जानिए हमारा कानून
क्या भारत का सुप्रीम कोर्ट अब जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्त रहने के अधिकार को मौलिक अधिकार मानता है?
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने M.K. Ranjitsinh बनाम Union of India (2024) मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया, जिसमें यह माना गया कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्त रहने का अधिकार भारतीय संविधान के तहत मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है।यह फैसला महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जीवन के अधिकार (Right to Life - Article 21) और समानता के अधिकार (Right to Equality - Article 14) की व्याख्या को और व्यापक बनाता है। इस निर्णय ने स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं...
क्या केवल गिरफ्तारी का कारण बताना पर्याप्त है या लिखित आधार देना ज़रूरी है?
सुप्रीम कोर्ट ने Prabir Purkayastha v. State (NCT of Delhi) (2024 INSC 414, दिनांक 15 मई 2024) में एक अहम फैसला दिया। यह निर्णय इस बात पर केंद्रित है कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय लिखित रूप (Written Form) में उसके गिरफ्तारी के आधार (Grounds of Arrest) बताना ज़रूरी है। यह मामला Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967 (UAPA) के तहत दर्ज हुआ था और इसमें संविधान (Constitution) के अनुच्छेद 20, 21 और 22 तथा Section 43B UAPA की व्याख्या की गई।अदालत ने साफ कहा कि “Reason for Arrest” और...
वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1981 की धारा 47-49 : राज्य बोर्डों का पर्यवेक्षण, विघटन और विलय
वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अध्याय VII में ऐसे महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल हैं जो राज्य बोर्डों के कामकाज पर सरकार के नियंत्रण को स्थापित करते हैं, जबकि यह भी सुनिश्चित करते हैं कि प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास बिना किसी रुकावट के जारी रहें। यह अध्याय राज्य बोर्ड को अधिकार से हटाए जाने (supersession), अन्य कानूनों के तहत गठित बोर्डों के साथ विलय (merger) और शक्तियों के हस्तांतरण (transfer) से संबंधित है।धारा 47 - राज्य बोर्ड को अधिकृत करने की राज्य सरकार की शक्ति (Power of...
पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 90, 91: सरकारी दस्तावेजों की छूट और निरीक्षण
आइए पंजीकरण अधिनियम, 1908 (Registration Act, 1908) के अंतिम भाग को समझते हैं, जो कुछ विशेष सरकारी दस्तावेजों को पंजीकरण की आवश्यकता से छूट देता है और उनके निरीक्षण की प्रक्रिया को निर्धारित करता है। यह धाराएं पंजीकरण प्रणाली के दायरे और सीमाओं को परिभाषित करती हैं।90. सरकार द्वारा या उसके पक्ष में निष्पादित कुछ दस्तावेजों की छूट (Exemption of certain documents executed by or in favour of Government)यह धारा उन विशिष्ट दस्तावेजों या नक्शों को सूचीबद्ध करती है जिन्हें पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होती।...
भारतीय प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 41-42 : महानिदेशक के कर्तव्य और आयोग के आदेशों का उल्लंघन
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) को प्रभावी ढंग से कार्य करने के लिए एक मजबूत और समर्पित जांच टीम की आवश्यकता होती है। यह भूमिका महानिदेशक (Director General - DG) द्वारा निभाई जाती है।भारतीय प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 41 महानिदेशक की शक्तियों और कर्तव्यों को परिभाषित करती है, जबकि धारा 42 यह सुनिश्चित करती है कि CCI द्वारा दिए गए आदेशों का उल्लंघन करने पर गंभीर परिणाम भुगतने पड़ें। ये दोनों धाराएं मिलकर CCI को एक शक्तिशाली और प्रभावी नियामक बनाती हैं, जो न केवल उल्लंघन की जांच कर सकता है, बल्कि...
