Transfer Of Property Act में लीज खत्म होने पर संपत्ति के अतिधारण की Conditions

Himanshu Mishra

28 Feb 2025 4:21 PM

  • Transfer Of Property Act में लीज खत्म होने पर संपत्ति के अतिधारण की Conditions

    इस एक्ट की धारा 116 के अनुसार अतिधारण की दो शर्तें आवश्यक हैं।

    (1) Lesseeलीज़ के पर्यवसान के उपरान्त लीज़ सम्पत्ति का कब्जा धारण किये हो।

    (2) Lessor या उसका प्रतिनिधि Lesseeसे किराया स्वीकार करे या अन्यथा Lesseeको सम्पत्ति में बने रहने की अनुमति दे।

    इन शर्तों में यह प्रकल्पित है कि रेण्ट का भुगतान तथा इसको स्वीकृति ऐसे समय पर तथा इस प्रकार की जाये जो कब्जा चालू रखने हेतु लैण्डलार्ड को अनुमति के तुल्य हो" अन्यथा" शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि Lessor द्वारा रेण्ट की स्वीकृति Lesseeके कब्जे को जारी रखने हेतु सहमति है।

    Lesseeका सम्पत्ति में बने रहने का प्रश्न हो नहीं उठता जब तक कि पट्टे का पर्यवसान न हो जाये किराये का भुगतान एवं उसकी स्वीकृति ऐसे समय पर होनी चाहिए एवं इस प्रकार होनी चाहिए जो Lessor की सहमति के तुल्य हो तथा Lessor की सहमति कब्जा चालू रखने के लिए हो। यदि किराये का भुगतान ऐसे समय पर किया गया हो जबकि Lessor द्वारा सहमति देने का कोई प्रश्न न हो तथा किसी भी पक्षकार ने भुगतान के लिए इस प्रकार दी गयी सम्पति को भुगतान हेतु सम्मति के रूप में स्वीकार किया हो। यदि ऐसा नहीं है तो धारा 116 प्रवर्तित नहीं होगी।

    इस धारा को धारा 111 खण्ड (क) के साथ पढ़ा जाना चाहिए जो समय के अवसान द्वारा पट्टे के पर्यवसान से सम्बद्ध है। यह धारा Lessor एवं Lesseeके अधिकारों जैसा कि धारा 112 एवं 113 में उपबन्धित है, को प्रभावित नहीं करती है। इसमें उपबन्धित सिद्धान्त कृषि प्रयोजन हेतु पट्टों पर भी प्रभावी होगा।

    यह प्रावधान रेण्ट कन्ट्रोल अधिनियम के अन्तर्गत उत्पन्न होने वाले ऐसे विषयों पर लागू नहीं होगा जिनमें Lesseeके निष्कासन हेतु आदेश पारित हो चुका है, किन्तु उस आदेश के विरुद्ध अपील लम्बित है और इस स्थिति में लैण्डलार्ड, Lesseeद्वारा किराये के रूप में भेजा गया चैक स्वीकार करता है, तो Lesseeको कब्जा चालू रखने के लिए किसी नवीन अधिकार की आवश्यकता नहीं होगी। यदि सम्पत्ति का कब्जा धारक Lesseeनहीं है अपितु उपLesseeहै तो अतिधारण का सिद्धान्त लागू नहीं होगा।

    सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम की धारा 108 खण्ड (ञ) Lesseeको लीज़ सम्पत्ति को पूर्णतः या अंशत: उपपट्टे के रूप में अन्तरित करने की अनुमति देता है। यदि पट्टे के पर्यवसान पर Lessor यह पाता है कि कई उपLesseeसम्पत्ति धारण कर रहे हैं तथा उनमें से एक या कइयों से किराया स्वीकार करता है, तो धारा 116 का लाभ उपपट्टेदारों को प्राप्त होगा।

