जानिए हमारा कानून
Hindu Marriage Act किन लोगों पर लागू होता है?
कोई भी अधिनियम केवल किसी देश के अधिवासी लोगों पर अधिनियमित होता है लेकिन इस एक्ट की धारा 1 के अनुसार हिंदू विवाह अधिनियम भारत राज्यों में अधिवासी समस्त हिंदुओं तथा भारत के बाहर रह रहे भारत के अधिवासी हिंदुओं के संबंध में भी लागू होता है।गौर गोपाल राय बनाम शिप्रा राय एआईआर 1978 कोलकाता 163 के मामले में यह कहा गया है कि अंतर्राष्ट्रीय विधि के अनुसार यदि कोई व्यक्ति स्थाई रूप से दूसरे देश में रहने लगे तो उसे इस देश की विधि व्यक्तिगत संबंधों में लागू नहीं की जाएगी किंतु उस व्यक्ति के अधिवास के देश...
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9-10: दांपत्य अधिकारों की बहाली और Judicial Separation
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) केवल विवाह के नियमों को ही परिभाषित नहीं करता, बल्कि यह उन स्थितियों से निपटने के लिए भी कानूनी प्रावधान (Legal Provisions) प्रदान करता है जब वैवाहिक संबंध (Marital Relationship) में तनाव आ जाता है।धारा 9 (Section 9) का उद्देश्य पति-पत्नी के बीच सहवास (Cohabitation) को बहाल करना है, जबकि धारा 10 (Section 10) तलाक (Divorce) के एक विकल्प के रूप में न्यायिक पृथक्करण (Judicial Separation) की अवधारणा (Concept) प्रस्तुत करती है, जिससे पति-पत्नी...
Indian Partnership Act, 1932 की धारा 45-47: फर्म के विघटन के बाद की देनदारियां और अधिकार
विघटन के बाद भागीदारों के कार्यों के लिए देनदारी (Liability for Acts of Partners Done After Dissolution)भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (Indian Partnership Act, 1932) की धारा 45 (Section 45) इस बात को स्पष्ट करती है कि फर्म के विघटन (Dissolution of a Firm) के बाद भी भागीदारों की तीसरे पक्षों के प्रति देनदारी (Liability to Third Parties) कैसे बनी रहती है: 1. सार्वजनिक सूचना तक देनदारी का जारी रहना (Continued Liability Until Public Notice): किसी फर्म के विघटन के बावजूद, भागीदार तीसरे पक्षों के...
क्या हर आपराधिक साजिश को PMLA के तहत अनुसूचित अपराध माना जा सकता है?
पावना डिब्बूर बनाम प्रवर्तन निदेशालय (2023) में सुप्रीम कोर्ट ने Prevention of Money Laundering Act, 2002 (PMLA) की व्याख्या करते हुए यह तय किया कि क्या केवल आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy) के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला चलाया जा सकता है, जब मूल अपराध (Predicate Offence) PMLA की अनुसूची (Schedule) में शामिल न हो।यह फैसला स्पष्ट करता है कि किसी व्यक्ति को केवल IPC की धारा 120-B (Criminal Conspiracy) के तहत अभियोजन (Prosecution) नहीं किया जा सकता, जब तक कि जिस अपराध...
Sales of Goods Act, 1930 की धारा 55-58: अनुबंध के उल्लंघन के लिए वाद
माल विक्रय अधिनियम (Sales of Goods Act), 1930 का अध्याय VI अनुबंध के उल्लंघन (Breach of Contract) के लिए उपलब्ध विभिन्न उपायों (Remedies) से संबंधित है। यह उन स्थितियों को स्पष्ट करता है जहाँ या तो विक्रेता (Seller) या खरीदार (Buyer) अपने अनुबंध संबंधी दायित्वों (Contractual Obligations) को पूरा करने में विफल रहता है, और पीड़ित पक्ष (Aggrieved Party) क्या कानूनी कार्रवाई कर सकता है।कीमत के लिए वाद (Suit for Price) धारा 55 उन परिस्थितियों को बताती है जिनमें एक विक्रेता खरीदार पर कीमत वसूलने के...
