इलाहाबाद हाईकोट

शिक्षा मित्र प्री-TET इन-सर्विस शिक्षकों के बराबर होने का अधिकार नहीं, उन्हें बाहर रखना अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि इन-सर्विस शिक्षकों (सेवा में पहले से मौजूद शिक्षकों) के लिए आयोजित 'स्पेशल टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट' (Special TET) से शिक्षा मित्रों को बाहर रखना भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन नहीं है।कोर्ट ने कहा कि जब 'टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट' (TET) अनिवार्य किया गया, तब जो शिक्षक पहले से सेवा में थे, वे एक अलग श्रेणी (class) में आते हैं। 'स्पेशल TET' अंतरिम उपाय है, जो उस श्रेणी के शिक्षकों को वह योग्यता हासिल करने में मदद करता है, जो सेवा में आने के बाद उन पर लागू...

S. 16(1) UP Gangsters Act: अटैच की गई प्रॉपर्टी रिलीज़ करने की अर्ज़ी खारिज करने के बाद मामला कोर्ट भेजेगा डीएम: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि 'गैंगस्टर्स एक्ट' के तहत अटैच की गई प्रॉपर्टी को रिलीज़ करने की अर्ज़ी खारिज करने के बाद डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM) को 'उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1986' की धारा 16(1) के तहत मामला सक्षम कोर्ट को भेजना होगा।जस्टिस अजय भनोट और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की बेंच ने फ़िरोज़ाबाद के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट का वह आदेश रद्द करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें अटैच की गई प्रॉपर्टी को रिलीज़ करने की अर्ज़ी खारिज की गई थी।कोर्ट ने गौर किया कि धारा...

बाद में रोक को कुछ समय के लिए टालने से बोली लगाने वाला व्यक्ति बोली की तय तारीख पर योग्य नहीं हो जाता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर टेंडर डॉक्यूमेंट में यह कहा गया कि बोली की तय तारीख पर सरकारी रोक (Debarment) होने पर कोई कंपनी बोली लगाने के लिए अयोग्य होगी, तो बाद में उस रोक को कुछ समय के लिए टालने (Abeyance) का आदेश केवल उसी तारीख से लागू होता है, जिस दिन वह पास किया गया हो; यह आदेश पिछली तारीख से लागू होकर बोली लगाने वाले को तय तारीख पर योग्य नहीं बनाता।'रिक्वेस्ट फॉर प्रपोज़ल' (RFP) के क्लॉज़ 2.1.18 में यह प्रावधान है कि अगर किसी कंपनी को केंद्र या राज्य सरकार, या उनके नियंत्रण वाली किसी...

ज़िला जज LARRA के अवॉर्ड को 'डिक्री' की तरह लागू कर सकते हैं, लेकिन मेरिट के आधार पर आपत्तियों पर विचार नहीं कर सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'ज़मीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' के तहत 'ज़मीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन प्राधिकरण' (LARRA) का अवॉर्ड एक 'डीम्ड डिक्री' (मान ली गई डिक्री) होता है, जिसे ज़िला अदालत लागू कर सकती है।जस्टिस जसप्रीत सिंह ने कहा कि इसे लागू करने वाली ज़िला अदालत केवल इसे लागू करने वाली एजेंसी के तौर पर काम करती है और अवॉर्ड के मेरिट पर आपत्तियों पर विचार नहीं कर सकती या उसके पीछे नहीं जा सकती, चाहे वह 'सिविल प्रक्रिया...

बेटे के बिज़नेस के लिए बेदखली का आधार बनने पर मकान-मालिक का खुद उस जगह पर रहना ज़रूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश रेगुलेशन ऑफ़ अर्बन प्रेमिसेस टेनेंसी एक्ट, 2021 की धारा 21(2)(m) के पहले हिस्से में "मकान-मालिक को ज़रूरत है" (Required by Landlord) वाक्यांश का मतलब यह नहीं है कि मकान-मालिक का खुद उस जगह पर कब्ज़ा या रहना ज़रूरी है।कोर्ट ने कहा कि अगर मकान-मालिक के बेटे का बिज़नेस शुरू करने या चलाने के लिए मौजूदा हालत में ही उस जगह की ज़रूरत है तो इस दावे को सिर्फ़ इसलिए शुरू में ही खारिज नहीं किया जा सकता कि असल में बेटा उस जगह का इस्तेमाल करेगा, न कि मकान-मालिक।कोर्ट ने यह...