The Indian Contract Act में Consideration के बगैर एग्रीमेंट
प्रतिफल के बिना भी कोई करार शून्य होता है यदि किसी करार में कोई प्रतिफल नहीं है तो ऐसी स्थिति में करार शून्य हो जाता है। इसके संबंध में अधिनियम की धारा 25 में उल्लेख किया गया है परंतु इसके कुछ अपवाद दिए गए। कुछ अपवादों को छोड़कर प्रतिफल के बिना किए गए करार शून्य होते हैं।जैसे ख को किसी प्रतिफल के बिना 1000 रूपये देने का क वचन देता है यह शून्य करार है।कामता प्रसाद बनाम अपर जिला जज द्वितीय मैनपुरी एआईआर 1996 इलाहाबाद 201 के प्रकरण में यह कहा गया है कि यदि कोई करार इस प्रकार का है कि वह प्रतिफल से...
The Indian Contract Act में Lawful Consideration का महत्व
किसी भी करार में विधिपूर्ण प्रतिफल का होना नितांत आवश्यक होता है। विधिपूर्ण प्रतिफल के साथ विधिपूर्ण उद्देश भी होना चाहिए। यदि किसी करार में विधिपूर्ण उद्देश्य नहीं होता है तथा विधिपूर्ण प्रतिफल का अभाव होता है तो उस करार को शून्य करार कहा जाता है अर्थात ऐसे करार का प्रारंभ से ही कोई अस्तित्व नहीं रहता है। यदि किसी करार के सक्षम पक्षकार नहीं होते हैं और किसी करार में स्वतंत्र सहमति नहीं होती है तो इस प्रकार के करार को व्यथित पक्षकार की इच्छा पर शून्यकरणीय कोर्ट द्वारा घोषित कर दिया जाता है परंतु...
The Indian Contract Act की धारा 18 और 20 के प्रावधान
भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 18 के अंतर्गत दुर्व्यपदेशन को परिभाषित किया गया है। किसी भी सहमति के स्वतंत्र सहमति होने के लिए उसमे दुर्व्यपदेशन नहीं होना चाहिए इसे सुझाव मात्र के रूप में नहीं होना चाहिए। इसे उन परिस्थितियों के अधीन होना चाहिए जहां बोलने का कर्तव्य हो।दुर्व्यपदेशन के अंतर्गत वह पक्ष शामिल है जो उस व्यक्ति की जिसे वह करता है उसकी जानकारी से समर्थित न हो। यदि वह व्यक्ति उसकी सत्यता में विश्वास करता है हालांकि कपट एवं दुर्व्यपदेशन इन दोनों में मिथ्या कथन के परिणामस्वरुप संविदा के...
The Indian Contract Act में कपट के बगैर ही सहमति फ्री मानी जाती है?
अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत स्वतंत्र सहमति की परिभाषा प्रस्तुत की गई है जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि सहमति कब फ्री मानी जाएगी। इस धारा में यह भी उल्लेख है कि किसी भी सहमति में कपट नहीं होना चाहिए। यदि किसी सहमति में कपट नहीं है तब ऐसी परिस्थिति में ही सहमति स्वतंत्र सहमति होती है।किसी भी व्यक्ति द्वारा जब जानबूझकर दुर्व्यपदेशन किया जाता है यह कपट हो जाता है। भारतीय संविदा अधिनियम के अंतर्गत धारा 17 में कपट की परिभाषा प्रस्तुत की गई है। इस परिभाषा के अंतर्गत मिथ्या कथन जिसका सत्य होने के रूप...
The Indian Contract Act में Free Concern तब बनती है जब उसमें Undue Influence नहीं हो
Undue Influence शब्द थोड़ा कठिन शब्द है परंतु किसी भी स्वतंत्र सहमति के लिए Undue Influence घातक होता है, इसे हिंदी में असम्यक असर कहा जाता है। कोई भी सहमति स्वतंत्र नहीं होती है यदि उसमें असम्यक असर का समावेश होता है। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 16 के अंतर्गत असम्यक असर को परिभाषित किया गया है।यदि संविदा असम्यक असर से पीड़ित है तो पीड़ित पक्षकार के विकल्प पर शून्यकरणीय होगी। असम्यक असर की अवधारणा प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति को कुछ बातें साबित करना होती।संविदा के पक्षकारों की स्थिति आपसी संबंध...
