इलाहाबाद हाईकोट
कस्टडी मांगने वाली हेबियस कॉर्पस याचिका पर 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' की रोक नहीं, बच्चे के हित में रिट जारी की जा सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिंगल जज का आदेश रद्द किया, जिसमें एक मां की हेबियस कॉर्पस याचिका खारिज की गई थी। इस याचिका में मां ने पिता से अपने बच्चे की कस्टडी मांगी थी। कोर्ट ने कहा कि मां की याचिका को इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' के तहत उसके पास दूसरा कानूनी उपाय मौजूद था।ऐसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर यह बच्चे के सबसे अच्छे हित में हो तो रिट कोर्ट अपने असाधारण क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल कर सकती है।मामले की पृष्ठभूमि यह है कि मां ने एक हेबियस कॉर्पस याचिका के...
S. 482 CrPC | पहले से उपलब्ध, लेकिन छोड़े गए आधारों पर लगातार रद्द करने वाली याचिकाएं स्वीकार्य नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को एक आरोपी द्वारा उसी आपराधिक कार्यवाही के संबंध में दायर 'तीसरी' रद्द करने वाली याचिका खारिज की। इस याचिका में ऐसा आधार उठाया गया, जो पहले से उपलब्ध था, लेकिन उस समय नहीं उठाया गया।जस्टिस समित गोपाल की बेंच ने स्पष्ट रूप से फैसला दिया कि CrPC की धारा 482 के तहत लगातार दायर की गई ऐसी रद्द करने वाली याचिकाएं स्वीकार्य नहीं हैं, जिनमें उन आधारों पर आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई हो जो पहले से उपलब्ध थे।सिंगल जज ने टिप्पणी करते हुए कहा,"आवेदक द्वारा पिछली दो...
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पेमेंट ऑफ़ बोनस (संशोधन) अधिनियम, 2015 के पूर्वव्यापी (retrospective) लागू होने को सही ठहराया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पेमेंट ऑफ़ बोनस (संशोधन) अधिनियम, 2015 के पूर्वव्यापी रूप से लागू होने की वैधता को इस आधार पर सही ठहराया कि इस संशोधन से कर्मचारियों के लिए कोई नया अधिकार नहीं बनाया जा रहा था और न ही यह नियोक्ताओं के किसी मौजूदा अधिकार को कम कर रहा था।यह संशोधन अधिनियम, अधिनियम के तहत 'कर्मचारी' की पात्रता सीमा को उन लोगों से, जो अधिकतम 10,000 रुपये प्रति माह कमाते थे, बढ़ाकर उन लोगों तक कर देता है, जो 21,000 रुपये प्रति माह कमाते हैं। इसने पेमेंट ऑफ़ बोनस अधिनियम, 1965 की धारा 12 में भी...
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1999 के चारहरे हत्याकांड में माँ और उसके 'प्रेमी' के खिलाफ नाबालिग बेटों की गवाही के आधार पर सज़ा बरकरार रखी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को व्यक्ति की सज़ा और आजीवन कारावास बरकरार रखी। इस व्यक्ति ने 1999 में अपनी कथित प्रेमिका (सह-आरोपी, अब मृत) के साथ मिलकर एक क्रूर चारहरे हत्याकांड को अंजाम दिया था।जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस ज़फीर अहमद की बेंच ने 2 नाबालिग बच्चों की 'स्वाभाविक' और 'लगातार' गवाही पर काफी भरोसा किया। इन बच्चों ने अपराध को अपनी आँखों से देखा था और अपनी माँ (सह-आरोपी, अब मृत) और उसके कथित प्रेमी (अपीलकर्ता) के खिलाफ गवाही दी थी।अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, 18 और 19 मई, 1999 की...
