उत्तराखंड हाईकोर्ट
रजिस्ट्रार के वैधानिक आदेश पर हुई सेवा समाप्ति के खिलाफ रिट याचिका सुनवाई योग्य: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि यदि किसी सहकारी समिति के कर्मचारी की सेवा समाप्ति सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार या वैधानिक अधिकार का प्रयोग करने वाले अधिकारी के निर्देश पर की गई हो, तो उसके खिलाफ दायर रिट याचिका सुनवाई योग्य होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में यह नहीं कहा जा सकता कि याचिका केवल सहकारी समिति की कार्रवाई के विरुद्ध है।चीफ जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ विशेष अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील उस आदेश के खिलाफ दायर की गई,...
समाहित कर्मचारियों के सेवा अधिकारों की रक्षा के लिए अलग पदोन्नति नियम वैध: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) से उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) में समाहित कर्मचारियों के लिए अलग पदोन्नति मानदंड तय करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं है। अदालत ने कहा कि इन कर्मचारियों की पहले से मौजूद सेवा शर्तों की रक्षा के उद्देश्य से किया गया वर्गीकरण उचित और वैध है।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी और जस्टिस पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने यह फैसला उन कर्मचारियों की याचिका पर सुनाया, जिन्होंने वर्ष 2018 के सेवा उपविधियों की वैधता को...
पहले से मौजूद सर्विस की शर्तों की सुरक्षा, एब्जॉर्ब किए गए कर्मचारियों के लिए अलग प्रमोशन क्राइटेरिया को सही ठहराती है: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट की जस्टिस मनोज कुमार तिवारी और जस्टिस पंकज पुरोहित की डिवीज़न बेंच ने माना कि 2018 के सर्विस बाय-लॉज़ के तहत बनाया गया वर्गीकरण आर्टिकल 14 के तहत उचित और वैध है। यह वर्गीकरण एक बाध्यकारी वादे के आधार पर एब्जॉर्ब किए गए UPPCL कर्मचारियों की पहले से मौजूद सर्विस की शर्तों की सुरक्षा करता है और उन्हें उन याचिकाकर्ताओं से अलग करता है, जिन्हें सीधे UPCL में नियुक्त किया गया और जिन्हें प्रमोशन के लिए 10 साल की क्वालिफाइंग सर्विस की आवश्यकता होती है।बैकग्राउंड फैक्ट्सयाचिकाकर्ताओं को...
कथित लापरवाही के कारण 'कर्मचारी मुआवजा अधिनियम' के तहत किसी तीसरे पक्ष को मुआवजा देने का आदेश नहीं दिया जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि 'कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923' के तहत मुआवजा केवल मृतक कर्मचारी के नियोक्ता (employer) को ही देना होगा, न कि कथित लापरवाही के आधार पर किसी तीसरे पक्ष को। कोर्ट ने कहा कि यह अधिनियम नियोक्ताओं द्वारा अपने कर्मचारियों को मुआवजा देने का प्रावधान करता है। इसका 'टॉर्टियस लायबिलिटी' (गलती या लापरवाही के लिए कानूनी जिम्मेदारी) से कोई लेना-देना नहीं है।जस्टिस रवींद्र मैठाणी 'कर्मचारी मुआवजा आयुक्त, रुद्रप्रयाग' द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ 'उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन...
CPC के ऑर्डर 33 नियम 9 के तहत 'निधन व्यक्ति' के तौर पर मुकदमा करने की अनुमति वापस नहीं ली जाती, तब तक वादी को कोर्ट फीस देने की ज़रूरत नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक 'निधन व्यक्ति' (indigent person) के तौर पर मुकदमा करने की अनुमति, जो वादी को दी गई, उसे पहले सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर 33 नियम 9 के अनुसार वापस नहीं लिया जाता, तब तक केवल कोर्ट फीस जमा करने की मांग वाली अर्ज़ी के आधार पर वादी को कोर्ट फीस जमा करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादियों ने वादी को 'निधन व्यक्ति' के तौर पर मुकदमा करने की अनुमति वापस लेने की मांग नहीं की, बल्कि बाकी सबूत दर्ज करने से पहले कोर्ट फीस जमा करने का...
