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अव्यावहारिक विवाह का संरक्षण दुख का कारण बनता है, जोड़ने लायक ना बचे हो तो वैवाहिक बंधन तोड़ दिया जाना चाहिए: केरल हाईकोर्ट
केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में एक वैवाहिक अपील को खारिज करते हुए कहा कि जब एक विवाह जोड़ने की सीमा से परे टूट गया है तो कानून को इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि ऐसे विवाह के कानूनी बंधन को तोड़ने से इनकार करना पार्टियों के हित के साथ ही समाज के लिए भी हानिकारक होगा।जस्टिस अनिल के नरेंद्रन और जस्टिस सी एस सुधा की खंडपीठ ने कहा कि पार्टियों को हमेशा के लिए एक शादी में, जो वास्तव में खत्म हो गई है, बांधे रखने की कोशिश करने से कुछ हासिल नहीं होता है।मामलायाचिकाकर्ता और प्रतिवादी के बीच जनवरी 2009...
सीआरपीसी की धारा 372 के परंतुक के तहत 'पीड़ित' को अपील का वास्तविक अधिकार प्रदान करना प्रकृति में पूर्वव्यापी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने कहा कि वर्ष 2009 में एक परंतुक (Proviso) जोड़कर सीआरपीसी की धारा 372 में किए गए संशोधन के तहत 'पीड़ित' को अपील का वास्तविक अधिकार प्रदान करना प्रकृति में पूर्वव्यापी नहीं है।इसका मतलब यह है कि, एक 'पीड़ित' [जैसा कि सीआरपीसी की धारा 2 w (wa) के तहत परिभाषित है] को 31 दिसंबर, 2009 से पहले पारित एक आदेश के खिलाफ अपील करने का कोई अधिकार नहीं है, जिसमें आरोपी को बरी करना/उसे अपराध के लिए दंडित करना/अपर्याप्त मुआवजा लगाना शामिल है।यह ध्यान दिया जा सकता है...
धारा 207 सीआरपीसी | आरोप पत्र सामग्री को पेश करने से इनकार करने का नतीजा अनुचित ट्रायल के रूप में होता है: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने दोहराया है कि एक याचिकाकर्ता/अभियुक्त आरोपपत्र की सामग्री की सभी प्रतियों का हकदार होता, जिससे इनकार निस्संदेह निष्पक्षता के सिद्धांत के खिलाफ होगा और यह ट्रायल अनुचित होगा। जस्टिस एम नागप्रसन्ना की एकल न्यायाधीश पीठ ने चिराग आर मेहता द्वारा दायर याचिका को स्वीकार कर लिया, जिस पर आईपीसी की धारा 364 ए और 506 के तहत अपराध का आरोप लगाया गया था।मेहता ने अतिरिक्त सिटी सिविल एंड सेशन जज, बेंगलुरु के आदेश पर सवाल उठाया था, जिन्होंने सीआरपीसी की धारा 207 (पुलिस रिपोर्ट और अन्य...
मोटर दुर्घटना दावा | बाल पीड़ित को गैर-कमाई वाले वयस्क के बराबर नहीं गिना जा सकता, गैर-आर्थिक मदों के तहत मुआवजा दिया जाना चाहिए: गुजरात हाईकोर्ट ने दोहराया
गुजरात हाईकोर्ट ने दोहराया कि मोटर दुर्घटनाओं के शिकार बच्चे मुआवजे के मामले में कमाई न करने वाले वयस्कों से अलग पायदान पर खड़े होते हैं।जस्टिस गीता गोपी की खंडपीठ ने मल्लिकार्जुन बनाम डिवीजनल मैनेजर, नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को याद करते हुए कहा कि मुआवजे से बच्चे को कुछ हासिल करने या जीवन शैली विकसित करने में सक्षम होना चाहिए, जो अपंगता से उत्पन्न होने वाली असुविधा या परेशानी को कुछ हद तक दूर करेगा।इस प्रकार, नाबालिग पीड़ितों के लिए मुआवजे की गणना...
सरकार के प्रति असंतोष को बढ़ावा देने के अभाव में राजद्रोह का अपराध नहीं बनता: कर्नाटक हाईकोर्ट ने पुलिस एसोसिएशन के नेता के खिलाफ मामला खारिज किया
कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक बर्खास्त पुलिस कांस्टेबल के खिलाफ दर्ज राजद्रोह के मामले को खारिज कर दिया है। उसने वर्ष 2016 में अखिल कर्नाटक पुलिस महा संघ (वेलफेयर बॉडी) नामक एक पुलिस एसोसिएशन का गठन किया था। उस पर आरोप लगा था कि वह पुलिस के निचले पायदान के कर्मचारियों को मौजूदा चुनी हुई सरकार के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए भड़का रहा है।जस्टिस हेमंत चंदनगौदर की एकल पीठ ने वी शशिधर और अन्य द्वारा दायर याचिकाओं की अनुमति दी, जिन पर आईपीसी की धारा 124 ए, 166 सहपठित धारा 120 (बी) और 109, कर्नाटक आवश्यक सेवा...
