सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (01 जून, 2026 से 05 जून, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत आरोपी को चार्जशीट में शामिल दस्तावेज़ देने से मना नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (OSA) के तहत आरोपी व्यक्ति के खिलाफ़ अभियोजन पक्ष (Prosecution) द्वारा इस्तेमाल किए गए दस्तावेज़ों को उसे देने से सिर्फ़ इस आशंका के आधार पर मना नहीं किया जा सकता कि ऐसे गोपनीय या अहम दस्तावेज़ देने से देश की सुरक्षा और संरक्षा को खतरा हो सकता है।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने कहा, "...हमारी पक्की राय है कि अपीलकर्ताओं को दस्तावेज़ देने से सिर्फ़ इस आधार पर मना नहीं किया जा सकता कि उनके खिलाफ़ OSA के प्रावधान लागू किए गए।"
Cause Title: V.K. SINGH VERSUS CENTRAL BUREAU OF INVESTIGATION & ANR.
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Specific Relief Act | खरीदार द्वारा विक्रेता को कानूनी नोटिस भेजने में देरी 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' से इनकार करने का आधार नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी (डिफेंडेंट) को बाकी रकम लेने और सेल डीड (बिक्री विलेख) निष्पादित करने के लिए कानूनी नोटिस भेजने में केवल देरी होने को वादी (प्लांटिफ) की अनुबंध पूरा करने की तत्परता और इच्छा की कमी नहीं माना जा सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। इसमें अपीलकर्ता-वादी ने प्रतिवादी-डिफेंडेंट को बिक्री की कुल रकम का 93% भुगतान कर दिया था और बार-बार सेल डीड निष्पादित करने और बाकी रकम लेने के लिए कहा था। फिर भी उसे अनुबंध पूरा करने के लिए तत्पर और इच्छुक नहीं माना गया, क्योंकि उसने प्रतिवादी-डिफेंडेंट को कानूनी नोटिस भेजने में देरी की।
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MMDR Act के तहत रॉयल्टी में बढ़ोतरी कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों से ऊपर: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (4 जून) को कहा कि माइन्स एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट, 1957 (MMDR Act) के तहत खनिजों पर रॉयल्टी का भुगतान उसी दर पर किया जाना चाहिए, जो खदान से उनके असल डिस्पैच या हटाने की तारीख पर लागू हो, चाहे पार्टियों के बीच हुए कॉन्ट्रैक्ट में कोई भी दर तय की गई हो।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा, "...भुगतान खनिजों की आवाजाही (मूवमेंट) की तारीख पर किया जाना है। अगर आवाजाही की तारीख रॉयल्टी में बढ़ोतरी के बाद की तो कानूनी बदलाव से पहले किए गए कॉन्ट्रैक्ट से इसके असर को सीमित नहीं किया जा सकता।"
Cause Title: THE DIRECTOR OF MINES AND GEOLOGY VERSUS M/s BMM ISPAT LTD & ANR.