POCSO Act के तहत समन जारी करना तब सही नहीं, जब शिकायत में लगाए गए आरोप, समन जारी करने से पहले के सबूतों में न हों: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी को सिर्फ़ शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर IPC की धारा 354A और POCSO Act की धारा 11/12 के तहत समन नहीं किया जा सकता, जब उन आरोपों की पुष्टि CrPC की धारा 200 और 202 के तहत दर्ज बयानों से न होती हो। कोर्ट ने कहा कि अगर शिकायतकर्ता और गवाहों के बयानों में कथित अपराधों के ज़रूरी तत्व मौजूद नहीं हैं तो उन प्रावधानों के तहत समन जारी करना सही नहीं होगा।जस्टिस सिद्धार्थ साह एक याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें IPC की धारा 323, 354A, 504 और 506 और POCSO Act की...
पुराने कर्मचारियों को अदालत के आदेश से मिला अधिक ग्रेड पे, नए नियुक्त कर्मचारी समान लाभ नहीं मांग सकते: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी विशेष कर्मचारी समूह को अदालत के आदेश के आधार पर दिया गया उच्च ग्रेड पे भविष्य में नियुक्त होने वाले कर्मचारियों के लिए स्वतः कोई कानूनी या अर्जित अधिकार पैदा नहीं करता। केवल समान कार्य करने के आधार पर बाद में नियुक्त कर्मचारी उस लाभ की मांग नहीं कर सकते।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी स्वास्थ्य कार्यकर्ता (महिला) पद पर नियुक्त कई कर्मचारियों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे। ये कर्मचारी वर्ष 2016, 2018, 2022 और 2024 की भर्ती प्रक्रियाओं के...
फरार आरोपी जिसे 'घोषित अपराधी' करार दिया गया, वह पावर ऑफ़ अटॉर्नी के ज़रिए केस रद्द करने की याचिका दायर नहीं कर सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि जिस आरोपी को 'घोषित अपराधी' (proclaimed offender) करार दिया गया और जिसके खिलाफ 'लुकआउट सर्कुलर' जारी किया गया, वह पावर ऑफ़ अटॉर्नी होल्डर के ज़रिए CrPC की धारा 482 के तहत याचिका दायर नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि वह ऐसे व्यक्ति के पक्ष में अपने विशेष या अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र (inherent jurisdiction) का इस्तेमाल नहीं करेगा, जो जानबूझकर कानूनी प्रक्रिया से बच रहा है और फरार है।जस्टिस राकेश थपलियाल, राकेश मेहरा द्वारा उनके पावर ऑफ़ अटॉर्नी होल्डर के ज़रिए दायर याचिका...
रद्द की गई परीक्षा में गड़बड़ी के आरोपों से बरी होने पर बाद की भर्तियों में नियुक्ति का पक्का अधिकार नहीं मिलता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि रद्द की गई भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोपों से बरी होने का मतलब यह नहीं है कि उम्मीदवार को नियुक्ति का पक्का अधिकार मिल गया। कोर्ट ने कहा कि भले ही जांच रिपोर्ट से यह साबित हो जाए कि उम्मीदवार किसी गड़बड़ी में शामिल नहीं था, लेकिन इससे न तो रद्द की गई भर्ती प्रक्रिया फिर से शुरू होती है और न ही बाद के भर्ती विज्ञापनों के तहत निकलने वाली खाली जगहों पर नियुक्ति का अधिकार मिलता है।जस्टिस पंकज पुरोहित उन उम्मीदवारों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे, जिन्होंने 2015...
रेलवे कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना सामान्य नोटिस से अनधिकृत कब्ज़ा करने वालों को नहीं हटा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि रेलवे की ज़मीन पर गैर-कानूनी कब्ज़ा करने वाले व्यक्ति को भी कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना सामान्य प्रशासनिक नोटिस के ज़रिए नहीं हटाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि कानूनी मंज़ूरी के बिना किसी संपत्ति से ज़बरदस्ती बेदखल करना संवैधानिक और मानवाधिकारों का उल्लंघन है, और बेदखली केवल कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन करके ही की जा सकती है।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी उस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें सीनियर सेक्शन इंजीनियर (वर्क्स), नॉर्दर्न रेलवे, देहरादून...
