इलाहाबाद हाईकोट
यूपी ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम की धारा 122-B (4-F) की शर्तें पूरी होने पर भी भूमिधर का दर्जा नहीं बदला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फिर से दोहराया कि अगर यूपी ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम की धारा 122-B (4-F) के तहत दी गई शर्तें पूरी होती हैं तो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति (जैसा भी मामला हो) से संबंधित मज़दूर को उस ज़मीन का भूमिधर माना जाएगा, और किसी भी अधिकारी द्वारा इस भूमिधरी की समीक्षा नहीं की जा सकती।यूपी ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम की धारा 122-B(4-F) में यह प्रावधान है कि जहां कोई भी कृषि मज़दूर, जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है, 13.05.2007 से पहले से ही...
दीवानी मामलों के लिए पुलिस के पास जाने की प्रवृत्ति कानून के शासन को कमज़ोर करती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'दिखावटी' FIRs की कड़ी आलोचना की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में इस बात को 'परेशान करने वाला' बताया कि जनता दीवानी मामलों के समाधान के लिए पुलिस और कलेक्टरों के पास जाती है, क्योंकि यह प्रवृत्ति कानून के शासन की बुनियाद को कमज़ोर करती है। ऐसे मामलों में समाधान के लिए उन गैर-कानूनी एजेंसियों को बढ़ावा देती है, जिनका उन मामलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होता।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने दलजीत सिंह और एक अन्य व्यक्ति द्वारा दायर एक आपराधिक रिट याचिका की सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं।उनकी याचिका में...
Ex-Parte भरण-पोषण आदेश को चुनौती देने से पहले धारा 145(2) BNSS के तहत रिकॉल अर्जी जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि धारा 144 BNSS/धारा 125 CrPC के तहत पारित एकतरफा (ex parte) भरण-पोषण आदेश को चुनौती देने के लिए सीधे हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण (criminal revision) दाखिल नहीं किया जा सकता।जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पहले संबंधित फैमिली कोर्ट या न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 145(2) BNSS/धारा 126(2) CrPC के तहत आवेदन देकर आदेश को निरस्त (recall) कराने का प्रयास करना होगा।मामला क्या था?मामले में पति ने देवरिया की फैमिली कोर्ट द्वारा पारित...
स्टांप शुल्क की कमी की वसूली केवल विरासत में मिली संपत्ति तक ही सीमित: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 के तहत स्टांप शुल्क की कमी (deficiency) की वसूली मृत व्यक्ति के कानूनी वारिसों से केवल उतनी ही की जा सकती है, जितनी संपत्ति उन्हें विरासत में मिली हो।जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र ने स्पष्ट किया कि U.P. Revenue Code, 2006 की धारा 181 के प्रावधान लागू होंगे, जिसके अनुसार वसूली की कार्रवाई वारिसों के खिलाफ जारी रह सकती है, लेकिन उनकी जिम्मेदारी केवल विरासत में मिली संपत्ति तक सीमित होगी।मामला क्या था?याचिकाकर्ताओं के पिता ने 2020 में एक बिक्री...
'उचित सहायता नहीं मिल रही': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी पैनल वाले वकीलों द्वारा दी जा रही अपर्याप्त सहायता पर चिंता जताई
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार के पैनल में शामिल वकीलों द्वारा दी जा रही अपर्याप्त सहायता पर चिंता व्यक्त की।U.P. Minor Minerals (Concession) Rules, 1963 के तहत बिना किसी कारण बताओ नोटिस के वसूली से जुड़े एक मामले में, जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस देवेंद्र सिंह-I की बेंच ने यह टिप्पणी की:“हम एडवोकेट जनरल-सह-राज्य विधि अधिकारी के कार्यालय में मौजूदा स्थिति को लेकर गंभीर रूप से चिंतित हैं। इसका कारण यह है कि कार्यालय का कामकाज इतने निचले स्तर पर पहुंच गया है कि अदालतों को उचित सहायता...
