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Sales of Goods Act, 1930 की धारा 66 : बचत खंड और अनुप्रयोग की सीमाएं
माल विक्रय अधिनियम (Sales of Goods Act), 1930 का अध्याय VII विविध प्रावधानों (Miscellaneous Provisions) के साथ समाप्त होता है। धारा 66, जिसे बचत खंड (Savings Clause) के रूप में जाना जाता है, यह सुनिश्चित करती है कि अधिनियम का प्रवर्तन (enforcement) कुछ मौजूदा अधिकारों, दायित्वों, कानूनी कार्यवाही या अन्य कानूनों को प्रभावित न करे। यह अधिनियम के दायरे और सीमाओं को स्पष्ट करती है।बचत प्रावधान (Savings Provisions) धारा 66(1) उन पहलुओं को सूचीबद्ध करती है जिन्हें माल विक्रय अधिनियम प्रभावित नहीं...
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 14: विवाह के एक वर्ष के भीतर तलाक याचिका पर प्रतिबंध
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) विवाह को एक पवित्र और महत्वपूर्ण संस्था (Sacred and Significant Institution) मानता है। इसलिए, यह विवाहों को अनावश्यक रूप से जल्दी तोड़ने से रोकने का प्रयास करता है।धारा 14 (Section 14) इसी सिद्धांत पर आधारित है, जो विवाह के एक वर्ष के भीतर (Within One Year) तलाक के लिए याचिका दायर करने पर प्रतिबंध (Restriction) लगाती है। यह प्रावधान जोड़ों को अपने मतभेदों (Differences) को सुलझाने और अपने वैवाहिक बंधन (Marital Bond) को मजबूत करने के लिए...
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 की धारा 55: फर्म के विघटन के बाद सद्भावना की बिक्री और व्यापार पर प्रतिबंध के समझौते
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (Indian Partnership Act, 1932) की धारा 55 (Section 55) फर्म के विघटन (Dissolution of a Firm) के बाद सद्भावना (Goodwill) की बिक्री और उससे संबंधित जटिल अधिकारों और व्यापारिक प्रतिबंधों पर विस्तार से बताती है। यह एक महत्वपूर्ण धारा है जो फर्म की अमूर्त संपत्ति (Intangible Asset) के मूल्य को पहचानती है और उसके निपटान के तरीके को नियंत्रित करती है।सद्भावना की बिक्री के नियम (Rules for Sale of Goodwill) 1. सद्भावना का परिसंपत्ति में शामिल होना और बिक्री (Inclusion in...
क्या लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार न देने से ED की गिरफ्तारी अवैध मानी जाएगी?
राम किशोर अरोड़ा बनाम प्रवर्तन निदेशालय (2023) के निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया से जुड़ा सवाल स्पष्ट किया — क्या प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा गिरफ्तारी के समय गिरफ्तारी के कारणों की लिखित प्रति (Written Copy of Grounds of Arrest) न देना, गिरफ्तारी को अवैध बनाता है?यह फैसला Prevention of Money Laundering Act, 2002 (PMLA) की धारा 19 की व्याख्या करता है और Vijay Madanlal Choudhary, V. Senthil Balaji तथा Pankaj Bansal जैसे पूर्व निर्णयों को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट करता है कि...
Sales of Goods Act, 1930 की धारा 64A: बिक्री अनुबंधों में करों का समायोजन
माल विक्रय अधिनियम (Sales of Goods Act), 1930 का अध्याय VII विविध प्रावधानों (Miscellaneous Provisions) को शामिल करता है। धारा 64A, जो बाद में जोड़ी गई थी, विशेष रूप से बिक्री अनुबंधों में कर (Tax) के प्रभाव से संबंधित है, जब अनुबंध बनने के बाद कर की दरों में बदलाव होता है या नया कर लगाया जाता है। यह धारा सुनिश्चित करती है कि माल की कीमत पर कर परिवर्तनों का उचित प्रभाव पड़े, चाहे वह विक्रेता (Seller) या खरीदार (Buyer) को हो।बिक्री अनुबंधों में बढ़े हुए या घटे हुए करों को जोड़ना या घटाना (Amount...
