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सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धाराएँ 77A, 77B और 78 : अपराधों की जांच का अधिकार
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (Information Technology Act, 2000) भारत में डिजिटल माध्यमों से संबंधित अपराधों को नियंत्रित करने वाला एक प्रमुख कानून है। इस अधिनियम के तहत, न केवल तकनीकी सुरक्षा और इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन की वैधता को मान्यता दी गई है, बल्कि इसने डिजिटल अपराधों से निपटने की विधिक प्रक्रिया भी निर्धारित की है। इस लेख में हम विशेष रूप से धाराओं 77A, 77B और 78 को विस्तार से समझेंगे जो दंड प्रक्रिया, अपराधों की प्रकृति तथा जांच से संबंधित हैं।धारा 77A: अपराधों का संधि (Compounding of...
क्या PoSH Act के तहत जांच समितियों को बिना प्रक्रिया अपनाए सजा देने का अधिकार है?
पीड़िता को न्याय देने और आरोपी के अधिकारों के बीच संतुलनसुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए ऐतिहासिक फैसले ऑरेलियानो फर्नांडिस बनाम गोवा राज्य (2023) में यह स्पष्ट किया गया कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment) की शिकायतों की जांच में प्रकृतिक न्याय (Natural Justice) और न्यायिक प्रक्रिया (Procedural Fairness) को अनदेखा नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह निर्णय न केवल आरोपी के अधिकारों की रक्षा के लिए दिया, बल्कि PoSH कानून के तहत गठित आंतरिक समिति (Internal Complaints Committee – ICC) की...
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 204 से 210: विभाजन की प्रक्रिया और ज़मीनों का न्यायसंगत आवंटन
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 के अंतर्गत भूमि के विभाजन की प्रक्रिया को पूरी तरह व्यवस्थित किया गया है। जहां पहले की धाराओं में यह बताया गया कि विभाजन कैसे किया जा सकता है – आपसी सहमति, मध्यस्थता या कलेक्टर द्वारा – वहीं धाराएं 204 से 210 तक यह बताती हैं कि विभाजन की क्रियात्मक प्रक्रिया किस तरह से की जाएगी, कौन अधिकारी क्या करेगा, अमीन की भूमिका क्या होगी, किस तरह से दावे और आपत्तियां निपटाई जाएंगी, और कैसे ज़मीनों का संतुलित और न्यायसंगत बंटवारा किया जाएगा। यह लेख इन सभी धाराओं की सरल,...
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 523 से 526 : हाईकोर्ट द्वारा नियम बनाने की शक्ति
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 का अंतिम अध्याय, अध्याय 39 (मिश्र विषय – Miscellaneous), ऐसे विविध और व्यावहारिक विषयों को शामिल करता है जिनका संबंध न्यायिक प्रशासन, नैतिकता, और संस्थागत मर्यादा से है।इस लेख में हम विशेष रूप से धारा 523 से धारा 526 तक का गहराई से सरल हिंदी में अध्ययन करेंगे। ये धाराएँ न्यायालयों के संचालन में पारदर्शिता, निष्पक्षता और नैतिक शुचिता बनाए रखने हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनमें याचिका लेखक (Petition-writers) के लिए नियम बनाने से लेकर न्यायाधीशों और...
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धाराएं 200 से 203: आपसी सहमति, मध्यस्थता, कलेक्टर द्वारा विभाजन और विभाजन
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धाराएं 200 से 203 तक की विधिक व्यवस्था भूमि के विभाजन (Partition) की प्रक्रिया को तीन अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत करती हैं — पहला, जब पक्षकार आपसी सहमति से विभाजन करते हैं; दूसरा, जब वे मध्यस्थों (Arbitrators) की सहायता लेते हैं; और तीसरा, जब मतभेद या विवाद के कारण कलेक्टर को स्वयं विभाजन करना पड़ता है।साथ ही यह भी बताया गया है कि कलेक्टर द्वारा किए गए विभाजन में खर्च का अनुमान और भुगतान किस प्रकार किया जाएगा। इस लेख में इन चारों धाराओं को आसान हिंदी में,...
