इलाहाबाद हाईकोट

भविष्य की योजना के लिए ज़मीन सिर्फ़ रिज़र्व रखना, अधिग्रहित ज़मीन का उपयोग नहीं माना जाएगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया ज़मीन वापस करने का निर्देश
भविष्य की योजना के लिए ज़मीन सिर्फ़ रिज़र्व रखना, अधिग्रहित ज़मीन का 'उपयोग' नहीं माना जाएगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया ज़मीन वापस करने का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि ज़मीन का कोई भी असल विकास या उपयोग किए बिना, उसे सिर्फ़ "भविष्य की योजना" के लिए रिज़र्व रखना, यूपी शहरी योजना और विकास अधिनियम, 1973 की धारा 17 के तहत 'उपयोग' नहीं माना जाएगा।यूपी शहरी योजना और विकास अधिनियम, 1973 की धारा 17 के तहत राज्य सरकार को विकास कार्यों के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत ज़मीन अधिग्रहित करने का अधिकार दिया गया। उप-धारा (1) का परंतुक यह प्रावधान करता है कि यदि ज़मीन मालिक आवेदन करता है तो राज्य सरकार ज़मीन को उसके मूल मालिक को वापस कर...

धोखा देने के इरादे के बिना जन्मतिथि में मामूली अंतर धोखाधड़ी नहीं है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी स्कूल के टीचर की बर्खास्तगी रद्द की
धोखा देने के इरादे के बिना जन्मतिथि में मामूली अंतर धोखाधड़ी नहीं है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी स्कूल के टीचर की बर्खास्तगी रद्द की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि किसी सरकारी कर्मचारी के अलग-अलग एजुकेशनल रिकॉर्ड में जन्मतिथि में सिर्फ़ मामूली अंतर होना—जिसमें धोखाधड़ी, गलतबयानी या जानबूझकर कुछ छिपाने का कोई तत्व न हो—उसे 'धोखाधड़ी या जानबूझकर की गई गलतबयानी' नहीं माना जाएगा, जिससे उसकी नियुक्ति रद्द हो जाए।जस्टिस मंजू रानी चौहान की बेंच ने इस तरह जून 2019 में मऊ में एक सरकारी असिस्टेंट टीचर के खिलाफ जारी बर्खास्तगी का आदेश रद्द किया, और राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे उसे तुरंत अपनी ड्यूटी फिर से शुरू करने की...

जमीन अधिग्रहण पर बड़ा झटका: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- सिर्फ प्रशासनिक सुविधा से तत्कालता प्रावधान लागू नहीं किया जा सकता
जमीन अधिग्रहण पर बड़ा झटका: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- सिर्फ प्रशासनिक सुविधा से तत्कालता प्रावधान लागू नहीं किया जा सकता

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमीन अधिग्रहण मामलों में अहम फैसला देते हुए कहा कि केवल प्रशासनिक सुविधा या आवश्यकता के आधार पर भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 17 (तत्कालता प्रावधान) लागू नहीं की जा सकती।जस्टिस संगीता चंद्रा और जस्टिस बृज राज सिंह की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि इस प्रावधान का उपयोग तभी किया जा सकता है, जब वास्तविक, ठोस और प्रमाणित आपात स्थिति हो, जिसे अधिसूचना में स्पष्ट कारणों के साथ दर्ज किया जाए।अदालत ने कहा,“सिर्फ प्रशासनिक आवश्यकता या सुविधा, चाहे वह कितनी भी जरूरी क्यों न लगे, कानून...

किसानों को राहत पर बड़ी टिप्पणी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- देरी के आधार पर दावा खारिज करना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ
किसानों को राहत पर बड़ी टिप्पणी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- देरी के आधार पर दावा खारिज करना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किसानों के हित में अहम फैसला देते हुए कहा कि केवल देरी के आधार पर मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना के तहत दावे खारिज करना, बिना कारणों पर विचार किए, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने कहा कि भले ही योजना में दावा दाखिल करने की अधिकतम समय सीमा 75 दिन निर्धारित हो, लेकिन यदि देरी के पीछे उचित कारण हों तो अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे उन कारणों पर विचार करें।अदालत ने स्पष्ट कहा,“यदि देरी के कारणों पर...

