उत्तराखंड हाईकोर्ट

सिर्फ़ शादी से इनकार करना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं, पुलिस IPC की धारा 306 का आसानी से इस्तेमाल कर रही है: उत्तराखंड हाईकोर्ट
सिर्फ़ शादी से इनकार करना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं, पुलिस IPC की धारा 306 का 'आसानी से' इस्तेमाल कर रही है: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि पुलिस भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) का इस्तेमाल "बहुत आसानी से और बिना सोचे-समझे" कर रही है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को बहुत सावधानी और सोच-समझकर काम करना चाहिए और बिना सोचे-समझे या "सुरक्षित रहने" की मानसिकता अपनाते हुए इस धारा के तहत आरोप तय नहीं करने चाहिए।कोर्ट ने आगे कहा कि IPC की धारा 306 के तहत अपराध तब माना जाएगा, जब शुरुआती तौर पर ऐसे सबूत हों जिनसे पता चले कि आरोपी ने IPC की धारा 107 के तहत आत्महत्या के...

सिर्फ शराब की गंध से नशे में गाड़ी चलाना साबित नहीं होता, रक्त या ब्रेथ एनालाइज़र जांच जरूरी: उत्तराखंड हाईकोर्ट
सिर्फ शराब की गंध से नशे में गाड़ी चलाना साबित नहीं होता, रक्त या ब्रेथ एनालाइज़र जांच जरूरी: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी चालक के मुंह से केवल शराब की गंध आने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि वह नशे की हालत में वाहन चला रहा था। अदालत ने स्पष्ट किया कि रक्त जांच या ब्रेथ एनालाइज़र जांच के जरिए यह साबित होना आवश्यक है कि शरीर में शराब की मात्रा मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में निर्धारित सीमा से अधिक थी। ऐसी वैज्ञानिक जांच के अभाव में केवल शराब की गंध के आधार पर नशे में वाहन चलाने का आरोप या भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 के तहत आरोप तय नहीं किया जा सकता।यह...

संबंधित, प्रासंगिक या संबद्ध विषय में मास्टर डिग्री रखने वाला असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति के लिए पात्र: उत्तराखंड हाईकोर्ट
संबंधित, प्रासंगिक या संबद्ध विषय में मास्टर डिग्री रखने वाला असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति के लिए पात्र: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि यूजीसी (UGC) विनियमों के अनुसार, यदि किसी अभ्यर्थी के पास किसी भारतीय विश्वविद्यालय से संबंधित (Concerned), प्रासंगिक (Relevant) या संबद्ध (Allied) विषय में कम से कम 55% अंकों के साथ मास्टर डिग्री है, तो वह असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के लिए पात्र होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यूजीसी विनियम इन तीनों श्रेणियों के विषयों को समान दर्जा देते हैं और केवल संबंधित विषय में डिग्री रखने वाले अभ्यर्थी को कोई अतिरिक्त प्राथमिकता नहीं देते।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी और...

वेतन संरक्षण मिलने से पूर्व सेवा को एसीपी में जोड़ने का अधिकार नहीं मिलता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
वेतन संरक्षण मिलने से पूर्व सेवा को एसीपी में जोड़ने का अधिकार नहीं मिलता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूर्व सेवा के आधार पर वेतन संरक्षण दिए जाने मात्र से कर्मचारी को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि उसी सेवा अवधि को सुनिश्चित सेवाकाल प्रगति का लाभ देने के लिए भी जोड़ा जाए। अदालत ने कहा कि वेतन संरक्षण और एसीपी के तहत मिलने वाली वित्तीय उन्नति अलग-अलग क्षेत्र हैं और दोनों अलग-अलग सरकारी आदेशों से संचालित होते हैं।जस्टिस पंकज पुरोहित एक कर्मचारी की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें 6 नवंबर 2013 के सरकारी आदेश तथा उसके आधार पर तीसरे एसीपी का लाभ वापस लेने संबंधी...