Hindu Marriage Act शादी और डिवोर्स का कानून
हिंदुओं के विवाह से संबंधित विधि को सहिंताबद्ध करने के उद्देश्य से भारत गणराज्य के छठे वर्ष में संसद द्वारा अधिनियमित किया गया है। यह अधिनियम हिंदुओं के विवाह से संबंधित संपूर्ण विधि उपलब्ध करता है।प्राचीन काल से वर्तमान समय तक स्त्री और पुरुष के संबंधों में विवाह को सर्वाधिक योग्य एवं उपयोगी प्रथा माना गया है। आज भी विवाह से अधिक सार्थक प्रथा मनुष्यों के पास स्त्री और पुरुषों के संबंध को लेकर उपलब्ध नहीं है। प्राचीन हिंदू विधि में विवाह एक संस्कार माना गया है। विवाह को हिंदुओं के सोलह संस्कारों...
Hindu law किसे कहा जाता है?
भारत की जनता को उनकी रूढ़ि और प्रथा से जुड़ा हुआ व्यक्तिगत लॉ दिया गया है। भारत के सभी नागरिकों को अपनी धार्मिक तथा जातिगत परंपराओं और रिवाजों को अपने व्यक्तिगत मामलों में कानून का दर्जा दिया गया है। इन परंपराओं और रीति-रिवाजों को अधिनियम के माध्यम से समय-समय पर बल दिया गया है तथा इन प्रथाओं को सहिंताबद्ध किया गया है।भारत के मुसलमानों को उनकी शरीयत के अधीन विधान दिया गया है जो उनके विवाह, तलाक तथा उत्तराधिकार से संबंधित मामलों को नियंत्रित करता है। इसी प्रकार भारत के हिंदुओं को उनका अपना...
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7-8: विवाह समारोह और पंजीकरण
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) न केवल एक वैध हिंदू विवाह (Valid Hindu Marriage) की शर्तों (Conditions) को निर्धारित करता है, बल्कि यह विवाह के अनुष्ठान (Rituals) और उसके पंजीकरण (Registration) से संबंधित प्रक्रियाओं (Procedures) को भी स्पष्ट करता है।धारा 7 (Section 7) इस बात पर प्रकाश डालती है कि हिंदू विवाह कैसे संपन्न (Solemnized) किए जा सकते हैं, जबकि धारा 8 (Section 8) विवाह के पंजीकरण की प्रक्रिया और उसके महत्व का विवरण देती है, हालांकि यह इसकी वैधता (Validity) के लिए...
Sales of Goods Act, 1930 की धारा 53-54 : खरीदार और विक्रेता द्वारा अंतरण के अधिकार
माल विक्रय अधिनियम (Sales of Goods Act), 1930 का अध्याय V अदत्त विक्रेता (Unpaid Seller) के अधिकारों पर केंद्रित है, विशेष रूप से जब माल के साथ अतिरिक्त लेन-देन होते हैं। धारा 53 खरीदार द्वारा माल के आगे की बिक्री (Sub-sale) या गिरवी (Pledge) के प्रभावों को स्पष्ट करती है, जबकि धारा 54 बताती है कि कैसे ग्रहणाधिकार (Lien) या पारगमन में माल को रोकने का अधिकार (Stoppage in Transit) का प्रयोग बिक्री अनुबंध को रद्द करता है या नहीं, और पुनर्बिक्री (Re-sale) के अधिकार को विस्तृत करता है।खरीदार द्वारा...
क्या सरकार ने भारत से मैला ढोने की प्रथा समाप्त करने के अपने संवैधानिक कर्तव्य को निभाया है?
डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ (2023) में सुप्रीम कोर्ट ने यह गंभीर प्रश्न उठाया कि क्या भारत सरकार और उसकी एजेंसियां मैला ढोने (Manual Scavenging) की अमानवीय प्रथा को खत्म करने और इससे जुड़े लोगों के पुनर्वास (Rehabilitation) की संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी को सही तरीके से निभा रही हैं? कोर्ट ने इस केस में 2013 के कानून – Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act, 2013 – के प्रभावी क्रियान्वयन और उससे जुड़े अधिकारों के उल्लंघन पर विस्तार से विचार किया।यह फैसला...
