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NI Act में चेक का Presentment क्या है?
परक्राम्य लिखत अर्थात् वचन पत्र, विनिमय पत्र या चेक एक निश्चित धनराशि को संदाय करने का वचन या आदेश अन्तर्निहित करते हैं। वचन पत्र में वचन एवं विनिमय पत्र या चेक में निश्चित धनराशि भुगतान करने का आदेश होता है। विनिमय पत्र या चेक में ऊपरवाल को इस आदेश की कोई जानकारी नहीं होनी है। वचन पत्र इसका अपवाद होता है, क्योंकि वचनदाता अर्थात् रचयिता स्वयं इस प्रकार का वचन देता है। अधिनियम में विनिमय पत्र की दशा में प्रतिग्रहण के लिए एवं सभी लिखतों में संदाय के लिए Presentment ा को अपेक्षा की गई है।अधिनियम की...
NI Act में इंस्ट्रूमेंट के टाइम पीरियड के संबंध में प्रावधान
इस एक्ट का आवश्यक लक्षण उसकी परक्राम्यता होती है। यह प्रश्न है कि परक्राम्य लिखत की यह परक्राम्यता कितने समय रहती है? अधिनियम की धारा 60 यह उपबन्धित करती है कि परक्राम्य लिखत की परक्राम्यता अर्थात् वचन पत्र, विनिमय पत्र या चेक की परक्राम्यता होती है।उसके संदाय एवं सन्तुष्टि तकरचयिता, ऊपरवाल या प्रतिग्रहीता द्वारा परिपक्वता पर या के पश्चात् परन्तु ऐसे संदाय एवं सन्तुष्टि के पश्चात् नहींइस प्रकार, लिखतों की परक्राम्यता (अन्तरण) की अवधि उसके परिपक्वता पर या के पश्चात् संदाय या सन्तुष्टि तक होती...
NI Act में सौकर्य विनिमय पत्र या वचन पत्र
सौकर्य विनिमय पत्र एवं वचन पत्र को परक्राम्य लिखत अधिनियम में परिभाषित नहीं किया गया है, परन्तु इसे धारा 59 में प्रयुक्त किया गया है। व्यापारिक समुदाय इसे प्रायः अपने व्यवहारों में प्रयोग करता है और इसे सामान्यतया साख के माध्यम के रूप में प्रयुक्त करता है। इसके द्वारा जरूरतमन्द व्यक्तियों को वित्तीय सहयोग एवं सहायता प्रदान की जाती है।इंग्लिश विधि के अन्तर्गत आंग्ल विनिमय पत्र अधिनियम, 1882 में सौकर्य विनिमय पत्र या वचन पत्र के सम्बन्ध में निम्नलिखित विशिष्ट उपबन्ध किया गयाविनिमय पत्र का सौकर्य...
NI Act में Dishonor के बाद प्राप्त हुआ इंस्ट्रूमेंट
इस एक्ट की धारा 59 किसी लिखत को अनादर के पश्चात् या अतिशोध्य होने के बाद अभिप्राप्ति के प्रभाव को स्पष्ट करती है। यह सामान्य नियम है कि लिखत के एक सम्यक् अनुक्रम धारक का स्वत्व अन्तरक के स्वत्व में किसी दोष से प्रभावित नहीं होता है। यह नियम हालांकि निम्नलिखित दो शर्तों के अधीन है जहाँ धारक इसे-अनादर की सूचना के साथ अभिप्राप्त करता हैअतिशोध्य होने के पश्चात् अर्थात् परिपक्वता के बाद अभिप्राप्त करता हैअनादूत लिखत का परक्रामण- जहाँ कोई लिखत अप्रतिग्रहण या असंदाय द्वारा अनादृत हो गया है कोई भी...