    धारा 107 से शासित पट्टे के मामले में यदि Lessor ने किराया स्वीकार नहीं किया है पट्टे के पर्यवसान के उपरान्त अथवा उसके द्वारा किया गया कोई करार कि पूर्विक Lesseeबगैर किसी नवीन पट्टे के निष्पादन के लीज़ सम्पत्ति का कब्जा धारण किये रहे, तो यह धारा प्रवर्तनीय नहीं होगी।

    एक टेनेन्ट ने अतिधारण द्वारा पट्टेदारी की माँग की। एक सहस्वामी ने Lesseeके निष्कासन हेतु वाद संस्थित किया। यह वाद अन्य सहस्वामियों को वाद का पक्षकार बनाये बिना पोषणीय है। यह इस सिद्धान्त पर आधारित है कि एक सहस्वामी का अधिकार अन्य सहस्वामियों के साथ सम्पूर्ण सम्पत्ति तक विस्तारित रहता है। अतः उसके द्वारा उठाया गया कोई भी कदम अन्य सहस्वामियों के लाभ के लिए भी होगा। पट्टेदारी के पर्यवसान के उपरान्त यदि पट्टेदार, लीज़ सम्पत्ति का कब्जा बिना लैण्डलाई को अनुमति के जारी रखता है तब ऐसा Lesseeकेवल एक अतिचारी होता है।

    अतः अतिचारों के विरुद्ध एक सहस्वामी द्वारा संस्थित होने वाले वाद से सम्बन्धित नियम, टेनेन्ट के विरुद्ध सहस्वामियों द्वारा संस्थित किये जाने वाले वाद पर प्रभावी होंगे। अर्थात् एक सहस्वामी अपने स्वयं के अधिकार के अध्यधीन बिना अन्य सहस्वामियों को बाद का पक्षकार बनाये लीज़ सम्पत्ति की वापसी हेतु वाद संस्थित कर सकेगा। परन्तु इस नियम का एक अपवाद है। जहाँ वाद संस्थित करने वाला सहस्वामी अन्य सहस्वामियों के अधिकारों को नकारते हुए एकान्तिक अधिकार का दावा करता है, तो वे सहस्वामी जिनके अधिकारों को नकारा गया है, वाद के आवश्यक पक्षकार होंगे तथा उनको पक्षकार न बनाया जाना, वाद के लिए घातक होगा।

    अतिधारण का सिद्धान्त पट्टे के पर्यवसान के उपरान्त अस्तित्व में आता है। सर्वप्रथम पट्टे का पर्यवसान आवश्यक है। इससे पूर्व यह सिद्धान्त प्रवर्तित नहीं हो सकेगा। इसी प्रकार यदि पूर्व रजिस्ट्रीकृत पट्टे के अन्तर्गत विकल्प का प्रयोग कर पट्टेदारी को जारी रखा जा रहा है तो यह सिद्धान्त प्रवर्तित नहीं होगा। दूसरे शब्दों में यह सिद्धान्त लागू नहीं होगा जहाँ Lesseeकब्जा जारी रखता है नवीकरण खण्ड अथवा अभिवर्धन खण्ड के अन्तर्गत जो मूल रजिस्ट्रीकृत पट्टे में विद्यमान थे।

    एक वाद में अपीलार्थी ने अपनी सम्पत्ति प्रति उत्तरदाता को 21 वर्ष की अवधि के लिए किराए पर दिया था और यह अवधि 29 फरवरी, 1984 को समाप्त हो रही थी। वादी ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से प्रतिवादी को नोटिस भेजा कि लीज़ कालावधि के समापन के फलस्वरूप 29 फरवरी, 1984 को समाप्त हो रहा है अतः प्रतिवादी वादी को सूचित करे कि किस तिथि को एवं किस समय लीज़ सम्पत्ति का कब्जा वह उसे संदत्त करेगा। किन्तु प्रतिवादी ने वादी को न कोई उत्तर दिया और न हो उसे सम्पत्ति का कब्जा प्रदान किया। इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने अभिनिर्णीत किया कि वादी न केवल लीज़ सम्पत्ति का कब्जा पाने का अधिकारी है अपितु भावी मध्यवर्ती लाभ पाने का भी अधिकारी है।

