मुस्लिम पुरुष द्वारा 'दूसरी' शादी करना IPC की धारा 494 के तहत द्विविवाह नहीं, इस्लाम में बहुविवाह की अनुमति है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Shahadat

7 April 2026 10:15 AM IST

  • मुस्लिम पुरुष द्वारा दूसरी शादी करना IPC की धारा 494 के तहत द्विविवाह नहीं, इस्लाम में बहुविवाह की अनुमति है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि कोई मुस्लिम पुरुष, जो अपनी पहली शादी के रहते हुए 'दूसरी' शादी करता है, उस पर IPC की धारा 494 के तहत द्विविवाह का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

    जस्टिस बीपी शर्मा की बेंच ने कहा कि IPC की धारा 494 उन मामलों पर लागू होती है, जहां पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी अमान्य हो जाती है।

    हालांकि, बेंच ने यह भी कहा कि चूंकि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत एक मुस्लिम पुरुष एक से ज़्यादा पत्नियां रख सकता है, इसलिए दूसरी शादी सिर्फ़ इस आधार पर अमान्य नहीं हो जाती कि पहली शादी अभी भी कायम है।

    इसके साथ ही बेंच ने एक मुस्लिम पति द्वारा दायर याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसके ख़िलाफ़ लगाया गया द्विविवाह का आरोप रद्द कर दिया। हालांकि, IPC की धारा 498-A, 342, 323 और 506 भाग-II के तहत दंडनीय अन्य अपराधों के लिए मुक़दमा चलता रहेगा।

    बेंच ने टिप्पणी की,

    "IPC की धारा 494 की प्रयोज्यता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी अमान्य है। मौजूदा मामले में यह स्वीकार किया गया कि दोनों पक्ष मुस्लिम पर्सनल लॉ के दायरे में आते हैं, जो एक से ज़्यादा शादियों की अनुमति देता है। इसलिए IPC की धारा 494 की ज़रूरी शर्त—यानी यह कि पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी अमान्य होनी चाहिए—पूरी नहीं होती।"

    संक्षेप में कहें तो, याचिकाकर्ता की पहली पत्नी ने पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिसमें उसने आरोप लगाया कि दिसंबर, 2002 में उनकी शादी के बाद याचिकाकर्ता ने बच्चा न होने के कारण उसके साथ मारपीट की और आख़िरकार मई, 2022 में दूसरी शादी कर ली। उसने यह भी दावा किया कि उस पर 'खुला'—यानी आपसी सहमति से 'तलाक'—देने का दबाव डाला गया।

    हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता के वकील ने यह दलील दी कि IPC की धारा 494 को लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि याचिकाकर्ता मुस्लिम पर्सनल लॉ के दायरे में आता है, जो एक ही समय में चार पत्नियां रखने की अनुमति देता है। वकील ने केरल हाई कोर्ट के वेणुगोपाल बनाम भारत संघ 2015 के फ़ैसले का हवाला देते हुए यह दलील दी कि IPC की धारा 494 तभी लागू होगी, जब कोई मुस्लिम पुरुष पांचवीं बार शादी करे।

    दूसरी ओर, शिकायतकर्ता-पत्नी के वकील ने यह दलील दी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत, जब तक कोई घोषणा (Declaration) जमा नहीं की जाती, तब तक मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के प्रावधान याचिकाकर्ता पर लागू नहीं होंगे; और इसलिए, वह एक ही समय में चार पत्नियाँ रखने का हकदार नहीं है।

    इन दलीलों की पृष्ठभूमि में बेंच ने यह बात नोट की कि IPC की धारा 494 उन पक्षों पर लागू होने वाले पर्सनल लॉ के अधीन है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सरला मुद्गल बनाम भारत संघ 1995 और खुर्शीद अहमद खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 2015 के फ़ैसलों का हवाला देते हुए यह बात नोट की कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बहुविवाह (Polygamy) को मान्यता देता है।

    बेंच ने आगे यह भी नोट किया कि भले ही शिकायतकर्ता के आरोपों को ज्यों का त्यों मान लिया जाए। फिर भी याचिकाकर्ता द्वारा दूसरी शादी करने का कृत्य IPC की धारा 494 के ज़रूरी तत्वों को पूरा नहीं करता।

    बेंच ने यह भी कहा कि उक्त अपराध के लिए मुक़दमे को जारी रखना कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।

    बेंच ने यह टिप्पणी की,

    "इसलिए किसी मुस्लिम पुरुष द्वारा अपनी पहली पत्नी के जीवित रहते हुए की गई दूसरी शादी को केवल इस आधार पर अमान्य (Void) नहीं माना जाता कि पहली शादी अभी भी कायम है। इस कानूनी स्थिति को देखते हुए IPC की धारा 494 का ज़रूरी तत्व—यानी, यह कि पहली शादी के कायम रहने के कारण बाद वाली शादी अमान्य होनी चाहिए—इस मौजूदा मामले में पूरा नहीं होता है।"

    परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की और द्विविवाह (Bigamy) के आरोप से संबंधित कार्यवाही को रद्द कर दिया। हालाँकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि आरोप और जांच सामग्री से प्रथम दृष्टया (Prima Facie) अन्य कथित अपराधों—जिनमें क्रूरता और आपराधिक धमकी शामिल हैं—के किए जाने का पता चलता है।

    ट्रायल कोर्ट को यह निर्देश दिया गया कि वह शेष आरोपों की स्वतंत्र रूप से जाँच करे और कानून के अनुसार इस मामले पर फ़ैसला सुनाए।

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