महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के तहत अधिकारियों को किसी ट्रस्ट के नाम में बदलाव करने का अधिकार नहीं: बॉम्बे हाइकोर्ट का अहम फैसला
Amir Ahmad
8 April 2026 5:48 PM IST

बॉम्बे हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट अधिनियम के तहत अधिकारियों को किसी ट्रस्ट के नाम में बदलाव करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि कानून की व्यवस्था में ट्रस्ट के नाम की उपयुक्तता की जांच का कोई प्रावधान ही नहीं है।
जस्टिस शर्मिला यू. देशमुख ने यह फैसला नेशनल एग को-ऑर्डिनेशन कमेटी की याचिका पर सुनाया, जिसमें संयुक्त धर्मादाय आयुक्त के उस आदेश को चुनौती दी गई। इसमें ट्रस्ट के नाम से नेशनल शब्द हटाने का निर्देश दिया गया था।
यह आदेश 14 सितंबर, 2023 को स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) कार्यवाही के तहत पारित किया गया। शिकायत में कहा गया कि नेशनल शब्द के उपयोग से यह भ्रम पैदा होता है कि यह ट्रस्ट सरकारी संस्था है जिससे किसानों और व्यापारियों में गलतफहमी फैलती है।
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट अधिनियम की धाराओं 18 और 19 का विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि इन धाराओं के तहत जांच केवल ट्रस्ट के अस्तित्व, उसकी संपत्ति, उद्देश्य और ट्रस्टी से संबंधित तथ्यों तक सीमित है। इसमें ट्रस्ट के नाम की उपयुक्तता की जांच शामिल नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि अधिनियम के तहत बनाए गए नियमों में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो अधिकारियों को ट्रस्ट का नाम बदलने का अधिकार देता हो। नियम केवल यह कहते हैं कि यदि ट्रस्ट स्वयं नाम बदलता है, तो उसे रिकॉर्ड में दर्ज किया जाएगा और नया प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा।
अदालत ने स्पष्ट किया,
“कानून की संरचना यह नहीं कहती कि अधिकारी ट्रस्ट के नाम की उपयुक्तता की जांच करें। यदि नाम बदलता है तो उसे दर्ज करने की प्रक्रिया है, लेकिन नाम बदलने का निर्देश देने का अधिकार नहीं है।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी नाम से सरकारी संरक्षण का भ्रम पैदा होता है तो उस पर कार्रवाई 'चिन्ह और नाम (अनुचित उपयोग निवारण) अधिनियम, 1950' के तहत की जा सकती है, न कि महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट अधिनियम के तहत।
अदालत ने संयुक्त धर्मादाय आयुक्त के आदेश को त्रुटिपूर्ण मानते हुए कहा कि उन्होंने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर यह निर्देश दिया। साथ ही किसानों में भ्रम फैलने के दावे के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किया गया।
अंततः हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 14 सितंबर, 2023 का आदेश रद्द किया।