Indian Partnership Act, 1932 की धारा 44: न्यायालय द्वारा फर्म का विघटन
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (Indian Partnership Act, 1932) की धारा 44 (Section 44) उन आधारों को निर्धारित करती है जिन पर एक भागीदार के मुकदमे (Suit of a Partner) पर न्यायालय (Court) एक फर्म को भंग (Dissolve) कर सकता है।जबकि धारा 40 (Section 40) समझौते द्वारा विघटन, धारा 41 (Section 41) अनिवार्य विघटन, और धारा 42 (Section 42) आकस्मिकताओं पर विघटन की बात करती है, धारा 44 न्यायालय के हस्तक्षेप (Intervention) की अनुमति देती है जब भागीदारों के बीच गंभीर मुद्दे उत्पन्न होते हैं। एक भागीदार के...
Indian Partnership Act, 1932 की धारा 39 – 43 : भागीदारी फर्म का विघटन
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (Indian Partnership Act, 1932) का अध्याय VI (Chapter VI) एक फर्म के विघटन (Dissolution of a Firm) से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधानों को निर्धारित करता है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि 'भागीदारी का विघटन' (Dissolution of Partnership) और 'फर्म का विघटन' (Dissolution of the Firm) में अंतर होता है।जब किसी एक भागीदार और बाकी भागीदारों के बीच संबंध समाप्त होता है, तो उसे भागीदारी का विघटन कहा जाता है, जबकि फर्म का विघटन तब होता है जब सभी भागीदारों के बीच भागीदारी समाप्त हो...
क्या झूठे आरोप और कानूनी आधारहीन FIR अदालत रद्द कर सकती है?
सलीब @ शालू @ सलीम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023) में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सवाल का उत्तर दिया – क्या किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज एफआईआर (First Information Report) को रद्द (Quash) किया जा सकता है, जब वह प्रथम दृष्टया (Prima Facie) कोई अपराध (Offence) नहीं दर्शाती हो या केवल व्यक्तिगत दुश्मनी (Personal Grudge) के कारण दर्ज की गई हो?यह निर्णय भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code – CrPC) की धारा 482 और भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code – IPC) की धारा 195A (झूठा साक्ष्य...
Sales of Goods Act, 1930 की धारा 50: पारगमन में माल को रोकने के अधिकार का प्रयोग
माल विक्रय अधिनियम (Sales of Goods Act), 1930 का अध्याय V अदत्त विक्रेता (Unpaid Seller) के अधिकारों से संबंधित है, जैसा कि हमने पिछली चर्चाओं में देखा। धारा 50 ने पारगमन में माल को रोकने के अधिकार (Right of Stoppage in Transit) को परिभाषित किया, जो अदत्त विक्रेता को खरीदार के दिवालिया होने पर, माल को अपने कब्ज़े से बाहर होने के बावजूद वापस लेने की अनुमति देता है, बशर्ते वे अभी भी 'पारगमन में' हों (जैसा कि धारा 51 में विस्तृत है)। अब, धारा 52 बताती है कि इस महत्वपूर्ण अधिकार का वास्तव में प्रयोग...
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7-8: विवाह समारोह और पंजीकरण
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) न केवल एक वैध हिंदू विवाह (Valid Hindu Marriage) की शर्तों (Conditions) को निर्धारित करता है, बल्कि यह विवाह के अनुष्ठान (Rituals) और उसके पंजीकरण (Registration) से संबंधित प्रक्रियाओं (Procedures) को भी स्पष्ट करता है।धारा 7 (Section 7) इस बात पर प्रकाश डालती है कि हिंदू विवाह कैसे संपन्न (Solemnized) किए जा सकते हैं, जबकि धारा 8 (Section 8) विवाह के पंजीकरण की प्रक्रिया और उसके महत्व का विवरण देती है, हालांकि यह इसकी वैधता (Validity) के लिए...
