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सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 82 से 84C : केंद्र सरकार का राज्य सरकार को निर्देश देने का अधिकार
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 भारत में डिजिटल दुनिया को नियंत्रित करने वाला एक प्रमुख कानून है। यह अधिनियम साइबर अपराध, इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज, डिजिटल साक्ष्य, और ऑनलाइन लेन-देन जैसे विषयों को कानूनी रूप से परिभाषित करता है। इस अधिनियम की धाराएं 82 से 84C उन प्रावधानों से जुड़ी हैं जो अधिकारियों के कर्तव्यों, उनके अधिकारों, संरक्षण और अपराध के प्रयास व उकसावे से संबंधित हैं। यह लेख इन धाराओं का सरल और व्यावहारिक विश्लेषण करता है ताकि आम पाठक भी इन कानूनी प्रावधानों को आसानी से समझ सकें। धारा...
राजस्थान भू राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 221 से 224: कम मूल्यांकित सम्पत्ति से अधिक मूल्यांकित सम्पत्ति को भुगतान
धारा 221 – कम मूल्यांकित सम्पत्ति से अधिक मूल्यांकित सम्पत्ति को भुगतान (Under-Assessed Estates to Refund to Over-Assessed Estates)धारा 221 का उद्देश्य विभाजन की प्रक्रिया में हुए राजस्व मूल्यांकन की गलतियों को ठीक करना है। यदि विभाजन के बाद यह पाया जाता है कि किसी संपत्ति का मूल्यांकन कम हो गया था (अर्थात कम लगान निर्धारित हुआ) और किसी अन्य संपत्ति पर अधिक लगान लग गया था, तो अधिक लाभ में रहने वाले संपत्ति स्वामी से तीन वर्षों तक प्रतिवर्ष उस राशि की भरपाई करवाई जा सकती है जितनी राशि से उसका...
Sales of Goods Act, 1930 की धारा 4 और 5 : बिक्री और बेचने का समझौता
बिक्री और बेचने का समझौता (Sale and Agreement to Sell)माल विक्रय अधिनियम (Sales of Goods Act), 1930 का अध्याय II अनुबंध के निर्माण (Formation of the Contract) से संबंधित है, और इसकी धारा 4 बिक्री (Sale) और बेचने के समझौते (Agreement to Sell) की अवधारणाओं (Concepts) को परिभाषित करती है। धारा 4(1) के अनुसार, माल की बिक्री का अनुबंध (Contract of Sale of Goods) एक ऐसा अनुबंध है जिसके तहत विक्रेता (Seller) एक कीमत (Price) के बदले में खरीदार (Buyer) को माल में संपत्ति (Property in Goods) हस्तांतरित...
Right to Information Act में अपील की व्यवस्था
इस एक्ट की धारा 19 में अपील की व्यवस्था की गयी है जिसके अनुसार,(1) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे धारा 7 की उपधारा (1) या उपधारा (3) के खण्ड (क) में विनिर्दिष्ट समय के भीतर कोई विनिश्चय प्राप्त नहीं हुआ है या जो, यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के किसी विनिश्चय से व्यथित है, उस अवधि की समाप्ति से या ऐसे किसी विनिश्चय की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर ऐसे अधिकारी को अपील कर सकेगा, जो प्रत्येक लोक प्राधिकरण में, यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या लोक सूचना अधिकारी की...
Right to Information Act में धारा 18 के प्रावधान
इस एक्ट की धारा 18 इनफार्मेशन कमीशन के पॉवर्स के संबंध में है जो इस प्रकार है(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यथास्थिति केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह निम्मलिखित किसी ऐसे व्यक्ति से शिकायत प्राप्त करे और उसकी जांच करे(क) जो, यथास्थिति, किसी केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी को, इस कारण से अनुरोध प्रस्तुत करने में असमर्थ रहा है कि इस अधिनियम के अधीन ऐसे अधिकारी की नियुक्ति नहीं की गई है या, यथास्थिति, केन्द्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी...