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धाराएं 73 से 77: डिजिटल प्रमाणपत्र, धोखाधड़ी, अंतरराष्ट्रीय अपराध और जब्ती
डिजिटल युग में इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर और उससे संबंधित प्रमाणपत्रों की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गई है। किसी व्यक्ति की पहचान, लेनदेन की वैधता और दस्तावेज़ की प्रमाणिकता को सुनिश्चित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर का प्रयोग किया जाता है।परंतु, जब इनका दुरुपयोग किया जाता है या झूठे प्रमाणपत्र प्रकाशित किए जाते हैं, तो इससे न केवल डिजिटल विश्वास पर आघात होता है बल्कि साइबर अपराध को भी बढ़ावा मिलता है। इसलिए, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धाराएं 73 से 77 ऐसे ही अपराधों और उनके परिणामों...
क्या सीनियर एडवोकेट का दर्जा देने की प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी और समावेशी बनाया जाना चाहिए?
भारत में एडवोकेट्स एक्ट, 1961 (Advocates Act, 1961) की धारा 16 (Section 16) के अंतर्गत सीनियर एडवोकेट का दर्जा एक विशेष सम्मान (Recognition of Excellence) के रूप में दिया जाता है। यह दर्जा उन वकीलों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने अपने उत्कृष्ट वकालत कौशल (Advocacy Skills), विधिक ज्ञान (Legal Knowledge), और कानून के विकास (Development of Law) में विशेष योगदान दिया हो।लेकिन इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और पक्षपात के आरोपों के चलते सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा जयसिंह बनाम भारत का सर्वोच्च...
Right to Information Act धारा 6 के प्रावधान
इस एक्ट की धारा 6 सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया बताती है। यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से कोई आवेदक सूचना प्राप्त कर सकता है। धारा 6 के अनुसार-(1) कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन कोई सूचना अभिप्राप्त करना चाहता है, लिखित में या इलेक्ट्रानिक युक्ति के माध्यम से अंग्रेजी या हिन्दी में या उस क्षेत्र की, जिसमें आवेदन किया जा रहा है, राजभाषा में ऐसी फीस के साथ, जो विहित की जाए(क) संबंधित लोक प्राधिकरण के यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी।(ख) यथास्थिति,...
Right to Information Act में गवर्नमेंट अथॉरिटी की सूचना देने की जिम्मेदारी
इस एक्ट की धारा 4 के अंतर्गत लोक अधिकारी को सूचना दिया जाना आवश्यक बनाया गया है, यह लोक सेवक को आदेशात्माक रूप से जिम्मेदारी के साथ सूचना प्रदान करनी होती है। धारा 4 के अनुसार-(1) प्रत्येक लोक प्राधिकारी(क) अपने सभी अभिलेखों को सम्यक् रूप से सूचीपत्रित और अनुक्रमणिकाबद्ध ऐसी रीति और रूप में रखेगा, जो इस अधिनियम के अधीन सूचना के अधिकार को सुकर बनाता है और सुनिश्चित करेगा कि ऐसे सभी अभिलेख, जो कंप्यूटरीकृत किये जाने के लिए समुचित हैं, युक्तियुक्त समय के भीतर और संसाधनों की उपलभ्यता के अधीन रहते...
Right to Information Act में लोक सेवकों से सूचना प्राप्त करना
इस एक्ट की धारा 3 भारत के नागरिकों को शासकीय सेवकों से सूचना प्राप्त करने का अधिकार देती है एवं शासकीय सेवकों का यह कर्तव्य होता है कि वह अपने विभाग की जन सूचनाओं को जारी किए जाने का अधिकार उन्हें प्राप्त है। वह सभी सूचनाओं को भारत के नागरिकों को दें। जब भी कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार की सूचना जिसे जारी किया जा सकता है किसी भी लोक सेवक से मांगता है तब उसका यह कर्तव्य होता है कि वह सूचना को मांगे गया क्रम में प्रस्तुत करें।मौखिक अनुदेश, आदेश, सुझायों पर कार्य नहीं करना है। उन्हें फाइल पर अनुदेश,...