BNSS की धारा 106 के तहत संपत्ति कुर्क करने के लिए पुलिस को पहले से नोटिस देना ज़रूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
BNSS की धारा 106 के तहत संपत्ति कुर्क करने के लिए पुलिस को पहले से नोटिस देना ज़रूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में फैसला दिया कि BNSS की धारा 106 के तहत पुलिस द्वारा संपत्ति कुर्क करने के लिए संबंधित व्यक्ति को पहले से कोई नोटिस देना ज़रूरी नहीं है। कोर्ट ने धारा 106 और धारा 107 के बीच अंतर स्पष्ट किया। धारा 107 में विशेष रूप से यह प्रावधान है कि मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को नोटिस जारी करेगा, जिसकी संपत्ति BNSS की धारा 107 के तहत कुर्क की जानी है।BNSS की धारा 106 पुलिस को ऐसी किसी भी संपत्ति को ज़ब्त करने का अधिकार देती है, जिसके बारे में यह आरोप हो या संदेह हो कि वह चोरी की है,...

आवंटित प्लॉट सौंपने में देरी का मामला: हाईकोर्ट ने KDA को लगाई फटकार, मुख्यमंत्री को दिए अधिकारियों की लापरवाही की जांच के निर्देश
आवंटित प्लॉट सौंपने में देरी का मामला: हाईकोर्ट ने KDA को लगाई फटकार, मुख्यमंत्री को दिए अधिकारियों की लापरवाही की जांच के निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री आदित्य योगीनाथ से KDA अधिकारियों की कथित लापरवाही की जांच करने को कहा है। इन अधिकारियों पर आवंटित ज़मीन का कब्ज़ा, अब 90 साल के हो चुके उसके पट्टेदार को सौंपने में 41 साल की देरी करने का आरोप है।जस्टिस संदीप जैन 90 साल के वादी के मामले की सुनवाई कर रहे थे। यह वादी सबसे ज़्यादा बोली लगाने वाला था और उसे 1984 में 999 साल का पट्टा मिला था, लेकिन कानपुर विकास प्राधिकरण (KDA) ने कई बार अनुरोध किए जाने के बाद भी उसे ज़मीन का कब्ज़ा नहीं सौंपा।बेंच ने टिप्पणी की, ...

संयुक्त परिवार के अस्तित्व की धारणा के आधार पर सह-काश्तकारी की अनुमति नहीं दी जा सकती, यह साबित करना होगा कि प्लॉट पैतृक है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
संयुक्त परिवार के अस्तित्व की धारणा के आधार पर सह-काश्तकारी की अनुमति नहीं दी जा सकती, यह साबित करना होगा कि प्लॉट पैतृक है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि संयुक्त परिवार के अस्तित्व की धारणा के आधार पर सह-काश्तकारी (Co-Tenancy) की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि संबंधित पक्ष को यह साबित करना होगा कि प्लॉट पैतृक है। साथ ही प्लॉट की पहचान और रिकॉर्ड में उसकी निरंतरता भी साबित करनी होगी।जस्टिस चंद्र कुमार राय ने फैसला सुनाते हुए कहा,“विचाराधीन प्लॉट का पैतृक होना साबित नहीं हो सका, और न ही प्लॉट की पहचान व रिकॉर्ड में उसकी निरंतरता स्थापित हो पाई। ऐसे में केवल इस आधार पर सह-काश्तकारी की अनुमति नहीं दी जा...

क्रूरता/उत्पीड़न से कोई सीधा संबंध न होने तक दहेज हत्या का अपराध सिर्फ़ कीमती चीज़ों की मांग करने पर लागू नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
क्रूरता/उत्पीड़न से कोई सीधा संबंध न होने तक 'दहेज हत्या' का अपराध सिर्फ़ कीमती चीज़ों की मांग करने पर लागू नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि IPC की धारा 304-B ​​(दहेज हत्या) के तहत अपराध साबित करने के लिए पीड़िता की मौत और दहेज से जुड़े उत्पीड़न या क्रूरता के बीच 'स्पष्ट संबंध' होना ज़रूरी है।जस्टिस मनीष माथुर की बेंच ने आगे कहा कि जहाँ सिर्फ़ चीज़ों या कीमती सामान की मांग का किसी ऐसे उत्पीड़न या क्रूरता से कोई संबंध न हो, जिसके कारण मौत हुई हो, वहां IPC की धारा 304-B ​​और धारा 498-A (साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-B के साथ पढ़ी जाने पर) के प्रावधान लागू नहीं होंगे।इस तरह बेंच ने मेवा लाल और पीड़िता...

