लोन की समयपूर्व वसूली विवाद में सिविल कोर्ट का अधिकार नहीं, केवल NCLT ही करेगा फैसला: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
6 April 2026 6:09 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम निर्णय देते हुए कहा कि लोन की समयपूर्व वसूली (प्रीमैच्योर रिपेमेंट) से जुड़े विवादों का निपटारा सिविल अदालत नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में अधिकार केवल राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) को है।
जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने कहा कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 430 स्पष्ट रूप से सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र पर रोक लगाती है, जहां मामला NCLT के अधिकार क्षेत्र में आता है।
अदालत ने कहा,
“जहां किसी मामले का निर्णय NCLT द्वारा किया जाना है वहां किसी भी अदालत को हस्तक्षेप करने या रोक लगाने का अधिकार नहीं है।”
मामला शिवम ट्रेडर्स एंड हायर परचेज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर अपील से जुड़ा था। कंपनी ने वर्ष 2019 में मधुसूदन व्हीकल्स प्राइवेट लिमिटेड से दीर्घकालिक ऋण लिया था। समझौते के अनुसार 9 वर्ष की अवधि पूरी होने से पहले ऋण की वसूली नहीं की जानी थी।
हालांकि, आरोप है कि एक वर्ष बाद ही प्रतिवादी कंपनी ने ऋण और ब्याज की वसूली के लिए दबाव बनाना शुरू किया और भारतीय रिजर्व बैंक को पत्र लिखकर भुगतान की मांग की। इसके बाद वादी ने सिविल अदालत में वाद दायर कर अपने अधिकारों की सुरक्षा की मांग की।
प्रतिवादी ने सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत आवेदन दाखिल कर यह कहते हुए वाद खारिज करने की मांग की कि ऐसे मामलों में सिविल अदालत का कोई अधिकार नहीं है। ट्रायल कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए वाद खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट का निर्णय सही ठहराते हुए कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (RBI Act) की धारा 45क्यूए के तहत ऐसे विवादों का निपटारा करने का अधिकार केवल NCLT को है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) से जुड़े ऋण विवाद इसी दायरे में आते हैं।
अदालत ने यह भी पाया कि वादी ने महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए और पहले से NCLT में लंबित कार्यवाही की जानकारी नहीं दी। इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि वादी ने अस्वच्छ हाथों के साथ अदालत का दरवाजा खटखटाया।
अंततः हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए प्रतिवादी के पक्ष में लागत (कॉस्ट) भी प्रदान की और दोहराया कि ऐसे मामलों में केवल NCLT ही सक्षम प्राधिकरण है।