Right to Information Act Section 3 के प्रावधान
इस एक्ट की इस धारा से सूचना का अधिकार मिलता है मतलब किसी भी व्यक्ति को शासकीय विभागों से एवं शासकीय अधिकारियों से सूचना मांगने का अधिकार मिलता है। यदि एक से अधिक व्यक्ति उसी प्रकार की सूचना की मांग करते हैं, तो उसे लोक सूचना अधिकारियों द्वारा सभी अनुरोधकर्ताओं को उपलब्ध कराया जाना चाहिए। नागरिक को उस सूचना की भी मांग करने का अधिकार दिया गया है, जिसे पहले ही अधिनियम के स्व-प्रकटन अपेक्षाओं के अनुसार प्रकट किया गया है। इसे नागरिक को प्रदान किया जाना चाहिए, जो लोक प्राधिकारी में ऐसी सूचना के लिए...
क्या संविधान पीठ के 2023 के फैसले के बाद दिल्ली सरकार को 'Services' पर नियंत्रण प्राप्त है?
दिल्ली में प्रशासनिक अधिकारों का संवैधानिक विवादसुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने Government of NCT of Delhi बनाम Union of India (2023) मामले में यह तय किया कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (NCTD) में प्रशासनिक सेवाओं (Services) का नियंत्रण किसके पास होगा केंद्र सरकार के पास या चुनी हुई दिल्ली सरकार के पास। इस फैसले में संविधान के Article 239AA की व्याख्या की गई, खासकर उस वाक्यांश की, जिसमें कहा गया है "insofar as any such matter is applicable to Union Territories"। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि...
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 194 से 199: हिस्सेदारी के लंबित निर्णय, प्रबंधन, मूल्यांकन और प्रारंभिक आदेश
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धाराएं 194 से 199 हिस्सेदारी की प्रक्रिया के उन महत्वपूर्ण चरणों को स्पष्ट करती हैं जो तब उत्पन्न होते हैं जब अपील लंबित हो, संपत्ति का अस्थायी प्रबंधन करना पड़े, मूल्यांकन का निर्धारण आवश्यक हो, या विभाजन से पहले कोई प्रारंभिक आदेश देना हो।यह धाराएं प्रशासनिक प्रावधानों के साथ-साथ न्यायिक प्रक्रिया को भी संतुलित करती हैं और भूमि के न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश प्रदान करती हैं। इस लेख में इन सभी धाराओं की सरल भाषा में व्याख्या की गई है ताकि...
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 520 से 522 : हाईकोर्ट द्वारा किसी अपराध की सुनवाई की प्रक्रिया
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) के अंतिम अध्याय अर्थात अध्याय 39 में विविध (Miscellaneous) प्रावधान शामिल किए गए हैं। ये प्रावधान मुख्य रूप से तीन विशिष्ट क्षेत्रों को संबोधित करते हैं:1. जब हाईकोर्ट स्वयं किसी अपराध की सुनवाई करता है (धारा 520) 2. जब अपराध सशस्त्र बलों (armed forces) से संबंधित व्यक्ति द्वारा किया गया हो (धारा 521) 3. कानूनी प्रक्रियाओं में प्रयुक्त होने वाले निर्धारित प्रपत्रों (forms) की वैधता और उपयोग (धारा 522) यह लेख इन...
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 71, 72 और 72A: डिजिटल युग में गोपनीयता, अनुबंध और ई-हस्ताक्षर धोखाधड़ी
आज के समय में जब हर छोटी-बड़ी जानकारी डिजिटल रूप में संग्रहीत की जा रही है और सरकारी व निजी सेवाएं इंटरनेट, मोबाइल ऐप और क्लाउड टेक्नोलॉजी जैसे माध्यमों पर आधारित हैं, तब गोपनीयता (Privacy), भरोसे (Trust) और वैधानिक अनुबंधों (Lawful Contracts) का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।एक ओर हम डिजिटल सेवाओं से अपने कामकाज को आसान बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इन सेवाओं के दुरुपयोग की आशंका भी बढ़ती जा रही है। इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 में कुछ कठोर प्रावधान शामिल...