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S.35L Central Excise Act | एक्साइज़ेबिलिटी के सवाल पर अपील का फ़ैसला सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट कर सकता है, हाईकोर्ट नहीं: एससी
सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि सामान की एक्साइज़ेबिलिटी से जुड़े विवाद उसके खास अपीलीय अधिकार क्षेत्र में आते हैं और सेंट्रल एक्साइज़ एक्ट, 1944 की धारा 35G के तहत हाईकोर्ट उनका फ़ैसला नहीं कर सकते।
कोर्ट ने फ़ैसला दिया, "एक्साइज़ ड्यूटी की दर या असेसमेंट के मकसद से सामान की कीमत से जुड़े किसी भी सवाल के निर्धारण के संबंध में अपीलीय ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेश के खिलाफ़ अपील इस कोर्ट में की जा सकती है, हाईकोर्ट में नहीं। हालांकि, यह रोक ड्यूटी की दर या सामान की कीमत से जुड़े हर सवाल पर लागू नहीं होती। सवाल का असेसमेंट से सीधा और करीबी संबंध होना चाहिए। सामान की एक्साइज़ेबिलिटी का सवाल असेसमेंट के मकसद से ड्यूटी की दर से जुड़ा होता है। सामान की एक्साइज़ेबिलिटी पर फ़ैसला, ड्यूटी की दर या सामान की कीमत से जुड़े किसी भी सवाल के निर्धारण से पहले का कदम होगा।"
Case Title – M/S Alupro Building Systems Pvt. Ltd v. Commissioner of Central Excise Bangalore-II
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Hindu Minority & Guardianship Act | सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग की संपत्ति के लिए अभिभावक द्वारा धारा 8 के तहत आवेदन पर सिद्धांतों को स्पष्ट किया
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (3 जून) को फैसला सुनाया कि हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 (HMGA) की धारा 8 के तहत प्राकृतिक अभिभावकों के उन आवेदनों की जांच करते समय, जिनमें वे नाबालिग की संपत्ति के प्रबंधन की मांग करते हैं, अदालतों को इस बात का यथार्थवादी मूल्यांकन करना चाहिए कि क्या प्रस्तावित लेनदेन से नाबालिग को "स्पष्ट लाभ" मिल रहा है; न कि ऐसे आवेदनों को तकनीकी या अनुमानित आधारों पर खारिज कर देना चाहिए।
Cause Title: SHEPHALI CHAKRABORTY VERSUS THE STATE OF WEST BENGAL
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ज़्यादा क्वालिफिकेशन वाले व्यक्ति को कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए तय पद के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी ऐसी नौकरी के लिए अपनी ज़्यादा क्वालिफिकेशन छिपाना, जो खास तौर पर कम क्वालिफिकेशन वाले लोगों के लिए रिज़र्व है, असल में काबिल और हकदार उम्मीदवारों को नौकरी से वंचित करने जैसा है।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा, "...जब कोई पद खास तौर पर कम क्वालिफिकेशन वाले उम्मीदवारों के लिए तय किया गया हो तो ज़्यादा क्वालिफिकेशन वाले किसी व्यक्ति को वह नौकरी पाने की इजाज़त देने का नतीजा यह होगा कि कोई असल में काबिल और हकदार उम्मीदवार उस मौके से वंचित रह जाएगा।"
Cause Title: GENERAL MANAGER (HR) & ANR VERSUS K. POOVARASAN
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लंबे समय तक वैवाहिक अलगाव 'मानसिक क्रूरता' माना जा सकता है; खत्म हो चुके रिश्ते को बनाए रखना ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक व्यक्ति को दी गई तलाक की डिक्री सही ठहराई। उस व्यक्ति की पत्नी पिछले 15 सालों से उससे अलग रह रही थी। कोर्ट ने कहा कि जब पति-पत्नी अलग-अलग पेशेवर और भौगोलिक रास्ते चुन लेते हैं और बिना दूरी कम करने की कोई कोशिश किए सालों तक एक-दूसरे से अलग रहते हैं तो वैवाहिक ढांचा ही खत्म माना जाता है।
कोर्ट ने कहा, "ऐसी परिस्थितियों में अलगाव सिर्फ़ व्यक्तिगत द्वेष या एकतरफ़ा गलती का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह वैवाहिक बंधन को दोनों पक्षों द्वारा असल में छोड़ देने का रूप ले लेता है। दोनों पक्षों ने असल में वैवाहिक ढांचे को ही छोड़ दिया है। पंद्रह सालों से जान-बूझकर अलग-अलग जीवनशैली, अलग-अलग रहने की जगह और वैवाहिक बातचीत का पूरी तरह से बंद हो जाना, दोनों पक्षों द्वारा वैवाहिक बंधन को असल में छोड़ देने की बात को साबित करता है।"
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'कौशल वाले खेलों पर सट्टेबाजी के लिए कोई संवैधानिक सुरक्षा नहीं': सुप्रीम कोर्ट ने दांव वाले ऑनलाइन गेम्स पर रोक वाले कानूनों को सही ठहराया