अपील, याचिकाओं और अन्य कार्यवाहियों पर शुल्क - धारा 15 और 16 राजस्थान कोर्ट फीस मूल्यांकन अधिनियम, 1961
राजस्थान कोर्ट फीस और वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1961 न्यायिक कार्यवाहियों में शुल्क की गणना और संग्रहण (Collection) को सुव्यवस्थित करने के लिए एक विस्तृत कानूनी ढांचा प्रदान करता है। इस अधिनियम में पहले ही वादपत्र (Plaint) पर शुल्क निर्धारण की प्रक्रिया को विस्तार से समझाने के लिए धारा 10 से लेकर धारा 13 तक के प्रावधान दिए गए हैं।इन धाराओं में यह स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार वादी को वाद की विषय-वस्तु (Subject Matter) का मूल्यांकन प्रस्तुत करना होगा, न्यायालय द्वारा इस मूल्यांकन की समीक्षा कैसे...
मृत्युदंड की पुष्टि से जुड़ी प्रक्रिया : भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 407 और 408
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bhartiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) जो अब भारत की नई आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code) है, ने कई अहम बदलाव लाए हैं। इनमें से सबसे गंभीर मामलों में से एक है — मृत्युदंड (Death Sentence) से जुड़ी प्रक्रिया।इस विषय पर अध्याय XXX (Chapter 30) में दो महत्वपूर्ण धाराएं हैं — धारा 407 और धारा 408, जो यह बताती हैं कि जब किसी व्यक्ति को Sessions Court द्वारा मृत्युदंड दिया जाता है, तो उसे सीधे लागू नहीं किया जा सकता। पहले उस फैसले की High Court...
धारा 20 राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001: आदेशों की पालना और कब्जा वसूली की प्रक्रिया
राजस्थान राज्य में किराया नियंत्रण और मकान मालिक-किरायेदार संबंधों को विनियमित करने हेतु लागू किया गया राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 (Rajasthan Rent Control Act, 2001), विशेष रूप से त्वरित और न्यायसंगत समाधान प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया है।यह अधिनियम किराया विवादों में पारंपरिक दीवानी अदालतों की अपेक्षा अधिक प्रभावी, सरल और गति से न्याय दिलाने वाली प्रणाली प्रदान करता है। केवल न्यायादेश (Judgment) प्राप्त होना पर्याप्त नहीं होता, जब तक वह प्रभावी ढंग से लागू न किया जा सके। इसी...
क्या शिक्षा का मौलिक अधिकार उचित शैक्षणिक वातावरण और आधारभूत संरचना सुनिश्चित करने के लिए सीमित किया जा सकता है?
Dental Council of India v. Biyani Shikshan Samiti मामले में यह प्रश्न उठाया गया कि भारत में दंत चिकित्सा शिक्षा (Dental Education) को नियंत्रित करने का अधिकार पूरी तरह से Dental Council of India (DCI) के पास है या नहीं।इस केस में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने यह तय किया कि क्या DCI की स्वीकृति (Approval) के बिना राज्य सरकार या विश्वविद्यालय (University) अपने स्तर पर दंत चिकित्सा संस्थानों (Dental Institutions) से जुड़े फैसले ले सकते हैं। यह मामला इस बात को स्पष्ट करता है कि किसी पेशेवर नियामक...
क्या राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 कानून के आने से पहले दिए गए स्वामित्व आदेश पर कोई असर पड़ेगा?
शंकरलाल नदानी बनाम सोहनलाल जैन (2022) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जब कोई नया कानून लागू होता है, तो पहले से चल रहे स्वामित्व (Possession) के दावों और विवादों पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। इस मामले में मुख्य प्रश्न यह था कि क्या राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 (Rajasthan Rent Control Act, 2001) के प्रभाव में आने के बाद भी सिविल अदालत द्वारा दिया गया स्वामित्व का आदेश वैध और प्रभावी रहेगा।यह लेख इस मामले में कोर्ट द्वारा निर्धारित किए गए कानूनी सिद्धांतों को समझाने का...
न्यायालय के निर्णय का अनुवाद और जिला मजिस्ट्रेट को भेजने की प्रक्रिया: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 405 और 406
न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए अभियुक्त (Accused) और अन्य पक्षकारों (Parties) को यह जानने का अधिकार होता है कि न्यायालय ने क्या निर्णय दिया और वह निर्णय किस आधार पर दिया गया। कई बार न्यायालय की आधिकारिक भाषा अभियुक्त या अन्य पक्षकारों की भाषा से भिन्न होती है। ऐसे मामलों में निर्णय (Judgment) का अनुवाद (Translation) आवश्यक हो जाता है ताकि सभी संबंधित पक्ष न्यायिक प्रक्रिया को पूरी तरह समझ सकें।इसके अतिरिक्त, न्यायिक प्रशासन (Judicial Administration) में समन्वय...
