Transfer Of Property में लीज की शर्त और रेस्ट्रिक्शन में अंतर
Shadab Salim
26 Feb 2025 12:27 PM

इस एक्ट के अंतर्गत लीज़ के संदर्भ में इन दोनों ही चीज़ों में अंतर माना गया है। इन दोनों ही परिस्थितियों में विभेद होता है। शर्त तब अतित्य में आती है जब Lessor एक निश्चित कालावधि के लिए लीज़ प्रदान करता है परन्तु इसमें एक उपबन्ध होता है जो लीज़ के पर्यवसान हेतु एक विशिष्ट घटना का उल्लेख करता है। इसके वि निबन्धन में उल्लिखित घटना प्राइमरी फार्मूला में परिवर्तित हो जाती है जो उस कालावधि का निर्धारण करती है जिसके लिए लीज़ अस्तित्व में रहेगा तथा घटना के घटित होने पर पट्टे का स्वमेव पर्यवसान हो जाएगा क्योंकि निर्धारित लीज़ अवधि समाप्त हो चुकी है। निर्बन्धन में समपहरण का प्रश्न नहीं उठता है।
यह सम्भव है कि पट्टे में उल्लिखित कोई शर्त दोहरे गुणों से युक्त हो। एक गुण प्रसंविदा हो तथा दूसरी शर्त जिसमें उल्लंघन की दशा में भू-स्वामी को मात्र एक उपचार उपलब्ध होगा और वह हैं लीज़।
इन्कार शब्द से अभिप्रेत है Lessee द्वारा अपनी लीज़जनित हैसियत का परित्याग कर एक अन्य व्यक्ति में सम्पत्ति का स्वामित्व निहित होना बताना या उक्त हित को स्वयं का हित बताना।
'स्वत्व का इन्कार' गठित करने के लिए प्रत्यक्ष इन्कार होना चाहिए। Lessee एवं Lessor के सम्बन्ध में स्पष्टतः इन्कार करे अथवा एक पृथक आधार पर सम्पत्ति को धारण करने का दावा प्रस्तुत करें जो आधार Lessee एवं Lessor के वर्तमान सम्बन्ध के ठीक प्रतिकूल हो एवं जो विवक्षा द्वारा पूर्व Lessee के सम्बन्धों को इन्कार करता हो। अतः इन्कार एक पक्षकार द्वारा अपनी स्थिति को नकार देना है या तो यह बताकर कि सम्पत्ति का स्वामित्व किसी अन्य व्यक्ति में है या यह कहकर कि उक्त सम्पत्ति का स्वामी स्वयं में है। इन्कार सुस्पष्ट एवं भ्रमरहित शब्दों में होना चाहिए। यह भी आवश्यक है कि ऐसा इन्कार Lessor के संज्ञान में होना चाहिए।
अतः Lessee द्वारा Lessor से यह कहना कि आप मेरे भू-स्वामी या मकान मालिक नहीं हैं, मैं किसी का Lessee नहीं हूँ हक को इन्कार हैं। उन प्रान्तों में जिनमें सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम प्रवर्तनीय नहीं है, भूस्वामी के हित को नकारना जब तक कि यह कृत्य किसी न्यायिक कार्यवाही में न हो अथवा अन्य लोक दस्तावेजों जो 'अभिलेख' की परिभाषा के अन्तर्गत आता हो में न हो. समपहरण को प्रभावी बनाने हेतु पर्याप्त नहीं होगा। लीज़ की शर्तों को नकारना और अधिक सूचना मांगना' या लैण्ड लार्ड से यह कहना वह लीज़ सम्पत्ति पर अपना हक साबित करे; Lessor के लीज़ सम्पत्ति में के हित की सीमा को नकारना" Lessor के हित को ऐसे बाद में नकारना जिसमें वह पक्षकार न हो; सह Lessee में हित बताना। कबूलियत के निष्पादन को नकारना किराया अदा न करना।
