प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री का वादा, पॉलिसी के बिना कानूनी तौर पर लागू नहीं होगा: दिल्ली हाईकोर्ट

Shahadat

6 April 2026 1:41 PM IST

  • प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री का वादा, पॉलिसी के बिना कानूनी तौर पर लागू नहीं होगा: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को कहा कि किसी मुख्यमंत्री द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिया गया कोई आश्वासन या वादा, किसी औपचारिक पॉलिसी या कानूनी आधार के बिना कानूनी तौर पर लागू होने वाला वादा नहीं माना जा सकता।

    जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की डिवीज़न बेंच ने कहा कि अगर कोई कानूनी ज़िम्मेदारी मौजूद नहीं है तो ऐसे वादे को 'रिट ऑफ़ मैंडमस' (आदेशिका) के ज़रिए लागू नहीं करवाया जा सकता।

    कोर्ट ने ये टिप्पणियां तब कीं, जब उसने एक सिंगल जज का आदेश रद्द किया, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा 2020 में गरीब किरायेदारों की ओर से किराया चुकाने के लिए किए गए वादों को "कानूनी तौर पर लागू होने योग्य" बताया गया।

    देशव्यापी लॉकडाउन के चार दिन बाद, यानी 29 मार्च, 2020 को दिल्ली के मुख्यमंत्री ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इसमें उन्होंने सभी मकान मालिकों से अपील की थी कि वे उन किरायेदारों से किराए की मांग या वसूली कुछ समय के लिए टाल दें, जो गरीब और आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। अरविंद केजरीवाल ने यह भी कहा था कि अगर गरीबी के कारण किरायेदार किराया चुकाने में असमर्थ होते हैं तो सरकार उनकी ओर से किराया चुकाएगी।

    22 जुलाई, 2021 को दिए गए अपने फैसले में सिंगल जज ने कहा था कि मुख्यमंत्री द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिया गया कोई भी वादा या आश्वासन, कानूनी तौर पर लागू होने वाला वादा माना जाएगा। साथ ही यह उम्मीद की जाती है कि मुख्यमंत्री ऐसे वादों को पूरा करने के लिए अपने अधिकार का इस्तेमाल करेंगे।

    दिल्ली सरकार की अपील पर फैसला सुनाते हुए डिवीज़न बेंच ने सोमवार को सरकार की इस दलील को खारिज किया कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रवासियों का किराया चुकाने का जो आश्वासन दिया गया, वह महज़ "एक राजनेता द्वारा दिया गया बयान" था।

    कोर्ट ने कहा कि किसी राजनेता द्वारा सार्वजनिक पद पर चुने जाने से पहले दिए गए बयान और चुने जाने के बाद दिए गए बयान में एक बड़ा अंतर होता है। कोर्ट ने कहा कि ज़्यादा-से-ज़्यादा सार्वजनिक पद पर चुने जाने से पहले किसी राजनेता द्वारा किए गए वादों को पूरा न करने का असर केवल उसकी सार्वजनिक छवि पर पड़ सकता है। शायद भविष्य में चुनावों में उसकी सफलता पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    अदालत ने कहा,

    “लोगों के चुने हुए प्रतिनिधि, जैसे कि मुख्यमंत्री, द्वारा किसी सार्वजनिक मंच पर दिया गया बयान, अपनी प्रकृति में बिल्कुल अलग होता है। इसलिए ऐसे बयान का स्वरूप उसी राजनेता द्वारा सार्वजनिक पद पर चुने जाने से पहले दिए गए बयान की तुलना में पूरी तरह से भिन्न होता है। इसलिए मौजूदा मामले में यह बयान केवल एक राजनेता का बयान नहीं है, बल्कि राज्य के मुख्यमंत्री का बयान है। इसलिए इसे हल्के में खारिज नहीं किया जा सकता।”

    हालांकि, इसके साथ ही खंडपीठ ने यह भी फैसला सुनाया कि मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया कोई भी बयान केवल एक बयान होने के कारण कानून की नज़र में लागू करने योग्य नहीं होगा—भले ही जिन नागरिकों को वह बयान दिया गया, वे उसे लागू करने योग्य मानते हों।

    अदालत ने कहा कि चूंकि राज्य के कोष से किराया चुकाने का जो आश्वासन दिया गया, उसे किसी लिखित दस्तावेज़, कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum), अधिसूचना, परिपत्र (Circular), या कानून का बल रखने वाले किसी अन्य माध्यम में नहीं बदला गया। इसलिए केवल इस आधार पर उसे लागू नहीं किया जा सकता कि वह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिए गए बयान का हिस्सा था।