राहुल गांधी की नागरिकता विवाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने से किया इनकार, FIR की मांग पर सुनवाई जारी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि वह आरोपों की सच्चाई की जांच नहीं करेगा और न ही गृह मंत्रालय के रिकॉर्ड की पड़ताल करेगा।यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें लखनऊ ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें राहुल गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने से इनकार किया गया था।याचिकाकर्ता एक राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। उसने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने ब्रिटिश नागरिकता ली थी और इस संबंध में विभिन्न...
'कोई अपराधी इरादा नहीं', पति के खिलाफ सिर्फ़ 'झूठे' केस दर्ज करना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दी पत्नी को राहत
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी पत्नी और उसके रिश्तेदारों को उसके पति की आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी सिर्फ़ इसलिए नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उन्होंने वैवाहिक विवाद को लेकर उसके खिलाफ केस दर्ज कराए।कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ केस दर्ज कराने से, भले ही वे झूठे होने का आरोप हो, IPC की धारा 306 के तहत अपराध साबित करने के लिए ज़रूरी 'Mens Rea' (अपराधी इरादा) साबित नहीं होता।समीर जैन की बेंच ने इस तरह पत्नी और उसके परिवार वालों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड में...
वकीलों के लिए व्यापक मेडिकल इंश्योरेंस योजना बनाने का मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए दर्ज की PIL
एक अहम कदम उठाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका (PIL) दर्ज करने का निर्देश दिया, ताकि पूरे उत्तर प्रदेश राज्य में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के लिए एक व्यापक इंश्योरेंस योजना बनाने की संभावनाओं को तलाशा जा सके।यह कदम तब उठाया गया, जब कोर्ट ने ऐसे कई मामले देखे जिनमें वकीलों को गंभीर और जानलेवा मेडिकल इमरजेंसी के दौरान इलाज करवाने में भारी आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा।जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मनजीव शुक्ला की बेंच ने यह आदेश 2024 में दायर एक PIL...
'जांच में गंभीर चूक': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग के रेप के मामले में 11 साल जेल में बिताने वाले व्यक्ति को बरी किया
इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने हाल ही में ऐसे व्यक्ति को बरी किया, जिसने 2010 के एक मामले में, जिसमें 14 साल की लड़की के साथ रेप का आरोप था, 11 साल जेल में बिताए। बेंच ने टिप्पणी की कि पुलिस ने एक "गंभीर चूक" की थी, क्योंकि वे पीड़िता के शरीर पर मिले मानव वीर्य (semen) का मिलान आरोपी से करने में नाकाम रहे थे।जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस बृज राज सिंह की बेंच ने 2018 के उस ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें अपीलकर्ता को IPC की धारा 376 के तहत आजीवन कारावास और 50,000 रुपये के जुर्माने की सज़ा...
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़र्ज़ी PhD धोखाधड़ी FIR में राहत से किया इनकार, 'रिश्वत से कुछ भी खरीदा जा सकता है' पर लगाई फटकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में आम लोगों के बीच बढ़ती इस धारणा पर कड़ी आपत्ति जताई कि रिश्वत देकर कुछ भी खरीदा जा सकता है, जिसमें अकादमिक डिग्रियां और यूनिवर्सिटी की नौकरियां भी शामिल हैं।जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने इस तरह महिला के खिलाफ FIR रद्द करने से इनकार किया। इस महिला पर एक उम्मीदवार से PhD डिग्री और असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी दिलाने के बहाने ₹22 लाख से ज़्यादा की धोखाधड़ी करने का आरोप है।एक सख़्त आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि FIR में लगाए गए आरोप समाज में एक बहुत...
इनक्वेस्ट रिपोर्ट में आरोपी का नाम जरूरी नहीं, सिर्फ मौत का कारण दर्ज करना उद्देश्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 194 के तहत तैयार की जाने वाली इनक्वेस्ट रिपोर्ट का उद्देश्य केवल मृत्यु के प्रथमदृष्टया कारण और चोटों का विवरण दर्ज करना है, न कि आरोपी का नाम लिखना।जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने यह टिप्पणी हत्या के आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए की।मामले में आरोपी ने दलील दी थी कि उसे एक अंधे हत्या मामले में झूठा फंसाया गया। प्रारंभिक पुलिस डायरी और अस्पताल रिकॉर्ड में हमलावर को अज्ञात बताया गया। आरोपी की ओर से यह भी...
