क्रीमी लेयर तय करने में केवल माता-पिता की आय ही मायने रखती है: एमपी हाईकोर्ट
Amir Ahmad
7 April 2026 12:45 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर की स्थिति तय करते समय केवल अभ्यर्थी के माता-पिता की आय को ही देखा जाएगा। अभ्यर्थी की स्वयं की आय या उसके पति की आय (यदि वह क्लास-1 अधिकारी नहीं है) इस निर्धारण में प्रासंगिक नहीं मानी जाएगी।
जस्टिस आशीष श्रोती की पीठ ने कहा,
“क्रीमी लेयर की स्थिति निर्धारित करते समय केवल माता-पिता की आय ही देखी जानी चाहिए। अभ्यर्थी की स्वयं की आय या उसके पति की आय, यदि वह क्लास-1 अधिकारी नहीं है, प्रासंगिक नहीं है।”
मामला MPPSC की परीक्षा से जुड़ा था, जिसमें याचिकाकर्ता ने सहायक प्रोफेसर (कानून) पद पर निजी प्रतिवादी की नियुक्ति को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता सूची में एक स्थान नीचे थी, जबकि प्रतिवादी को ओबीसी (महिला) श्रेणी में चयनित कर नियुक्ति दी गई।
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि चयनित उम्मीदवार क्रीमी लेयर में आती है, क्योंकि उसके पति सिविल जज क्लास-1 हैं। वह स्वयं भी गेस्ट फैकल्टी के रूप में आय अर्जित कर रही है जिससे कुल आय सीमा से अधिक हो जाती है।
वहीं, प्रतिवादी की ओर से कहा गया कि क्रीमी लेयर तय करने के लिए केवल माता-पिता की आय देखी जाती है, न कि पति या स्वयं की आय।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि क्रीमी लेयर का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में पिछड़े वर्गों के जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे, न कि उन लोगों तक जो सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया-
1. क्रीमी लेयर निर्धारण में केवल माता-पिता की आय प्रासंगिक है।
2. अभ्यर्थी की स्वयं की आय को नहीं जोड़ा जाएगा।
3. पति की आय तभी देखी जाएगी जब वह क्लास-1 अधिकारी हो।
4. यदि दोनों माता-पिता क्लास-2 अधिकारी हैं, या पिता 40 वर्ष से पहले क्लास-1 में पदोन्नत हो जाता है, तो भी क्रीमी लेयर लागू हो सकती है।
इन सभी पहलुओं पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित अभ्यर्थी क्रीमी लेयर में नहीं आती और उसे ओबीसी आरक्षण का लाभ सही तरीके से दिया गया।
अंततः अदालत ने याचिका खारिज की।