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 80, 81 और 81A के अंतर्गत साइबर अपराधों से निपटने की कानूनी व्यवस्था
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (Information Technology Act, 2000) डिजिटल युग में भारत का एक प्रमुख कानून है जो कंप्यूटर, इंटरनेट, साइबर अपराध और इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन से संबंधित पहलुओं को नियंत्रित करता है।अध्याय XIII अधिनियम के विविध प्रावधानों (Miscellaneous Provisions) से संबंधित है, जो पुलिस अधिकारियों के विशेष अधिकारों, अधिनियम की सर्वोपरिता, और इलेक्ट्रॉनिक चेक से जुड़े नियमों को स्पष्ट करता है। इस लेख में हम विशेष रूप से धाराएं 80, 81 और 81A को विस्तारपूर्वक सरल भाषा में समझेंगे। धारा...
Sales of Goods Act : माल विक्रय अधिनियम का परिचय
माल विक्रय अधिनियम का परिचय (Introduction to the Sales of Goods Act)माल विक्रय अधिनियम (Sales of Goods Act) कानून का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो वस्तुओं की बिक्री के लिए अनुबंधों (Contracts) को नियंत्रित करता है। भारत में, संबंधित कानून माल विक्रय अधिनियम, 1930 (Sale of Goods Act, 1930) है। यह अधिनियम चल संपत्ति (Movable Property) के हस्तांतरण (Transfer) से जुड़े जटिल लेन-देन (Transactions) को संबोधित करने के लिए एक विशिष्ट कानूनी ढांचे की आवश्यकता से उत्पन्न हुआ। इसके अधिनियमन (Enactment) से...
राजस्थान भू राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 216 से 220: विभाजन का दस्तावेजीकरण
धारा 216 – अंतिम विभाजन आदेश (Final Order for Partition)धारा 216 में कलेक्टर के द्वारा जारी अंतिम विभाजन आदेश का स्वरूप स्पष्ट रूप से बताया गया है। इस आदेश में निम्नलिखित महत्वपूर्ण जानकारी शामिल होती है: एक तो विभाजित हिस्सों को प्राप्त भूमि की श्रेणी मसलन खेती योग्य भूमि, भवन भूमि, बगीचा या बावली क्षेत्र का वर्णन करना होता है। इसके साथ ही राज्यों को यह भी बताना होता है कि हर हिस्सेदारी किस हिस्सेदार को कितनी भूमि मिली है और किस प्रकार की है। दूसरा, विभाजन के समय प्रत्येक हिस्से के...
क्या धारा 313 CrPC के तहत जरूरी सबूत आरोपी से पूछे बिना ट्रायल निष्पक्ष माना जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय राज कुमार @ सुमन बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) (2023) में इस महत्वपूर्ण बात पर जोर दिया गया कि आपराधिक मामलों में निष्पक्ष ट्रायल (Fair Trial) सुनिश्चित करने के लिए कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर, 1973 (Criminal Procedure Code – CrPC) की धारा 313 का सही और पूरी तरह से पालन किया जाना अनिवार्य है।इस प्रावधान के ज़रिये आरोपी को यह अवसर मिलता है कि उसके खिलाफ जो भी सबूत लाए गए हैं, उन पर वह अपनी सफाई (Explanation) दे सके। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी महत्वपूर्ण सबूत को...
Right to Information Act में सूचना की प्रक्रिया का अनुपालन
इस एक्ट से जुड़े एक प्रसिद्ध प्रकरण अरविन्द केजरीवाल बनाम सेण्ट्रल पब्लिक इन्फार्मेशन आफिसर, एआईआर 2012 डेलही 291 के प्रकरण में कहा गया है कि इस धारा के अधीन विहित प्रक्रिया का अनुपालन गोपनीय सूचना के मामले में किया जाना चाहिए, जब सूचना पर पक्षकार से सम्बन्धित है या पर पक्षकार द्वारा प्रदान की जाती है।आर० के० जैन बनाम भारत संप, ए आई आर 2013 दिल्ली 24 के मामले में कहा गया है कि सूचना केवल तब प्रदान की जा सकती है, जब मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा आज्ञापक प्रक्रिया का पालन करने के पश्चात् यह राय बनाई गई...