करंट हादसे में बिजली विभाग की सख्त जिम्मेदारी, लापरवाही साबित करना जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि करंट लगने (इलेक्ट्रोक्यूशन) के मामलों में बिजली विभाग की सख्त जिम्मेदारी तय होती है और पीड़ित को मुआवजा पाने के लिए विभाग की लापरवाही साबित करने की आवश्यकता नहीं है।जस्टिस संदीप जैन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया,“ऐसे मामलों में सख्त जिम्मेदारी का सिद्धांत लागू होता है और वादी को यह साबित करने की जरूरत नहीं कि बिजली लाइन के रखरखाव में विभाग के कर्मचारियों की लापरवाही थी। उसे केवल यह साबित करना है कि उसे करंट से चोट लगी।”मामला एक मजदूर से जुड़ा था,...
लोन की समयपूर्व वसूली विवाद में सिविल कोर्ट का अधिकार नहीं, केवल NCLT ही करेगा फैसला: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम निर्णय देते हुए कहा कि लोन की समयपूर्व वसूली (प्रीमैच्योर रिपेमेंट) से जुड़े विवादों का निपटारा सिविल अदालत नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में अधिकार केवल राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) को है।जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने कहा कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 430 स्पष्ट रूप से सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र पर रोक लगाती है, जहां मामला NCLT के अधिकार क्षेत्र में आता है।अदालत ने कहा, “जहां किसी मामले का निर्णय NCLT द्वारा किया जाना है वहां किसी भी अदालत को हस्तक्षेप करने या...
वैवाहिक विवाद से जुड़े मामूली आपराधिक मामले के आधार पर नौकरी से इनकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि केवल वैवाहिक विवाद से जुड़े आपराधिक मामले के लंबित होने के आधार पर किसी अभ्यर्थी को नौकरी देने से इनकार नहीं किया जा सकता।जस्टिस करुणेश सिंह पवार की पीठ ने स्पष्ट किया कि सामान्य और अस्पष्ट आरोपों वाले ऐसे मामलों को नियुक्ति से वंचित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।अदालत ने कहा,“वैवाहिक विवाद से उत्पन्न सामान्य आरोपों पर आधारित आपराधिक मामले का लंबित होना याचिकाकर्ता को नियुक्ति देने से इनकार करने का वैध आधार नहीं है।”मामले में याचिकाकर्ता ने...
वकीलों के आपसी विवाद में ट्रिब्यूनल का हस्तक्षेप अस्वीकार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 से जुड़े मुआवजा मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि वकीलों के आपसी विवाद में ट्रिब्यूनल का हस्तक्षेप बिल्कुल भी उचित नहीं है।मामले में वर्ष 2019 में लोक अदालत के आदेश के बावजूद याचिकाकर्ता को अब तक मुआवजा राशि नहीं मिली थी। वर्ष 2026 में MACT सुल्तानपुर के पीठासीन अधिकारी ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता के पूर्व वकील को सुने बिना राशि जारी नहीं की जा सकती। इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।जस्टिस जसप्रीत...
दिल्ली स्थित ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती देने का अधिकार उसी क्षेत्र के हाईकोर्ट को: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि नई दिल्ली स्थित सशस्त्र बल ट्रिब्यूनल (प्रधान पीठ) के आदेशों को चुनौती देने का अधिकार उसी क्षेत्राधिकार वाले हाईकोर्ट को है, न कि किसी अन्य हाईकोर्ट को।चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की पीठ ने कहा कि जब आदेश नई दिल्ली स्थित ट्रिब्यूनल की प्रधान पीठ द्वारा पारित किया गया तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के पास ऐसे आदेश को सुनने का क्षेत्राधिकार नहीं है।खंडपीठ ने कहा, “जब विवादित आदेश नई दिल्ली की प्रधान पीठ से पारित हुआ तो...
इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: धोखाधड़ी और आपराधिक न्यासभंग साथ-साथ लग सकते हैं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक ही मामले में 'धोखाधड़ी' और 'आपराधिक न्यासभंग' जैसे अपराध एक साथ लगाए जा सकते हैं, यदि परिस्थितियों से यह स्पष्ट न हो कि वास्तव में कौन सा अपराध बना है।जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए आरोपी की जमानत याचिका खारिज की, जिस पर स्वयं सहायता समूह की गरीब महिलाओं से पैसा लेकर हड़पने का आरोप था।अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (आपराधिक न्यासभंग) को एक साथ लगाने...
म्यूटेशन कार्यवाही में नहीं तय होगा मालिकाना हक: इलाहाबाद हाईकोर्ट का स्पष्ट निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि म्यूटेशन (नामांतरण) की कार्यवाही का उद्देश्य संपत्ति के मालिकाना हक का फैसला करना नहीं है। ऐसे विवादों का समाधान केवल सिविल कोर्ट में ही किया जा सकता है।जस्टिस जे.जे. मुनीर ने यह फैसला सुनाते हुए नायब तहसीलदार के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें 34 साल बाद दायर नामांतरण निरस्तीकरण की अर्जी को खारिज कर दिया गया।अदालत ने कहा,“याचिकाकर्ता और प्रतिवादी के बीच का विवाद जटिल मालिकाना हक से जुड़ा है, जिसे म्यूटेशन अधिकारी तय नहीं कर सकते।”मामले में...
मृत व्यक्ति के खिलाफ अपील दाखिल करने पर फटकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार की अपील खारिज की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर लापरवाही का मामला सामने आने पर उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने उस अपील को खारिज किया, जो सरकार ने ऐसे व्यक्ति के खिलाफ दाखिल की थी, जिसकी पहले ही मृत्यु हो चुकी है और उसके कानूनी वारिसों को पक्षकार भी नहीं बनाया गया।जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि राज्य की ओर से अपील दाखिल करने में घोर लापरवाही बरती गई और केवल यह कहकर देरी को माफ नहीं किया जा सकता कि अपील दाखिल करने की अनुमति देर से मिली।अदालत ने टिप्पणी की,“राज्य की ओर से मृत प्रतिवादी के खिलाफ अपील दाखिल...
हैबियस कॉर्पस का इस्तेमाल पति को पेश कराने के लिए नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि मेंटेनेंस (भरण-पोषण) के मामले में वारंट से बच रहे पति को कोर्ट में पेश कराने के लिए हैबियस कॉर्पस याचिका का उपयोग नहीं किया जा सकता।जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में संबंधित फैमिली कोर्ट को ही आवश्यक कठोर (coercive) कदम उठाने का अधिकार है।मामला क्या था?आजमगढ़ की फैमिली कोर्ट ने जनवरी 2021 में पति को पत्नी और बेटी को भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। लेकिन पति भुगतान से बच रहा था और उसके खिलाफ वारंट जारी होने के...
ग्रांट-इन-एड संस्थानों में कार्यरत कार्यवाहक प्रिंसिपल को मिलेगा समान वेतन, लेकिन पद पर बने रहने का अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि ग्रांट-इन-एड (अनुदानित) संस्थानों में कार्यरत कार्यवाहक (ऑफिसिएटिंग) प्रिंसिपल को नियमित प्रिंसिपल के बराबर वेतन दिया जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय तक इस पद पर कार्य करने से उन्हें केवल वेतन का अधिकार मिलेगा, पद पर बने रहने का नहीं।जस्टिस सुमित्रा दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने कहा कि जब कोई शिक्षक प्रिंसिपल के रूप में कार्य करता है और अधिक जिम्मेदारियां निभाता है, तो उसे उसी के...