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में तमिलनाडु और कर्नाटक के उन कानूनों की संवैधानिक वैधता को सही ठहराया, जो खेलों पर ऑनलाइन सट्टेबाजी और दांव लगाने पर रोक लगाते हैं। कोर्ट ने कहा कि राज्य की विधायिकाएं सट्टेबाजी पर कानून बनाने में सक्षम हैं, भले ही वह खेल कौशल पर आधारित हो।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने फैसला सुनाया कि राज्यों के पास संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 34 के तहत कौशल वाले खेलों पर सट्टेबाजी को विनियमित करने और उस पर रोक लगाने की शक्ति है। यह प्रविष्टि राज्यों को "सट्टेबाजी और जुए" पर कानून बनाने का अधिकार देती है। कोर्ट ने कहा कि कौशल वाले खेलों को जो संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है, वह उन खेलों पर की जाने वाली सट्टेबाजी या दांव लगाने पर लागू नहीं होती।
Case Title – State of Tamil Nadu & Ors. v. Junglee Games India Pvt. Ltd. & Ors. and connected cases
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Prevention Of Corruption Act | अधीनस्थों के लिए रिश्वत मांगने वाला सरकारी कर्मचारी भी दोषी माना जाएगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention Of Corruption Act) की धारा 7 के तहत दोषी ठहराए जाने के लिए किसी सरकारी कर्मचारी का रिश्वत की मांग करना या उसे खुद स्वीकार करना ज़रूरी नहीं है। यह मानते हुए कि यह प्रावधान तीसरे पक्षों के माध्यम से और किसी अन्य व्यक्ति के लाभ के लिए अनुचित लाभ प्राप्त करने के प्रयासों को भी शामिल करता है, कोर्ट ने कर्नाटक पुलिस के सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ भ्रष्टाचार की FIR को बहाल किया। इस सब-इंस्पेक्टर पर अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से पैसे मांगने का आरोप था।
Case Details: THE STATE BY LOKAYUKTHA POLICE v. SRI K. RANGAYYA & ANR|SPECIAL LEAVE PETITION (CRIMINAL) NO.5245 of 2025
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शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना असंवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट ने पलटा इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला
देश की सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि केवल विवाह हो जाने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति या उससे जुड़े लाभों से बाहर नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उन फैसलों को निरस्त कर दिया, जिनमें विवाहित बेटियों को परिवार की परिभाषा से बाहर मानते हुए अनुकंपा नियुक्ति का लाभ देने से इनकार किया गया था। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि वैवाहिक स्थिति किसी पात्र बेटी को कल्याणकारी योजना से वंचित करने का आधार नहीं बन सकती।
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कोऑर्डिनेट बेंच दूसरी बेंच द्वारा दी गई ज़मानत रद्द कर सकती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि हाईकोर्ट की एक कोऑर्डिनेट बेंच, किसी आरोपी को दूसरी बेंच द्वारा दी गई ज़मानत रद्द कर सकती है, अगर वह ज़मानत गलत तथ्य पेश करके हासिल की गई हो।
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट आरोपी सूरज महानंदा की ज़मानत अर्जी पर सुनवाई कर रहा था। सूरज पर नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1985 (NDPS Act) की धारा 21(c) (निर्मित दवाओं और तैयारियों के संबंध में उल्लंघन के लिए सज़ा) और 29 (दुष्प्रेरण और आपराधिक साज़िश के लिए सज़ा) के तहत आरोप लगाए गए हैं। आरोपी ने सह-आरोपी, बाबू चटर्जी के बराबर ज़मानत मांगी थी, जिसे हाईकोर्ट की एक कोऑर्डिनेट बेंच ने ज़मानत दी थी।
Case Details: SURAJ MAHANANDA v. STATE OF WEST BENGAL|Petition(s) for Special Leave to Appeal (Crl.) No(s).9148-9149/2026
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S.138 NI Act | चेक बाउंस मामले में मिली सज़ा पक्षकारों के बीच समझौते के आधार पर रद्द की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 147 (अपराधों का समझौता योग्य होना) के तहत अपराधों के कंपाउंडिंग (समझौते) की अनुमति दी, जब पार्टियों के बीच एक समझौता हो गया। इसके परिणामस्वरूप, कोर्ट ने NI Act की धारा 138 के तहत चेक बाउंस होने (खाते में पर्याप्त पैसे न होने के कारण) के अपराध के लिए दी गई सज़ा और दोषसिद्धि रद्द की।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच ने यह आदेश दिया। उन्होंने अपने पहले के फैसले 'ज्ञान चंद गर्ग बनाम हरपाल सिंह (2025)' पर भरोसा किया, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि एक बार शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच समझौता हो जाने के बाद NI Act की धारा 138 के तहत दी गई सज़ा बरकरार नहीं रखी जा सकती।
Case : PARSHARVANATH WELD WIRES PVT LTD & ANR v. STATE OF CHHATTISGARH & ANR.