Right to Information Act की सेक्शन 11 के प्रावधान
इस एक्ट की धारा 11 इस प्रकार है-पर व्यक्ति सूचना - (1) जहाँ, यथास्थिति, किसी केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी का, इस अधिनियम के अधीन किए गए अनुरोध पर कोई ऐसी सूचना या अभिलेख या उसके किसी भाग को प्रकट करने का आशय है, जो किसी पर व्यक्ति से संबंधित है या उसके द्वारा इसका प्रदाय किया गया है और उस पर व्यक्ति द्वारा उसे गोपनीय माना गया है, वहाँ, यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी अनुरोध प्राप्त होने से पांच दिन के भीतर, ऐसे पर व्यक्ति को अनुरोध की -...
क्या IBC की धारा 7 के तहत डिफॉल्ट साबित होने के बाद आवेदन खारिज किया जा सकता है?
भूमिका (Introduction): IBC की धारा 7 (Section 7) की व्याख्यासुप्रीम कोर्ट ने एम. सुरेश कुमार रेड्डी बनाम केनरा बैंक एवं अन्य (2023) के फैसले में इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 (Insolvency and Bankruptcy Code – IBC) की धारा 7 की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया कि यदि कोई फाइनेंशियल डिफॉल्ट (Financial Default) साबित हो जाए, तो नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के पास उस आवेदन को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। कोर्ट ने यह भी कहा कि IBC एक क्रेडिटर-चालित (Creditor-Driven) कानून...
इंटरनेट कंपनियों की ज़िम्मेदारी और छूट: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79
अध्याय बारह: सीमित उत्तरदायित्व - मध्यस्थ (Intermediary) की भूमिका और छूटइंटरनेट की दुनिया में जब भी हम किसी वेबसाइट पर कुछ पोस्ट करते हैं, किसी वीडियो प्लेटफॉर्म पर वीडियो डालते हैं, या सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं, तब उस प्लेटफॉर्म का संचालन करने वाली कंपनी "मध्यस्थ" (Intermediary) की भूमिका निभाती है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 इसी विषय से संबंधित है और बताती है कि किन परिस्थितियों में ये प्लेटफॉर्म, कंपनियां या वेबसाइट्स कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त (Exempted from...
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धाराएं 529 से 531: अधीनस्थ न्यायालयों पर हाईकोर्ट की निगरानी
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023) का अंतिम भाग अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें न्यायालयों की निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रियाओं की मान्यता और पुराने कानून (दंड प्रक्रिया संहिता, 1973) को निरस्त करने के साथ-साथ संक्रमण संबंधी व्यवस्थाओं को भी विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।इस लेख में हम धारा 529, 530 और 531 का विस्तृत और सरल हिंदी में विश्लेषण करेंगे। ये धाराएं आधुनिक भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की नई दिशा को रेखांकित करती हैं, जो पारंपरिक विधियों...
राजस्थान भू राजस्व अधिनियम, 1956 की धाराएं 211 से 216: संपत्ति विभाजन के विशेष प्रावधान, साझा संरचना और राजस्व वितरण
धारा 211 – एक सह स्वामी के हिस्से में दूसरे द्वारा बनाई गई इमारतों, बागों या बगीचों का न्यायसंगत पुनर्वितरणजब संपत्ति का विभाजन किया जा रहा हो, और किसी सह स्वामी के हिस्से में ऐसी जमीन आ रही हो जिस पर दूसरे सह स्वामी ने अपना आवास, भवन, बगीचे, वृक्षारोपण या अन्य सुधार अपने खर्च पर किया है, तो उस सुधारकर्ता को उस जमीन का अधिकार बना रहने दिया जाएगा। हालाँकि वह जमीन दूसरे सह स्वामी के हिस्से में आती है, लेकिन उसे कुछ स्थायी किराया देना होगा जिसे 'ग्राउंड रेंट' कहते हैं। इसमें कलेक्टर ही तय करेगा कि...