छोटी टाइपिंग गलती पर पेट्रोल पंप आवंटन रद्द करना गलत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने BPCL को फटकारा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि केवल टाइपिंग की मामूली गलती के आधार पर पेट्रोल पंप का आवंटन रद्द करना न सिर्फ अनुचित है बल्कि कानूनन भी गलत है।इसके साथ ही अदालत ने भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा किया गया आवंटन रद्द करने का फैसला निरस्त किया।जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि जब आवेदक ने लेटर ऑफ इंटेंट मिलने के बाद भारी निवेश कर दिया हो तब इस तरह का निर्णय पूरी तरह अन्यायपूर्ण है।मामले के अनुसार भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन...
NBW पर IO को सस्पेंड करना भारी पड़ा: हाईकोर्ट ने बस्ती SP को दी अवमानना की चेतावनी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बस्ती के पुलिस अधीक्षक द्वारा एक जांच अधिकारी को निलंबित किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना करार दिया।बता दें, यह मामला उस समय सामने आया, जब जांच अधिकारी ने आरोपियों की पेशी सुनिश्चित कराने के लिए गैर-जमानती वारंट प्राप्त किया था।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कहा कि एसपी द्वारा जारी निलंबन आदेश अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-2, बस्ती के आदेश की अवहेलना जैसा प्रतीत होता है। मजिस्ट्रेट ने जांच अधिकारी के आवेदन पर...
बीमारी का बहाना बनाकर दूसरी अदालत में पेश हुआ वकील, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाया 20 हजार का जुर्माना
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालत को गुमराह करने की कोशिश करने वाले वकील पर सख्त रुख अपनाते हुए 20 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। वकील ने एक मामले में बीमारी का पर्चा भेजकर अनुपस्थित रहने की सूचना दी, जबकि उसी दिन वह दूसरी अदालत में पेश हो रहा था।जस्टिस गौतम चौधरी ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि संबंधित वकील ने न केवल बीमारी का गलत बहाना बनाया बल्कि यह भी नहीं बताया कि आवेदकों को पहले ही एक अन्य मामले में गिरफ्तारी से अंतरिम राहत मिल चुकी है।अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा,“वकील का आचरण यह...
भवन निर्माण कार्य विनियमन अधिनियम | अनुमति प्राप्त करने में धोखाधड़ी साबित होने पर शिकायतकर्ता का अधिकार क्षेत्र (Locus) अप्रासंगिक: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि भवन निर्माण कार्य विनियमन अधिनियम, 1958 की धारा 7-A के तहत कार्यवाही के उद्देश्य से शिकायतकर्ता का अधिकार क्षेत्र (locus) अप्रासंगिक है, जब प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट हो कि अधिनियम के तहत विकास की अनुमति धोखाधड़ी और गलत बयानी से प्राप्त की गई थी।भवन निर्माण कार्य विनियमन अधिनियम, 1958 की धारा 7-A में यह प्रावधान है कि यदि विकास की अनुमति धोखाधड़ी से प्राप्त की गई हो तो निर्धारित प्राधिकारी द्वारा लिखित रूप में कारण दर्ज करने के बाद उस अनुमति को रद्द किया जा...
22 महीने की सजा पर हाईकोर्ट का हस्तक्षेप, भरण-पोषण न देने पर जेल भेजे गए पति की तत्काल रिहाई का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण राशि न देने के मामले में 22 महीने की सजा काट रहे व्यक्ति की तत्काल रिहाई का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि इस तरह लंबी अवधि के लिए सिविल जेल में रखना कानून के अनुरूप नहीं है।जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी ने यह राहत देते हुए स्पष्ट किया कि चूंकि व्यक्ति सिविल कारावास में है, इसलिए उसकी रिहाई के लिए जमानत बांड या जमानतदार की आवश्यकता नहीं है।मामले में पति (ताहिर उर्फ बबलू) को झांसी के फैमिली कोर्ट ने पत्नी को 22 महीने तक भरण-पोषण राशि न देने पर जेल भेज दिया था। वह 3 दिसंबर...