Right to Information Act में सूचना के अधिकार का अर्थ
इस अधिनियम के अधीन नागरिक को सूचना का अधिकार दिया गया है, जिसका तात्पर्य सभी लोक प्राधिकारियों से सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। सूचना के अधिकार को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है, इसमें कार्यों, दस्तावेजों और अभिलेखों का निरीक्षण करने और दस्तावेजों/अभिलेखों/नमूनों का टिप्पण, उद्धरण या प्रमाणित प्रतियाँ लेने तथा मुद्रित या इलेक्ट्रानिक प्ररूप में सूचना, उदाहरणार्थ प्रिंट आउट, डिस्केट, फ्लापो, टेप इत्यादि अभिप्राप्त करने का अधिकार शामिल है। लेकिन, दो शर्तें नागरिक द्वारा अधिनियम के अधीन कोई...
Right to Information Act की धारा 2 के प्रावधान
इस एक्ट की धारा 2 में परिभाषाएं दी गयी हैं, यह परिभाषा वह हैं जिनसे इस एक्ट की ईमारत खड़ी होती है। धारा 2 इस प्रकार हैइस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,(क) "समुचित सरकार" से किसी ऐसे लोक प्राधिकरण के संबंध में जो-(i) केन्द्रीय सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन द्वारा स्थापित, गठित, उसके स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन या उसके द्वारा प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा पूर्णतया वित्तपोषित किया जाता है, केन्द्रीय सरकार अभिप्रेत है।(ii) राज्य सरकार...
वाद की सीमा के अपवाद : भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 516 से 519
भूमिकाभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) के अध्याय 38 में यह प्रावधान किया गया है कि कुछ अपराधों को एक निश्चित अवधि (Limitation Period) के भीतर ही संज्ञान में लिया जा सकता है। यह व्यवस्था मुख्यतः छोटे और मध्यम स्तर के अपराधों पर लागू होती है ताकि मुकदमे समयबद्ध रूप से पूरे किए जा सकें और न्यायिक संसाधनों का समुचित उपयोग हो। हालांकि, कई परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जिनमें वाद की सीमा की सामान्य गणना न्याय के हित में नहीं होती। इन विशेष परिस्थितियों को...
क्या 2015 के संशोधन के बाद दाखिल Section 11 की याचिकाओं पर नया कानून लागू होता है, जब Arbitration पहले ही शुरू हो चुका हो?
परिचय (Introduction): क्या कोर्ट Arbitrator की नियुक्ति में सीमित भूमिका निभा सकता है?सुप्रीम कोर्ट ने Shree Vishnu Constructions बनाम Engineer-in-Chief, Military Engineering Services (2023) में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न का निपटारा किया। सवाल यह था कि Arbitration and Conciliation (Amendment) Act, 2015 की Section 11(6A) की सीमित भूमिका वाली व्यवस्था उन मामलों पर लागू होगी या नहीं, जहाँ Arbitration की प्रक्रिया तो संशोधन से पहले शुरू हुई थी, लेकिन Section 11 की याचिका संशोधन के बाद दाखिल की गई।...
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धाराएं 70, 70A और 70B: महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना की सुरक्षा और भारत की साइबर सुरक्षा
आज के डिजिटल युग में जब सरकारी कामकाज, बैंकिंग, स्वास्थ्य सेवाएं, परिवहन, संचार और रक्षा जैसे तमाम महत्वपूर्ण क्षेत्र कंप्यूटर नेटवर्क और इंटरनेट आधारित प्रणालियों पर निर्भर हो चुके हैं, तो यह आवश्यक हो गया है कि इन प्रणालियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखी जाए।इन प्रणालियों को यदि नुकसान पहुँचता है या वे काम करना बंद कर देती हैं, तो इसका प्रभाव सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामान्य जनजीवन पर पड़ सकता है। इसी दृष्टिकोण से सूचना...




