तेजाब हमले के दो महीने बाद सेप्टीसीमिया से मौत भी हत्या, दोषी की उम्रकैद बरकरार: उत्तराखंड हाईकोर्ट
तेजाब हमले के दो महीने बाद सेप्टीसीमिया से मौत भी हत्या, दोषी की उम्रकैद बरकरार: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि यदि तेजाब हमले में झुलसी पीड़िता की बाद में सेप्टीसीमिया (संक्रमण फैलने) के कारण मौत होती है और चिकित्सा साक्ष्य यह साबित करते हैं कि संक्रमण तेजाब से लगी चोटों का ही परिणाम था, तो इसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत हत्या का अपराध माना जाएगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोषी की हत्या, तेजाब हमला और गाली-गलौज के मामलों में हुई सजा बरकरार रखी।जस्टिस रवींद्र मैठाणी और जस्टिस सिद्धार्थ साह की खंडपीठ आपराधिक जेल अपील पर सुनवाई कर रही थी।...

1996 में उत्तराखंड राज्य था ही नहीं, फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र के आधार पर ग्राम प्रधान की अयोग्यता बरकरार : उत्तराखंड हाईकोर्ट
1996 में उत्तराखंड राज्य था ही नहीं, फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र के आधार पर ग्राम प्रधान की अयोग्यता बरकरार : उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र के आधार पर निर्वाचित ग्राम प्रधान को अयोग्य ठहराने और पद से हटाने का आदेश बरकरार रखते हुए कहा कि वर्ष 1996 में उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में ही नहीं था। ऐसे में उस वर्ष जारी बताए गए स्थानांतरण प्रमाणपत्र में "उत्तराखंड राज्य" का उल्लेख होना उसके अविश्वसनीय होने का स्पष्ट संकेत है।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी ने ग्राम प्रधान की वह याचिका खारिज की, जिसमें उन्होंने सक्षम प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनके जरिए उन्हें...

गवाह को धमकी मिलना मात्र मुकदमे के स्थानांतरण का आधार नहीं, गवाह संरक्षण कानून का किया जाए उपयोग : उत्तराखंड हाईकोर्ट
गवाह को धमकी मिलना मात्र मुकदमे के स्थानांतरण का आधार नहीं, गवाह संरक्षण कानून का किया जाए उपयोग : उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि केवल गवाहों को धमकी मिलने के आरोप के आधार पर किसी आपराधिक मुकदमे को एक अदालत से दूसरी अदालत में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। यदि गवाहों की सुरक्षा के लिए कानून में व्यवस्था उपलब्ध है तो पहले उसी का सहारा लिया जाना चाहिए।जस्टिस सिद्धार्थ साह ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 407 के तहत दायर एक स्थानांतरण याचिका पर यह फैसला सुनाया।मामला हत्या और शस्त्र अधिनियम के तहत दर्ज एक आपराधिक मुकदमे से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने अनुरोध किया था कि देहरादून की जिला एवं सत्र...

21 वर्ष से कम उम्र में शादी पर भी जोड़े को सुरक्षा: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पुलिस को दिए संरक्षण के निर्देश
21 वर्ष से कम उम्र में शादी पर भी जोड़े को सुरक्षा: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पुलिस को दिए संरक्षण के निर्देश

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने विवाहित जोड़े को सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह आदेश उस आपत्ति के बावजूद दिया कि विवाह के समय युवक की उम्र 21 वर्ष से कम है।हाईकोर्ट ने कहा कि परामर्शदाता की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि युवती अपने माता-पिता के साथ जाने को तैयार नहीं है और वह अपने पति के साथ खुश है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर जोड़ा सुरक्षा का हकदार है।जस्टिस आलोक महरा उस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें पुलिस को निजी पक्षकारों और उनके सहयोगियों से दोनों याचिकाकर्ताओं की सुरक्षा...