केंद्रीय मंत्री के नाम के आगे सम्मानसूचक शब्द क्यों नहीं, हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक FIR में केंद्रीय मंत्री के नाम के साथ सम्मानसूचक शब्द न लगाए जाने पर सख्त रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से स्पष्टीकरण मांगा।जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को हलफनामा दाखिल कर इस चूक का कारण बताने का निर्देश दिया।अदालत ने पाया कि FIR में एक स्थान पर केंद्रीय मंत्री का नाम बिना किसी सम्मानसूचक शब्द जैसे 'माननीय' या 'श्री' के सीधे लिखा गया।इस पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि भले ही शिकायतकर्ता ने मंत्री का उल्लेख इस...
यूपी की गन कल्चर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, आर्म्स लाइसेंस डेटा मांगा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समाज में बढ़ती “गन कल्चर” पर सख्त रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश में जारी किए गए हथियार लाइसेंसों का व्यापक डेटा मांगा है। जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने कहा कि बिना नियंत्रण के हथियारों की उपलब्धता समाज के लिए गंभीर खतरा बन रही है।अदालत ने टिप्पणी की कि कई लोग, खासकर राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले या संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति, लाइसेंसी हथियारों का इस्तेमाल “प्रभाव और दबदबा दिखाने” के लिए कर रहे हैं, जिससे समाज में डर का माहौल बनता है।कोर्ट ने सोशल मीडिया, खासकर...
नाबालिग की उम्र दस्तावेज़ से साबित हो जाए तो बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि यदि उपलब्ध दस्तावेज़ों से यह स्पष्ट हो जाए कि आरोपी घटना के समय नाबालिग था तो उसकी उम्र निर्धारित करने के लिए बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट (हड्डी परीक्षण) कराने की कोई आवश्यकता नहीं है।जस्टिस मनीष कुमार ने किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (POCSO Act) की धारा 94 का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया।अदालत ने कहा,“यदि उपलब्ध दस्तावेज़ों से ही यह साबित हो रहा है कि आरोपी घटना के समय 16 वर्ष से कम उम्र का था तो ऐसे में जुवेनाइल जस्टिस...
हनी-ट्रैप वसूली गिरोह पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त: यूपी पुलिस को जांच और कड़ी निगरानी के निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मेरठ जोन में संचालित कथित हनी-ट्रैप और ब्लैकमेल गिरोह की जांच के आदेश दिए हैं। अदालत ने मेरठ जोन के पुलिस महानिरीक्षक (IG) को इस पूरे मामले की जांच करने का निर्देश दिया।जस्टिस जे जे मुनीर और जस्टिस तरून सक्सेनाकी खंडपीठ ने कहा कि इस तरह के गिरोह का अस्तित्व, जो महिलाओं के जरिए लोगों को फंसाकर ब्लैकमेल करता है, समाज की “गंभीर रूप से चिंताजनक स्थिति” को दर्शाता है।अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि इस तरह के अपराधों को जारी रहने दिया गया, तो एक...
अपील/रिवीजन में संशोधन पर Order VI Rule 17 का प्रावधान सख्ती से लागू नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VI नियम 17 का वह प्रावधान, जो ट्रायल शुरू होने के बाद संशोधन पर रोक लगाता है, अपील और पुनरीक्षण (revision) कार्यवाही में सख्ती से लागू नहीं होता।जस्टिस योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने कहा कि यह प्रावधान मूल रूप से सिविल मुकदमों (trial) में pleadings के संशोधन को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है, ताकि साक्ष्य शुरू होने के बाद देरी से बदलाव कर प्रक्रिया को प्रभावित न किया जा सके। इसलिए इसे अपील या पुनरीक्षण...
