हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Update: 2026-04-12 02:30 GMT

देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (06 अप्रैल, 2026 से 10 अप्रैल, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

'जॉब्लेस' पति और 'हैंडसम सैलरी' वाली पत्नी: कर्नाटक हाईकोर्ट ने मेंटेनेंस बढ़ाने से किया इनकार

कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत पत्नी को दी गई भरण-पोषण राशि बढ़ाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि पत्नी अच्छी आय अर्जित कर रही है, जबकि पति ने स्वयं को बेरोजगार बताया है, ऐसे में भरण-पोषण बढ़ाने का कोई आधार नहीं बनता।

जस्टिस वी श्रीसनंदा की एकल पीठ ने साथ ही पति की उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें उसने 2015 के पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द करने की मांग की थी। इस आदेश के तहत पति को पत्नी को ₹9,000 प्रतिमाह (₹5,000 किराया और ₹4,000 भरण-पोषण) तथा ₹40,000 मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। दोनों पक्षों की पुनरीक्षण याचिकाएं खारिज कर दी गईं।

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मतदाता सूची पर बड़ा फैसला: गुजरात हाईकोर्ट ने कहा— राज्य निर्वाचन आयोग नाम जोड़ने-हटाने का स्वतंत्र अधिकार नहीं रखता

गुजरात हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि राज्य निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का स्वतंत्र अधिकार नहीं है। आयोग केवल विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची को ही अपनाने (प्रतिरूपित करने) का काम करता है। अदालत ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें एक महिला ने अहमदाबाद नगर निगम चुनाव में भाग लेने के लिए अपनी नामावली में नाम शामिल करने की मांग की थी।

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संयुक्त परिवार के अस्तित्व की धारणा के आधार पर सह-काश्तकारी की अनुमति नहीं दी जा सकती, यह साबित करना होगा कि प्लॉट पैतृक है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि संयुक्त परिवार के अस्तित्व की धारणा के आधार पर सह-काश्तकारी (Co-Tenancy) की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि संबंधित पक्ष को यह साबित करना होगा कि प्लॉट पैतृक है। साथ ही प्लॉट की पहचान और रिकॉर्ड में उसकी निरंतरता भी साबित करनी होगी।

जस्टिस चंद्र कुमार राय ने फैसला सुनाते हुए कहा, “विचाराधीन प्लॉट का पैतृक होना साबित नहीं हो सका, और न ही प्लॉट की पहचान व रिकॉर्ड में उसकी निरंतरता स्थापित हो पाई। ऐसे में केवल इस आधार पर सह-काश्तकारी की अनुमति नहीं दी जा सकती कि पुराने समय में संयुक्त परिवार के अस्तित्व की धारणा थी।”

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महिला सहकर्मी को घूरना अशोभनीय, पर वोयूरिज्म नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट ने FIR रद्द की

बॉम्बे हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि महिला सहकर्मी के शरीर को घूरना भले ही अनुचित और नैतिक रूप से गलत आचरण हो, लेकिन इसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354-सी के तहत वोयूरिज्म का अपराध नहीं माना जा सकता।

जस्टिस अमित बोरकर ने 8 अप्रैल के आदेश में मुंबई के बोरीवली थाने में दर्ज FIR रद्द करते हुए यह स्पष्ट किया कि धारा 354-सी का दायरा सीमित है और इसे हर तरह के आपत्तिजनक व्यवहार पर लागू नहीं किया जा सकता।

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ग्राम न्यायालय भी तय कर सकते हैं भरण-पोषण के मामले: इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया कि ग्राम न्यायालयों को भरण-पोषण से जुड़े मामलों की सुनवाई और निष्पादन करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 से 128 तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 से 147 के तहत आने वाले मामलों पर भी ग्राम न्यायालय निर्णय ले सकते हैं।

जस्टिस अब्दुल शाहिद की पीठ ने यह टिप्पणी एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें उसने अपने भरण-पोषण आदेश के क्रियान्वयन के लिए लंबित प्रार्थना पत्र के शीघ्र निस्तारण की मांग की थी।