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 धारा 13A-13B: तलाक कार्यवाही में वैकल्पिक राहत और आपसी सहमति से तलाक
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) में संशोधन (Amendments) समय-समय पर वैवाहिक संबंधों की बदलती सामाजिक गतिशीलता (Changing Social Dynamics) को दर्शाते हैं। धारा 13A (Section 13A) न्यायालय को तलाक की कार्यवाही में वैकल्पिक राहत (Alternate Relief) प्रदान करने का विवेक (Discretion) देती है, जबकि धारा 13B (Section 13B) आपसी सहमति (Mutual Consent) से तलाक के लिए एक महत्वपूर्ण प्रावधान (Crucial Provision) प्रस्तुत करती है।ये धाराएँ लचीलापन (Flexibility) लाती हैं और उन स्थितियों में...
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 की धारा 53-54: फर्म के विघटन के बाद व्यापार और सद्भावना से संबंधित प्रावधान
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (Indian Partnership Act, 1932) के ये खंड फर्म के विघटन (Dissolution of a Firm) के बाद के महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं, विशेष रूप से व्यापार के निरंतरता, फर्म के नाम के उपयोग, और सद्भावना (Goodwill) की बिक्री से जुड़े अधिकारों और प्रतिबंधों पर।फर्म के नाम या फर्म की संपत्ति के उपयोग को प्रतिबंधित करने का अधिकार (Right to Restrain from Use of Firm Name or Firm Property) धारा 53 (Section 53) यह प्रावधान करती है कि फर्म के विघटन के बाद, प्रत्येक भागीदार या...
क्या कोई Non-signatory कंपनी भी Group of Companies सिद्धांत के तहत Arbitration के लिए बाध्य हो सकती है?
Cox & Kings Ltd. बनाम SAP India Pvt. Ltd. (2024) में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर विचार किया कि क्या कोई ऐसा पक्ष जो मध्यस्थता अनुबंध (Arbitration Agreement) पर हस्ताक्षरकर्ता (Signatory) नहीं है, उसे भी मध्यस्थता के लिए बाध्य किया जा सकता है यदि वह उसी व्यावसायिक लेनदेन (Commercial Transaction) और कॉर्पोरेट समूह (Corporate Group) का हिस्सा हो। यह फैसला Arbitration and Conciliation Act, 1996 की धारा 11(6) और Group of Companies Doctrine की व्याख्या करता है, जो पिछले कुछ...
Hindu Marriage Act में मैरिज के लिए पूर्व पति या पत्नी का जीवित नहीं होना और पक्षकारों की मानसिक स्थिति का ठीक होना
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 5 के अंतर्गत यह महत्वपूर्ण शर्त अधिरोपित की गई है कि हिंदू विवाह तभी संपन्न होगा जब विवाह के समय दोनों पक्षकारों में से न तो वर कि कोई पत्नी जीवित होगी और न ही वधू का कोई पति जीवित होगा। प्राचीन शास्त्रीय हिंदू विवाह बहुपत्नी को मान्यता देता था परंतु आधुनिक हिंदू विवाह अधिनियम 1955 बहुपत्नी का उन्मूलन करता है।लीला गुप्ता बनाम लक्ष्मी नारायण 1978 (3) सुप्रीम कोर्ट 558 के मामले में कहा गया है कि दांपत्य युगल शब्द से आशय पूर्व दांपत्य युगल से नहीं है यदि वर या वधू...
Hindu Marriage Act में मैरिज की शर्तों में पक्षकारों का हिन्दू होना और प्रोहिबिटेड रिलेशनशिप का महत्त्व
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अधीन जो शर्त दी गई है उनमें सबसे पहली शर्त दो हिंदू पक्षकारों का होना अति आवश्यक है। कोई भी विवाह हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अधीन तब ही संपन्न होगा जब दोनों पक्षकार हिंदू होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने भीमराव लोखंडे बनाम महाराष्ट्र राज्य एआईआर 1985 सुप्रीम कोर्ट 1564 के मामले में कहा है कि जब विवाह के दोनों पक्षकार हिंदू हो तो ही हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत कोई हिंदू विवाह संपन्न माना जाएगा।यदि विवाह का कोई एक पक्षकार हिंदू है तथा दूसरा पक्षकार गैरहिंदू है तो विवाह इस...
