इलाहाबाद हाईकोट
अगर ट्रायल के दौरान पीड़ित पक्ष बदल ले तो सिर्फ़ CrPC की धारा 164 के तहत दिए गए बयान के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने कहा कि अगर ट्रायल के दौरान पीड़ित और अभियोजन पक्ष के अन्य गवाह अपनी बात से मुकर जाते हैं (होस्टाइल हो जाते हैं) तो आरोपी को सिर्फ़ CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज बयान के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।अपहरण के मामले में 2011 में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सज़ा रद्द करते हुए जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने कहा कि चूंकि CrPC की धारा 164 के तहत बयान आरोपी की मौजूदगी में दर्ज नहीं किया जाता है, इसलिए उसे गवाह से जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) करने का मौका नहीं मिलता...
हाईकोर्ट का यूपी कोर्ट्स को निर्देश: अगर 'दहेज हत्या' का मामला हत्या जैसा लगे तो मुख्य आरोप हत्या का और वैकल्पिक आरोप दहेज हत्या का तय करें
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की सभी निचली अदालतों (ट्रायल कोर्ट) को एक ज़रूरी निर्देश जारी किया। निर्देश के मुताबिक, अगर जांच के दौरान मिले सबूतों से पता चलता है कि ससुराल में हुई मौत 'हत्या' (homicidal) थी, तो मुख्य आरोप IPC की धारा 302 (हत्या) के तहत और वैकल्पिक आरोप IPC की धारा 304-B (दहेज हत्या) के तहत तय किया जाना चाहिए।जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस डॉ. अजय कुमार-II की बेंच ने यह निर्देश ऐसे मामले पर नाराज़गी जताते हुए जारी किया, जिसमें जांच अधिकारी और ट्रायल कोर्ट के जज दोनों ने...
पति की नेट इनकम का 25% गुज़ारा-भत्ता तय करना ज़रूरी नहीं; कोर्ट कम या ज़्यादा भी दे सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी को पति की नेट सैलरी का 25% गुज़ारा-भत्ता देने का जो पैमाना (बेंचमार्क) अक्सर इस्तेमाल किया जाता है, वह सिर्फ़ एक "सामान्य गाइडलाइन" है, न कि कोई अनिवार्य नियम।जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने साफ़ किया कि हर मामले के तथ्यों के आधार पर कोर्ट के पास कम या ज़्यादा भत्ता तय करने का अधिकार है।कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि गुज़ारा-भत्ता तय करने के लिए "नेट इनकम" का मतलब आम तौर पर ज़रूरी कटौतियों और टैक्स के बाद बची हुई इनकम से होता है, न कि ग्रॉस सैलरी से।कोर्ट असल में दो...
इलेक्ट्रोहोम्योपैथी का सर्टिफिकेट लेकर एलोपैथी नहीं कर सकते, बिना मान्यता इलाज करना झोलाछाप डॉक्टरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इलेक्ट्रोहोम्योपैथी का सर्टिफिकेट रखने वाला व्यक्ति एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति से मरीजों का इलाज नहीं कर सकता।अदालत ने कहा कि मान्यता प्राप्त मेडिकल योग्यता के बिना एलोपैथी करना झोलाछाप डॉक्टरी है और ऐसे लोगों को मरीजों का इलाज करने की अनुमति देना जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने एटा के चीफ मेडिकल ऑफिसर द्वारा एक प्राइवेट अस्पताल को सील किए जाने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए यह...
सेशन जज सुनवाई के बीच लंबित मुकदमा उसी न्यायिक अधिकारी की नई अदालत में स्थानांतरित कर सकते हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी आपराधिक मुकदमे की आंशिक सुनवाई कर रहे न्यायिक अधिकारी का तबादला उसी सत्र प्रभाग के भीतर किसी अन्य सक्षम अदालत में हो जाता है, तो सेशन जज दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC)। की धारा 408 के तहत अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए उस लंबित मुकदमे को अधिकारी की नई अदालत में स्थानांतरित कर सकते हैं।जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने इस संबंध में दायर याचिका खारिज करते हुए कहा कि यदि स्थानांतरण का उद्देश्य उस न्यायिक अधिकारी को गवाहों के हावभाव और आचरण का लाभ बनाए...