Lessee का त्याग कर देना; लीज़जनित हित का अन्तरण कर देना; सहLessee द्वारा Lessor के हित को नकारना; लीज़ सम्पत्ति के समनुदेशन के पश्चात् Lessor के हित को नकारना, समपहरण हेतु पर्याप्त आधार नहीं है। Lessor, लीज़ का अवसान इनमें से किसी भी एक आधार पर नहीं करा सकेगा। किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता है कि वह Lessee भी बना रहे तथा उसी समय Lessor के हित को चुनौती भी दे।
हक के नकार का प्रभाव- इस सन्दर्भ में साधारण नियम यह है कि Lessee जो Lessor के हित को नकार रहा है, उसका तुरन्त निष्कासन Lessor के विकल्प पर किया जा सकेगा। ऐसी स्थिति में वह खाली करने हेतु नोटिस की मांग करने के लिए प्राधिकृत नहीं है और न हो लीज़ विलेख में उल्लिखित किसी नोटिस के लिए प्राधिकृत है क्योंकि नकार के फलस्वरूप Lessee ने नोटिस पाने के अपने अधिकार का परित्याग कर दिया हुआ समझा जाएगा। बेस्ट सो० जे० ने डो बनाम फ्राड के वाद में सुस्पष्ट कर दिया था कि :-
"नोटिस की आवश्यकता नहीं होगी उसे समाप्त करने के लिए जिसके लिए वह (Lessee) कहता है कि अस्तित्ववान नहीं है।"
फूलन देवी बनाम आनन्द स्वरूप के वाद में भी इसी वस्तुस्थिति को स्वीकृति प्रदान को गयी थी कि यदि एक Lessee अपने Lessor के हित को नकारता है और अपने आप को सम्पत्ति का स्वामी घोषित करता है तो वह यह अभिवचन नहीं कर सकेगा कि उसे छोड़ने की नोटिस नहीं दी गयी थी।
यदि किराये की बकाया रकम के भुगतान हेतु Lessor द्वारा Lessee को नोटिस दी गयी थी तथा Lessee ने उक्त नोटिस का कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया तो यह नहीं कहा जा सकेगा कि यह Lessor के हित को नकारने के लिए अभिव्यक्त घोषणा थी।
Lessor के हित का नकारा जाना जिसके आधार पर Lessee को निष्काषित करने हेतु वाद संस्थित किया जा सकेगा, बेदखली हेतु वाद संस्थित करने से पूर्व किया जाना चाहिए। Lessee के अभिकथन में उल्लिखित नकार को आधार नहीं बनाया जा सकेगा। Lessee को लीज़ सम्पत्ति से बेदखल करने हेतु। परन्तु किराया पाने हेतु संस्थित बाद में Lessor के हित को नकारना समपहरण हेतु पर्याप्त आधार होगा।
पट्टे का समपहरण Lessor का हित नकारने के अतिरिक्त शर्त भंग पर दिवालियेपन को स्थिति में भी होता है अतः इन तीनों ही स्थितियों में समपहरण के प्रयोजनार्थ Lessor द्वारा Lessee को लिखित नोटिस देना अति आवश्यक होगा जिससे यह सुस्पष्ट हो सके कि Lessor की मंशा उक्त लीज़ को समाप्त करने की है। इन तीन परिस्थितियों के अतिरिक्त अन्य किसी भी स्थिति में समपहरण या जब्ती नहीं हो सकेगी, किन्तु इस आशय का मजबूत साक्ष्य उपलब्ध होना चाहिए कि Lessor ने लीज़ को समपहरण द्वारा समाप्त करने के आशय से Lessee को नोटिस दे दी थी अन्यथा यह माना जाएगा कि समपहरण की सूचना नहीं दी गयी थी एवं पट्टे का जब्तीकरण नहीं हो सकेगा।
ऐसे मामलों में कोर्ट के लिए यह समीचीन होगा कि बाद संस्थित होने के बाद को परिस्थिति एवं घटनाओं को भी संज्ञान में ले क्योंकि ये तथ्य भी वाद पत्र में मांगे गये उपचारों को प्रदान करने हेतु अतिरिक्त आधार प्रस्तुत करते हैं। धारा 111(छ) में जैसी कि नोटिस अपेक्षित है उसका उद्देश्य केवल Lessor की मंशा कि वह पट्टे को समाप्त करना चाहता है, को प्रकट करना है न कि लीज़ के समपहरण के आधारों को प्रवृत्त करना है।