बिना चुनौती वाले सैलरी पेमेंट के आदेश से जाली मंज़ूरी पर आधारित नियुक्ति सही नहीं ठहराई जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सैलरी पेमेंट का प्रशासनिक आदेश सरकारी खजाने से सैलरी पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं देता, भले ही उस आदेश को कभी चुनौती न दी गई हो या रद्द न किया गया हो, अगर वह मंज़ूरी का आदेश जिस पर नियुक्ति आधारित है, बाद में जाली पाया जाता है।कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक आदेश की अंतिम प्रकृति (Finality) उस आधार की वैधता से अलग है जिस पर सरकारी खजाने के खिलाफ़ कोई आर्थिक दावा किया जाता है।जस्टिस मंजू रानी चौहान ने कहा,“किसी ऐसे दस्तावेज़ पर आधारित अधिकार को बनाए रखने के लिए अंतिम...

बालिग बेटी को उसकी मर्ज़ी के खिलाफ साथ रखने के लिए 'हेबियस कॉर्पस' का सहारा नहीं ले सकते माता-पिता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि माता-पिता अपनी बालिग बेटी को उसकी साफ़ ज़ाहिर की गई इच्छा के खिलाफ़ अपने साथ रहने के लिए मजबूर करने के लिए 'हेबियस कॉर्पस' की रिट का इस्तेमाल नहीं कर सकते।हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई बालिग व्यक्ति सोच-समझकर और अपनी मर्ज़ी से यह चुनता है कि उसे कहां रहना है, तो उसकी आज़ादी और फ़ैसला लेने की स्वतंत्रता को उचित सम्मान मिलना चाहिए।जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने कलावती देवी द्वारा दायर 'हेबियस कॉर्पस' याचिका खारिज करते हुए यह बात कही। कलावती देवी ने अपनी बेटी (कुमारी पूजा) को...

जौनपुर कस्टोडियल डेथ 2021: हाईकोर्ट ने खारिज की 4 आरोपी पुलिसकर्मियों की ज़मानत अर्ज़ी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को 2021 के जौनपुर कस्टोडियल डेथ (पुलिस हिरासत में मौत) मामले में आरोपी उत्तर प्रदेश पुलिस के 4 कर्मियों की ज़मानत अर्ज़ियां खारिज कीं।अपने 95 पन्नों के आदेश में जस्टिस समित गोपाल ने CBI की चार्जशीट में लगाए गए आरोपों का ज़िक्र किया। इन आरोपों के मुताबिक, आरोपी पुलिसकर्मियों ने मृतक कृष्ण कुमार यादव उर्फ पुजारी से जुर्म कबूलवाने के लिए उन्हें गंभीर चोटें पहुंचाईं और बाद में ऐसी चोटें देकर उनकी हत्या की, जिनसे मौत हो सकती थी।CBI ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी मौत को...

किराया हर महीने देना हो तो अपील के समय किया गया 50% प्री-डिपॉज़िट काफ़ी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर जिस आदेश के खिलाफ अपील की जा रही है, उसमें हर महीने किराया देने की ज़िम्मेदारी तय की गई है तो 'उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021' की धारा 35(1) के प्रावधान के तहत ज़रूरी 50% प्री-डिपॉज़िट (अपील से पहले जमा की जाने वाली रकम) अपील दाखिल करते समय जमा की गई रकम से पूरी नहीं हो जाती।कोर्ट ने कहा कि अपील लंबित रहने के दौरान जो रकम देनी बनती है, उस पर भी यह शर्त लागू रहती है और अपीलीय अदालत उन्हें जमा करने का निर्देश दे सकती है।धारा 35(1) के...

बिक्री की रकम को लेकर विवाद से रजिस्टर्ड सेल डीड अमान्य नहीं होती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि खरीदार द्वारा बिक्री की रकम के भुगतान को लेकर हुए विवाद के आधार पर ही 'ट्रांसफर ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882' की धारा 54 के तहत किसी रजिस्टर्ड सेल डीड को अमान्य घोषित नहीं किया जा सकता।कोर्ट ने कहा कि जिस विक्रेता को भुगतान न मिलने की शिकायत है, उसे पैसे की वसूली के लिए मुकदमा करना चाहिए, न कि इस आधार पर सेल डीड रद्द करवाना चाहिए।'ट्रांसफर ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882' की धारा 54 बिक्री को इस तरह परिभाषित करती है: कीमत के बदले मालिकाना हक का ट्रांसफर, चाहे वह कीमत चुका दी गई...