POCSO एक्ट आरोपियों पर सबूतों का भार डालता है, सीआरपीसी की धारा 311 के तहत महत्वपूर्ण गवाहों को समन करने की अनुमति दी जानी चाहिए : कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने POCSO (लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (The Protection Of Children From Sexual Offences Act, 2012) एक्ट के तहत दायर मुकदमे के संबंध में कहा कि अभियुक्त द्वारा सीआरपीसी की धारा 311 के तहत महत्वपूर्ण गवाहों को समन करने के लिए किए गए आवेदन को सामान्य रूप से अनुमति दी जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि यह अनुमति तब तक दी जानी चाहिए जब तक अदालत इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच जाती आरोप गलत या सही है।जस्टिस एम नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने पेरियास्वामी एम द्वारा दायर...
धर्मशास्त्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के 78 छात्रों ने 'उपचारात्मक' कक्षाओं के लिए अत्यधिक फीस लेने के फैसले को चुनौती देते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का रुख किया
धर्मशास्त्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, जबलपुर के 78 छात्रों ने सत्रांत परीक्षा में बैठने के लिए उपचारात्मक कक्षाओं (Remedial Classes) के लिए 7500 रुपए प्रति विषय फीस लेने के यूनिवर्सिटी प्रशासन के निर्णय को चुनौती देते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (जबलपुर पीठ) का रुख किया है।छात्रों का कहना है कि उन्हें पहले ही सत्रांत परीक्षा लिखने से रोक दिया गया है, इसलिए उन्हें सत्रांत परीक्षा लिखने के लिए पात्र बनने के लिए उपचारात्मक कक्षाओं के नाम पर प्रति विषय 7500 रुपए का भुगतान करने के लिए कैसे कहा जा सकता...
रिट कोर्ट बैंकों और उधारकर्ता के बीच लेन-देन का परीक्षण नहीं कर सकता क्योंकि वह प्रकृति में अनिवार्य अनुबंध हैं : कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि रिट अदालतों के पास बैंकों के "विवेकपूर्ण निर्णयों" का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए न तो साधन हैं और न ही विशेषज्ञता है जो व्यापार में संचित ज्ञान के साथ उनके वाणिज्यिक लेनदेन के सामान्य पाठ्यक्रम में किए जाते हैं।जस्टिस कृष्णा एस दीक्षित की एकल पीठ ने इस प्रकार मेसर्स नितेश रेजीडेंसी होटल्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर एक याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें यस बैंक द्वारा दी गई सभी क्रेडिट सुविधाओं को वापस लेने को चुनौती दी गई थी। फर्म ने सरफेसी अधिनियम के तहत जारी किए...
अभियुक्तों के लिए एनआई अधिनियम की धारा 139 के तहत अनुमान का खंडन करने के लिए सबूत का मानक 'संभावनाओं की प्रबलता' का है: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने दोहराया है कि जब नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट (एनआई) एक्ट की धारा 138 के तहत एक आरोपी को चेक धारक के पक्ष में अनुमान का खंडन करना होता है, तो ऐसा करने के लिए सबूत का मानक 'संभावनाओं की प्रबलता' है।यह टिप्पणी जस्टिस दीपक रोशन की ओर से आई:"यद्यपि अधिनियम की धारा 138 चेक के बाउंस होने के संबंध में एक मजबूत आपराधिक उपाय निर्दिष्ट करती है, धारा 139 के तहत खंडन योग्य अनुमान मुकदमेबाजी के दौरान अनुचित देरी को रोकने के लिए एक उपाय है। अनिवार्य औचित्य के अभाव में, 'रिवर्स ओनस क्लॉज' आमतौर पर...
केवल शादी की सही तारीख का उल्लेख न होने पर तलाक की अर्जी खारिज नहीं की जा सकती: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक के लिए आवेदन में केवल शादी की सही तारीख का उल्लेख न होने आवेदन को खारिज करने का कारण नहीं हो सकता।जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने कहा कि अगर फैमिली कोर्ट को संदेह है कि शादी के पहलू पर निष्कर्ष अनिर्णायक हैं तो वह पक्षकारों से सवाल पूछने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 के तहत शक्तियों का प्रयोग कर सकती है, ताकि आवेदन में किए गए कथनों की सत्यता सत्यापित किया जा सके।वर्तमान अपीलकर्ता द्वारा फैमिली कोर्ट द्वारा पारित जजमेंट/डिक्री का विरोध...