यदि Lessee लिखित अभिकथन में समपहरण, स्वत्व या हित इन्कार के आधार पर उठाता है तो इसे पाश्चिक घटना माना जाएगा जो पट्टे के जप्ती हेतु अतिरिक्त आधार प्रस्तुत करेगा जिसे कोर्ट संज्ञान में रूप में Lessee के निष्कापन हेतु निष्काषन का आदेश पारित करते समय पर यदि Lessee के निष्काषन हेतु जब्तीकरण का वाद संस्थित किया गया है, धारा 111 (छ) में वर्णित आधारों से भिन्न अन्य आधारों पर जैसे लीज़ की अवधि की समाप्ति पर तो ऐसे वाद में Lessee द्वारा Lessor के हित को लिखित अभिकथन में नकारना जब्तीकरण के आधार पर निष्काषित करने हेतु आधार प्रस्तुत नहीं करेगा।
रेस्ट्रिक्शन
धारा 116 साक्ष्य अधिनियम उपबन्धित करती है कि स्थावर सम्पत्ति का कोई भी Lessee या ऐसे Lessee के अध्यधीन दावा करने वाला कोई भी व्यक्ति Lesseeों की निरन्तरता के दौरान प्राधिकृत नहीं होगा यह इन्कार करने से कि ऐसे Lessee का Lessor, Lesseeों के प्रारम्भ के समय लीज़ सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त था। प्रिवी कौंसिल ने यह अभिनिर्णीत किया है कि भले ही पट्टे का पर्यवसान निर्धारित लीज़ अवधि की समाप्ति के साथ हो गया है तो ऐसा Lessee जिसे सम्पत्ति का कब्जा अपने भूस्वामी के हित को इन्कार नहीं कर सकेगा। साक्ष्य अधिनियम की धारा 116 के अन्तर्गत जब तक कि उसने प्रकट रूप में Lessor के पक्ष में सम्पत्ति का समर्पण न किया हो। Lessor का हित लीज़ सम्पत्ति में चाहे कितना हो दोषपूर्ण क्यों न हो विशेषकर लीज़ के सूजन के दौरान Lessee को यह अधिकार नहीं होगा कि वह उक्त दोषपूर्ण हित का लाभ उठाये।
यदि Lessee ने 'क' से लीज़ सम्पत्ति प्राप्त नहीं किया है फिर भी यदि उसके एवं 'क' के बीच Lessor एवं Lessee का सम्बन्ध स्थापित हो गया है तो Lessee 'क' के हित को नकार नहीं सकेगा। Lessee का एक उपलीज़दार या समनुदेशिनी या कोई अन्य व्यक्ति जो Lessee से दुरधिपूर्ण सन्धि के अन्तर्गत लीज़ सम्पत्ति पर आता है यह भी Lessee के विरुद्ध जारी विबन्धन से बाध्य होगा तथा मूल Lessor के हित को नकार नहीं सकेगा पर Lessee यह तर्क कभी भी प्रस्तुत कर सकेगा कि Lessor का हित समाप्त हो गया है तभी से जब से उनके बीच Lessor एवं Lessee का सम्बन्ध स्थापित हुआ था। चूंकि Lessee Lessor के हित को नकार नहीं सकता है अतः यह सम्पत्ति में उसका हित Lesseeी को निरन्तरता के दौरान Lessor के प्रतिकूल नहीं होगा।
Lessee के दिवालिया होने पर समपहरण- सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम की धारा 12 पैरा 2 में यह उपबन्धित है कि इस धारा (धारा 12) की कोई बात पट्टे की किसी ऐसी शर्त पर लागू न होगी जो लीज़धारी या उसके व्युत्पन्न अधिकाराधीन दावा करने वाले के फायदे के लिए हो।