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असम सीएम की पत्नी के पासपोर्ट पर विवाद: कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को मिली 1 हफ़्ते की अग्रिम जमानत, संबंधित कोर्ट में जाने की अनुमति

तेलंगाना हाईकोर्ट ने शुक्रवार (10 अप्रैल) को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को एक हफ़्ते की अग्रिम ज़मानत दी। यह ज़मानत असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा द्वारा दर्ज कराई गई FIR के सिलसिले में दी गई, जिसमें उन पर कई पासपोर्ट रखने के आरोप लगाए गए।

जस्टिस के. सुजाना ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा, "याचिकाकर्ता को संबंधित कोर्ट में अर्ज़ी दाख़िल करने के लिए एक हफ़्ते का समय दिया जाता है... याचिकाकर्ता को शर्तों के साथ एक हफ़्ते की राहत दी जाती है।"

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बिहार राज्य वित्त निगम राज्य की मंज़ूरी के बिना कर्मचारियों का वेतन तय कर सकता है: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट की चीफ़ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की डिवीज़न बेंच ने फ़ैसला दिया कि State Financial Corporations Act, 1951 के तहत एक State Financial Corporation के पास अपने कर्मचारियों का वेतन और सेवा शर्तें तय करने का अधिकार है, जिसके लिए उसे राज्य सरकार से पहले से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं है।

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टेंडर में 'मौजूदा प्रतिबद्धता' वही मानी जाएगी, जो वास्तव में लागू हों: पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि टेंडर प्रक्रिया में केवल वही कार्य “मौजूदा प्रतिबद्धता” माने जाएंगे, जो वास्तव में लागू और प्रभावी हों। जिन कार्यों को पहले ही समाप्त करने का प्रस्ताव हो चुका हो, उन्हें छिपाने के आधार पर बोलीदाता को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।

जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस शैलेन्द्र सिंह की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए तकनीकी मूल्यांकन समिति द्वारा एक बोलीदाता को अयोग्य ठहराने का आदेश रद्द किया।

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कस्टडी मांगने वाली हेबियस कॉर्पस याचिका पर 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' की रोक नहीं, बच्चे के हित में रिट जारी की जा सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिंगल जज का आदेश रद्द किया, जिसमें एक मां की हेबियस कॉर्पस याचिका खारिज की गई थी। इस याचिका में मां ने पिता से अपने बच्चे की कस्टडी मांगी थी। कोर्ट ने कहा कि मां की याचिका को इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' के तहत उसके पास दूसरा कानूनी उपाय मौजूद था। ऐसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर यह बच्चे के सबसे अच्छे हित में हो तो रिट कोर्ट अपने असाधारण क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल कर सकती है।

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UAPA के तहत बिना पुष्टि वाले गवाह की गवाही और फ़ोन कॉल के आधार पर ज़मानत से इनकार नहीं किया जा सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत ज़मानत से तब इनकार नहीं किया जा सकता, जब अभियोजन पक्ष मुख्य रूप से गवाहों के बयानों और बिना पुष्टि वाले फ़ोन कॉल पर निर्भर हो। उसके पास ऐसा कोई सामान या सबूत न हो जिससे पहली नज़र में आरोपी की संलिप्तता साबित होती हो।

कोर्ट NIA Act की धारा 21 के तहत दायर एक अपील पर सुनवाई कर रहा था। इस अपील में NIA के स्पेशल जज, जम्मू के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें IPC की धारा 120-B, NDPS Act की धारा 8/21, और UAPA की धारा 17, 18 और 20 के तहत दर्ज मामले में अपीलकर्ता की ज़मानत अर्जी खारिज की गई।

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पहले विवाह के बेबुनियाद आरोप से नहीं रुकेगा हक, पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार: हिमाचल हाईकोर्ट

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि पत्नी के पहले से विवाह होने के केवल आरोप, बिना किसी ठोस और वैध प्रमाण के उसे घरेलू हिंसा कानून के तहत राहत पाने से वंचित नहीं कर सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी परिस्थितियों में पत्नी भरण-पोषण की हकदार रहेगी।