दावा करने वाले का लापरवाही से गाड़ी चलाने का अपराध स्वीकार करना लापरवाही की बात मानना है, जिससे वह दुर्घटना के मुआवज़े का हकदार नहीं रहता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी मोटर दुर्घटना से जुड़े आपराधिक मामले में दावा करने वाले ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है तो इसका मतलब यह है कि उसने मान लिया है कि दुर्घटना उसकी लापरवाही और तेज़ी से गाड़ी चलाने के कारण हुई थी। कोर्ट ने कहा कि भले ही आपराधिक मामले में दर्ज निष्कर्षों का असर अलग हो सकता है, लेकिन दावा करने वाले का खुद अपनी मर्ज़ी से अपराध स्वीकार करना उसे दुर्घटना के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार ठहराने का आधार बन सकता है।जस्टिस रवींद्र मैठाणी मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 140 और...
महा वैल्यू लिखना अपने आप में भ्रामक नहीं, बिना ठोस सबूत किसी उत्पाद को गलत ब्रांडिंग वाला नहीं कहा जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी खाद्य उत्पाद के पैकेट पर "महा वैल्यू" लिख देना मात्र से उसे खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत गलत ब्रांडिंग वाला उत्पाद नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित न हो जाए कि उक्त शब्द उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाला, भ्रामक या धोखापूर्ण है, तब तक गलत ब्रांडिंग का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।जस्टिस रवींद्र मैठाणी ने यह फैसला पेप्सिको इंडिया होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड की अपील पर सुनाते हुए दिया। कंपनी ने उन...
10 साल से जेल में बंद हत्या के आरोपी को जमानत: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा- त्वरित न्याय के लिए सभी पक्षों को निभानी होगी जिम्मेदारी
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने लगभग दस वर्षों से न्यायिक हिरासत में बंद एक हत्या के आरोपी को जमानत देते हुए कहा कि त्वरित सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुकदमे के जल्द पूरा होने की संभावना न होने पर किसी विचाराधीन कैदी को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता।जस्टिस आलोक महरा ने यह आदेश हत्या और शस्त्र अधिनियम से जुड़े एक मामले में नियमित जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया।मामले के अनुसार...
जिलाधिकारी के हस्ताक्षर बिना राशन दुकान लाइसेंस रद्द करने का आदेश अमान्य: उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि यदि उचित मूल्य दुकान (राशन दुकान) का लाइसेंस रद्द करने वाले आदेश पर जिलाधिकारी के हस्ताक्षर नहीं हैं तो ऐसा आदेश कानून की नजर में टिक नहीं सकता।अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी अन्य अधिकारी द्वारा आदेश की सूचना भेज देने से उसे जिलाधिकारी का वैध आदेश नहीं माना जा सकता। जस्टिस पंकज पुरोहित की पीठ एक राशन दुकान संचालक की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।याचिकाकर्ता ने 19 नवंबर 2018 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके जरिए उसकी उचित मूल्य दुकान का...
सिर्फ हस्ताक्षर से इनकार करने भर से जालसाजी साबित नहीं हो सकती, विशेषज्ञ राय जरूरी: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल किसी व्यक्ति द्वारा अपने हस्ताक्षरों से इनकार कर देने मात्र के आधार पर जालसाजी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।अदालत ने स्पष्ट किया कि जालसाजी का आरोप गंभीर नागरिक और आपराधिक परिणाम उत्पन्न करता है, इसलिए ऐसे निष्कर्ष केवल अनुमान या एकतरफा दावों के आधार पर नहीं दिए जा सकते। जस्टिस पंकज पुरोहित की पीठ एक उचित मूल्य दुकान संचालक की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।याचिका में ग्राम सभा के उस प्रस्ताव, जिला मजिस्ट्रेट के आदेश और अपीलीय...
