जब किसी व्यक्ति के मृत्यु से पूर्व दिए गए दो Dying Declaration सामने आते हैं तो न्यायालय को किसे सही मानकर निर्णय देना चाहिए?
Himanshu Mishra
18 Feb 2025 1:02 PM

जब किसी व्यक्ति के अंतिम क्षणों में दिए गए बयान, जिन्हें हम Dying Declarations कहते हैं, को अदालत में सबूत के रूप में पेश किया जाता है, तो इनकी सही समझ और विश्वसनीयता का आकलन करना बेहद महत्वपूर्ण होता है।
अदालतें मानती हैं कि जब कोई व्यक्ति अपने अंतिम समय में बिना किसी दबाव (Duress) के अपना बयान देता है, तो वह बयान अक्सर सच्चा होता है। हाल ही में, Supreme Court ने Makhan Singh v. State of Haryana के मामले में यह मुद्दा उठाया कि दो विरोधाभासी Dying Declarations में से किस पर भरोसा किया जाए।
इस लेख में हम Indian Evidence Act के प्रावधानों, Dying Declarations की स्वैच्छिकता (Voluntariness) और विश्वसनीयता (Reliability) के मापदंडों, साथ ही अदालत द्वारा इन मामलों में अपनाई गई प्रक्रिया का सरल हिंदी में विश्लेषण करेंगे।
Dying Declarations को नियंत्रित करने वाले कानूनी प्रावधान (Legal Provisions Governing Dying Declarations)
Indian Evidence Act (Indian Evidence Act) की धारा 32 (Section 32) के अंतर्गत, Dying Declarations को कानूनी मान्यता दी जाती है। इस धारा के अनुसार, यदि मृत व्यक्ति अपने अंतिम समय में बिना किसी बाहरी दबाव के अपना बयान देता है, तो उसे अदालत में सबूत के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
यह प्रावधान इस विश्वास पर आधारित है कि मृत्यु के निकट व्यक्ति झूठ बोलने का जोखिम कम होता है, क्योंकि वह अपने जीवन के अंतिम क्षणों में सत्य बोलता है।
यदि अदालत को यह सुनिश्चित हो जाए कि बयान स्वैच्छिक (Voluntary) है और मृत व्यक्ति की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति (Physical and Mental Condition) जांची गई है, तो उस बयान को अकेले आधार (Sole Basis) के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह व्यवस्था न्यायपालिका को ऐसी स्थितियों में भी निर्णय लेने में सहायक होती है जहाँ अन्य सबूतों की उपलब्धता सीमित होती है।
Dying Declarations को स्वीकार करने में मौलिक मुद्दे (Fundamental Issues in Accepting Dying Declarations)
जब भी Dying Declaration को अदालत में प्रस्तुत किया जाता है, तो मुख्य प्रश्न यह होता है कि क्या वह बयान वास्तव में सच्चा और विश्वसनीय है। अदालत पहले यह निर्धारित करती है कि मृत व्यक्ति उस समय शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम (Capable) था या नहीं, जिससे वह स्पष्ट रूप से अपना अंतिम बयान दे सके। इसके अलावा, यह भी देखा जाता है कि वह बयान बिना किसी बाहरी प्रभाव (External Influence) या प्रोत्साहन (Prompting) के दिया गया है या नहीं।
यदि किसी बयान में किसी प्रकार का दबाव या बाहरी हस्तक्षेप का संदेह हो, तो उसकी वैधता पर सवाल उठते हैं। यह सुनिश्चित करना कि बयान बिना किसी हस्तक्षेप के और पूरी स्वतंत्रता (Independence) से दिया गया हो, Dying Declarations की स्वीकृति के लिए अनिवार्य है।
Dying Declarations की विश्वसनीयता और स्वैच्छिकता (Reliability and Voluntariness in Dying Declarations)
Dying Declaration की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह किस प्रकार और किन परिस्थितियों में दिया गया है। यदि बयान पूरी तरह से स्वैच्छिक (Voluntary) है और इसे किसी भी दबाव या प्रोत्साहन के बिना दिया गया है, तो इसे विश्वसनीय माना जाता है। अदालत यह भी देखती है कि मृत व्यक्ति को अपने अंतिम बयान देने से पहले चिकित्सकीय (Medical) रूप से जांचा गया हो या नहीं।