जस्टिस संदीप शर्मा ने कहा, “जब पति-पत्नी के बीच विवाह स्वीकार किया गया और पहले विवाह के अस्तित्व का कोई कानूनी प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं है तो शिकायत को खारिज करना उचित नहीं था।”

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महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के तहत अधिकारियों को किसी ट्रस्ट के नाम में बदलाव करने का अधिकार नहीं: बॉम्बे हाइकोर्ट का अहम फैसला

बॉम्बे हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट अधिनियम के तहत अधिकारियों को किसी ट्रस्ट के नाम में बदलाव करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि कानून की व्यवस्था में ट्रस्ट के नाम की उपयुक्तता की जांच का कोई प्रावधान ही नहीं है।

जस्टिस शर्मिला यू. देशमुख ने यह फैसला नेशनल एग को-ऑर्डिनेशन कमेटी की याचिका पर सुनाया, जिसमें संयुक्त धर्मादाय आयुक्त के उस आदेश को चुनौती दी गई। इसमें ट्रस्ट के नाम से नेशनल शब्द हटाने का निर्देश दिया गया था।

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शादीशुदा होने के बावजूद लिव-इन कपल को सुरक्षा, दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- जीवन और स्वतंत्रता सर्वोपरि

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि दो वयस्क अपनी इच्छा से साथ रह रहे हैं तो केवल इस आधार पर उन्हें सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता कि वे पहले से किसी और से शादीशुदा हैं। अदालत ने ऐसे ही एक लिव-इन कपल को पुलिस सुरक्षा देने का निर्देश दिया।

जस्टिस सौरभ बनर्जी की पीठ ने स्पष्ट कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सर्वोपरि है और यह सभी नागरिकों को समान रूप से प्राप्त है।

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मजिस्ट्रेट संज्ञान लेने के बाद के चरण में भी CrPC की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच का निर्देश दे सकते हैं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि एक मजिस्ट्रेट या विशेष अदालत के पास ऐसे मामले में आगे की जांच का निर्देश देने की शक्ति है, जहां की गई जांच में कोई कमी हो या कुछ पहलुओं की ठीक से जांच न की गई हो। ऐसा निर्देश संज्ञान लेने के बाद भी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 173(8) का प्रयोग करते हुए जारी किया जा सकता है।

अदालत एक पूर्व नायब तहसीलदार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें जम्मू के स्पेशल जज (भ्रष्टाचार निरोधक) द्वारा पारित आदेशों को चुनौती दी गई। इन आदेशों में आगे की जांच का निर्देश देने वाला एक आदेश और उसके बाद राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर करने की कथित साजिश के संबंध में जम्मू-कश्मीर पीसी एक्ट और RPC के तहत अपराधों के लिए उसके खिलाफ आरोप तय करने वाला एक अन्य आदेश शामिल है।

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पिता की मृत्यु के बाद हुआ तलाक तो बेटी को नहीं मिलेगी पारिवारिक पेंशन: त्रिपुरा हाईकोर्ट

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी बेटी का तलाक उसके पेंशनभोगी पिता की मृत्यु के बाद होता है तो वह पारिवारिक पेंशन की हकदार नहीं होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पेंशन पाने की पात्रता पिता की मृत्यु के समय ही तय होती है बाद में प्राप्त स्थिति के आधार पर नहीं।

जस्टिस एस. दत्ता पुरकायस्थ ने कहा, “नियमों के अनुसार तलाकशुदा बेटी को पारिवारिक पेंशन का अधिकार है, लेकिन यह शर्त जरूरी है कि पिता की मृत्यु के समय वह तलाकशुदा हो। पेंशन का अधिकार उसी समय उत्पन्न होता है।”

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क्रीमी लेयर तय करने में केवल माता-पिता की आय ही मायने रखती है: एमपी हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर की स्थिति तय करते समय केवल अभ्यर्थी के माता-पिता की आय को ही देखा जाएगा। अभ्यर्थी की स्वयं की आय या उसके पति की आय (यदि वह क्लास-1 अधिकारी नहीं है) इस निर्धारण में प्रासंगिक नहीं मानी जाएगी।