Indian Partnership Act, 1932, की धारा 48-50 : फर्म के विघटन के बाद खातों का निपटान और देनदारियों का भुगतान
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (Indian Partnership Act, 1932) का यह खंड फर्म के विघटन (Dissolution of a Firm) के बाद के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक पर केंद्रित है: खातों का निपटान (Settlement of Accounts) और देनदारियों का भुगतान (Payment of Liabilities). यह सुनिश्चित करता है कि व्यवसाय के समापन पर वित्तीय मामलों को एक व्यवस्थित और न्यायसंगत तरीके से संभाला जाए।भागीदारों के बीच खातों के निपटान का तरीका (Mode of Settlement of Accounts Between Partners) धारा 48 (Section 48) यह बताती है कि फर्म...
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13: तलाक के आधार
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) का सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी (Revolutionary) प्रावधानों में से एक तलाक (Divorce) का परिचय है। पारंपरिक हिंदू कानून में, विवाह को एक अटूट संस्कार (Indissoluble Sacrament) माना जाता था, और तलाक लगभग अज्ञात (Almost Unknown) था, सिवाय कुछ समुदायों में प्रचलित रीति-रिवाजों (Customs) के।धारा 13 (Section 13) इस दृष्टिकोण को बदलती है, जिससे पति या पत्नी दोनों को विशिष्ट आधारों (Specific Grounds) पर विवाह को भंग (Dissolve) करने की अनुमति मिलती है।...
Sales of Goods Act, 1930 की धारा 62-64: नीलामी बिक्री
माल विक्रय अधिनियम (Sales of Goods Act), 1930 का अध्याय VII विविध प्रावधानों (Miscellaneous Provisions) से संबंधित है जो अधिनियम के पिछले अध्यायों को पूरक बनाते हैं। ये धाराएँ कुछ सामान्य सिद्धांतों, 'उचित समय' के निर्धारण, और नीलामी बिक्री (Auction Sale) के विशिष्ट नियमों पर प्रकाश डालती हैं।निहित शर्तों और निबंधनों का अपवर्जन (Exclusion of Implied Terms and Conditions) धारा 62 पार्टियों को निहित शर्तों और निबंधनों को बदलने की अनुमति देती है: जहाँ बिक्री अनुबंध के तहत कानून के निहितार्थ...
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 की धारा 51-52: फर्म के विघटन पर प्रीमियम की वापसी और धोखाधड़ी/गलत बयानी के मामले में अधिकार
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (Indian Partnership Act, 1932) के ये खंड उन विशिष्ट परिस्थितियों को संबोधित करते हैं जो फर्म के समय से पहले विघटन (Premature Dissolution) या धोखाधड़ी (Fraud) और गलत बयानी (Misrepresentation) के आधार पर भागीदारी अनुबंध को रद्द (Rescinded) करने पर उत्पन्न होती हैं।समय से पहले विघटन पर प्रीमियम की वापसी (Return of Premium on Premature Dissolution) धारा 51 (Section 51) उस स्थिति से संबंधित है जब एक भागीदार ने एक निश्चित अवधि (Fixed Term) के लिए भागीदारी में प्रवेश करते...
क्या भारत में एंप्लॉयमेंट बॉन्ड वैध हैं? सुप्रीम कोर्ट ने दी स्पष्टता
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस विवादास्पद मुद्दे को हल किया कि क्या रोजगार बांड भारत में वैध और कानूनी रूप से लागू करने योग्य हैं।यह माना गया कि न्यूनतम सेवा अवधि को अनिवार्य करने वाले रोजगार बांड समझौते या प्रारंभिक इस्तीफे के लिए वित्तीय जुर्माना लगाना कानूनी रूप से वैध है। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि इस तरह के खंड भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 27 का उल्लंघन नहीं करते हैं, जो व्यापार पर प्रतिबंध को प्रतिबंधित करता है, बशर्ते प्रतिबंध केवल रोजगार की अवधि के दौरान लागू हों और कर्मचारी के...