पीड़िता की गवाही पर भरोसा कायम, मां का बयान न होना घातक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1984 दुष्कर्म मामले में सजा बरकरार रखी
पीड़िता की गवाही पर भरोसा कायम, मां का बयान न होना घातक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1984 दुष्कर्म मामले में सजा बरकरार रखी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1984 के दुष्कर्म मामले में आरोपी की सजा बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और अटूट है, तो अन्य गवाहों के बयान न होने से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता।जस्टिस मनोज बजाज की पीठ ने आजमगढ़ के एडिशनल सेशन कोर्ट के वर्ष 1986 के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपी की अपील खारिज की। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत दोषी मानते हुए 7 साल की कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई।मामले के अनुसार, 7 अक्टूबर 1984 को 15 वर्ष से...

गलत कानून के तहत की गई नियुक्तियां रद्द, प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन बर्खास्तगी में दखल देने का आधार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
गलत कानून के तहत की गई नियुक्तियां रद्द, प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन बर्खास्तगी में दखल देने का आधार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि किसी ऐसे कानून के तहत की गई नियुक्तियां, जो उस संस्थान पर लागू नहीं होता—वे रद्द मानी जाएंगी। ऐसे कर्मचारियों की बर्खास्तगी के आदेशों को केवल इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि आदेश में बर्खास्तगी के कारणों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।यह देखते हुए कि नियुक्तियाँ संस्थान पर लागू होने वाले कानूनी प्रावधानों के तहत नहीं की गईं, जस्टिस मंजू रानी चौहान ने कहा:“ऐसी परिस्थितियों में भले ही अधिकार क्षेत्र की कमी और विवादित आदेश के कारणों का स्पष्ट उल्लेख न होने...

डीएम ने बंद किए अमर उजाला को सरकारी विज्ञापन, हाईकोर्ट ने कहा- तानाशाही आदेश चौथे स्तंभ की स्वायत्तता पर चोट करते हैं
डीएम ने बंद किए 'अमर उजाला' को सरकारी विज्ञापन, हाईकोर्ट ने कहा- 'तानाशाही आदेश चौथे स्तंभ की स्वायत्तता पर चोट करते हैं'

'अमर उजाला' अखबार को राहत देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में संभल के ज़िलाधिकारी (DM) को निर्देश दिया कि वह इस मामले में 'व्यावहारिक' दृष्टिकोण अपनाएं, जिसमें अखबार ने आरोप लगाया था कि उन्हें सरकारी विज्ञापन नहीं दिए जा रहे हैं।'अमर उजाला' का पक्ष यह था कि संबंधित डीएम ने एक गुरुद्वारा विवाद से जुड़ी खबर के आधार पर आदेश पारित किया था। हालांकि, याचिकाकर्ता ने बाद में स्पष्टीकरण (Corrigendum) प्रकाशित करके अपना पक्ष साफ कर दिया था, फिर भी आदेश पारित कर दिया गया, जिसके बाद उन्हें सरकारी...

एसिड हमले एक अलग ही श्रेणी के होते हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार किया, रिपोर्ट में देरी पर पुलिस को फटकारा
'एसिड हमले एक अलग ही श्रेणी के होते हैं': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार किया, रिपोर्ट में देरी पर पुलिस को फटकारा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि जिन मामलों में एसिड का इस्तेमाल हमले के हथियार के तौर पर किया जाता है, वे अपराध में इस्तेमाल हथियार की प्रकृति के कारण 'एक अलग ही श्रेणी' के होते हैं।गहन जांच की ज़रूरत को देखते हुए जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने रिट याचिका खारिज की। इस याचिका में संपत्ति विवाद को लेकर किए गए सुनियोजित एसिड हमले से जुड़ी FIR को रद्द करने की मांग की गई।मामले के खास तथ्यों से परे हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस विभाग के प्रति अपनी "गहरी नाराज़गी" भी ज़ाहिर...

चीनी नागरिक ने धोखाधड़ी से हासिल की भारतीय नागरिकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट का केंद्र को याचिका पर फैसला करने का निर्देश
चीनी नागरिक ने धोखाधड़ी से हासिल की भारतीय नागरिकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट का केंद्र को याचिका पर फैसला करने का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह 4 हफ़्तों के भीतर याचिका पर उचित कारणों के साथ आदेश पारित करे। इस याचिका में ऐसे पूर्व चीनी नागरिक के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई, जिस पर धोखाधड़ी से भारतीय नागरिकता हासिल करने का आरोप है।जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने यह आदेश 'महाबोधि सोसाइटी ऑफ़ इंडिया' द्वारा दायर एक रिट याचिका पर दिया।याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी नंबर 6 (जो पहले चीन का नागरिक था और अब नैचुरलाइज़ेशन के ज़रिए भारत का...