लंबे समय तक आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध 'रेप' नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने व्यक्ति को आरोपों से मुक्त किया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि आपसी सहमति से बालिगों के बीच लंबे समय तक चले शारीरिक संबंधों को शादी का वादा पूरा न होने पर 'रेप' नहीं कहा जा सकता, खासकर तब जब मूल विवाद मुख्य रूप से सिविल और आर्थिक प्रकृति का हो।दो जुड़ी हुई आपराधिक अपीलों को स्वीकार करते हुए जस्टिस संतोष राय की बेंच ने आरोपी (सौरभ पाल सिंह) को IPC की धाराओं 376, 420, 406, 504 और 506, और SC/ST (अत्याचार निवारण) Act की धारा 3(2)(v) के तहत सभी आरोपों से मुक्त किया।इस प्रकार कोर्ट ने प्रयागराज के स्पेशल जज (SC/ST Act) के उन...
निरसन कानून का लाभ नहीं मिलेगा यदि अतिरिक्त भूमि का कब्जा पहले ही लिया जा चुका हो, देरी से दायर याचिका भी खारिज: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि शहरी भूमि (सीमा निर्धारण एवं विनियमन) अधिनियम, 1976 के तहत अतिरिक्त घोषित भूमि का कब्जा शहरी भूमि (सीमा निर्धारण एवं विनियमन) निरसन अधिनियम, 1999 लागू होने से पहले ही प्रशासन द्वारा ले लिया गया था, तो भू-स्वामी निरसन अधिनियम का लाभ लेकर उस भूमि पर अपना अधिकार बरकरार रखने का दावा नहीं कर सकता।हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कब्जा लिए जाने के कई वर्षों बाद ऐसे भूमि सीमा निर्धारण की कार्यवाही को चुनौती दी जाती है तो अत्यधिक देरी के आधार पर भी याचिका खारिज की जा...
परिवार के लोग घर में मौजूद थे, ऐसे में दुष्कर्म की घटना संभव नहीं लगती; पीड़िता के बयान में भी विरोधाभास, बरी करने का फैसला बरकरार: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2014 के दुष्कर्म मामले में राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए आरोपी को बरी करने का ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा।अदालत ने कहा कि जिस समय कथित घटना हुई, उस समय पीड़िता के बच्चे और परिवार के अन्य सदस्य घर में मौजूद थे। ऐसे हालात में आरोपी द्वारा पीड़िता को घसीटकर कमरे में ले जाकर दुष्कर्म करना अत्यंत असंभव प्रतीत होता है।जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने जुलाई 2019 में गोंडा की ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को सही ठहराया। ट्रायल कोर्ट...
सिर्फ संदेह के आधार पर पेट्रोल पंप की डीलरशिप रद्द नहीं की जा सकती, तकनीकी साक्ष्य जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल इस आशंका के आधार पर कि ईंधन वितरण मशीन से छेड़छाड़ की गई है किसी पेट्रोल पंप की डीलरशिप समाप्त नहीं की जा सकती।अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक ठोस तकनीकी और वैज्ञानिक साक्ष्यों से यह साबित न हो जाए कि कथित अनियमितता ईंधन की आपूर्ति में हेरफेर करने में सक्षम थी और उसका संबंध डीलर से था तब तक डीलरशिप समाप्त करने जैसी दंडात्मक कार्रवाई उचित नहीं मानी जा सकती।जस्टिस इरशाद अली की पीठ ने यह टिप्पणी मार्केटिंग अनुशासन दिशानिर्देश, 2012 के खंड...
RTI Act | सुनवाई का अवसर दिए बिना सूचना अधिकारी पर जुर्माना नहीं लगाया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act), 2005 की धारा 20 के तहत सूचना देने में देरी पर लोक सूचना अधिकारी (PIO) पर जुर्माना लगाने से पहले उसे सुनवाई का उचित अवसर देना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि केवल बिना आधार के राय बनाकर दंड नहीं लगाया जा सकता, बल्कि उपलब्ध अभिलेखों और तथ्यों के आधार पर विधिसम्मत राय बनाना आवश्यक है।यह फैसला जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने सुनाया।मामले में याचिकाकर्ता एक खंड शिक्षा अधिकारी होने के...