    कोर्ट ने यह भी अभिप्रेक्षित किया कि यदि Lesseeलीज़ की अवधि समाप्त होने के पश्चात् भी सम्पत्ति को अपने कब्जे में धारण किए रहता है तथा कोर्ट में किराया की रकम जमा करता है तो इस कृत्य से यह नहीं समझा जाना चाहिए कि मकान मालिक ने किराया स्वीकार कर लिया है।

    सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम की धारा 116 का लाभ पाने के लिए यह आवश्यक है कि किरायादार किराये का भुगतान सीधे मकान मालिक को करे या प्रस्तुत करे तथा मकान मालिक उसे स्वीकार करे। पट्टे के नवीकरण हेतु यह आवश्यक है कि पट्टे के दोनों पक्षकार एक मत के हों। पट्टे को अवधि के समापन के उपरान्त Lesseeका सम्पत्ति में बना रहना विधि सम्मत नहीं है। ऐसी स्थिति में यदि कोई प्राधिकारी (प्रस्तुत प्रकरण में आयकर अधिकारी) Lesseeको नोटिस जारी करता है तो इससे Lessor एवं Lesseeके बीच सम्बन्ध का न तो नवीनीकरण होगा और न ही नवीन सम्बन्ध स्थापित होगा।

    विभिन्न न्यायिक निर्णयों के आधार पर अतिधारण के सम्बन्ध में स्थिति को इस प्रकार सुस्पष्ट किया जा सकता है -

    "अभिव्यक्त संविदा के अतिरिक्त, पक्षकारों के आचरण निःसन्देह इस निष्कर्ष को न्यायोचित ठहराते हैं कि पट्टे के पर्यवसान के उपरान्त चाहे समय के अवसान से या अन्यथा, भूस्वामी Lesseeके साथ एक नवीन संविदा करता है, परन्तु क्या आचरण से ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकेगा सदैव प्रत्येक मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। किराये को अभिस्वीकृति (या वर्द्धित किराया) एक ऐसी परिस्थिति है जो अतिधारण द्वारा नवीन पट्टेदारी के दावे को समर्थन देती है।

    अतिधारण का सिद्धान्त वहाँ प्रवर्तनीय नहीं है जहाँ कि Lessor ने वाद संस्थित होने के पश्चात्अ पने खाते में जमा पैसे निकाल लिये तथा उन पैसों को वाद संस्थित होने के पश्चात् अपने खाते में जमा कर लिया। ऐसे मामले में अतिधारण का सिद्धान्त लागू नहीं होगा।

    लीज़ की अवधि के समापन के पश्चात् कब्जा-लीज़ की अवधि के समापन के पश्चात् एक Lesseeके लिए यह नहीं कहा जा सकता है कि वह विधित सम्पत्ति को धारण कर रहा है यदि ऐसा कब्जा अन्यथा संविधितः संरक्षित नहीं है, किन्तु उसे बलपूर्वक सम्पत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकेगा, चाहे वह दखल करने वाला व्यक्ति कितना ही उत्तम हित धारक क्यों न हो। उसका कब्जा न्यायिक कब्जा है जो अवैध बेदखली के विरुद्ध विधि द्वारा संरक्षित है, परन्तु स्वयमेव सदैव इसको तुलना विधिक कब्जा के साथ नहीं की जा सकेगी।

    लीज़ की अवधि के समापन के उपरान्त Lessor द्वारा किराया स्वीकार किया जाना युक्तियुक्ततः इस निष्कर्ष निकालने के लिए आधार प्रस्तुत करता है कि पट्टेदार, Lessor को सम्मति से निरन्तर कब्जा धारण किये हैं और Lessor की सम्मति से सम्पत्ति का कब्जा धारण किये हैं। अतः भाषानुभाषी प्रकृति के पट्टे का सृजन होगा।

