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Annuity और Periodic Payments के मूल्यांकन का नियम - धारा 25 भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899
भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 (Indian Stamp Act, 1899) विभिन्न कानूनी दस्तावेजों (Legal Documents) और लेन-देन (Transactions) पर स्टांप शुल्क (Stamp Duty) लगाने के नियमों को निर्धारित करता है।इस अधिनियम के तहत, यदि कोई दस्तावेज वार्षिकी (Annuity) या किसी अन्य प्रकार के आवधिक भुगतान (Periodic Payment) को सुरक्षित करने के लिए बनाया गया है, तो उस पर स्टांप शुल्क कैसे लगाया जाएगा, यह धारा 25 (Section 25) में स्पष्ट किया गया है। वार्षिकी (Annuity) एक निश्चित राशि होती है, जो एक निश्चित अंतराल (Fixed...
Transfer Of Property में होने वाली लीज में हित अन्तरित करने का अधिकार
इस एक्ट की धारा 108 (अ) के अनुसार Lessee को महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान करता है। इसके अनुसार Lessee लीज़ सम्पत्ति में अपने पूर्ण हित को या उसके भाग को आत्यन्तिक रूप से अथवा बंधक या उपपट्टे द्वारा अन्तरित कर सकेगा और ऐसे हित को भाग का अन्तरिती उसे पुनः अन्तरित कर सकेगा। Lessee का मात्र ऐसे अन्तरण के फलस्वरूप पट्टे से संलग्न दायित्यों में से किसी के अध्यधीन रहना प्रविरत न हो जाएगा। उस उपबन्ध में प्रदत्त अन्तरण का अधिकार निम्न परिस्थितियों में प्रवर्तित नहीं होगा।(1) Lessee के पास अनन्तरणीय धारणाधिकार...
Transfer Of Property में किसी भी लीज के Lessor की लाइबिलिटी
धारा 108 Lessor तथा Lessee के अधिकारों एवं दायित्वों के सम्बन्ध में प्रावधान प्रस्तुत करता है, परन्तु ये अधिकरण एवं दायित्व आत्यन्तिक नहीं हैं। ये संविदा या स्थानीय प्रथा के अध्यधीन होते हैं, किन्तु किसी स्थानीय विधि के अध्यधीन नहीं होते हैं। Lessor तथा Lessee स्वयं इसमें वर्णित अधिकारों एवं कर्तव्यों से भिन्न अधिकारों एवं कर्तव्यों पर सहमत हो सकते हैं। यह धारा केवल तब प्रवर्तित होती है जब कोई तत्प्रतिकूल संविदा न हो ।Lessor की लाइबिलिटीसम्पत्ति में के किसी अप्रत्यक्ष सारवान दोष प्रकट करने का...
अपराध के आरोपी अस्वस्थ मानसिकता वाले व्यक्तियों के लिए धारा 367, BNSS 2023 के प्रावधान
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 – BNSS), जो पहले की दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure – CrPC) की जगह लाई गई है, इसमें यह सुनिश्चित करने के लिए प्रावधान (Provisions) किए गए हैं कि अस्वस्थ मानसिकता (Unsound Mind) या बौद्धिक अक्षमता (Intellectual Disability) वाले व्यक्तियों को न्यायिक प्रक्रिया (Judicial Process) में उचित तरीके से संभाला जाए।धारा 367 (Section 367) विशेष रूप से इस बात को तय करती है कि अगर किसी आरोपी (Accused) के मानसिक रूप...
ऋण या भविष्य में भुगतान के आधार पर संपत्ति हस्तांतरण : भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 की धारा 24
भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 (Indian Stamp Act, 1899) विभिन्न प्रकार के दस्तावेज़ों (Documents) पर स्टांप शुल्क (Stamp Duty) के भुगतान से संबंधित नियमों को निर्धारित करता है। यह सुनिश्चित करता है कि सभी कानूनी दस्तावेज मान्यता प्राप्त और लागू करने योग्य (Legally Enforceable) हों।धारा 24 उन परिस्थितियों से संबंधित है जब किसी संपत्ति (Property) को किसी ऋण (Debt) के बदले हस्तांतरित (Transferred) किया जाता है या जब हस्तांतरण (Transfer) के लिए भविष्य में भुगतान करने की शर्त होती है। इस स्थिति में,...
