सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (18 मई, 2026 से 22 मई, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
आरोपी का खुद को बेकसूर बताने वाला और सह-आरोपी को फंसाने वाला बयान भरोसे लायक नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (22 मई) को हत्या के मामले में दोषी ठहराए जाने का फैसला रद्द किया। कोर्ट ने पाया कि किसी आरोपी का अदालत के बाहर दिए गए बयान (Extra-Judicial Confession) के ज़रिए दूसरे सह-आरोपियों को फंसाना और उन्हें बयान देने वाले से जिरह करने का मौका न देना, अभियोजन पक्ष के मामले के लिए घातक होगा। साथ ही किसी को दोषी ठहराने के लिए ऐसे बयान भरोसे लायक नहीं माने जा सकते।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट का वह फैसला पलट दिया, जिसमें ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया गया, जिसमें अपीलकर्ताओं को हत्या के अपराध के लिए दोषी ठहराया गया था। अभियोजन पक्ष के मामले में दूसरी कमियों के अलावा, कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता को दोषी ठहराने का आधार ऐसे आरोपी का अदालत के बाहर दिया गया बयान था, जिसने खुद को बेकसूर बताते हुए (Exculpatory Statement) खुद को तो बरी कर लिया था, लेकिन अपराध करने का आरोप दूसरे सह-आरोपियों पर लगाया था।
Cause Title: Papan Sarkar @ Pranab Versus State of West Bengal (with connected case)
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सिर्फ इसलिए रेगुलराइज़ेशन से मना नहीं किया जा सकता कि शुरुआती नियुक्ति स्वीकृत पद के खिलाफ नहीं थी: सुप्रीम कोर्ट
एक बड़े घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (21 मई) को फैसला सुनाया कि सिर्फ इस बात से कि कर्मचारियों को शुरू में अस्थायी आधार पर नियुक्त किया गया था और स्वीकृत पदों के खिलाफ नहीं, वे 'स्टेट ऑफ़ कर्नाटक बनाम उमा देवी' मामले में तय किए गए सिद्धांतों के तहत रेगुलराइज़ेशन की मांग करने के हकदार नहीं रह जाएंगे।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि जहां कर्मचारियों ने उन विभागों में दशकों तक लगातार सेवा दी, जो नियमित सरकारी कार्य करते हैं, वहां वे अभी भी रेगुलराइज़ेशन पर विचार किए जाने के हकदार होंगे, भले ही उनकी शुरुआती नियुक्ति स्वीकृत पद के खिलाफ न हुई हो।
Cause Title: SUKHENDU BHATTACHARJEE AND OTHERS VERSUS THE STATE OF ASSAM AND OTHERS (with connected cases)
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वैवाहिक घर में पत्नी की मौत की वजह न बता पाने पर पति के खिलाफ़ धारा 106 के तहत प्रतिकूल निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा सही ठहराई
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (21 मई) को एक पति को अपनी पत्नी का गला घोंटकर हत्या करने के मामले में दी गई सज़ा को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि एक बार जब अभियोजन पक्ष यह साबित कर देता है कि कुछ ऐसे तथ्य जो आरोपी को फंसा सकते हैं, वे विशेष रूप से आरोपी के निजी संज्ञान में थे, तो भारतीय सबूत अधिनियम, 1872 की धारा 106 के तहत यह ज़िम्मेदारी आरोपी पर आ जाती है कि वह उन तथ्यों के बारे में कोई विश्वसनीय स्पष्टीकरण दे।
Cause Title: CHETAN DASHRATH GADE VERSUS THE STATE OF MAHARASHTRA
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BNSS S.223(1) का परंतुक अनिवार्य, आरोपी को सुने बिना संज्ञान लेना शुरू से ही अमान्य: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 223(1) का पहला परंतुक—जो किसी शिकायत मामले में संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य बनाता है—अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से उत्पन्न होने वाला एक मूल सुरक्षा उपाय है। इसका पालन न करने पर संज्ञान लेने का आदेश शुरू से ही अमान्य हो जाएगा।
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि आरोपी को ऐसे पालन न होने से हुए नुकसान को साबित करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह दोष एक ऐसी अवैधता है जो पूरी कार्यवाही को ही दूषित कर देती है, न कि केवल एक प्रक्रियात्मक अनियमितता।
Cause Title: PARVINDER SINGH VERSUS DIRECTORATE OF ENFORCEMENT
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क्राइम सीन का री-एक्टमेंट हर स्थिति में 'खुद के खिलाफ गवाही देने के अधिकार' का उल्लंघन नहीं करेगा: सुप्रीम कोर्ट
यह देखते हुए कि जघन्य अपराधों की जांच में 'अपराध स्थल के री-एक्टमेंट' की तकनीक को काफी अहमियत मिल रही है, सुप्रीम कोर्ट ने इस तकनीक के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अपराध स्थल के री-एक्टमेंट को सिर्फ इसलिए असंवैधानिक बताकर पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसमें आरोपी भी शामिल होता है।
कोर्ट ने साफ किया कि अपराध स्थल के री-एक्टमेंट में आरोपी की भागीदारी संविधान के अनुच्छेद 20(3) (खुद के खिलाफ गवाही देने के मौलिक अधिकार) का उल्लंघन तभी मानी जाएगी, जब इसके ज़रिए आरोपी को अपनी निजी जानकारी के आधार पर ऐसे तथ्य बताने के लिए मजबूर किया जाए, जो उसके खिलाफ ही इस्तेमाल हो सकते हैं; न कि तब, जब यह सिर्फ वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए किया गया कोई निर्देशित शारीरिक प्रदर्शन हो।
Cause Title: THE STATE OF TAMIL NADU v PONNUSAMY AND ORS.