जांच के अधीन सस्पेंशन ऑर्डर ब्लैकलिस्टिंग नहीं है, राज्य गुणवत्ता संबंधी चिंताओं के आधार पर बोली खारिज करने के लिए स्वतंत्र: इलाहाबाद हाईकोर्ट
जांच के अधीन सस्पेंशन ऑर्डर ब्लैकलिस्टिंग नहीं है, राज्य गुणवत्ता संबंधी चिंताओं के आधार पर बोली खारिज करने के लिए स्वतंत्र: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि सस्पेंशन ऑर्डर को यूं ही ब्लैकलिस्टिंग ऑर्डर नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब सस्पेंशन ऑर्डर किसी जांच के अधीन हो।हालांकि, कोर्ट ने एक तकनीकी बोली खारिज किए जाने के फैसले को सही ठहराया, क्योंकि कोर्ट ने पाया कि पिछला खराब प्रदर्शन जनहित में बोली खारिज करने का एक वैध आधार है।जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने फैसला दिया:"हमारी राय में जांच के अधीन सस्पेंशन ऑर्डर ब्लैकलिस्टिंग ऑर्डर के बराबर नहीं होता। हम उन तमाम मिसालों (Precedents) को...

शर्मनाक, बेबुनियाद और खोखले: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी और बेटियों पर सेक्स रैकेट चलाने का झूठा आरोप लगाने वाले व्यक्ति को फटकारा
'शर्मनाक, बेबुनियाद और खोखले': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी और बेटियों पर सेक्स रैकेट चलाने का झूठा आरोप लगाने वाले व्यक्ति को फटकारा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को व्यक्ति की क्रिमिनल रिट याचिका खारिज की। इस व्यक्ति ने कानपुर नगर में चल रहे कथित सेक्स रैकेट में शामिल लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की।हालांकि, याचिकाकर्ता ने शुरू में अपनी पत्नी और बेटी के अश्लील वीडियो ऑनलाइन अपलोड किए जाने पर चिंता जताई, लेकिन बाद की सुनवाई में उसने अपने परिवार के सदस्यों पर अनैतिकता का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ अपमानजनक और झूठे आरोप लगाए।इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने याचिकाकर्ता...

आरोप तय करने के चरण में केवल प्रथम दृष्टया मामला देखा जाता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कुरान का अपमान करने के आरोपी एडिटर को राहत देने से किया इनकार
'आरोप तय करने के चरण में केवल प्रथम दृष्टया मामला देखा जाता है': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'कुरान का अपमान' करने के आरोपी एडिटर को राहत देने से किया इनकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते किताब के संपादक द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) खारिज की। इस याचिका में संपादक ने इस्लाम और कुरान के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक शब्द प्रकाशित करने के एक मामले में खुद को आरोपमुक्त करने की मांग की थी।यह देखते हुए कि आरोप तय करने के चरण में केवल प्रथम दृष्टया मामला ही देखा जाता है, जस्टिस सुभाष चंद्र शर्मा की पीठ ने ट्रायल कोर्ट का उस आदेश बरकरार रखा, जिसमें याचिकाकर्ता-डॉ. मदन गोपाल सिन्हा (जो विचाराधीन किताब के नामित संपादक हैं)...

पूर्व साजिश साबित बिना साझा मंशा नहीं: 1985 हत्या मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी को किया बरी
पूर्व साजिश साबित बिना साझा मंशा नहीं: 1985 हत्या मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी को किया बरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 34 के तहत दोषी ठहराने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी के बीच पहले से कोई साझा योजना या साजिश थी। इस आधार पर अदालत ने 1985 के हत्या मामले में एक आरोपी को बरी किया।जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने 1989 में पारित सत्र अदालत का फैसला रद्द करते हुए कहा कि बिना “पूर्व सहमति या साजिश” (प्रायर कॉन्सर्ट) साबित किए धारा 34 लागू नहीं की जा सकती।अदालत ने कहा,“धारा 302 के साथ धारा 34 के तहत...

हत्या के मामले में गले की हायॉइड हड्डी का टूटना जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट, पति को जमानत देने से किया इनकार
हत्या के मामले में गले की हायॉइड हड्डी का टूटना जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट, पति को जमानत देने से किया इनकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि गला दबाकर हत्या के मामलों में हायॉइड हड्डी (गर्दन की छोटी यू-आकार की हड्डी) का टूटना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गवाहों के बयान दर्ज करने में देरी हमेशा अभियोजन के खिलाफ नहीं जाती, यदि उसके पीछे उचित कारण हो।जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने पत्नी की गला दबाकर हत्या के आरोपी पति की जमानत याचिका खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं।सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष ने दलील दी थी कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबाने की बात कही गई, लेकिन...