माता-पिता की जिम्मेदारी के नाम पर पत्नी की उपेक्षा नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बढ़ा भरण-पोषण बरकरार रखा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति की अपने माता-पिता और भाई-बहनों के प्रति जिम्मेदारियां उसे अपनी पत्नी के भरण-पोषण के प्राथमिक दायित्व से मुक्त नहीं कर सकतीं।जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने एक रेलवे कर्मचारी द्वारा दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।मामले में फैमिली कोर्ट इटावा ने पत्नी के लिए मासिक भरण-पोषण राशि 3500 रुपये से बढ़ाकर 8000 रुपये और नाबालिग पुत्र के लिए 1500 रुपये से बढ़ाकर 4000 रुपये की थी।पति ने हाईकोर्ट में दलील दी कि वह रेलवे में ग्रुप-डी कर्मचारी...
भरण-पोषण बार-बार मिलने वाला अधिकार, समझौते का उल्लंघन होने पर पत्नी फिर से शुरू कर सकती है पुरानी अर्जी: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि अगर कोई पति मध्यस्थता समझौते की शर्तों का उल्लंघन करता है तो पत्नी को भरण-पोषण के लिए नई अर्जी दाखिल करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वह पहले से शुरू की गई कार्यवाही को ही आगे बढ़ा सकती है।हाईकोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भरण-पोषण का अधिकार कोई एक बार मिलने वाला तोहफ़ा नहीं है, बल्कि यह एक गतिशील और बार-बार मिलने वाला अधिकार है, जो हर बार दायित्व के उल्लंघन पर नए सिरे से लागू हो जाता है।जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ मूल रूप से एक पति द्वारा दायर...
गुज़ारा भत्ता न चुकाने के कारण मई 2025 से लगातार हिरासत में व्यक्ति? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़ैमिली कोर्ट से स्पष्टीकरण मांगा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा की फ़ैमिली कोर्ट से उस व्यक्ति की लगातार हिरासत के बारे में स्पष्टीकरण मांगा, जिसने गुज़ारा भत्ता नहीं चुकाया। आरोप है कि वह व्यक्ति 23 मई, 2025 से लगातार हिरासत में है।जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की बेंच ने यह स्पष्टीकरण तब मांगा, जब वह प्रेम सिंह नाम के एक व्यक्ति द्वारा दायर क्रिमिनल रिवीज़न याचिका पर सुनवाई कर रही थी। प्रेम सिंह ने मथुरा की फ़ैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज द्वारा 9 जनवरी, 2026 को CrPC की धारा 125(3) के तहत एक कार्यवाही में पारित आदेश को चुनौती दी थी।...
बरेली नमाज़ विवाद—बड़े जमावड़े पर रोक, शांति भंग हुई तो राज्य कार्रवाई को स्वतंत्र: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में, जिसमें एक व्यक्ति को अपने घर में नमाज़ पढ़ने से रोके जाने के आरोप पर पहले 24 घंटे सुरक्षा प्रदान की गई थी, अब यह निर्देश दिया है कि वह अपने आवास पर बड़ी संख्या में लोगों को एकत्र न करे।यह आदेश जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने 25 मार्च को पारित किया।मामला बरेली निवासी हसीन खान से जुड़ा है, जिन्हें पहले एक अन्य पीठ द्वारा सुरक्षा दी गई थी। हालांकि, बाद में बेंच के पुनर्गठन के बाद मामले की सुनवाई नई पीठ के समक्ष हुई।सुनवाई के...
एकतरफा भरण-पोषण आदेश को चुनौती में केवल नोटिस न मिलने का मुद्दा उठेगा, मेरिट पर बहस नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि भरण-पोषण मामले में पारित एकतरफा अंतरिम आदेश को चुनौती देते समय पक्षकार मामले के गुण-दोष (मेरिट) पर बहस नहीं कर सकता।कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी चुनौती का दायरा केवल यह साबित करने तक सीमित होता है कि उसे नोटिस नहीं मिला था या उसके अनुपस्थित रहने का पर्याप्त कारण था।यह टिप्पणी जस्टिस गरिमा प्रसाद की पीठ ने पति द्वारा दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए की।मामले में ट्रायल कोर्ट ने घरेलू हिंसा कानून के तहत पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण के...

