रिहायशी इमारत को गैर-रिहायशी इमारत में बदलना और मकान मालिक की मरम्मत की ज़िम्मेदारी – हिमाचल प्रदेश शहरी किराया नियंत्रण अधिनियम, 1987 की धारा 12 और 13
हिमाचल प्रदेश शहरी किराया नियंत्रण अधिनियम, 1987 (Himachal Pradesh Urban Rent Control Act, 1987) मकान मालिक (Landlord) और किरायेदार (Tenant) के बीच संबंधों को नियंत्रित करता है ताकि दोनों पक्षों के अधिकार सुरक्षित रहें। इस अधिनियम के तहत धारा 12 और धारा 13 (Section 12 and Section 13) बहुत महत्वपूर्ण हैं।धारा 12 (Section 12) यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी व्यक्ति बिना लिखित अनुमति (Written Permission) के रिहायशी (Residential) इमारत को गैर-रिहायशी (Non-Residential) इमारत में न बदले। इससे यह...
क्या सरकार किसी कानून को पिछली तारीख से लागू करके लोगों को सजा दे सकती है?
सुप्रीम कोर्ट ने Union of India v. Ganpati Dealcom Pvt. Ltd. मामले में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक (Constitutional) प्रश्न पर फैसला दिया, जिसमें यह तय किया गया कि क्या Prohibition of Benami Property Transactions Act, 1988 (1988 अधिनियम) और Benami Transactions (Prohibition) Amendment Act, 2016 (2016 अधिनियम) के तहत अपराधों (Criminal Provisions) को पिछली तारीख से लागू किया जा सकता है।इस फैसले में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20(1) (Article 20(1)) की व्याख्या की गई, जो किसी भी अपराध (Offense) के लिए...
दूसरी FIR कब दर्ज की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट ने बताया
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि एक ही अपराध के लिए दूसरी FIR की अनुमति नहीं है, जबकि दूसरे अपराध के लिए दूसरी FIR की अनुमति है।कोर्ट ने कहा कि दोनों FIR में आरोपों की प्रकृति की जांच की जानी चाहिए, जिससे बाद में FIR दर्ज करने की अनुमति निर्धारित की जा सके।न्यायालय ने निम्नलिखित परिस्थितियों का वर्णन किया जब दूसरी FIR दर्ज करना अनुमेय है:"1. जब दूसरी FIR प्रति-शिकायत हो या तथ्यों के सेट का प्रतिद्वंद्वी संस्करण प्रस्तुत करती हो, जिसके संदर्भ में पहले से ही एक FIR दर्ज है।2. जब दो FIR का दायरा...
Transfer Of Property में एक साल से ज्यादा की लीज
इस एक्ट की धारा 107 में प्रावधान हैं कि एक मकान का लीज़ यदि निश्चित एक वर्ष की अवधि मात्र के लिए तो ऐसे पट्टे को मौखिक साक्ष्य तथा पट्टे के परिदान के द्वारा साबित किया जा सकेगा। एक वर्ष को निश्चित अवधि का लीज़ तथा पट्टेदार द्वारा यह अभिव्यक्ति कि वह यदि Lessor सहमत हो तो उसी रेन्ट पर सम्पत्ति को एक वर्ष की अवधि से अधिक की अवधि का लीज़ धारण करने को तैयार है, तो ऐसा लीज़ एक वर्ष से अधिक की अवधि का लीज़ नहीं होगा।इसी प्रकार एक ऐसा लीज़ जिसके तहत Lessor अपनी सम्पत्ति एक वर्ष की अवधि के लिए पट्टे पर देने...
Transfer Of Property में लीज किस तरह से होती है?
एक्ट की धारा 107 धारा उन विधियों या तरीकों का उल्लेख करती है जिनके द्वारा पट्टों को निष्पादित किया जा सकेगा। धारा का पैराग्राफ एक अनिवार्य रजिस्ट्रीकरण के सम्बन्ध में प्रावधान प्रस्तुत करता है। पट्टे के मामले में रजिस्ट्रीकरण की अनिवार्यता हस्तान्तरित हित के मूल्य पर निर्भर नहीं करता है, जैसा कि विक्रय या बन्धक के मामलों में होता है, अपितु यह अन्तरण भी शर्तों पर निर्भर करता है। चौक लीज़ के मामलों में हित का मूल्य निर्धारित करना कठिन होता है जिसे रजिस्ट्रीकरण के प्रयोजन के लिए युक्तियुक्त आँकड़ा...