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BNSS लागू होने के बाद संज्ञान लिया गया हो तो PMLA शिकायत में आरोपी की सुनवाई पहले होना ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट
एक अहम फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई मजिस्ट्रेट, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के लागू होने के बाद मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम, 2002 (PMLA) के तहत किसी कथित अपराध का संज्ञान लेता है तो BNSS की धारा 223(1) के पहले प्रावधान का पालन न करने पर वह संज्ञान रद्द माना जाएगा। इस प्रावधान के तहत संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का मौका देना ज़रूरी है, भले ही शिकायत BNSS के लागू होने से पहले ही दायर की गई हो।
Cause Title: PARVINDER SINGH VERSUS DIRECTORATE OF ENFORCEMENT
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समान आरोपों में सह-आरोपी डिस्चार्ज हो चुके हों तो एक आरोपी पर अकेले मुकदमा नहीं चल सकता : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि समान परिस्थितियों वाले सह-आरोपियों (Co-Accused) को पहले ही डिस्चार्ज किया जा चुका है, तो केवल एक आरोपी के खिलाफ मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्य अन्य आरोपियों की तुलना में अधिक मजबूत न हों। अदालत ने कहा कि समान आरोपों वाले व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाना आपराधिक न्यायशास्त्र (Criminal Jurisprudence) का मूल सिद्धांत है।
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सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देशों में बदलाव से किया इनकार, कहा- 'कुत्तों के काटने का खतरा बढ़ रहा है'
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अपने पहले के निर्देशों को वापस लेने से इनकार किया। इन निर्देशों में कहा गया कि अस्पतालों, बस स्टैंडों, स्कूलों, रेलवे स्टेशनों जैसी सार्वजनिक जगहों से पकड़े गए आवारा कुत्तों को वैक्सीनेशन/नसबंदी के बाद उसी जगह पर वापस नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने उन कई अर्जियों को खारिज किया, जिनमें पिछले साल नवंबर में कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों में बदलाव की मांग की गई। दूसरे शब्दों में, सार्वजनिक जगहों के परिसर से अधिकारियों द्वारा पकड़े गए आवारा कुत्तों को शेल्टर में ही रखा जाना चाहिए।
Case Title: In Re : 'City Hounded By Strays, Kids Pay Price', SMW(C) No. 5/2025 (and connected cases)
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कर्मचारियों को पुराने सेवा नियमों के तहत प्रमोशन मांगने का निहित अधिकार नहीं : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारियों को केवल इस आधार पर पदोन्नति (Promotion) का अधिकार नहीं मिल जाता कि रिक्तियां पुराने सेवा नियमों (Old Service Rules) के दौरान उत्पन्न हुई थीं।
अदालत ने कहा कि सरकार को सेवा नियमों में बदलाव कर चयन और पदोन्नति की प्रक्रिया बदलने का अधिकार है, बशर्ते यह निर्णय मनमाना न हो। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ओडिशा परिवहन विभाग के कर्मचारियों से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी।
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सुप्रीम कोर्ट ने पागल और खतरनाक कुत्तों को मारने की इजाज़त दी
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिए गए एक अहम आदेश में अधिकारियों को इंसानी ज़िंदगी पर मंडराते खतरे को रोकने के लिए पागल और खतरनाक कुत्तों को मारने की इजाज़त दी।
कोर्ट ने आदेश दिया, "अधिकारी, पशु जन्म नियंत्रण (ABC) नियमों और दूसरे लागू कानूनी प्रोटोकॉल के मुताबिक, कानूनी तौर पर मंज़ूर उपाय कर सकते हैं। इनमें ऐसे मामलों में कुत्तों को मारना भी शामिल है, जो लाइलाज रूप से बीमार हैं, पागल हैं, या साफ तौर पर खतरनाक/आक्रामक हैं, ताकि इंसानी ज़िंदगी और सुरक्षा पर मंडराते खतरे को असरदार तरीके से खत्म किया जा सके।"
Case Title: In Re : 'City Hounded By Strays, Kids Pay Price', SMW(C) No. 5/2025 (and connected cases)