जस्टिस आशीष श्रोती की पीठ ने कहा, “क्रीमी लेयर की स्थिति निर्धारित करते समय केवल माता-पिता की आय ही देखी जानी चाहिए। अभ्यर्थी की स्वयं की आय या उसके पति की आय, यदि वह क्लास-1 अधिकारी नहीं है, प्रासंगिक नहीं है।”

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मुस्लिम पुरुष द्वारा 'दूसरी' शादी करना IPC की धारा 494 के तहत द्विविवाह नहीं, इस्लाम में बहुविवाह की अनुमति है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि कोई मुस्लिम पुरुष, जो अपनी पहली शादी के रहते हुए 'दूसरी' शादी करता है, उस पर IPC की धारा 494 के तहत द्विविवाह का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। जस्टिस बीपी शर्मा की बेंच ने कहा कि IPC की धारा 494 उन मामलों पर लागू होती है, जहां पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी अमान्य हो जाती है।

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लोन की समयपूर्व वसूली विवाद में सिविल कोर्ट का अधिकार नहीं, केवल NCLT ही करेगा फैसला: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम निर्णय देते हुए कहा कि लोन की समयपूर्व वसूली (प्रीमैच्योर रिपेमेंट) से जुड़े विवादों का निपटारा सिविल अदालत नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में अधिकार केवल राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) को है। जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने कहा कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 430 स्पष्ट रूप से सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र पर रोक लगाती है, जहां मामला NCLT के अधिकार क्षेत्र में आता है।

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वैवाहिक विवाद से जुड़े मामूली आपराधिक मामले के आधार पर नौकरी से इनकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि केवल वैवाहिक विवाद से जुड़े आपराधिक मामले के लंबित होने के आधार पर किसी अभ्यर्थी को नौकरी देने से इनकार नहीं किया जा सकता। जस्टिस करुणेश सिंह पवार की पीठ ने स्पष्ट किया कि सामान्य और अस्पष्ट आरोपों वाले ऐसे मामलों को नियुक्ति से वंचित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

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19 वर्षीय महिला को अपनी पसंद के साथी के साथ रहने की इजाजत, पति और माता-पिता दोनों अलग: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में 19 वर्षीय विवाहित महिला को अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने की अनुमति दी। महिला ने अपने 40 वर्षीय पति के साथ रहने से इनकार करते हुए उसके द्वारा किए गए दुर्व्यवहार के आरोप लगाए थे।

जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस पुष्पेन्द्र यादव की खंडपीठ ने महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (personal liberty) को प्राथमिकता देते हुए उसे अपने साथी अनुज (प्रतिवादी) के साथ रहने की अनुमति दी।

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म्यूटेशन कार्यवाही में नहीं तय होगा मालिकाना हक: इलाहाबाद हाईकोर्ट का स्पष्ट निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि म्यूटेशन (नामांतरण) की कार्यवाही का उद्देश्य संपत्ति के मालिकाना हक का फैसला करना नहीं है। ऐसे विवादों का समाधान केवल सिविल कोर्ट में ही किया जा सकता है।

जस्टिस जे.जे. मुनीर ने यह फैसला सुनाते हुए नायब तहसीलदार के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें 34 साल बाद दायर नामांतरण निरस्तीकरण की अर्जी को खारिज कर दिया गया।

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प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री का वादा, पॉलिसी के बिना कानूनी तौर पर लागू नहीं होगा: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को कहा कि किसी मुख्यमंत्री द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिया गया कोई आश्वासन या वादा, किसी औपचारिक पॉलिसी या कानूनी आधार के बिना कानूनी तौर पर लागू होने वाला वादा नहीं माना जा सकता।

जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की डिवीज़न बेंच ने कहा कि अगर कोई कानूनी ज़िम्मेदारी मौजूद नहीं है तो ऐसे वादे को 'रिट ऑफ़ मैंडमस' (आदेशिका) के ज़रिए लागू नहीं करवाया जा सकता।