स्टाम्प शुल्क के लिए दस्तावेजों का मूल्यांकन: भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 की धारा 20 से 23
भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 (Indian Stamp Act, 1899) में यह निर्धारित किया गया है कि किसी दस्तावेज़ (Instrument) का मूल्यांकन कैसे किया जाएगा ताकि उचित स्टाम्प शुल्क (Stamp Duty) लगाया जा सके। अलग-अलग प्रकार के दस्तावेजों पर अलग-अलग स्टाम्प शुल्क लागू होता है, जो आमतौर पर उसमें दर्ज किए गए लेन-देन (Transaction) के मूल्य पर निर्भर करता है।धारा 20 से 23 में यह बताया गया है कि विदेशी मुद्रा (Foreign Currency), शेयर बाजार (Stock Market), विनिमय दर (Exchange Rate), और ब्याज (Interest) से जुड़े...
किराएदार की आवश्यक सेवाओं को रोकना या बंद करना – हिमाचल प्रदेश शहरी किराया नियंत्रण अधिनियम, 1987 की धारा 11
हिमाचल प्रदेश शहरी किराया नियंत्रण अधिनियम, 1987 (Himachal Pradesh Urban Rent Control Act, 1987) किराएदारों (Tenants) को मकान मालिकों (Landlords) द्वारा किए जाने वाले अन्यायपूर्ण (Unfair) व्यवहार से बचाने के लिए बनाया गया है।इस अधिनियम की धारा 11 (Section 11) बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मकान मालिक को किराएदार द्वारा उपयोग की जा रही आवश्यक सेवाओं (Essential Supply or Service) को रोकने या बंद करने से रोकती है। यह प्रावधान (Provision) यह सुनिश्चित करता है कि मकान मालिक किराएदार को परेशान करने के...
क्या Commercial Courts Act, 2015 की धारा 12A के तहत मुकदमा दायर करने से पहले मध्यस्थता करना अनिवार्य है?
सुप्रीम कोर्ट ने Patil Automation Private Limited बनाम Rakheja Engineers Private Limited के मामले में एक महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर दिया है कि क्या Commercial Courts Act, 2015 की धारा 12A के तहत मुकदमा दायर करने से पहले मध्यस्थता (Mediation) करना अनिवार्य है।इस धारा को 2018 में एक संशोधन (Amendment) के माध्यम से जोड़ा गया था, ताकि मुकदमेबाजी (Litigation) को कम किया जा सके और वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution - ADR) को बढ़ावा दिया जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा...
BNSS, 2023 की धारा 366 और CrPC, 1973 की धारा 327 में अंतर: Open Court की नई व्यवस्था
न्यायपालिका में खुले न्यायालय (Open Court) का सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण होता है, जिससे न्याय प्रक्रिया पारदर्शी (Transparent) और जवाबदेह (Accountable) बनी रहती है। इससे जनता को यह भरोसा रहता है कि न्याय निष्पक्ष और उचित तरीके से दिया जा रहा है।दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (Criminal Procedure Code, 1973 - CrPC) में धारा 327 (Section 327) के तहत खुले न्यायालय का प्रावधान था, जिसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 - BNSS, 2023) की धारा 366 (Section 366)...
'सामान्य इरादा' (S. 34 IPC) और 'सामान्य उद्देश्य' (S. 149 IPC) के बीच अंतर: सुप्रीम कोर्ट ने उदाहरणों के साथ समझाया
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) की धारा 34 (सामान्य इरादा) और 149 (सामान्य उद्देश्य) के बीच अंतर को स्पष्ट किया। इसने फैसला सुनाया कि धारा 34 में सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता है, जिसमें व्यक्ति के इरादे को एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में महत्व दिया गया है। इसके विपरीत, धारा 149 के तहत, किसी व्यक्ति को केवल एक विशिष्ट अपराध करने के लिए एक सामान्य उद्देश्य के साथ एक गैरकानूनी जमावड़े का हिस्सा होने के लिए दोषी ठहराया जा सकता है, भले ही अपराध करने का उनका व्यक्तिगत इरादा...