The Indian Contract Act में कोई Free Concern में Coercion नहीं होना
वैध संविदा के लिए स्वतंत्र सहमति आवश्यक गुण है। स्वतंत्र सहमति की परिभाषा भारतीय संविदा अधिनियम के अंतर्गत धारा 14 में प्रस्तुत की गई है। धारा 14 के अंतर्गत स्वतंत्र सहमति के गुणों का उल्लेख किया गया है। किसी भी वैध संविदा के लिए स्वतंत्र सहमति आवश्यक है।सम्मति का तात्पर्य वास्तविक सम्मति से है। इसे शुद्ध सम्मती भी कहते हैं। यदि यह स्वतंत्र या शुद्ध नहीं है तो यह संविदा को प्रतिकूल रूप में प्रभावित कर सकती है। इस प्रकार जब भी विधिमान्य संविदा का सृजन किया जाना तात्पर्य हो तो ऐसी स्थिति में...
पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 85 - 89: अप्रयुक्त दस्तावेजों का विनाश
पंजीकरण अधिनियम, 1908 (Registration Act, 1908) के भाग XV को समझते हैं, जिसमें विभिन्न प्रावधान (miscellaneous provisions) शामिल हैं। ये धाराएँ पंजीकरण प्रणाली से संबंधित कई महत्वपूर्ण और विविध मुद्दों को संबोधित करती हैं, जैसे अप्रयुक्त दस्तावेजों को नष्ट करना, अधिकारियों को कानूनी सुरक्षा, और सरकारी अधिकारियों द्वारा दस्तावेजों के पंजीकरण की विशेष प्रक्रिया।धारा 85. अप्रयुक्त दस्तावेजों का विनाश (Destruction of unclaimed documents)यह धारा अप्रयुक्त दस्तावेजों को नष्ट करने की अनुमति देती है।...
भारतीय प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 39: मौद्रिक दंडों के निष्पादन की प्रक्रिया
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) को प्रतिस्पर्धा-विरोधी व्यवहारों पर भारी मौद्रिक दंड (monetary penalties) लगाने की शक्ति प्राप्त है। हालाँकि, केवल जुर्माना लगाना ही पर्याप्त नहीं है; इसे प्रभावी ढंग से वसूल करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।भारतीय प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 39 (Section 39) इसी प्रक्रिया का विवरण देती है, यह सुनिश्चित करते हुए कि CCI द्वारा लगाए गए दंडों को सख्ती से लागू किया जाए। यह धारा CCI को जुर्माने की वसूली के लिए लचीले और शक्तिशाली तरीके प्रदान करती है। धारा 39: मौद्रिक दंड...
वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1981 की धारा 43 से 46: अपराधों का संज्ञान और न्यायिक सुरक्षा
वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1981, के तहत प्रदूषण के मामलों से निपटने के लिए एक विशिष्ट कानूनी प्रक्रिया स्थापित की गई है। अध्याय VII में, धारा 43 से 46 तक के प्रावधान यह सुनिश्चित करते हैं कि अपराधों का संज्ञान (cognizance) सही तरीके से लिया जाए, बोर्ड के सदस्यों को कानूनी सुरक्षा मिले, और उनकी कार्रवाई को नागरिक अदालतों (civil courts) में चुनौती न दी जा सके।धारा 43 - अपराधों का संज्ञान (Cognizance of Offences)यह धारा अदालतों को अधिनियम के तहत अपराधों का संज्ञान लेने की प्रक्रिया...
क्या Advocates को Consumer Protection Act के तहत “Deficiency in Service” के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम का विधायी उद्देश्य और दायरा (Legislative Intent and Scope of the Consumer Protection Act)सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले यह देखा कि Consumer Protection Act, 1986 और 2019 के पुनः लागू संस्करण में क्या विधायिका (Legislature) ने कभी यह इरादा जताया था कि इसमें Professions और Professionals द्वारा दी जाने वाली सेवाओं को शामिल किया जाए। State of Karnataka v. Vishwabharathi House Building Coop. Society, Common Cause v. Union of India और Lucknow Development Authority v. M.K. Gupta...