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हैबियस कॉर्पस का इस्तेमाल पति को पेश कराने के लिए नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि मेंटेनेंस (भरण-पोषण) के मामले में वारंट से बच रहे पति को कोर्ट में पेश कराने के लिए हैबियस कॉर्पस याचिका का उपयोग नहीं किया जा सकता। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में संबंधित फैमिली कोर्ट को ही आवश्यक कठोर (coercive) कदम उठाने का अधिकार है।

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ग्रांट-इन-एड संस्थानों में कार्यरत कार्यवाहक प्रिंसिपल को मिलेगा समान वेतन, लेकिन पद पर बने रहने का अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि ग्रांट-इन-एड (अनुदानित) संस्थानों में कार्यरत कार्यवाहक (ऑफिसिएटिंग) प्रिंसिपल को नियमित प्रिंसिपल के बराबर वेतन दिया जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय तक इस पद पर कार्य करने से उन्हें केवल वेतन का अधिकार मिलेगा, पद पर बने रहने का नहीं।

जस्टिस सुमित्रा दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने कहा कि जब कोई शिक्षक प्रिंसिपल के रूप में कार्य करता है और अधिक जिम्मेदारियां निभाता है, तो उसे उसी के अनुरूप वेतन मिलना उसका अधिकार है।

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यूपी ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम की धारा 122-B (4-F) की शर्तें पूरी होने पर भी भूमिधर का दर्जा नहीं बदला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फिर से दोहराया कि अगर यूपी ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम की धारा 122-B (4-F) के तहत दी गई शर्तें पूरी होती हैं तो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति (जैसा भी मामला हो) से संबंधित मज़दूर को उस ज़मीन का भूमिधर माना जाएगा, और किसी भी अधिकारी द्वारा इस भूमिधरी की समीक्षा नहीं की जा सकती।

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BSF के कॉम्बैट पदों पर तैनात जवान 57 साल की उम्र में रिटायर होंगे, 60 साल की सिविलियन रिटायरमेंट उम्र का दावा नहीं कर सकते - दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस अनिल क्षेतर्पाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीज़न बेंच ने फैसला सुनाया कि सीमा सुरक्षा बल (BSF) में किसी कॉम्बैट पद पर दोबारा नियुक्त किया गया कोई पूर्व सैनिक, जो उस कॉम्बैट कैडर के लाभों का आनंद लेता है, BSF की 57 साल की वैधानिक रिटायरमेंट उम्र के अधीन होगा, न कि सिविलियन पदों पर लागू 60 साल की रिटायरमेंट उम्र के।

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Ex-Parte भरण-पोषण आदेश को चुनौती देने से पहले धारा 145(2) BNSS के तहत रिकॉल अर्जी जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि धारा 144 BNSS/धारा 125 CrPC के तहत पारित एकतरफा (ex parte) भरण-पोषण आदेश को चुनौती देने के लिए सीधे हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण (criminal revision) दाखिल नहीं किया जा सकता।

जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पहले संबंधित फैमिली कोर्ट या न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 145(2) BNSS/धारा 126(2) CrPC के तहत आवेदन देकर आदेश को निरस्त (recall) कराने का प्रयास करना होगा।

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स्टांप शुल्क की कमी की वसूली केवल विरासत में मिली संपत्ति तक ही सीमित: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 के तहत स्टांप शुल्क की कमी (deficiency) की वसूली मृत व्यक्ति के कानूनी वारिसों से केवल उतनी ही की जा सकती है, जितनी संपत्ति उन्हें विरासत में मिली हो।

जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र ने स्पष्ट किया कि U.P. Revenue Code, 2006 की धारा 181 के प्रावधान लागू होंगे, जिसके अनुसार वसूली की कार्रवाई वारिसों के खिलाफ जारी रह सकती है, लेकिन उनकी जिम्मेदारी केवल विरासत में मिली संपत्ति तक सीमित होगी।

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