Matrimonial डिस्प्यूट में लीगल नोटिस की जरूरत
पति पत्नी द्वारा एक दूसरे को ऐसे लीगल नोटिस भेजे जाने की कानून में तो कोई जरूरत नहीं बताई गई है और इसका कोई भी कानूनी उल्लेख भी नहीं मिलता है। तलाक का मामला कोर्ट में दर्ज करवाने के पहले लीगल नोटिस भेजा जाए ऐसा कोई भी उल्लेख हिंदू विवाह अधिनियम 1955, विशेष विवाह अधिनियम 1956 दोनों ही अधिनियम में कहीं भी नहीं मिलता है। इसी के साथ भरण पोषण के मामले जो कि घरेलू हिंसा अधिनियम 2005, हिंदू विवाह अधिनियम 1955 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 के तहत आते हैं। इन सभी कानूनों में भी भरण पोषण का...
PNDPT Act का कानून
गर्भधारण पूर्व निदान कारक तकनीक, भ्रूण लिंग चयन विशेष निषेध पी० एन० डी० पी० टी० अधिनियम 1994 है।स्त्री दमन हेतु समाज में लिंग चयन की तकनीक विकसित हो गई तथा लिंग का चयन करने के पश्चात पुत्री मालूम होने पर गर्भपात कर दिया जाता था। यह तकनीक मनुष्यता पर संकट के रूप में सामने आ गई है। रूढ़िवादी भारतीय सोच में पुरुष संतान का मोह तथा कन्या के लिए उपेक्षापूर्ण लिंग भेद का प्रचलन अत्यंत पुराना है। कन्याओं को पैदा होने के बाद भी मार दिया जाता था।वैज्ञानिक तकनीक ऐसी आई जिसने पैदा होने के पूर्व मारने के...
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 की धारा 36-38: जाने वाले भागीदारों के अधिकार और गारंटी पर फर्म में बदलाव का प्रभाव
बाहर जाने वाले भागीदार का प्रतिस्पर्धी व्यवसाय चलाने का अधिकार और व्यापार प्रतिबंध में समझौते (Rights of Outgoing Partner to Carry on Competing Business. Agreements in Restraint of Trade)भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (Indian Partnership Act, 1932) की धारा 36 (Section 36) एक बाहर जाने वाले भागीदार (Outgoing Partner) के अधिकारों और व्यापार प्रतिबंधों (Restraint of Trade) से संबंधित समझौतों पर चर्चा करती है: 1. प्रतिस्पर्धी व्यवसाय चलाने का अधिकार (Right to Carry on Competing Business): एक बाहर...
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5: एक वैध हिंदू विवाह की शर्तें
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) केवल विवाह के नियमों को संहिताबद्ध (Codify) ही नहीं करता, बल्कि यह कुछ आवश्यक शर्तों (Essential Conditions) को भी निर्धारित करता है जिन्हें एक विवाह को कानूनी रूप से वैध (Legally Valid) हिंदू विवाह मानने के लिए पूरा किया जाना चाहिए। ये शर्तें सामाजिक व्यवस्था (Social Order), नैतिकता (Morality) और व्यक्तियों के अधिकारों (Rights of Individuals) की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं।धारा 5 (Section 5) इन मूलभूत शर्तों को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है,...
क्या PMLA के तहत गिरफ्तारी के समय लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार देना ज़रूरी है? – पंकज बंसल बनाम भारत संघ में सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या
पंकज बंसल बनाम भारत संघ (2023) के निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम, 2002 (Prevention of Money Laundering Act – PMLA) की धारा 19 की संवैधानिक व्याख्या की। इस फैसले का मुख्य सवाल यह था कि क्या प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate – ED) को किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के समय उसे लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार (Grounds of Arrest) देना अनिवार्य है?यह मामला मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों पर नहीं, बल्कि गिरफ्तारी की वैधानिक प्रक्रिया और संविधान के अनुच्छेद 22(1) (Article 22(1) –...




