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Hindu Succession Act | बिना वसीयत उत्तराधिकार के बाद कोई भी सह-उत्तराधिकारी 'कर्ता' के तौर पर काम करते हुए दूसरों के हिस्से नहीं बेच सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (1 जून) को यह फैसला सुनाया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act) के तहत बिना वसीयत वाली संपत्ति का उत्तराधिकार पाने वाले लोग उस संपत्ति को 'टेनेंट्स-इन-कॉमन' (साझा हिस्सेदार) के तौर पर रखते हैं, जिसमें उनके हिस्से तय होते हैं, न कि 'संयुक्त पारिवारिक संपत्ति' के तौर पर। नतीजतन, कोई भी सह-उत्तराधिकारी दूसरों की ओर से संपत्ति का निपटारा (बेच या हस्तांतरित) नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसे मामलों में 'कर्ता' की अवधारणा लागू नहीं होती।
Cause Title: DARUBAI & ANR. VERSUS KAMALABAI & ORS.
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बार एसोसिएशन पर रिट अधिकार क्षेत्र लागू नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट का फ़ैसला सही ठहराया
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फ़ैसले में दखल देने से इनकार किया, जिसमें कहा गया था कि बार एसोसिएशन संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत "राज्य" या राज्य की कोई संस्था नहीं है, क्योंकि यह वकीलों का एक निजी निकाय है जो सार्वजनिक कार्य नहीं करता। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने वकील संगीता राय द्वारा दायर SLP (विशेष अनुमति याचिका) को खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी गई थी।
Case Title – Sangita Rai v. New Delhi Bar Association
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राज्य की अनुग्रह राशि के लिए अयोग्य आश्रित माँ मोटर दुर्घटना मुआवज़े में अलग हिस्से की हकदार: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि हालांकि किसी मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार को 'हरियाणा मृत सरकारी कर्मचारियों के आश्रितों को अनुकंपा सहायता नियम, 2006' के तहत मिलने वाली अनुग्रह वित्तीय सहायता को लाभों की दोहरी गिनती रोकने के लिए 'मोटर वाहन अधिनियम' के तहत दिए गए मुआवज़े से घटाया जाना चाहिए; लेकिन यह कटौती उस आश्रित माँ के स्वतंत्र अधिकार को खत्म नहीं कर सकती, जो राज्य की योजना के तहत सहायता पाने के लिए पात्र नहीं है।
Case: Sarla Devi & Ors. v. Reliance General Insurance Company Ltd. & Ors.
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अपनी मर्ज़ी से सेक्स का काम करने वाली वयस्क महिलाओं को उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ 'बचाया' या हिरासत में नहीं रखा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
कमर्शियल सेक्स के लिए तस्करी (CSE) के पीड़ितों की चिंताओं को कम करने के उद्देश्य से दिए गए ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुनर्वास, समाज में फिर से जोड़ने और सुरक्षा घरों में रखने से जुड़े फैसलों में वयस्क सेक्स वर्करों की सहमति को सबसे ज़्यादा अहमियत दी जानी चाहिए।
CSE के पीड़ितों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए दिशा-निर्देश और आदेश मांगने वाली एक विविध याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने सीनियर एडवोकेट सुश्री अपर्णा भट की 'पीड़ित सुरक्षा योजना' तैयार करने की दलील स्वीकार करते हुए यह फैसला दिया कि पीड़ितों को बचाव और पुनर्वास की प्रक्रिया में सिर्फ़ निष्क्रिय वस्तु नहीं माना जा सकता, और उनकी पसंद और स्वायत्तता का सम्मान किया जाना चाहिए।
Cause Title: PRAJWALA VERSUS UNION OF INDIA & ORS.