रजिस्ट्रार के वैधानिक आदेश पर हुई सेवा समाप्ति के खिलाफ रिट याचिका सुनवाई योग्य: उत्तराखंड हाईकोर्ट
रजिस्ट्रार के वैधानिक आदेश पर हुई सेवा समाप्ति के खिलाफ रिट याचिका सुनवाई योग्य: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि यदि किसी सहकारी समिति के कर्मचारी की सेवा समाप्ति सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार या वैधानिक अधिकार का प्रयोग करने वाले अधिकारी के निर्देश पर की गई हो, तो उसके खिलाफ दायर रिट याचिका सुनवाई योग्य होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में यह नहीं कहा जा सकता कि याचिका केवल सहकारी समिति की कार्रवाई के विरुद्ध है।चीफ जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ विशेष अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील उस आदेश के खिलाफ दायर की गई,...

समाहित कर्मचारियों के सेवा अधिकारों की रक्षा के लिए अलग पदोन्नति नियम वैध: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की
समाहित कर्मचारियों के सेवा अधिकारों की रक्षा के लिए अलग पदोन्नति नियम वैध: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) से उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) में समाहित कर्मचारियों के लिए अलग पदोन्नति मानदंड तय करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं है। अदालत ने कहा कि इन कर्मचारियों की पहले से मौजूद सेवा शर्तों की रक्षा के उद्देश्य से किया गया वर्गीकरण उचित और वैध है।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी और जस्टिस पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने यह फैसला उन कर्मचारियों की याचिका पर सुनाया, जिन्होंने वर्ष 2018 के सेवा उपविधियों की वैधता को...

पहले से मौजूद सर्विस की शर्तों की सुरक्षा, एब्जॉर्ब किए गए कर्मचारियों के लिए अलग प्रमोशन क्राइटेरिया को सही ठहराती है: उत्तराखंड हाईकोर्ट
पहले से मौजूद सर्विस की शर्तों की सुरक्षा, एब्जॉर्ब किए गए कर्मचारियों के लिए अलग प्रमोशन क्राइटेरिया को सही ठहराती है: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट की जस्टिस मनोज कुमार तिवारी और जस्टिस पंकज पुरोहित की डिवीज़न बेंच ने माना कि 2018 के सर्विस बाय-लॉज़ के तहत बनाया गया वर्गीकरण आर्टिकल 14 के तहत उचित और वैध है। यह वर्गीकरण एक बाध्यकारी वादे के आधार पर एब्जॉर्ब किए गए UPPCL कर्मचारियों की पहले से मौजूद सर्विस की शर्तों की सुरक्षा करता है और उन्हें उन याचिकाकर्ताओं से अलग करता है, जिन्हें सीधे UPCL में नियुक्त किया गया और जिन्हें प्रमोशन के लिए 10 साल की क्वालिफाइंग सर्विस की आवश्यकता होती है।बैकग्राउंड फैक्ट्सयाचिकाकर्ताओं को...

कथित लापरवाही के कारण कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत किसी तीसरे पक्ष को मुआवजा देने का आदेश नहीं दिया जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
कथित लापरवाही के कारण 'कर्मचारी मुआवजा अधिनियम' के तहत किसी तीसरे पक्ष को मुआवजा देने का आदेश नहीं दिया जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि 'कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923' के तहत मुआवजा केवल मृतक कर्मचारी के नियोक्ता (employer) को ही देना होगा, न कि कथित लापरवाही के आधार पर किसी तीसरे पक्ष को। कोर्ट ने कहा कि यह अधिनियम नियोक्ताओं द्वारा अपने कर्मचारियों को मुआवजा देने का प्रावधान करता है। इसका 'टॉर्टियस लायबिलिटी' (गलती या लापरवाही के लिए कानूनी जिम्मेदारी) से कोई लेना-देना नहीं है।जस्टिस रवींद्र मैठाणी 'कर्मचारी मुआवजा आयुक्त, रुद्रप्रयाग' द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ 'उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन...

