिंगल बेंच वर्ष 2016 में रांची स्थित झारखंड राज्य क्रिकेट संघ (JSCA) स्टेडियम में फ्लडलाइट की मरम्मत के दौरान तीन...
पंचायत सचिव को 'तुम-ताम' या 'मेरे-तेरे' कहकर बुलाना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: झारखंड हाईकोर्ट ने BDO के खिलाफ FIR रद्द की
झारखंड हाईकोर्ट ने ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (BDO) के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। उन पर एक पंचायत सचिव को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप था। कोर्ट ने कहा कि मृतक को सिर्फ़ "तुम-ताम" या "मेरे-तेरे" कहकर बुलाना आत्महत्या के लिए उकसाने जैसा नहीं है। कोर्ट ने माना कि अगर FIR में लगाए गए आरोपों को पूरी तरह सच भी मान लिया जाए तो भी वे भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध की शर्तों को पूरा नहीं करते हैं।जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की सिंगल जज बेंच उस याचिका पर सुनवाई...
व्यभिचार अब अपराध नहीं: झारखंड हाईकोर्ट ने विवाहेतर संबंध के आरोप में कॉन्स्टेबल की बर्खास्तगी रद्द की
झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड आर्म्ड पुलिस के एक कॉन्स्टेबल की बर्खास्तगी रद्द की। यह बर्खास्तगी विवाहेतर संबंध (Adultery) के आरोप में की गई। कोर्ट ने कहा कि 'जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद व्यभिचार अब कोई आपराधिक अपराध नहीं रह गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुशासनात्मक अधिकारी ने कॉन्स्टेबल को ऐसे आधार पर बर्खास्त किया था जो कभी चार्ज-शीट का हिस्सा ही नहीं था, जिससे यह आदेश गैर-कानूनी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाला हो गया।जस्टिस दीपक रोशन की...
गुड़ का बर्तन ज़मीन पर रखने पर बहू को डांटना क्रूरता नहीं: झारखंड हाईकोर्ट ने रद्द की सास की सजा
झारखंड हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत दोषी ठहराई गई एक सास की सजा रद्द करते हुए कहा कि केवल गुड़ के शीरे का बर्तन जमीन पर रखने पर बहू को डांटना या अपशब्द कहना अपने आप में क्रूरता नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष धारा 498ए के तहत आवश्यक कानूनी तत्व साबित करने में असफल रहा है।जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने यह फैसला दुमका के चतुर्थ अपर जिला एवं सेशन जज (फास्ट ट्रैक कोर्ट) के उस निर्णय के खिलाफ दायर आपराधिक अपील पर सुनाया, जिसमें सास को धारा 498ए के तहत...
2014 के चुनावी भाषण मामले में हेमंत सोरेन को राहत: हाईकोर्ट ने रद्द की आपराधिक कार्यवाही
झारखंड हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए भाषण से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने माना कि छोटानागपुर टेनेंसी (CNT) एक्ट, संथाल परगना टेनेंसी (SPT) एक्ट और श्रम कानूनों में प्रस्तावित बदलावों के बारे में उनकी टिप्पणियां 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' की धारा 125 के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आती हैं।जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की सिंगल जज बेंच उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आपराधिक कार्यवाही, 16 अगस्त 2017 के संज्ञान लेने वाले आदेश और...
NDPS Act के तहत 'भांग' को 'कैनाबिस (हेम्प)' की परिभाषा में शामिल नहीं किया गया: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि भांग रखना NDPS Act, 1985 के तहत अपराध नहीं है, क्योंकि इसे एक्ट की धारा 2(iii) के तहत "कैनाबिस (हेम्प)" की कानूनी परिभाषा से बाहर रखा गया। NDPS Act के तहत अपील करने वाले व्यक्ति की सज़ा रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि जब फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) ने रिपोर्ट दी कि ज़ब्त किया गया पदार्थ भांग था, न कि गांजा, तो सज़ा को बरकरार नहीं रखा जा सकता।जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की सिंगल जज बेंच एक क्रिमिनल अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें NDPS Act की धारा 20(B), 22(B) और...
सिर्फ कुर्फ़ानामा काफी नहीं, बेदखली रोकने के लिए 1949 के कानून से पहले 12 वर्ष का कब्जा साबित करना होगा: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति कुर्फ़ानामा के आधार पर जमीन पर अपना अधिकार जताकर बेदखली की कार्रवाई का विरोध करना चाहता है तो उसे यह साबित करना होगा कि संताल परगना काश्तकारी (पूरक उपबंध) अधिनियम, 1949 लागू होने से पहले उसका 12 वर्ष का वैध कब्जा था।अदालत ने यह भी कहा कि तस्दीक नियमावली की शर्तों को पूरा नहीं करने वाले कुर्फ़ानामा के आधार पर बेदखली की कार्रवाई को चुनौती नहीं दी जा सकती। जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें संताल परगना...
हिरासत में मौत और दुष्कर्म मामलों की न्यायिक जांच खत्म करने वाले NHRC के आदेश को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती
झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के उस सर्कुलर को चुनौती दी गई, जिसके जरिए हिरासत में मौत, हिरासत से लापता होने और हिरासत में दुष्कर्म के मामलों में अनिवार्य न्यायिक जांच संबंधी अपने पहले के निर्देश को वापस ले लिया गया था।याचिका में 14 मई 2024 का NHRC का सर्कुलर रद्द करने की मांग की गई। इस सर्कुलर में आयोग ने 4 सितंबर 2020 के अपने पूर्व निर्देश को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) लागू होने के बाद निष्प्रभावी बताते हुए उसे वापस और निरस्त कर दिया...
CrPC की धारा 216 के तहत आरोप बदलने या जोड़ने की शक्ति केवल अदालत की, पक्षकारों के आवेदन से नहीं होती सीमित: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 216 के तहत आरोप (Charge) में बदलाव या नया आरोप जोड़ने का अधिकार केवल ट्रायल कोर्ट के पास है। हालांकि, यदि अभियोजन या आरोपी इस संबंध में आवेदन देकर अदालत का ध्यान प्रासंगिक तथ्यों की ओर आकर्षित करते हैं, तो केवल इस वजह से अदालत की शक्ति सीमित नहीं हो जाती।जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने यह टिप्पणी उस आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, गढ़वा द्वारा धारा 328 और 302/34 आईपीसी के...
अभियोजन की अर्जी से ट्रायल कोर्ट की शक्ति सीमित नहीं होती, फैसला आने से पहले कभी भी आरोप बदले जा सकते हैं: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 216 के तहत आरोपों में संशोधन या नए आरोप जोड़ने का अधिकार केवल ट्रायल कोर्ट के पास है। यदि अभियोजन या आरोपी किसी आवेदन के माध्यम से इस ओर अदालत का ध्यान आकर्षित करता है तो मात्र इसी आधार पर अदालत की शक्ति सीमित नहीं हो जाती।जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ एडिशनल सेशन जज, गढ़वा के उस आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने धारा 216 के तहत अभियोजन की अर्जी स्वीकार...
