धारा 19 राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001: अपीलीय किराया न्यायाधिकरण और लंबित मामलों में किराया भुगतान– भाग 2
राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 (Rajasthan Rent Control Act, 2001) का उद्देश्य किरायेदार (Tenant) और मकान मालिक (Landlord) के बीच विवादों का त्वरित और न्यायसंगत निपटारा करना है। इस अधिनियम के तहत, किराया न्यायाधिकरण (Rent Tribunal) और अपीलीय किराया न्यायाधिकरण (Appellate Rent Tribunal) स्थापित किए गए हैं, ताकि किरायेदारी से जुड़े मामलों को सुलझाया जा सके।धारा 19 (Section 19) और धारा 19-A (Section 19-A) इस प्रक्रिया का विस्तार करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि किराया विवादों का न्यायिक...
वाद में दावे के कुछ भाग का त्याग और लिखित बयान पर शुल्क: धारा 13 और 14 राजस्थान कोर्ट फीस अधिनियम, 1961
न्यायिक प्रक्रिया (Judicial Process) में शुल्क निर्धारण (Fee Determination) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राजस्थान कोर्ट फीस और वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1961 के तहत मुकदमों में वादपत्र (Plaint) और लिखित बयान (Written Statement) पर शुल्क निर्धारित करने की प्रक्रिया विस्तार से बताई गई है।पहले की धाराओं (Sections 10, 11 और 12) में वाद की विषय-वस्तु का मूल्यांकन, शुल्क में संशोधन और अतिरिक्त मुद्दों पर शुल्क लगाने की व्यवस्था की गई थी। इसी संदर्भ में धारा 13 और धारा 14 राजस्थान कोर्ट फीस अधिनियम,...
मुकदमे में मुद्दों के निर्धारण पर अतिरिक्त शुल्क : धारा 12 राजस्थान कोर्ट फीस और वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1961
न्यायिक प्रक्रिया (Judicial Process) में मुकदमे की सुनवाई के दौरान कई बार ऐसे मुद्दे (Issues) उत्पन्न होते हैं, जिनके कारण पक्षकार को अतिरिक्त शुल्क (Additional Fee) जमा करना पड़ता है।राजस्थान कोर्ट फीस और वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1961 (Rajasthan Court Fees and Suits Valuation Act, 1961) की धारा 12 (Section 12) में इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रावधान किया गया है। यह धारा कहती है कि यदि मुकदमे के दौरान कोई नया मुद्दा जुड़ता है, जिससे किसी पक्षकार को अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता...
राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001: अपीलीय किराया न्यायाधिकरण, अपीलऔर उनकी सीमाएं – भाग 1 धारा 19
राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 (Rajasthan Rent Control Act, 2001) के तहत, किराया न्यायाधिकरण (Rent Tribunal) के निर्णयों के विरुद्ध अपील (Appeal) करने के लिए अपीलीय किराया न्यायाधिकरण (Appellate Rent Tribunal) का प्रावधान किया गया है। धारा 19 (धारा 19) यह निर्धारित करता है कि राज्य सरकार (State Government) आवश्यकतानुसार अपीलीय न्यायाधिकरणों का गठन करेगी, उनके अधिकार क्षेत्र को निर्धारित करेगी, और उनकी कार्यवाही से संबंधित नियम बनाएगी।अपीलीय किराया न्यायाधिकरण का गठन (Constitution of...
दंडित व्यक्ति को निर्णय की प्रति देने का अधिकार: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 404
न्यायिक प्रक्रिया (Judicial Process) में पारदर्शिता (Transparency) और न्याय के अधिकार (Right to Justice) को सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि अभियुक्त (Accused) को उसके खिलाफ दिए गए निर्णय (Judgment) की जानकारी पूरी तरह से उपलब्ध कराई जाए।भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 404 यह प्रावधान करती है कि यदि किसी अभियुक्त को कारावास (Imprisonment) या मृत्युदंड (Death Sentence) दिया जाता है, तो उसे न्यायालय द्वारा पारित निर्णय की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) तुरंत और मुफ्त में प्रदान की...