    इस मामले में हुण्डई मोटर ने मोहन को-आपरेटिव इण्डस्ट्रियल इस्टेट, नई दिल्ली में एक सम्पत्ति पट्टे पर 3 वर्ष की अवधि के लिए लिया था। पट्टे की शर्तों के अन्तर्गत लीज़ नवीकृत हो सकता था। पुनः तीन वर्ष के लिए अन्तिम देय किराया पर 15% वृद्धि के साथ मोटर कम्पनी ने शर्तों के अनुसार पट्टे के नवीकरण हेतु Lessor को पत्र लिखा किन्तु Lessor ने यह जवाब दिया कि वह नवीकरण हेतु तैयार है यदि कम्पनी बाजार की दर पर किराया देने को तैयार हो।

    परन्तु मोटर कम्पनी इसके लिए तैयार नहीं हुई। मोटर कम्पनी पूर्ववर्ती लीज़ विलेख में उल्लिखित शर्तों के अनुसार ही नवीकरण पर अड़ी रही। पट्टे की अवधि के समापन के फलस्वरूप मोटर कम्पनी की स्थिति अतिधारण द्वारा Lesseeकी थी। दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने इन तथ्यों के आधार पर यह अभिनिर्धारित किया कि अतिधारण द्वारा Lesseeभी अपने कब्जे को बनाये रखने हेतु वाद संस्थित करने के लिए प्राधिकृत हैं।

    Lessor की सम्मति -

    एक अतिधारण के लिए Lessor की सम्मति आवश्यक है। सम्मति प्रत्यक्ष या विवक्षित भी हो सकेगी। यदि सम्पत्ति धारण का विरोध लम्बे अन्तराल तक नहीं किया जाता है, तो इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकेगा कि लैण्डलार्ड ने अपनी सम्मति दे दी है। जहाँ सम्पत्ति का लीज़ म्यूनिसिपल कार्पोरेशन द्वारा किया गया था।

    कालावधि के समापन के पश्चात् सम्पत्ति का किराया सहायक राजस्व अधिकारी द्वारा स्वीकार किया गया जबकि किराया आयुक्त द्वारा स्टैण्डिग कमेटी के अनुमोदन से स्वीकार किया जाना चाहिए था। इन तथ्यों पर यह अभिनिर्णीत हुआ कि अतिधारण द्वारा पट्टे का सृजन नहीं हुआ है। Lesseeकी बेदखली हेतु वाद संस्थित करने में हुए विलम्ब के फलस्वरूप यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकेगा कि धारणाधिकार हेतु Lessor की संस्तुति प्राप्त हो गयी थी। यह साबित होना आवश्यक है कि Lessor की प्रत्यक्ष सम्मति थी। Lessor की निष्क्रिय विफलता के कारण Lesseeके निष्कासन हेतु, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकेगा कि लीज़ सम्पत्ति के अतिधारण हेतु Lessor ने अपनी सम्मति प्रदान कर दी है।

    किन्तु यदि यह अन्तराल लम्बा है यथा 10 वर्ष का, तो यह निष्कर्ष निकाला जायेगा कि उसने निश्चयतः अपनी सम्मति प्रदान कर दी है तथा Lesseeको अतिचारी नहीं माना जायेगा Lessor द्वारा लीज़ अवधि के अवसान के तुरन्त बाद उस Lesseeके विरुद्ध निष्कासन हेतु कदम न उठाना इस बात का प्रतीक नहीं है कि Lessor ने उसे पट्टे को चालू रखने हेतु सम्मति दे दी है। कुछ अतिरिक्त दर्शित किया जाना आवश्यक है जैसे किराये की माँग लीज़ अवधि की समाप्ति के उपरान्त Lessor द्वारा किराये को माँग हेतु वाद संस्थित करना इस बात का संकेत है कि वह लीज़ की निरन्तरता को स्वीकार करता है।

