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भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 स्त्री-विरोधी - क्या यही आगे बढ़ने का रास्ता है?
भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 स्त्री-विरोधी - क्या यही आगे बढ़ने का रास्ता है?

'प्रोजेक्ट पॉश' नामक प्रोजेक्ट के संचालन के दौरान, जिसका मैं हिस्सा हूँ, एक स्टूडेंट ट्रेनी ने तत्कालीन भारतीय न्याय संहिता (BNS) विधेयक की नई धारा 69 पर अपनी हैरानी और अविश्वास व्यक्त किया। मैं युवा लॉ स्टूडेंट में राजनीतिक शुद्धता और संवेदनशीलता देखकर खुश था। उम्मीद भरी एकालाप में कहा कि विधेयक उस रूप में पारित नहीं हो सकता। अधिनियम में धारा को उसी रूप में देखना निराशाजनक था, जैसा कि विधेयक में था।अब जबकि अधिनियम लागू हो गया है, शिक्षाविद और वकील नए नामों और धाराओं को समझने की कोशिश कर रहे...

प्रेस की स्वतंत्रता: ऑनलाइन न्यूज स्पेस को नियंत्रित करने के केंद्र सरकार के कदम क्यों है चिंताजनक
प्रेस की स्वतंत्रता: ऑनलाइन न्यूज स्पेस को नियंत्रित करने के केंद्र सरकार के कदम क्यों है चिंताजनक

हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में दिलचस्प घटना यह देखने को मिली कि समाचार और समसामयिक मामलों की रिपोर्टिंग, चर्चा और विश्लेषण करने वाले व्यक्तिगत YouTubers की लोकप्रियता में उछाल आया। ध्रुव राठी, रवीश कुमार और आकाश बनर्जी (देशभक्त) जैसे YouTubers ने आम लोगों को प्रभावित करने वाली सरकारी नीतियों के बारे में महत्वपूर्ण सवाल उठाने वाले अपने वीडियो से काफ़ी लोकप्रियता हासिल की।उल्लेखनीय रूप से इन वीडियो को कई मिलियन व्यू मिले, जो अक्सर कई स्थापित टीवी चैनलों के कुल व्यू से भी ज़्यादा होते हैं।...

किफायती दवाओं के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का नोटिस और किफायती जेनेरिक दवाओं के बचाव में लड़ी गयी लंबी कानूनी लड़ाई का लेखा- जोखा
किफायती दवाओं के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का नोटिस और किफायती जेनेरिक दवाओं के बचाव में लड़ी गयी लंबी कानूनी लड़ाई का लेखा- जोखा

जेनेरिक दवा का कानूनी मतलब और सुप्रीम कोर्ट का जेनरिक दवाओं के पक्ष में नोटिससामान्य बोलचाल की भाषा में 'पेटेंट दवाई' या फिर किसी भी दूसरी पेटेंट चीज का मतलब ये होता कि यदि किसी भी व्यक्ति या फिर संस्था ने किसी चीज की सबसे पहले खोज कर के उस चीज का कानूनी रूप से पेटेंट करा लिया तो उस व्यक्ति या संस्था का यह विशेषाधिकार होगा कि वो पेटेंट चीज को अपनी सुविधा के अनुसार बना कर बेचे या फिर किसी अन्य काम के लिए उसका प्रयोग करे, और अगर कोई अन्य संस्था उस पेटेंट चीज का उत्पादन या प्रयोग करने की कोशिश करती...

जस्टिस एस मुरलीधर के पक्ष में खड़े न होकर, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने एक और स्वतंत्र जज को विफल कर दिया
जस्टिस एस मुरलीधर के पक्ष में खड़े न होकर, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने एक और स्वतंत्र जज को विफल कर दिया

फरवरी 2020 के अंतिम सप्ताह में, जब दिल्ली के उत्तर पूर्वी क्षेत्रों के कुछ हिस्से सांप्रदायिक दंगों की चपेट में थे, कई घायल पीड़ित मुस्तफाबाद के एक अपेक्षाकृत छोटे अस्पताल में फंसे हुए थे। उन्हें आपातकालीन गंभीर देखभाल की आवश्यकता थी और उन्हें तुरंत सुविधाओं के साथ एक बड़े अस्पताल में ले जाना पड़ा। हालांकि, भड़के दंगों के कारण एंबुलेंस वहां पहुंचने की स्थिति में नहीं थी। पुलिस सहायता तुरंत नहीं मिल रही थी। इस पृष्ठभूमि में, डॉ. जस्टिस एस मुरलीधर, जो उस समय दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश थे, के...

जस्टिस केएम जोसेफ: भारतीय लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता हमेशा उनका ऋणी रहेगी
जस्टिस केएम जोसेफ: भारतीय लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता हमेशा उनका ऋणी रहेगी

मनु सेबेस्टियनप्रकांड कानूनविद् और बुद्धिजीवी जज जस्टिस केएम जोसेफ ने कई उल्लेखनीय फैसलों का लेखन किया है। फिर भी, हेट स्पीच के खिलाफ लड़ी गई लड़ाई, जिसकी अगुवाई उन्होंने ही की थी, उनके सबसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेपों में से एक माना जाएगा।कई मौकों पर, उन्होंने हेट स्पीच को एक कैंसर का निदान एक कैंसर के रूप में करने की दूरदर्शिता दिखाई है, जिसे अगर अनियंत्रित रूप से बढ़ने की अनुमति दी जाती है तो हमारे महान राष्ट्र को नरक बना देगा।“हमारा देश किस ओर जा रहा है? धर्म के नाम पर हम कहां पहुंच गए हैं? यह...