CPC के ऑर्डर 33 नियम 9 के तहत निधन व्यक्ति के तौर पर मुकदमा करने की अनुमति वापस नहीं ली जाती, तब तक वादी को कोर्ट फीस देने की ज़रूरत नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट
CPC के ऑर्डर 33 नियम 9 के तहत 'निधन व्यक्ति' के तौर पर मुकदमा करने की अनुमति वापस नहीं ली जाती, तब तक वादी को कोर्ट फीस देने की ज़रूरत नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक 'निधन व्यक्ति' (indigent person) के तौर पर मुकदमा करने की अनुमति, जो वादी को दी गई, उसे पहले सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर 33 नियम 9 के अनुसार वापस नहीं लिया जाता, तब तक केवल कोर्ट फीस जमा करने की मांग वाली अर्ज़ी के आधार पर वादी को कोर्ट फीस जमा करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादियों ने वादी को 'निधन व्यक्ति' के तौर पर मुकदमा करने की अनुमति वापस लेने की मांग नहीं की, बल्कि बाकी सबूत दर्ज करने से पहले कोर्ट फीस जमा करने का...

POCSO Act के तहत समन जारी करना तब सही नहीं, जब शिकायत में लगाए गए आरोप, समन जारी करने से पहले के सबूतों में न हों: उत्तराखंड हाईकोर्ट
POCSO Act के तहत समन जारी करना तब सही नहीं, जब शिकायत में लगाए गए आरोप, समन जारी करने से पहले के सबूतों में न हों: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी को सिर्फ़ शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर IPC की धारा 354A और POCSO Act की धारा 11/12 के तहत समन नहीं किया जा सकता, जब उन आरोपों की पुष्टि CrPC की धारा 200 और 202 के तहत दर्ज बयानों से न होती हो। कोर्ट ने कहा कि अगर शिकायतकर्ता और गवाहों के बयानों में कथित अपराधों के ज़रूरी तत्व मौजूद नहीं हैं तो उन प्रावधानों के तहत समन जारी करना सही नहीं होगा।जस्टिस सिद्धार्थ साह एक याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें IPC की धारा 323, 354A, 504 और 506 और POCSO Act की...

पुराने कर्मचारियों को अदालत के आदेश से मिला अधिक ग्रेड पे, नए नियुक्त कर्मचारी समान लाभ नहीं मांग सकते: उत्तराखंड हाईकोर्ट
पुराने कर्मचारियों को अदालत के आदेश से मिला अधिक ग्रेड पे, नए नियुक्त कर्मचारी समान लाभ नहीं मांग सकते: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी विशेष कर्मचारी समूह को अदालत के आदेश के आधार पर दिया गया उच्च ग्रेड पे भविष्य में नियुक्त होने वाले कर्मचारियों के लिए स्वतः कोई कानूनी या अर्जित अधिकार पैदा नहीं करता। केवल समान कार्य करने के आधार पर बाद में नियुक्त कर्मचारी उस लाभ की मांग नहीं कर सकते।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी स्वास्थ्य कार्यकर्ता (महिला) पद पर नियुक्त कई कर्मचारियों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे। ये कर्मचारी वर्ष 2016, 2018, 2022 और 2024 की भर्ती प्रक्रियाओं के...

फरार आरोपी जिसे घोषित अपराधी करार दिया गया, वह पावर ऑफ़ अटॉर्नी के ज़रिए केस रद्द करने की याचिका दायर नहीं कर सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
फरार आरोपी जिसे 'घोषित अपराधी' करार दिया गया, वह पावर ऑफ़ अटॉर्नी के ज़रिए केस रद्द करने की याचिका दायर नहीं कर सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि जिस आरोपी को 'घोषित अपराधी' (proclaimed offender) करार दिया गया और जिसके खिलाफ 'लुकआउट सर्कुलर' जारी किया गया, वह पावर ऑफ़ अटॉर्नी होल्डर के ज़रिए CrPC की धारा 482 के तहत याचिका दायर नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि वह ऐसे व्यक्ति के पक्ष में अपने विशेष या अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र (inherent jurisdiction) का इस्तेमाल नहीं करेगा, जो जानबूझकर कानूनी प्रक्रिया से बच रहा है और फरार है।जस्टिस राकेश थपलियाल, राकेश मेहरा द्वारा उनके पावर ऑफ़ अटॉर्नी होल्डर के ज़रिए दायर याचिका...