अतः यदि लीज़ विलेख में ऐसी शर्त सम्मिलित है जो Lessor को प्राधिकृत करती है कि वह Lessee के दिवालिया होने की स्थिति में पट्टे का समपहरण कर सकेगा तथा Lessee वस्तुतः दिवालिया घोषित हो जाता है तो Lessor को यह अधिकार होगा कि वह Lessee को नोटिस देकर पट्टे का अवसान कर दे। अनेक बार Lessee दिवालिया होने से पूर्व अपनी लीज़धृति में हित अन्य को अन्तरित कर देता है उस स्थिति में लीज़ सम्पत्ति का समपहरण होगा या नहीं, यह प्रश्न उठ खड़ा होता है। इसका समाधान कलकत्ता हाईकोर्ट ने प्रस्तुत किया है।
इस मामले में लीज़ विलेख में यह शर्त उल्लिखित थी कि Lessee के दिवालिया होने पर Lessor लीज़ सम्पत्ति में पुनः प्रवेश कर सकेगा। पर Lessee के विरुद्ध पारित के निष्पादन में एक अन्य व्यक्ति ने Lessee का हित क्रय कर लिया। तत्पश्चात् Lessee दिवालिया घोषित हो गया। प्रश्न यह था कि क्या Lessor पट्टे का समपहरण कर सकेगा। परिस्थितियों के आधार पर कोर्ट ने यह निर्णत किया कि पट्टे की शर्त के प्रयोजनार्थ मामले की परिस्थितियों के आधार पर वस्तुतः वह अन्य व्यक्ति Lessee है न कि वह व्यक्ति जो दिवालिया घोषित किया गया है। चूंकि वह अन्य व्यक्ति दिवालिया घोषित नहीं किया गया है अतः Lessor समपहरण या जब्ती की कार्यवाही नहीं कर सकेगा।
यदि Lessor द्वारा नोटिस रजिस्टर्ड पत्र द्वारा Lessee के सही पते पर भेजी गयी है तो यह माना जाएगा कि नोटिस की प्रभावी ढंग से तामील की गयी है। यदि नोटिस की जाब्ती वापस Lessor को प्राप्त हो जाती है जिस पर किसी व्यक्ति के हस्ताक्षर हैं। यदि नोटिस सभी सहLesseeों को भेजी गयी थी और उनमें से एक सहLessee द्वारा नोटिस प्राप्त किए जाने की सूचना Lessor को प्राप्त हो जाती है। तो यह समझा जाएगा कि नोटिस सही पते पर भेजी गयी थी एवं नोटिस को सूचना सभी Lesseeों को हो गयी है।
साधारणतया एक Lessor तब तक वाद संस्थित करने के लिए सक्षम नहीं है जब तक कि वह जब्ती हेतु Lessee को नोटिस नहीं दे देता, क्योंकि तब तक Lessor एवं Lessee के सम्बन्ध बने रहते हैं। पट्टे का अवसान करने के लिए Lessor द्वारा दी गयी केवल एक नोटिस पर्याप्त है। द्वितीय नोटिस को आवश्यकता नहीं होती है नोटिस की तामील विधिक साक्ष्यों द्वारा साबित होनी चाहिए। Lessee के एक अंश के समनुदेशिती को इस आशय की नोटिस देने की आवश्यकता नहीं होती है।
यदि लीज़ विलेख में यह उपबन्धित है कि शर्त के भंग होने पर निष्कासन से पूर्व Lessee को विधि के अनुसार नोटिस देना होगा तो Lessee को तब तक बेदखल नहीं किया जा सकेगा जब तक के कि संविदा के अनुसार उसे नोटिस न दे दी गयी हो।
समय की समाप्ति द्वारा शाश्वत पट्टे का पर्यवसान- एक प्रकरण में Lessee मूलतः लीज़ सम्पत्ति पर आया था एक शाश्वत Lessee के रूप में 99 वर्ष की अवधि के लिए जो समय 1965 में समाप्त हो गया। इसके पश्चात् सरकार ने पट्टे का नवीकरण नहीं किया। फलतः पूर्विक लीज़ समाप्त हो गया एवं Lessor एवं Lessee का सम्बन्ध समाप्त हो गया। लीज़ की अवधि समाप्त होने के पश्चात् Lessee उक्त सम्पत्ति पर अतिचारी के रूप में विद्यमान था भले ही कनिष्ठ अधिकारियों ने Lessee से उक्त सम्पत्ति का किराया लेना जारी रखा हो।