बिलकिस बानो गैंग रेप केस: गुजरात सरकार ने छूट नीति के तहत आजीवन कारावास की सजा काट रहे 11 दोषियों को रिहा करने का निर्देश दिया
गुजरात के 2002 बिलकिस बानो गैंग रेप मामले (Bilkis Bano Gang Rape Case) में उम्रकैद की सजा पाने वाले 11 दोषियों को गुजरात सरकार की छूट नीति के तहत सोमवार को गोधरा जेल से रिहा कर दिया गया।2002 के गुजरात दंगों (Gujarat Riots) के दौरान बानो के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था।जनवरी 2008 में मुंबई की एक विशेष सीबीआई अदालत ने गुजरात में गोधरा के बाद के सांप्रदायिक दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार और उसके परिवार के सात सदस्यों के हत्या के दोषी पाए जाने के बाद 11 दोषियों को आजीवन...
संविदात्मक अनुबंध के लिए सहमति देने वाला कामगार औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25 एफ का लाभ नहीं उठा सकता: गुजरात हाईकोर्ट
गुजरात हाईकोर्ट ने दोहराया कि रोजगार के सहमति पत्र में नियुक्ति अनुबंध के आधार पर विशिष्ट शर्त दी जाती है तो ऐसे में कर्मचारी प्रतिवादी प्रतिष्ठान द्वारा औद्योगिक विवाद अधिनियम धारा 25 (एफ) के उल्लंघन के तहते किसी भी लाभ का दावा नहीं कर सकता।वर्तमान याचिका वरिष्ठ अधिकारी पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए श्रम न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर की गई है। इसमें कहा गया कि श्रम न्यायालय को यह मानना चाहिए कि संविदा नियुक्ति केवल 'छलावरण' है और वह छंटनी मुआवजे की हकदार है।प्रतिवादी ने जोर देकर कहा कि...
POCSO Act-यह असंभव है कि जिस नाबालिग का शिक्षक द्वारा यौन शोषण किया जा रहा हो, वह अपने माता-पिता/दोस्तों से शिकायत नहीं करेगी : पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में पॉक्सो एक्ट(लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012) के तहत आरोपी और सजा पाए एक स्कूल शिक्षक को बरी करते हुए कहा है कि यह बहुत ही असंभव है कि एक नाबालिग लड़की जिसका उसके शिक्षक द्वारा एक से अधिक अवसरों पर यौन शोषण किया गया हो, वह इस तथ्य का खुलासा अपने माता-पिता या उसके शिक्षक या उसके किसी कक्षा के साथी के समक्ष नहीं करेगी।जस्टिस जीएस संधावालिया और जस्टिस विकास सूरी की खंडपीठ ने आगे कहा कि एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी ने सभी सबूत मिटा दिए हैं।...
मोटर दुर्घटना | मृतक की आय के साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफलता न्यूनतम वेतन के निम्नतम स्तर को अपनाने को उचित नहीं ठहराती: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि दावेदार का मृतक की मासिक की आय दिखाने के लिए दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने में असमर्थ होने पर आय की गणना करते समय न्यूनतम वेतन के निम्नतम स्तर को अपनाने का औचित्य नहीं होना चाहिए।जस्टिस ज्योत्सना रेवाल दुआ ने उक्त टिप्पणी मृतक की मां को क्लेम ट्रिब्यूनल द्वारा 15,85,000 रुपए का मुआवाजा दिए जाने के आदेश के खिलाफ बीमा कंपनी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की।ट्रिब्यूनल ने मृतक की मासिक आय 10,000/- के रूप में निर्धारित की, जबकि अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि मृतक...
एससी/एसटी एक्ट| संज्ञान और समन जारी करने के आदेशों के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 482 के तहत आवेदन सुनवाई योग्य: उड़ीसा हाईकोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से अलग राय दी
उड़ीसा हाईकोर्ट ने यह मानते हुए कि संज्ञान लेने और समन जारी करने का आदेश अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 14-ए (1) के तहत अपील योग्य होगा, यह भी माना है कि ऐसे आदेशों को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 482 के तहत चुनौती दी जा सकती है।जस्टिस आदित्य कुमार महापात्र की एकल पीठ का विचार था कि हाईकोर्ट के पास धारा 482 के तहत निहित शक्ति है, जिसे किसी भी कानून के प्रावधानों द्वारा निर्देशित और नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। ऐसा कहकर हाईकोर्ट ने हाल ही में...