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हाईकोर्ट का रजिस्ट्रार जनरल किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ खुद से अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को फैसला सुनाया कि किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई तब तक शुरू नहीं की जा सकती, जब तक कि उसे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस या चीफ जस्टिस द्वारा गठित जजों की समिति द्वारा अधिकृत न किया गया हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि रजिस्ट्रार जनरल के पास ऐसी कार्रवाई खुद से शुरू करने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने उत्तराखंड की सिविल जज की बहाली को सही ठहराया। इस जज को विभागीय कार्रवाई के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने घर पर घरेलू सहायिका के तौर पर काम करने वाली नाबालिग लड़की के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार किया।
Case : HIGH COURT OF UTTARAKHAND AT NAINITAL Vs DEEPALI SHARMA | SLP(C) No. 16520/2026
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UAPA में भी जमानत नियम, जेल अपवाद: सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बताया सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) जैसे कठोर कानूनों में भी जमानत नियम है और जेल अपवाद। अदालत ने स्पष्ट किया कि UAPA की धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर लगी कानूनी पाबंदियां संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को खत्म नहीं कर सकतीं।
जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस बीवी नागरत्ना की खंडपीठ ने जम्मू-कश्मीर के व्यक्ति को नार्को-टेरर मामले में जमानत देते हुए यह टिप्पणी की। मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी कर रही थी।
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MPID Act के तहत 'लोन' भी 'डिपॉजिट' माना जा सकता है; कोई प्राइवेट पर्सन भी 'फाइनेंशियल एस्टैब्लिशमेंट' हो सकता है: सुप्रीम कोर्ट
एक अहम घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (15 मई) को कहा कि महाराष्ट्र प्रोटेक्शन ऑफ़ इंटरेस्ट ऑफ़ डिपॉजिटर्स एक्ट (MPID Act) के तहत प्राइवेट व्यक्तियों को भी 'फाइनेंशियल एस्टैब्लिशमेंट' की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसका मतलब है कि अगर कोई व्यक्ति किसी देनदार को इस वादे के साथ पैसे देता है कि वह उसे ब्याज के साथ लौटाएगा, तो ऐसे पैसे को कानूनी तौर पर "डिपॉजिट" माना जा सकता है, भले ही दोनों पक्ष उसे "लोन" कहते हों।
Cause Title: ALKA AGRAWAL AND OTHERS VERSUS STATE OF MAHARASHTRA AND OTHERS
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Hindu Succession Act | 2005 का संशोधन बेटियों के पहले से मौजूद विरासत के अधिकारों को सीमित नहीं करता: सुप्रीम कोर्ट
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम पर एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (15 मई) को कहा कि 2005 का संशोधन, जो बेटियों को जन्म से ही सह-दायिक (coparcenary) अधिकार देता है, उनके मृत पिता की संपत्ति में 'प्रथम श्रेणी के वारिस' (Class I heirs) के तौर पर विरासत पाने के स्वतंत्र अधिकार को न तो छीनता है और न ही सीमित करता है - खासकर तब, जब पिता की मृत्यु बिना वसीयत किए हुई हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल बेटों के बीच किया गया संपत्ति का बंटवारा, पिता के हिस्से की संपत्ति में बेटियों के उत्तराधिकार के अधिकारों को खत्म नहीं कर सकता।
Cause Title: B.S. LALITHA AND OTHERS VERSUS BHUVANESH AND OTHERS
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राज्य, अंतिम आदेश के तहत मिलने वाले लाभों से सिर्फ इसलिए इनकार नहीं कर सकता कि कर्मचारियों ने इसे लागू करवाने में देरी की: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि राज्य किसी ऐसे न्यायिक आदेश को लागू करने से इनकार नहीं कर सकता, जो अंतिम रूप ले चुका हो, सिर्फ इसलिए कि लाभार्थियों ने इसे लागू करवाने के लिए अदालतों का दरवाज़ा देर से खटखटाया। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार 'आदर्श नियोक्ता' (model employer) के तौर पर कानून का पालन करने में अपनी ही नाकामी का फायदा नहीं उठा सकती।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने ग्रेड-IV कर्मचारियों के एक समूह द्वारा आंध्र प्रदेश राज्य और विशाखापत्तनम नगर निगम के खिलाफ दायर अपील को मंज़ूरी दी। बेंच ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे 2012 के आंध्र प्रदेश प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के उस आदेश को चार महीने के भीतर इन कर्मचारियों के पक्ष में लागू करें।
Cause Title: B. YERRAJI & ORS. VERUS THE STATE OF ANDHRA PRADESH & ORS.