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955: धारा 11 द्वारा निर्धारित शून्य विवाह और धारा 12 द्वारा परिभाषित शून्यकरणीय विवाह के आधार
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) के तहत, विवाह हमेशा पूर्ण रूप से वैध (Perfectly Valid) नहीं होते हैं। कुछ परिस्थितियों में, एक विवाह को शून्य (Void) या शून्यकरणीय (Voidable) घोषित किया जा सकता है।धारा 11 (Section 11) उन विवाहों से संबंधित है जो शुरू से ही अमान्य (Invalid) होते हैं, जबकि धारा 12 (Section 12) उन विवाहों का विवरण देती है जो कुछ विशेष आधारों (Specific Grounds) पर रद्द (Annulled) किए जा सकते हैं, लेकिन तब तक वैध बने रहते हैं जब तक उन्हें अदालत द्वारा रद्द नहीं...
Sales of Goods Act, 1930 की धारा 59, 60 और 61: अनुबंध के उल्लंघन के लिए उपाय - वारंटी, अग्रिम खंडन, और विशेष क्षतिपूर्ति
माल विक्रय अधिनियम (Sales of Goods Act), 1930 का अध्याय VI अनुबंध के उल्लंघन (Breach of Contract) के लिए उपलब्ध विभिन्न कानूनी उपायों को जारी रखता है। ये धाराएँ विशेष रूप से वारंटी के उल्लंघन, नियत तारीख से पहले अनुबंध के खंडन (Anticipatory Repudiation), और ब्याज व विशेष क्षतिपूर्ति की वसूली से संबंधित हैं।वारंटी के उल्लंघन के लिए उपाय (Remedy for Breach of Warranty) धारा 59 वारंटी के उल्लंघन के लिए खरीदार के उपलब्ध उपायों को स्पष्ट करती है: 1. माल अस्वीकार करने का अधिकार नहीं - धारा 59(1): ...
Indian Partnership Act, 1932 की धारा 45-47: फर्म के विघटन के बाद की देनदारियां और अधिकार
विघटन के बाद भागीदारों के कार्यों के लिए देनदारी (Liability for Acts of Partners Done After Dissolution)भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (Indian Partnership Act, 1932) की धारा 45 (Section 45) इस बात को स्पष्ट करती है कि फर्म के विघटन (Dissolution of a Firm) के बाद भी भागीदारों की तीसरे पक्षों के प्रति देनदारी (Liability to Third Parties) कैसे बनी रहती है: 1. सार्वजनिक सूचना तक देनदारी का जारी रहना (Continued Liability Until Public Notice): किसी फर्म के विघटन के बावजूद, भागीदार तीसरे पक्षों के...
क्या किसी दूसरे राज्य में दर्ज FIR के लिए भी अग्रिम जमानत दी जा सकती है?
प्रिया इंडोरिया बनाम कर्नाटक राज्य (2023) के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि क्या कोई कोर्ट, जिसकी क्षेत्रीय सीमा (Territorial Jurisdiction) से बाहर FIR दर्ज हुई है, उस मामले में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) दे सकता है या नहीं। यह फैसला लंबे समय से चली आ रही कानूनी बहस को समाप्त करता है और यह तय करता है कि न्याय और प्रक्रिया (Procedure) के संतुलन में कैसे व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) की रक्षा की जा सकती है।CrPC की धारा 438 और अग्रिम जमानत का प्रावधान...
Hindu Marriage Act में Custom and usage, Full blood and half blood, Sapinda relationship शब्द के अर्थ
इस एक्ट की धारा 3 के अनुसार इस अधिनियम में प्रयुक्त होने वाले शब्दों की परिभाषाएं दी गई है। इन परिभाषाओं से उन शब्दों के संबंध में कोई संशय नहीं रहता है तथा सभी स्थितियां स्पष्ट हो जाती है।Custom and usageहिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 3 के अनुसार रूढ़ि और प्रथा शब्द की परिभाषाएं दी गयी है। यदि किसी मामले में पारिवारिक रूढ़ि का सहारा लिया जाता है तो उसे सिद्ध भी किया जाएगा। रूढ़ि को सबूतों द्वारा सिद्ध किया जा सकता है। इसके विभिन्न तत्व होते हैं। जैसे रूढ़ि और प्रथा अवैधानिक एवं लोकनीति के विरुद्ध...



