विधि आयोग की सिफारिशें राजद्रोह कानून को और अधिक दुरूपयोगी बनाती हैं
"विधि आयोग की सिफारिशें राजद्रोह कानून को और अधिक दुरूपयोगी बनाती हैं"

अवस्तिका दासराजद्रोह का कानून हमेशा विवादास्पद रहा है। सभी विचारों की सरकारों ने असहमति पर रोक लगाने के लिए औपनिवेशिक युग के कानून का उदारतापूर्वक इस्तेमाल किया है।पत्रकारों, एक्टिविस्टों, कार्टूनिस्टों, छात्रों और यहां तक कि आम लोगों को भी सरकार की आलोचना करने का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। यह शायद ही रहस्य हो। फिर, यह कानून वापस खबरों में क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि एक अप्रत्याशित घटनाक्रम में, लॉ कमीशन ऑफ इंडिया ने राजद्रोह के कानून के पूर्ण निरसन की वकालत करने के बजाय, या कम से कम, उक्त...

प्रतिबंधात्मक खंड बनाम परिसीमा का कानून: क्या मध्यस्थता के अधिकार को परिसीमा अधिनियम के तहत प्रदान की गई अवधि से कम अवधि तक सीमित किया जा सकता है?
प्रतिबंधात्मक खंड बनाम परिसीमा का कानून: क्या मध्यस्थता के अधिकार को परिसीमा अधिनियम के तहत प्रदान की गई अवधि से कम अवधि तक सीमित किया जा सकता है?

धृतिमान रॉय, अरशद अय्यूब, औसाफ अय्यूब मध्यस्थता व्यवसायियों का ऐसे समझौते से टकराना असामान्य बात नहीं है, जिसके प्रावधान एकपक्षीय हों और प्रभावशाली पक्ष या नियोक्ता के पक्ष के लिए बनाए गए हों। ये खंड लगभग ऐसे होते हैं कि मोल-भाव न हो सके, और एक पक्ष को अक्सर डॉटेड लाइंस पर हस्ताक्षर कराया जाता है।इनमें अन्य बातों के साथ-साथ ऐसे समएझौतों में अनिवार्य मध्यस्थता पूर्व पेशगी की आवश्यकता जैसे खंड [1] एकपक्षीय विकल्प खंड [2] एकपक्षीय नियुक्ति खंड, [3] ऐसे खंड, जिनसे एक संकीर्ण पैनल से मध्यस्थ के...

फैसला सुनाने में 17 महीने का विलंब: जब सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित फैसला सुनाने के अपने ही निर्देशों की अनदेखी की
फैसला सुनाने में 17 महीने का विलंब: जब सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित फैसला सुनाने के अपने ही निर्देशों की अनदेखी की

अवस्तिका दाससुप्रीम कोर्ट ने 4 मई को भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय और अन्य के खिलाफ सामूहिक बलात्कार और आपराधिक धमकी के एक आरोप की पुलिस जांच का निर्देश देने वाले कोलकाता के एक मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द करने का फैसला किया। दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट, जिसने पूर्व में तर्कों के समापन के बाद हाईकोर्टों को शीघ्र निर्णय सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे, ने मौजूदा मामले में सुरक्षित रखने के लगभग 17 महीने बाद यह फैसला सुनाया।भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और दो अन्य पर एक महिला से...

दंड प्रक्रिया संहिता,1973 की धारा 161 और 162  का विधिक और संवैधानिक विश्लेषण (भाग 1)
दंड प्रक्रिया संहिता,1973 की धारा 161 और 162 का विधिक और संवैधानिक विश्लेषण (भाग 1)

अदालत में विचारण शुरू होने से पहले कुछ ऐसी प्रक्रियाएं होती हैं जिनका पालन किया जाना अतिआवश्यक होता है, जिन्हें सामान्य भाषा में विचारण पूर्व प्रक्रिया या प्री-ट्रायल प्रक्रिया कहा जाता है। मामले के विचारण प्रारंभ होने से पूर्व दो चरण मुख्य होते है, पहला पुलिस द्वारा अन्वेषण(investigation) और दूसरा मजिस्ट्रेट द्वारा की जाने वाली मामले की जांच। इसमें सबसे महत्वपूर्ण पुलिस द्वारा अन्वेषण के दौरान अपराध से संबंधित साक्ष्यों का एकत्रण है। क्योंकि सामान्यतः अपराध गुप्त व गोपनीय तरीकों से किया जाता है...

Shahid Azmi
मासूमों के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले वकील बहादुर शाहिद आजमी की 13वीं पुण्यतिथि

"मैं सौ बार मर चुका हूं और अगर मौत दस्तक दे रही है, तो मैं इसे आंखों में देखूंगा।“ये बात मासूमों के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले वकील स्वर्गीय बहादुर शाहिद आजमी ने कही थी।साल 2010 में उनके चैंबर में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी।लगभग सात वर्षों के अपने प्रैक्टिस में, आज़मी ने कई केस लड़े और उन लोगों का प्रतिनिधित्व किया जिनके बारे में उनका मानना था कि मुंबई में कई हाई-प्रोफाइल "आतंकवादी मामलों" में गलत तरीके से अभियुक्त थे।लगभग सात सालों की अपनी छोटी सी अवधि में, हमारी क्रीमिनल ट्रायल...