क्या जघन्य अपराध के मामलों में किशोर न्याय बोर्ड द्वारा प्रारंभिक मूल्यांकन की तीन माह की समयसीमा अनिवार्य है?
Child in Conflict with Law Through His Mother v. State of Karnataka (2024 INSC 387) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (Juvenile Justice Act, 2015) की कुछ महत्वपूर्ण धाराओं की व्याख्या की।इस मामले का मुख्य विवाद तथ्यों पर नहीं बल्कि इस बात पर था कि कानून में तय प्रक्रिया और समयसीमा का पालन न होने पर उसके क्या परिणाम होंगे, विशेषकर तब जब किसी बच्चे पर जघन्य अपराध (Heinous Offence) का आरोप हो और यह तय करना हो कि उसे वयस्क (Adult) के रूप में मुकदमे...
भारतीय प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 36-38 : आयोग की प्रक्रिया और आदेशों का संशोधन
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) एक विशेष नियामक निकाय (regulatory body) है जिसे भारतीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा (Competition) को बनाए रखने का महत्वपूर्ण कार्य सौंपा गया है।इस कार्य को प्रभावी ढंग से करने के लिए, CCI को न केवल व्यापक शक्तियां दी गई हैं, बल्कि उसे अपनी कार्यवाही (proceedings) को संचालित करने के लिए भी पर्याप्त स्वतंत्रता दी गई है। भारतीय प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 36 (Section 36) और धारा 38 (Section 38) इसी प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक ढांचे का वर्णन करती हैं, जो CCI के कामकाज की...
पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 81 - 84: दस्तावेज़ों का गलत पृष्ठांकन, प्रतिलिपि, अनुवाद या पंजीकरण करने पर दंड
आइए पंजीकरण अधिनियम, 1908 (Registration Act, 1908) के भाग XIV को समझते हैं, जो पंजीकरण प्रक्रिया में होने वाले अपराधों और उनके लिए निर्धारित दंडों से संबंधित है। यह भाग पंजीकरण प्रणाली की अखंडता (integrity) की रक्षा करता है और इसमें शामिल सभी पक्षों - अधिकारियों और नागरिकों - की जवाबदेही सुनिश्चित करता है।81. चोट पहुँचाने के इरादे से दस्तावेज़ों का गलत पृष्ठांकन, प्रतिलिपि, अनुवाद या पंजीकरण करने पर दंड (Penalty for incorrectly endorsing, copying, translating or registering documents with intent...
वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1981 की धारा 40-42 : कंपनियों और सरकारी विभागों द्वारा अपराध, और सद्भाव में की गई कार्रवाई का संरक्षण
वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1981 का यह अध्याय स्पष्ट करता है कि जब कोई अपराध किसी कंपनी, फर्म या सरकारी विभाग द्वारा किया जाता है, तो कौन जवाबदेह होगा। यह व्यक्तियों को जवाबदेह ठहराने के लिए कानूनी प्रक्रियाओं को परिभाषित करता है और अधिकारियों को सद्भाव (good faith) में की गई कार्रवाइयों के लिए सुरक्षा भी प्रदान करता है।धारा 40 - कंपनियों द्वारा अपराध (Offences by Companies)यह धारा इस बात को सुनिश्चित करती है कि जब कोई कंपनी या व्यावसायिक संस्था (business entity) अपराध करती है,...
The Indian Contract Act में Contract कौन कर सकता है?
The Indian Contract Act में Contract कौन कर सकता है संविदा करने के लिए सक्षम होने के संबंध में धारा 11 और 12 में प्रावधान दिए गए हैं। धारा 11 में यह बतलाया गया है कि कोई भी व्यक्ति जो प्राप्तवय हो जो स्वस्थचित्त हो और किसी विधि द्वारा संविदा करने से निर्योग्य न हो। एक्ट की धारा 11 और 12 संविदा करने की सक्षमता और स्वस्थ मस्तिष्क की स्थिति को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह धाराएँ न केवल पक्षकारों को शोषण से बचाती हैं, बल्कि संविदा की कानूनी वैधता को भी बनाए रखती हैं।...




