    यदि Lessor ने चार से पाँच वर्ष तक अतिधारण के विरुद्ध अपना विरोध प्रकट किया तत्पश्चात् रेन्ट हेतु वाद संस्थित किया। यह अभिनिर्णीत हुआ कि वाद संस्थित किये जाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकेगा कि उसने अतिधारण हेतु अपनी सम्मति दे दी है। ऐसे मामले में भूस्वामी किराया वसूल करने के लिए प्राधिकृत नहीं होगा विशेषकर लीज़ को समाप्ति के उपरान्त।

    अतिधारण का प्रभाव - जब पट्टेदार, पट्टे की अवधि के पर्यवसान के बाद लीज़ सम्पत्ति अपने कब्जे में बनाये रखता है, तो उसे लीज़ सम्पत्ति को अतिधारित करता हुआ कहा जाता है, पर जैसा कि रैन्किन सी० जे० द्वारा गोपाल चन्द्र बनाम खटेर करिकरों के वाद में अभिप्रेक्षित किया था कि "पट्टे की अवधि के समापन के उपरान्त अतिधारण के कृत्य से निश्चयतः किसी भी प्रकार की पट्टेदारी का सृजन नहीं होता है" धारा के अभिव्यक्त प्रावधान से यह सुस्पष्ट है कि पट्टे की अवधि के समापन के उपरान्त लीज़ सम्पत्ति को अपने कब्जे में बनाये रखने मात्र से ही उसे अतिधारण द्वारा Lesseeबनने का अधिकार नहीं होगा, अपितु यह भी आवश्यक है कि इस प्रयोजन हेतु Lessor को सम्मति होनी चाहिए चाहे वह सम्मति किराया लेकर दी गयी हो अथवा अन्यथा।" यदि Lesseeभूस्वामी की सम्मति से सम्पत्ति का कब्जा धारण किये रहता है तो वह प्रथम दृष्टया इच्छाधारी Lesseeहैं। पर यदि Lesseeमूल पट्टे की अवधि के समापन के उपरान्त की अवधि के लिए किराये का भुगतान करता है तो यह माना जायेगा कि वह मात्र इच्छाजनित Lesseeनहीं है।

    यह कामन लॉ विधि है। धारा 116 यह प्रकल्पना करती है कि यदि Lesseeलीज़ सम्पत्ति का कब्जा चालू रखता है। तथा कब्जे की निरन्तरता को Lessor की सम्मति मिल जाती है तो विधि में यह निष्कर्ष निकाला जायेगा कि किसी तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में लीज़ भाषानुभाषी अथवा वर्षानुवर्षी आधार पर नवीकृत हुआ समझा जायेगा। कब्जे को चालू रखने हेतु सम्मति किराये की स्वीकृति द्वारा अथवा किसी अन्य कृत्य द्वारा अभिव्यक्त किया जा सकेगा। नवीकृत पट्टेदारी एक नवीन पट्टेदारी है।

    अतः एक नवीन पट्टेदारी तब उत्पन्न होती है जब कब्जे की निरन्तरता हेतु Lessor को सम्मति हो जो किराये की स्वीकृति या किसी अन्य कार्य द्वारा अभिव्यक्त हो। यहाँ यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि धारा 116 का शीर्षक अपने को प्रकट करता है “अतिधारण का प्रभाव" के रूप में, जबकि यह धारा वस्तुत: Lesseeद्वारा "अविधारण" के प्रभाव से सम्बन्धित है। भारतीय विधि में अतिधारण का यह प्रभाव है कि लीज़ भाषानुभाषो या वर्षानुवर्षी आधार पर Lessor को सम्मति से नवोकृत होता है, इस आधार पर कि किस प्रयोजन हेतु धारा 106 के अन्तर्गत पट्टे का सृजन हुआ था।

    Next Story