उदाहरण के लिए, यदि डॉक्टर ने यह प्रमाणित किया हो कि व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम था, तो यह बात बयान की विश्वसनीयता में चार चांद लगा देती है। यदि किसी बयान में किसी भी प्रकार का संशय हो, तो अदालत को गहराई से जांच करनी पड़ती है कि क्या वह बयान दबाव या परिवारिक प्रभाव (Family Influence) के तहत दिया गया है।
Dying Declarations में विरोधाभास: एक न्यायिक चुनौती (Contradictions in Dying Declarations: A Judicial Challenge)
जब एक ही मामले में दो या अधिक Dying Declarations सामने आते हैं जो एक-दूसरे से पूरी तरह से विरोधाभासी (Contradictory) होते हैं, तो अदालत के लिए यह एक गंभीर चुनौती बन जाती है। Supreme Court ने Makhan Singh के मामले में देखा कि एक बयान में मृत व्यक्ति ने अपने ऊपर से आरोप हटाने का संकेत दिया, जबकि दूसरे बयान में आरोपों को स्पष्ट रूप से उकेरा गया।
ऐसे मामलों में, अदालत को यह निर्णय लेना पड़ता है कि किस बयान में वह विश्वसनीयता और स्पष्टता अधिक है। अदालत अक्सर उस बयान को तरजीह देती है, जिसे रिकॉर्ड करते समय चिकित्सकीय जांच (Medical Examination) और उचित Procedural Safeguards (Procedural Safeguards) का पालन किया गया हो। इस प्रकार के विरोधाभासी बयान न्यायपालिका के लिए एक महत्वपूर्ण जाँच प्रक्रिया (Screening Process) बन जाते हैं, जिससे निष्पक्ष और संतुलित निर्णय लिया जा सके।
Medical Fitness और Procedural Safeguards का मूल्यांकन (Assessment of Medical Fitness and Procedural Safeguards)
एक Dying Declaration की स्वीकृति के लिए यह जानना जरूरी है कि उस समय मृत व्यक्ति की Medical Fitness (Medical Fitness) कैसी थी। चिकित्सा जांच (Medical Examination) यह सुनिश्चित करती है कि व्यक्ति अपने अंतिम बयान के समय शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्पष्ट (Clear) था।
साथ ही, Procedural Safeguards (Procedural Safeguards) जैसे कि रिकॉर्डिंग के दौरान किसी भी अन्य व्यक्ति का हस्तक्षेप न होना, डॉक्टर द्वारा प्रमाणपत्र (Certificate) लेना आदि, यह सब सुनिश्चित करते हैं कि बयान पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से दिया गया है।
यदि इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जाता, तो बयान की विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह उठते हैं और उसे सबूत के रूप में कम महत्व दिया जाता है। अदालतें इन मापदंडों को ध्यान में रखते हुए यह तय करती हैं कि कौन सा बयान न्यायसंगत (Just) और सही साबित होता है।
Dying Declarations पर महत्वपूर्ण Judicial Precedents (Important Judicial Precedents on Dying Declarations)
भारतीय न्यायपालिका ने Dying Declarations के मुद्दे पर कई महत्वपूर्ण Judicial Precedents (Judicial Precedents) स्थापित किए हैं, जो इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि ऐसे बयान कैसे और किन शर्तों पर मान्य होते हैं। Lakhan v. State of M.P. के मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि Dying Declaration विश्वसनीय और स्वैच्छिक पाया जाता है, तो उसे अकेले आधार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसी तरह Harjit Kaur v. State of Punjab, Sayarabano v. State of Maharashtra तथा Sher Singh v. State of Punjab जैसे मामलों में भी यह सिद्ध हुआ कि मृत व्यक्ति के बयान को प्रभावित करने वाले बाहरी कारकों (External Factors) की जांच अनिवार्य है।