जब नियम डिग्री की समानता के बारे में कुछ न कहें तो रिट कोर्ट एकेडमिक एक्सपर्ट की तरह फैसला नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी पद के लिए योग्यता तय करने वाले सर्विस नियमों में समकक्ष (बराबर) डिग्री पर विचार करने का कोई प्रावधान नहीं है तो रिट कोर्ट यह तय नहीं कर सकता कि नियमों में न बताई गई कोई डिग्री, तय की गई डिग्री के बराबर है या नहीं।कोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कोर्ट ऐसी समानता तय करने के लिए एकेडमिक एक्सपर्ट की भूमिका नहीं निभा सकता।जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने कहा,“यह कोर्ट यह कहने को मजबूर है कि इस मामले को नियंत्रित...

प्राइवेट ट्रस्ट द्वारा टीचर को नौकरी से निकालने के खिलाफ़ रिट याचिका स्वीकार्य नहीं, विवाद कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रस्ट द्वारा चलाए जा रहे प्राइवेट बिना सरकारी मदद वाले (Unaided) शिक्षण संस्थान द्वारा किसी टीचर को नौकरी से निकालने के खिलाफ़ संविधान के आर्टिकल 226 के तहत रिट याचिका स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने माना कि यह विवाद पूरी तरह से नियोक्ता (Employer) और कर्मचारी (Employee) के बीच कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा मामला है।प्राइवेट संस्था के रिट अधिकार क्षेत्र (Writ Jurisdiction) के दायरे में आने और उसके खिलाफ़ किसी खास दावे की स्वीकार्यता के बीच अंतर करते हुए जस्टिस मंजू रानी चौहान ने...

अगर पति कमाने में सक्षम है तो नौकरी न होना या बिज़नेस खराब चलना पत्नी को गुज़ारा-भत्ता न देने का आधार नहीं हो सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर पति कमाने में सक्षम है तो वह यह कहकर अपनी पत्नी का गुज़ारा-भत्ता देने की ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता कि उसके पास नौकरी नहीं है या उसका बिज़नेस अच्छा नहीं चल रहा है।जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की बेंच ने कहा कि ऐसे तर्क सिर्फ़ "बेबुनियाद बहाने" हैं और "कानून में इनकी कोई मान्यता नहीं है"।कोर्ट ने यह टिप्पणी एक पति द्वारा दायर क्रिमिनल रिविज़न याचिका ख़ारिज करते हुए की। पति ने उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे CrPC की धारा 125 के तहत अपनी पत्नी को हर महीने ₹3,500...

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी के गुज़ारा-भत्ते में हर साल 10% बढ़ोतरी के फ़ैमिली कोर्ट के आदेश की तारीफ़ की, कहा- नई सोच
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में फ़ैमिली कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें पत्नी के मासिक अंतरिम गुज़ारा-भत्ते में हर साल 10% बढ़ोतरी का प्रावधान था। कोर्ट ने इस सोच को "नई सोच" (इनोवेटिव थॉट) बताया।जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की बेंच ने इस आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि यह "बहुत हैरानी की बात" है कि हाई कोर्ट को ऐसा नया विचार पहले नहीं आया।बेंच ने तर्क दिया कि महंगाई हर साल लगभग 10% बढ़ रही है। अगर गुज़ारा-भत्ते की रकम तय रहती है, तो आश्रित पत्नी और बच्चों को समय के साथ अपनी बुनियादी...

'ध्वनि प्रदूषण एक खतरा बनता जा रहा है': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तेज़ आवाज़ वाले DJ के बीच स्कूल की छात्रा की मौत पर स्वतः संज्ञान लिया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को शोर प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान लेते हुए नई जनहित याचिका (PIL) दर्ज की। यह कदम बलरामपुर में दूसरी कक्षा की छात्रा की मौत की घटना का संज्ञान लेने के बाद उठाया गया; आरोप है कि जब पास से लाउडस्पीकर और म्यूज़िक सिस्टम के साथ एक जुलूस गुज़र रहा था, तब वह छात्रा अपनी क्लास में गिर पड़ी थी।जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने प्रेशर हॉर्न, मॉडिफाइड साइलेंसर और हूटर के गलत इस्तेमाल से जुड़ी लंबित PIL पर सुनवाई करते हुए रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह इस घटना और...