DPC में देरी होने मात्र से पूर्व प्रभाव से पदोन्नति का अधिकार नहीं मिलता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल इस आधार पर कि विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) का गठन देर से हुआ कोई कर्मचारी पूर्व प्रभाव से पदोन्नति का दावा नहीं कर सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी नियम या दिशा-निर्देश में काल्पनिक अथवा पूर्व निर्धारित तिथि से पदोन्नति देने का प्रावधान न हो, तब तक ऐसा दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी एम्स ऋषिकेश के नर्सिंग अधिकारियों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति वर्ष 2017-18 में हुई...
आउटसोर्स कर्मचारी भी गोपनीय जानकारी लीक नहीं कर सकते, आधिकारिक गोपनीयता कानून लागू न होने पर भी जिम्मेदारी बरकरार: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि भले ही किसी आउटसोर्स कर्मचारी पर आधिकारिक गोपनीयता कानून के प्रावधान सीधे लागू न होते हों, फिर भी उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह विभाग की संवेदनशील और गोपनीय जानकारी बाहरी लोगों के साथ साझा न करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह जिम्मेदारी सरकारी विभाग में कार्यरत नियमित और आउटसोर्स, दोनों प्रकार के कर्मचारियों पर समान रूप से लागू होती है।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी एक याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसे उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड के...
आउटसोर्स कर्मचारियों को पदोन्नति का अधिकार नहीं, बिना अधिकार बदला गया पदनाम सुधारा जा सकता है: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि आउटसोर्स या संविदा कर्मचारी नियमित सरकारी कर्मचारियों जैसी स्थिति स्वतः प्राप्त नहीं कर लेते। केवल लंबे समय तक सेवा में बने रहने से राज्य सरकार और कर्मचारी के बीच प्रत्यक्ष नियोक्ता-कर्मचारी संबंध स्थापित नहीं माना जा सकता।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी की पीठ ने यह टिप्पणी उन दो कर्मचारियों की याचिका खारिज करते हुए की, जिन्हें उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम (UPNL) के माध्यम से संविदा पर स्टेनोग्राफर के रूप में नियुक्त किया गया।मामले में...
पहले दीवानी मुकदमों का निपटारा होने दें, फिर आपराधिक कार्रवाई करें: मसूरी के मोदी भवन मामले में हाईकोर्ट ने FIR रद्द की
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मसूरी स्थित मोदी भवन संपत्ति से जुड़े कथित ध्वस्तीकरण, चोरी और अतिक्रमण के आरोपों पर दर्ज FIR रद्द करते हुए कहा कि जब दोनों पक्ष पहले ही दीवानी अदालतों का दरवाजा खटखटा चुके हैं, तब समान विवाद पर आपराधिक जांच जारी रखना उचित नहीं है।जस्टिस राकेश थपलियाल ने अपने आदेश में कहा कि जब एक ही संपत्ति को लेकर दोनों पक्ष अलग-अलग दीवानी मुकदमे दायर कर चुके हैं तो ऐसे में आपराधिक कार्यवाही जारी रहने से लंबित मुकदमों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। अदालत ने कहा कि फिलहाल पक्षकारों को...
अंकिता भंडारी हत्याकांड से जोड़ने वाले सोशल मीडिया पोस्ट पर उत्तराखंड हाईकोर्ट सख्त, सुरेश राठौर के खिलाफ दो FIR रद्द, दो पर जांच जारी
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पूर्व विधायक सुरेश राठौर के खिलाफ दर्ज चार FIR में से दो रद्द की, जबकि दो अन्य मामलों में जांच जारी रखने की अनुमति दी।अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को जघन्य अपराध से जोड़कर उसकी छवि खराब करने का प्रयास गंभीर मामला है और इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।जस्टिस राकेश थपलियाल ने मामले की सुनवाई के दौरान सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ वीडियो और ऑडियो सामग्री के प्रतिलेखों का अवलोकन किया।अदालत ने कहा कि बिना किसी ठोस आधार के किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से...