इन Judicial Precedents (Judicial Precedents) ने यह सुनिश्चित किया है कि जब भी Dying Declaration की वैधता का प्रश्न उठता है, तो आवश्यक प्रक्रियात्मक उपायों और चिकित्सा जांच का पूरा ध्यान रखा जाता है।
Makhan Singh के मामले में Supreme Court के दृष्टिकोण का विश्लेषण (Analysis of the Supreme Court's Approach in Makhan Singh's Case)
Makhan Singh v. State of Haryana के मामले में, Supreme Court ने दो विरोधाभासी Dying Declarations का विश्लेषण किया। पहले बयान में, मृत व्यक्ति ने यह कहा था कि उसने गलती से दवा ले ली थी, जबकि दूसरे बयान में आरोप लगाया गया था कि उसे जबरदस्ती दवा दी गई थी।
पहले बयान को रिकॉर्ड करते समय डॉक्टर ने मृत व्यक्ति की Medical Fitness (Medical Fitness) की जांच की थी और यह सुनिश्चित किया था कि वह स्पष्ट (Clear) और स्वैच्छिक रूप से अपना बयान दे रही थी। इसके विपरीत, दूसरे बयान को रिकॉर्ड करते समय ऐसा कोई मेडिकल Examination (Medical Examination) नहीं किया गया था और परिवार के सदस्यों का दबाव (Family Pressure) भी मौजूद था।
इन तथ्यों के आधार पर, Supreme Court ने पहले बयान को अधिक विश्वसनीय (Reliable) मानते हुए उसे तरजीह दी। इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि Dying Declaration की स्वीकृति में प्रक्रियात्मक (Procedural) और चिकित्सकीय (Medical) जांच का महत्व कितना अधिक है।
Dying Declarations, जो किसी व्यक्ति के अंतिम क्षणों में दिए गए बयान होते हैं, वे एक संवेदनशील और महत्वपूर्ण सबूत के रूप में कार्य करते हैं। Indian Evidence Act की धारा 32 (Section 32) के अंतर्गत यदि यह सुनिश्चित हो जाए कि बयान स्वैच्छिक, स्पष्ट और बिना किसी बाहरी प्रभाव के दिया गया है, तो उसे अकेले आधार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
हालाँकि, जब एक ही मामले में विरोधाभासी (Contradictory) Dying Declarations सामने आते हैं, तो अदालत को यह तय करना पड़ता है कि किस बयान को विश्वसनीय माना जाए। Supreme Court के Makhan Singh के मामले में यह निर्णय आया कि वह बयान, जिसे चिकित्सकीय जांच (Medical Examination) और उचित Procedural Safeguards (Procedural Safeguards) के साथ रिकॉर्ड किया गया था, अधिक विश्वसनीय है।
यह निर्णय न केवल Dying Declarations के महत्व को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि न्याय (Justice) और निष्पक्षता (Fairness) के सिद्धांतों का पालन किया जाए। Judicial Precedents (Judicial Precedents) जैसे Lakhan v. State of M.P. और अन्य मामलों ने यह दिशा प्रदान की है कि अदालत को किस प्रकार से अंतिम वक्तव्य के मापदंडों का आकलन करना चाहिए।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि Dying Declaration का मूल्यांकन करते समय, अदालत को यह देखना चाहिए कि बयान देने के समय सभी आवश्यक सुरक्षा उपायों और चिकित्सा जांच का सही ढंग से पालन हुआ हो।
इस लेख में वर्णित कानून और प्रक्रियात्मक उपाय स्पष्ट करते हैं कि कैसे Dying Declarations का सही मूल्यांकन किया जाता है। जब भी ऐसे मामलों में विरोधाभासी बयान सामने आते हैं, तो Supreme Court का दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि मृत व्यक्ति के अंतिम शब्दों का सही अर्थ निकाला जाए और आरोपी के अधिकारों (Rights) का भी ध्यान रखा जाए।
यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण Reference (Reference) बन जाएगा, जिससे न्यायिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता (Transparency) और संतुलन (Balance) सुनिश्चित हो सके।