रद्द की गई परीक्षा में गड़बड़ी के आरोपों से बरी होने पर बाद की भर्तियों में नियुक्ति का पक्का अधिकार नहीं मिलता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
रद्द की गई परीक्षा में गड़बड़ी के आरोपों से बरी होने पर बाद की भर्तियों में नियुक्ति का पक्का अधिकार नहीं मिलता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि रद्द की गई भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोपों से बरी होने का मतलब यह नहीं है कि उम्मीदवार को नियुक्ति का पक्का अधिकार मिल गया। कोर्ट ने कहा कि भले ही जांच रिपोर्ट से यह साबित हो जाए कि उम्मीदवार किसी गड़बड़ी में शामिल नहीं था, लेकिन इससे न तो रद्द की गई भर्ती प्रक्रिया फिर से शुरू होती है और न ही बाद के भर्ती विज्ञापनों के तहत निकलने वाली खाली जगहों पर नियुक्ति का अधिकार मिलता है।जस्टिस पंकज पुरोहित उन उम्मीदवारों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे, जिन्होंने 2015...

रेलवे कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना सामान्य नोटिस से अनधिकृत कब्ज़ा करने वालों को नहीं हटा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
रेलवे कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना सामान्य नोटिस से अनधिकृत कब्ज़ा करने वालों को नहीं हटा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि रेलवे की ज़मीन पर गैर-कानूनी कब्ज़ा करने वाले व्यक्ति को भी कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना सामान्य प्रशासनिक नोटिस के ज़रिए नहीं हटाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि कानूनी मंज़ूरी के बिना किसी संपत्ति से ज़बरदस्ती बेदखल करना संवैधानिक और मानवाधिकारों का उल्लंघन है, और बेदखली केवल कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन करके ही की जा सकती है।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी उस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें सीनियर सेक्शन इंजीनियर (वर्क्स), नॉर्दर्न रेलवे, देहरादून...

दावा करने वाले का लापरवाही से गाड़ी चलाने का अपराध स्वीकार करना लापरवाही की बात मानना ​​है, जिससे वह दुर्घटना के मुआवज़े का हकदार नहीं रहता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
दावा करने वाले का लापरवाही से गाड़ी चलाने का अपराध स्वीकार करना लापरवाही की बात मानना ​​है, जिससे वह दुर्घटना के मुआवज़े का हकदार नहीं रहता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी मोटर दुर्घटना से जुड़े आपराधिक मामले में दावा करने वाले ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है तो इसका मतलब यह है कि उसने मान लिया है कि दुर्घटना उसकी लापरवाही और तेज़ी से गाड़ी चलाने के कारण हुई थी। कोर्ट ने कहा कि भले ही आपराधिक मामले में दर्ज निष्कर्षों का असर अलग हो सकता है, लेकिन दावा करने वाले का खुद अपनी मर्ज़ी से अपराध स्वीकार करना उसे दुर्घटना के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार ठहराने का आधार बन सकता है।जस्टिस रवींद्र मैठाणी मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 140 और...

महा वैल्यू लिखना अपने आप में भ्रामक नहीं, बिना ठोस सबूत किसी उत्पाद को गलत ब्रांडिंग वाला नहीं कहा जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
महा वैल्यू लिखना अपने आप में भ्रामक नहीं, बिना ठोस सबूत किसी उत्पाद को गलत ब्रांडिंग वाला नहीं कहा जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी खाद्य उत्पाद के पैकेट पर "महा वैल्यू" लिख देना मात्र से उसे खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत गलत ब्रांडिंग वाला उत्पाद नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित न हो जाए कि उक्त शब्द उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाला, भ्रामक या धोखापूर्ण है, तब तक गलत ब्रांडिंग का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।जस्टिस रवींद्र मैठाणी ने यह फैसला पेप्सिको इंडिया होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड की अपील पर सुनाते हुए दिया। कंपनी ने उन...