Transfer Of Property में एग्रीमेंट के बिना लीज़ में संपत्ति को खाली करवाने के लिए नोटिस किस तरह होगा
लीज़ के पर्यवसान हेतु नोटिस देना आवश्यक है। धारा 106 की उपधारा (4) नोटिस दिए जाने के सम्बन्ध में प्रावधान प्रस्तुत करती है, जिसके अनुसार(1) नोटिस लिखित हो,(2) नोटिस देने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से हस्ताक्षरित हो,(3) नोटिस अपेक्षित व्यक्ति पर तामील हो -(क) डाक द्वारा या(ख) व्यक्तिगत रूप में परिदत्त हो, या(ग) सम्पत्ति के सहज भाग पर चस्पा की गयी हो।यदि नोटिस व्यक्तिगत रूप में देने का आशय है तो यह आवश्यक नहीं है कि नोटिस सम्बन्धित व्यक्ति को ही तामील हो उपधारा (4) के अनुसार यदि नोटिस परिवार के...
Transfer Of Property एग्रीमेंट के बिना लीज़ का पीरियड
लीज़ भी संपत्ति के अन्तरण का एक माध्यम है जिसमें संपत्ति का टाइटल तो उसके स्वामी के पास पर रहता है परंतु संपत्ति पर उपभोग का अधिकार अंतरिती उपलब्ध हो जाता।धारा 106 से अधिनियम का उद्देश्य है Lessee के हित को सुरक्षित रखना जो, इसमें उल्लिखित नियम के सिवाय पूर्णतया, असुरक्षित रहेगा। यथेच्छ लीज़धारी की तरह वह किसी भी क्षण lessor के विकल्प पर इस कारण कि Lessee द्वारा मुक्त कर देने पर उस सम्पत्ति का वह बेहतर उपयोग कर सकेगा, सम्पत्ति से बेदखल कर दिया जाएगा। यदि Lessee यकायक सम्पत्ति को मुक्त कर देता है...
जब किसी व्यक्ति के मृत्यु से पूर्व दिए गए दो Dying Declaration सामने आते हैं तो न्यायालय को किसे सही मानकर निर्णय देना चाहिए?
जब किसी व्यक्ति के अंतिम क्षणों में दिए गए बयान, जिन्हें हम Dying Declarations कहते हैं, को अदालत में सबूत के रूप में पेश किया जाता है, तो इनकी सही समझ और विश्वसनीयता का आकलन करना बेहद महत्वपूर्ण होता है।अदालतें मानती हैं कि जब कोई व्यक्ति अपने अंतिम समय में बिना किसी दबाव (Duress) के अपना बयान देता है, तो वह बयान अक्सर सच्चा होता है। हाल ही में, Supreme Court ने Makhan Singh v. State of Haryana के मामले में यह मुद्दा उठाया कि दो विरोधाभासी Dying Declarations में से किस पर भरोसा किया जाए। इस...
हिमाचल प्रदेश अर्बन रेंट कंट्रोल अधिनियम, 1987: गलत तरीके से दिए गए किराए की वसूली और स्थानीय करों के कारण किराए में बढ़ोतरी के नियम
हिमाचल प्रदेश अर्बन रेंट कंट्रोल अधिनियम, 1987 (Himachal Pradesh Urban Rent Control Act, 1987) किरायेदारों (Tenants) के अधिकारों की सुरक्षा करता है और मकान मालिकों (Landlords) को उनके दायित्व (Responsibilities) निर्धारित करता है।इस अधिनियम के सेक्शन (Section) 9 और 10 दो महत्वपूर्ण विषयों से जुड़े हुए हैं—पहला, यदि किरायेदार ने कोई ऐसा किराया (Rent) या राशि (Amount) का भुगतान किया है जो कानूनन उसे नहीं देना चाहिए था, तो वह इसे वापस कैसे प्राप्त कर सकता है। दूसरा, किन परिस्थितियों में मकान मालिक...
क्या सभी अदालतों की कार्यवाही सार्वजनिक होती है? धारा 366 BNSS, 2023
न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता (Transparency) यह सुनिश्चित करती है कि न्याय न केवल किया जाए, बल्कि उसे होते हुए देखा भी जाए।भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) की धारा 366 इसी सिद्धांत को लागू करती है, जिसके तहत अपराध से जुड़े मुकदमों (Criminal Cases) की सुनवाई आम जनता के लिए खुली (Open Court) होती है। इससे न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहती है और जनता को यह विश्वास रहता है कि मामलों का निपटारा निष्पक्ष रूप से किया जा रहा है। हालांकि, कुछ संवेदनशील...