संशोधन की अर्ज़ी खारिज होने पर भी पार्टी मौजूदा दलीलों के आधार पर कानूनी तर्क दे सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर VI नियम 17 के तहत दलीलों (pleadings) में संशोधन की अर्ज़ी खारिज होने का मतलब यह नहीं है कि कोई पार्टी अंतिम सुनवाई के चरण में पहले से रिकॉर्ड पर मौजूद दलीलों से उत्पन्न कानूनी सवालों को नहीं उठा सकती।कोर्ट ने कहा कि अगर प्रस्तावित संशोधन केवल उन कानूनी दलीलों को दोहराता है, जो पहले से ही दलीलों और अपील के मेमोरेंडम से स्पष्ट हैं, तो उसे खारिज करने से कोई कानूनी नुकसान नहीं होता है।CPC का ऑर्डर VI नियम 17 कोर्ट को दलीलों में संशोधन...
जहां आर्बिट्रेशन क्लॉज़ मौजूद हो, वहां विवादित तथ्यों वाले कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े मामलों में रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के आर्टिकल 226 के तहत रिट याचिका ऐसे कॉन्ट्रैक्ट विवाद में स्वीकार्य नहीं है, जहां विवाद में तथ्यों से जुड़े सवाल शामिल हों और एग्रीमेंट के तहत पीड़ित पक्ष के पास आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) का उपाय उपलब्ध हो।कोर्ट ने मछली पकड़ने के लीज़ को खत्म करने और सिक्योरिटी ज़ब्त करने के खिलाफ चुनौती पर सुनवाई करने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि लीज़ वाली जगह और कॉन्ट्रैक्ट के तहत बकाया रकम पर विरोधी दावों का समाधान तभी हो सकता है, जब पार्टियाँ तय फोरम के सामने सबूत पेश...
'सही बोली लगाने वाले को हटाने पर तुले': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे को फटकार लगाई, कोंकण रेलवे की बोली खारिज करने का फैसला रद्द किया
इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने पिछले हफ्ते नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे (NER) अधिकारियों के 'मनमाने' और "बदनीयती भरे" कामों पर कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने एक सरकारी सहयोगी कंपनी, कोंकण रेलवे कॉर्पोरेशन लिमिटेड (KRCL) की फाइनेंशियल बोली को बार-बार कमजोर आधारों पर खारिज किया।NER के कामों को "परेशान करने जैसा" बताते हुए जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने 8 जून, 2026 का पत्र रद्द किया, जिसमें बैंक गारंटी में लाभार्थी का नाम गलत होने की बात कहकर KRCL की बोली खारिज कर दी गई।कोर्ट ने...
पहले पति को तलाक दिए बिन शादी करने वाले दूसरे 'पुरुष' से महिला भरण-पोषण कर सकती है? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि अगर कोई महिला अपने पहले पति को तलाक दिए बिना किसी पुरुष के साथ रहने लगती है, तो उसे "कानूनी रूप से विवाहित पत्नी" नहीं माना जाएगा, इसलिए वह CrPC की धारा 125 के तहत अपने साथी से गुज़ारा-भत्ता पाने की हकदार नहीं है।जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें महिला को उसके साथी (जिससे उसने कथित तौर पर पहले पति से तलाक लिए बिना शादी की थी) से गुज़ारा-भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।हालांकि, सिंगल जज ने उनकी नाबालिग बेटी को दिए गए...
Sunday Sitting | 150 साल पुराने मेथोडिस्ट स्कूल पर गिराए जाने का खतरा: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कथित 'नज़ूल' ज़मीन पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया
रविवार को बुलाई गई विशेष सुनवाई में इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने विवादित ज़मीन के मामले में दखल देते हुए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। यह ज़मीन कथित तौर पर एक ऐसे शिक्षण संस्थान की, जो 150 से ज़्यादा सालों से चल रहा है, लेकिन अब उस पर "गिराए जाने का खतरा" मंडरा रहा है।सीतापुर के सिविल लाइन्स स्थित मेथोडिस्ट मिशन गर्ल्स जूनियर हाई स्कूल की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने राज्य सरकार के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे विवादित संपत्ति का...