अनुशासनात्मक जांच के दौरान अंतरिम स्तर पर वकीलों को सस्पेंड नहीं कर सकती बार काउंसिल: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के पास अनुशासनात्मक जांच लंबित रहने के दौरान अंतरिम स्तर पर वकीलों को सस्पेंड करने का अधिकार नहीं है।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35(3)(c) (दुर्व्यवहार के लिए वकीलों को सज़ा) के तहत सस्पेंशन अंतिम आदेश है, जिसे अनुशासनात्मक कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान पारित नहीं किया जा सकता।जस्टिस शेखर बी सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब उन्होंने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की अनुशासनात्मक समिति के...

1994 के अंतरिम आदेश का पालन नहीं किया गया: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जानकारी न देने पर राज्य पर लगाया ₹1 लाख का जुर्माना
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते राज्य पर ₹1,00,000 का जुर्माना लगाया। यह जुर्माना काउंटर एफिडेविट दाखिल करने में 3 दशकों से ज़्यादा की बिना वजह देरी और अंतरिम आदेश का पालन न होने की बात कोर्ट के ध्यान में न लाने के लिए लगाया गया। साथ ही रिट याचिका को मेरिट के आधार पर खारिज भी किया गया।जस्टिस गरिमा प्रसाद ने कहा:"राज्य इस चूक के लिए अपनी ज़िम्मेदारी से सिर्फ़ इसलिए नहीं बच सकता, क्योंकि याचिकाकर्ता अपना मुख्य दावा साबित करने में नाकाम रहा है। इतनी लंबी देरी के कारण कोर्ट को संबंधित अधिकारियों...

टैंकर में खतरनाक पदार्थ था यह साबित किए बिना बीमा कंपनी लाइसेंस की कमी का हवाला नहीं दे सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना के मुआवजे से जुड़ी जिम्मेदारी से बीमा कंपनी केवल यह कहकर बच नहीं सकती कि चालक के ड्राइविंग लाइसेंस पर खतरनाक या जोखिमपूर्ण पदार्थों के परिवहन की अनुमति संबंधी विशेष प्रविष्टि नहीं थी। इसके लिए बीमा कंपनी को पहले यह साबित करना होगा कि दुर्घटना के समय टैंकर में वास्तव में वही पदार्थ ले जाया जा रहा था, जिसे केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के तहत खतरनाक पदार्थ की श्रेणी में रखा गया।जस्टिस प्रशांत कुमार ने कहा,“केवल इस आधार पर कि टैंकर में स्पिरिट ले जाई जा रही...

OMR शीट में गलती पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राहत देने से किया इनकार, कहा- परीक्षा निर्देशों का सख्ती से पालन जरूरी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने OMR शीट भरने में परीक्षा निर्देशों का पालन नहीं करने वाली अभ्यर्थी को राहत देने से इनकार किया। हाईकोर्ट ने कहा कि OMR शीट भरने के संबंध में जारी निर्देश अनिवार्य हैं और उनमें गलती होने पर बाद में हाथ से शीट की जांच कराने की अनुमति नहीं दी जा सकती।जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने कहा कि यदि इस तरह की रियायत बाद में दी जाती है तो इससे परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठ सकते हैं। इसलिए OMR शीट का हाथ से मूल्यांकन कराने की अनुमति नहीं दी जा सकती।मामले में...

'आरोपी पर दबाव बनाने के लिए भाई को थाने में रखा': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ₹40,000 मुआवजा देने का आदेश दिया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पुलिस किसी आरोपी पर दबाव बनाने या उसे सरेंडर करने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से उसके परिवार के किसी निर्दोष सदस्य को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं रख सकती। ऐसा करना व्यक्ति की स्वतंत्रता से गैरकानूनी वंचना है और इसके लिए पीड़ित व्यक्ति मुआवजे का हकदार है।जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने यह टिप्पणी अरविंद कुमार यादव की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिका में प्रयागराज के जॉर्ज टाउन...