क्या Homebuyer को Consumer कानून होते हुए भी Arbitration में जाने के लिए मजबूर किया जा सकता है?
Experion Developers बनाम Sushma Ashok Shiroor (2022) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने consumer अधिकारों, arbitration (मध्यस्थता) और real estate agreements (अचल संपत्ति समझौते) में arbitration clauses की वैधता से जुड़े अहम कानूनी मुद्दों पर विचार किया।इस मामले में यह तय किया गया कि क्या एक homebuyer (गृह खरीदार), जिसे Consumer Protection Act, 1986 और 2019 द्वारा सुरक्षा दी गई है, को केवल इसलिए arbitration में जाने के लिए मजबूर किया जा सकता है क्योंकि उसके और developer (विकासकर्ता) के बीच ऐसा agreement...
विशेष कारणों का उल्लेख और न्यायालय द्वारा निर्णय में बदलाव पर रोक: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 402 और 403
न्यायिक प्रणाली का मुख्य उद्देश्य केवल अपराधियों को दंड देना नहीं बल्कि उन्हें सुधारने और पुनर्वास (Rehabilitation) का अवसर देना भी है। कई मामलों में, अपराध की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय आरोपी को सीधे सजा देने की बजाय प्रोबेशन (Probation) पर छोड़ सकता है या युवा अपराधियों (Juvenile Offenders) के लिए विशेष पुनर्वास कार्यक्रम लागू कर सकता है।हालांकि, कुछ मामलों में न्यायालय को यह उपयुक्त नहीं लगता और वह प्रोबेशन या पुनर्वास की सुविधा नहीं देता। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya...
धारा 18 राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001: किराया न्यायाधिकरण का क्षेत्राधिकार
राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 (Rajasthan Rent Control Act, 2001) के तहत, किराया संबंधी विवादों (Rent Disputes) को सुलझाने के लिए किराया न्यायाधिकरण (Rent Tribunal) को विशिष्ट अधिकार (Exclusive Jurisdiction) दिए गए हैं।धारा 18 (Section 18) यह स्पष्ट करता है कि केवल किराया न्यायाधिकरण को इन मामलों की सुनवाई करने का अधिकार होगा और अन्य किसी दीवानी न्यायालय (Civil Court) को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होगा। केवल किराया न्यायाधिकरण को अधिकार (Exclusive Authority of Rent Tribunal) ...
अपील न्यायालय में शुल्क निर्धारण : धारा 11 भाग 2 राजस्थान कोर्ट फीस अधिनियम, 1961
न्यायिक प्रक्रिया (Judicial Process) में अपील (Appeal) का महत्वपूर्ण स्थान होता है, जहां निचली अदालत (Lower Court) के आदेशों की समीक्षा की जाती है। राजस्थान कोर्ट फीस और वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1961 (Rajasthan Court Fees and Suits Valuation Act, 1961) की धारा 11 (Section 11) में यह प्रावधान किया गया है कि किसी भी मुकदमे में सही शुल्क (Proper Fee) की जांच कैसे की जाएगी।इस लेख के पहले भाग में, हमने इस धारा के प्रारंभिक प्रावधानों पर चर्चा की थी। इस भाग में, हम अपील न्यायालय (Appellate Court) में...
क्या दोषपूर्ण जांच के कारण आरोपी को बरी किया जा सकता है?
State of Uttar Pradesh v. Subhash Pappu (2022) के फैसले में आपराधिक न्याय (Criminal Justice) से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार किया गया। इस मामले में जांच (Investigation), साक्ष्य (Evidence) और न्यायालय (Court) के कर्तव्यों (Duties) पर गहराई से चर्चा की गई।न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि जांच में खामियां (Defects) हैं, तो भी यदि अभियोजन (Prosecution) आरोपी का अपराध (Crime) संदेह से परे (Beyond Reasonable Doubt) सिद्ध कर देता है, तो दोषपूर्ण जांच मात्र से आरोपी को बरी नहीं किया जा सकता। इस...