    अदालत ने कहा,

    “हालांकि, उस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद कोई भी आधिकारिक दस्तावेज़—जैसे कि कार्यालय ज्ञापन, अधिसूचना, सार्वजनिक सूचना या परिपत्र—जारी नहीं किया गया, जिसमें मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए आश्वासन को लिखित रूप दिया गया हो। ऐसा क्यों हुआ इस पर कोई राय देना हमारा काम नहीं है; लेकिन यह परिस्थिति कम-से-कम अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण थी। हमारे मन में यह बात पूरी तरह स्पष्ट है कि उस समय की राज्य सरकार क, मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए आश्वासन को एक लिखित दस्तावेज़ का रूप देना चाहिए था; ताकि उसे कानूनी स्वरूप और वैधता प्राप्त हो सके।”

    इसमें आगे कहा गया,

    "एक मैंडमस (Mandamus) केवल किसी ऐसे कर्तव्य को पूरा करने के लिए जारी किया जा सकता है, जिसे राज्य या कोई सार्वजनिक प्राधिकरण कानून के तहत पूरा करने के लिए बाध्य है। यदि ऐसी कोई कानूनी बाध्यता मौजूद नहीं है, तो कोई भी मैंडमस रिट जारी नहीं की जा सकती।"

    बेंच ने कहा कि वह राज्य सरकार को मुख्यमंत्री के बयान में दिए गए आश्वासन से केवल इसलिए बाध्य नहीं कर सकती, क्योंकि वह आश्वासन कुछ विशेष परिस्थितियों में दिया गया था; बशर्ते कि वह आश्वासन, अन्यथा, कानून में लागू करने योग्य न हो।

    बेंच ने प्रथम दृष्टया यह पाया कि मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया यह आश्वासन कि राज्य सभी प्रवासियों का किराया वहन करेगा, सभी प्रासंगिक पहलुओं पर आवश्यक स्तर का अध्ययन और विचार-विमर्श करने के बाद नहीं दिया गया।

    जजों ने कहा,

    "इसलिए हमारी यह स्पष्ट राय है कि मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया यह आश्वासन कि राज्य प्रवासियों का किराया उस अवधि के लिए देगा, जब तक लॉकडाउन लागू रहा, किसी भी आधिकारिक दस्तावेज़ द्वारा समर्थित न होने के कारण मैंडमस रिट के माध्यम से लागू नहीं किया जा सकता।"

    विवादित आदेश में संशोधन करते हुए न्यायालय ने रिट याचिका में की गई उस प्रार्थना को खारिज कर दिया, जिसमें राज्य को प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए आश्वासन को लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई; न्यायालय ने इस प्रार्थना को 'भ्रमपूर्ण' (Misconceived) करार दिया।

    न्यायालय ने यह भी कहा कि मार्च 2020 के DDMA आदेश के आलोक में—जिसे कभी चुनौती नहीं दी गई—मकान मालिकों को अपने प्रवासी किरायेदारों से उस अवधि का किराया वसूलने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिस अवधि के दौरान वे किराए के परिसर में तो रहे, लेकिन COVID-19 के कारण लगाए गए लॉकडाउन के चलते वहां से बाहर नहीं निकल पाए।

    हालांकि, यह छूट (Amnesty) केवल उसी अवधि के लिए लागू होगी, जब तक लॉकडाउन लागू रहा, न्यायालय ने कहा।

    अन्य निर्देश इस प्रकार हैं:

    - हालांकि, यह निर्देश राज्य सरकार को 29 मार्च, 2020 को पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए उस आश्वासन के संबंध में कोई नीतिगत निर्णय लेने से नहीं रोकेगा, जिसमें राज्य द्वारा प्रवासियों का किराया चुकाने की बात कही गई; बशर्ते कि राज्य सरकार ऐसा करना उचित समझे। हालांकि, हम अपनी इस स्पष्ट राय को दोहराते हैं कि 29 मार्च, 2020 को प्रेस कॉन्फ्रेंस में तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए बयान को लागू करने के लिए कोई 'मैंडमस' (Mandamus) जारी नहीं किया जा सकता।

    - हमें उस निर्णय को लागू करने के वित्तीय, लॉजिस्टिकल और अन्य प्रभावों के बारे में कोई जानकारी नहीं है—जिसके तहत राज्य प्रवासियों का किराया वहन करेगा—और जो पहली नज़र में बिना सोचे-समझे (तत्काल) लिया गया निर्णय प्रतीत होता है, क्योंकि इसका ज़िक्र DDMA आदेश संख्या 122-A में भी नहीं मिलता। इसलिए हम इस विषय पर किसी भी तरह की कोई राय व्यक्त नहीं कर रहे हैं।

    Title: GOVERNMENT OF NCT OF DELHI v. NAJMA AND ORS

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