'एलिबी की दलील' को ट्रायल के दौरान साबित करना ज़रूरी; IO इसे सच मानकर अकेले ही फ़ाइनल रिपोर्ट दाखिल नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाकोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा कि किसी आरोपी की "एलिबी की दलील" (यानी घटना के समय कहीं और होने का दावा) को आपराधिक ट्रायल के दौरान सबूत पेश करके साबित करना ज़रूरी है। इन्वेस्टिगेटिंग ऑफ़िसर (IO) इसे सच मानकर अकेले ही फ़ाइनल रिपोर्ट दाखिल नहीं कर सकता।जस्टिस विवेक कुमार सिंह की बेंच ने कहा कि अगर IO उन गवाहों के बयानों के आधार पर फ़ाइनल रिपोर्ट दाखिल करता है, जो आरोपियों की एलिबी की दलील का समर्थन करते हैं तो यह "बहुत बड़ी गैर-कानूनी बात" होगी।कोर्ट ने ये बातें तब कहीं जब उसने दो आरोपियों...
S.8 Evidence Act | झूठी NCR से लेकर फरार होने तक: पत्नी की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति के 'आचरण' पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किया विचार
इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने बुधवार को पत्नी की हत्या के दोषी व्यक्ति की उम्रकैद की सज़ा बरकरार रखी। कोर्ट ने उसके धोखेबाज़ कामों—जैसे झूठा भरोसा दिलाना, झूठी पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराना और अंत में फरार हो जाना—को भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 8 के तहत "प्रासंगिक आचरण" माना।जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस बबीता रानी की बेंच ने दोषी (पवन कुमार) की जेल अपील खारिज की। उसने हरदोई सेशंस कोर्ट के 2016 के उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें उसे IPC की धारा 302 और 201 के तहत दोषी ठहराया...
मेडिकल सबूत से पुष्टि न होने पर भी पीड़िता की विश्वसनीय गवाही बलात्कार में दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त:इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलादाबाद हाईकोर्ट ने 1983 के एक बलात्कार मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए कहा है कि यदि पीड़िता (Prosecutrix) की गवाही विश्वसनीय, सुसंगत और किसी मूलभूत खामी से मुक्त हो, तो केवल इस आधार पर आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती कि मेडिकल साक्ष्य अभियोजन के मामले की पूरी तरह पुष्टि नहीं करते।जस्टिस संजीव कुमार की पीठ ने वीर सिंह द्वारा दायर आपराधिक अपील खारिज करते हुए कहा कि बलात्कार कोई चिकित्सीय स्थिति नहीं, बल्कि एक कानूनी अपराध है।...
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टाटा प्रोजेक्ट्स का ₹940 करोड़ का हाईवे कॉन्ट्रैक्ट बहाल किया, कहा- NHAI का कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने का फैसला 'पहले से तय'
टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को राहत देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (NHAI), जो संविधान के आर्टिकल 12 के तहत "राज्य" (State) है, मनमाने ढंग से हाईवे बनाने का कॉन्ट्रैक्ट बीच में ही खत्म नहीं कर सकती और न ही देरी के लिए कॉन्ट्रैक्टर को जिम्मेदार ठहरा सकती है, जब देरी खुद अथॉरिटी की गलती से हुई हो—जैसे कि कॉन्ट्रैक्ट के तहत बिना किसी रुकावट वाली ज़मीन और साफ़ रास्ता (clear right of way) न सौंप पाना।जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी ने कहा,"इस मामले में...
पति-पत्नी की तरह साथ रहने पर वैध विवाह का कड़ा सबूत मांगकर भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हों और उनका वैवाहिक संबंध अन्य परिस्थितियों से स्थापित होता हो, तो भरण-पोषण (Maintenance) के दावे को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वैध विवाह का सख्त दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है।जस्टिस अचल सचदेव ने यह टिप्पणी महाराजगंज फैमिली कोर्ट के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द करते हुए की, जिसमें महिला की भरण-पोषण याचिका केवल इसलिए खारिज कर दी गई थी क्योंकि वह स्वयं को विधिक रूप से विवाहित...