COVID-19 लॉकडाउन उल्लंघन: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने विदेश से लौटे व्यक्ति को आईपीसी की धारा 269 के तहत इंफेक्शन फैलाने के आरोप से बरी किया
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में विदेश से लौटे व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) की धारा 269 के तहत इंफेक्शन फैलाने के आरोप से बरी किया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने व्यक्ति पर आईपीसी की धारा 188, 269 और 270 के तहत दर्ज एफआईआर भी रद्द कर दी।याचिकाकर्ता को पुलिस ने देश में COVID-19 लॉकडाउन की अवधि के दौरान चंडीगढ़ प्रशासन को कनाडा से आने के बारे में सूचित नहीं करने पर गिरफ्तार कर किया था। पुलिस ने उसके खिलाफ एफआईआर की थी।जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज की पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा...
पति के बार-बार ताने देना और अन्य महिलाओं से तुलना मानसिक क्रूरता के समान: केरल हाईकोर्ट
केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि पति द्वारा पत्नी के उसकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरने के संबंध में बार-बार ताने देना और अन्य महिलाओं के साथ उसकी तुलना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आती है, जैसा कि विवाह भांग करने के उद्देश्य लिए तलाक अधिनियम 1869 की धारा 10 (x) में प्रावधान दिया गया है।जस्टिस अनिल के नरेंद्रन और जस्टिस सी.एस. सुधा की खंडपीठ ने कहा कि पति या पत्नी का आचरण क्रूरता के दायरे में आने के लिए यह इस आधार पर 'गंभीर और वजनदार' होना चाहिए कि याचिकाकर्ता के पति या पत्नी के दूसरे पति या...
दिल्ली हाईकोर्ट ने गिरफ्तार आप नेता सत्येंद्र जैन को 'अस्वस्थ दिमाग का व्यक्ति' घोषित करने की मांग वाली याचिका में आदेश सुरक्षित रखा
दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को उस जनहित याचिका में आदेश सुरक्षित रख लिया, जिसमें आप नेता सत्येंद्र जैन को 'विकृत व्यक्ति' घोषित करने की मांग की गई, जिसके आधार पर उन्हेंदिल्ली विधानसभा से अयोग्य घोषित करने की मांग की गई है।जैन वर्तमान में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा जांच किए जा रहे मनी लॉन्ड्रिंग मामले में न्यायिक हिरासत में हैं।मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की खंडपीठ ने आशीष कुमार श्रीवास्तव द्वारा दायर याचिका में आदेश सुरक्षित रख लिया। याचिकाकर्ता ने सामाजिक...
सबूत का बोझ कभी नहीं बदलता, जबकि सबूत के मूल्यांकन में 'सबूत का दायित्व' लगातार बदलता रहता है: त्रिपुरा हाईकोर्ट
त्रिपुरा हाईकोर्ट ने हाल ही में 'सबूत के बोझ' (Proof of burden) और 'सबूत के दायित्व' (Onus of proof) के बीच अंतर समझाया। जस्टिस टी अमरनाथ गौड़ ने कहा कि सबूत का बोझ एक ऐसे व्यक्ति पर होता है, जिसे किसी विशेष तथ्य को साबित करना होता है और यह कभी नहीं बदलता है।पीठ ने कहा कि सबूतों के मूल्यांकन में 'सबूत का दायित्व' बदल जाता है और इस तरह के दायित्व का स्थानांतरण एक सतत प्रक्रिया है।कोर्ट ने यह टिप्पणी संपत्ति विवाद के संबंध में दायर दूसरी अपील में की है। मूल वादी, यहां प्रतिवादी ने, क्रमशः आवंटन...
अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करने का पैमाना जेंडर नहीं: झारखंड हाईकोर्ट ने मृतक कर्मचारी की विवाहित बेटी को राहत दी
झारखंड हाईकोर्ट ने हाल ही में एक मृतक कर्मचारी की विवाहित बेटी को राहत दी, जिसे झारखंड ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड ने अनुकंपा नियुक्ति से वंचित कर दिया था। जस्टिस एसएन पाठक ने कहा कि यह मामला एक उदाहरण है, जहां अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदक के साथ लिंग के आधार पर "भेदभाव" किया गया था। याचिकाकर्ता ने प्रस्तुत किया कि उसके दावे को खारिज करने वाला आक्षेपित आदेश लैंगिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त है, क्योंकि यदि मृतक कर्मचारी का बेटा अनुकंपा के आधार पर रोजगार के लिए विचार क्षेत्र में आता है तो इसका कोई कारण...


