Right to Information Act में जानकारी दिए जाने का टाइम पीरियड
इस एक्ट के अधीन सूचना प्रदान करने के लिए 30 दिनों की समय सीमा की संगणना करने में लोक सूचना अधिकारी द्वारा अतिरिक्त/अग्रिम फीस की मांग करने और आवेदक द्वारा उसके अन्तिम भुगतान के मध्य की अवधि धारा 7 (3) (क) के अनुसार अधिनियम की धारा 7 (1) में नियत 30 दिनों की अवधि की संगणना करने में अपवर्जित की जाती है।आवेदन के निस्तारण की अवधि अधिनियम की धारा 7 या तो सूचना प्रदान करके या निवेदन को नामंजूर करके तीस दिनों के भीतर निवेदन के निस्तारण के लिए प्रावधान करती है। विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर सूचना के लिए...
Right to Information Act में जानकारी नहीं दिए जाने वाले विषय
इस एक्ट में कुछ विषय ऐसे भी हैं जिनकी जानकारी नहीं दी जाएगी। इस संबंध में धारा 8 है-(1) इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी व्यक्ति को निम्नलिखित सूचना देने की बाध्यता नहीं होगी:-(क) सूचना, जिसके प्रकटन से भारत को प्रभुता और अखण्डता, राज्य की सुरक्षा, रणनीति, वैज्ञानिक या आर्थिक हित, विदेश से संबंध पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो या किसी अपराध को करने का उद्दीपन होता हो।(ख) सूचना, जिसके प्रकाशन को किसी कोर्ट या अधिकरण द्वारा अभिव्यक्त रूप से निषिद्ध किया गया है या जिसके प्रकटन से कोर्ट...
Right to Information Act में किसी भी व्यक्ति को सूचना प्राप्त करने का अधिकार
इस एक्ट से जुड़े एक मामले दिवाकर एस० नटराजन बनाम स्टेट इन्फार्मेशन कमिश्नर ए आई आर 2009 के मामले में कहा गया है कि सूचना के लिए अनुरोध केवल लोक प्रयोजन के लिए होगा और सूचना प्राप्त करने के लिए अविवेकपूर्ण प्रयास न्यायोचित और उचित नहीं है।आवेदन का कोई विशिष्ट प्ररूप आवश्यक नहीं और सूचना की ईप्सा करने के लिए कोई कारण अपेक्षित नहीं:-सूचना की ईप्सा करने के लिए विशिष्ट प्ररूप को विहित करने के लिए कोई निर्देश आज्ञापक नहीं हो सकता और साधारण आवेदन की अपेक्षा को अभिभावी नहीं कर सकता, जैसा कि इस धारा में...
Right to Information Act में मांगी गई सूचना का निपटारा
इस संबंध में अधिनियम के भीतर धारा 7 है।(1) धारा 5 की उपधारा (2) के परन्तुक या धारा 6 की उपधारा (3) के परन्तुक के अधीन रहते हुए धारा 6 के अधीन अनुरोध के प्राप्त होने पर यथास्थिति, केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, यथा संभव शीघ्रता से, और किसी भी दशा में अनुरोध की प्राप्ति के तीस दिन के भीतर ऐसी फीस के संदाय पर, जो विहित की जाए या तो सूचना उपलब्ध कराएगा या धारा 8 और धारा 9 में विनिर्दिष्ट कारणों में से किसी कारण से अनुरोध को अस्वीकार करेगा:परन्तु जहाँ मांगी गई जानकारी का...
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528: हाईकोर्ट की Inherent Power
यह प्रावधान, धारा 528, अनिवार्य रूप से पुराने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की सुप्रसिद्ध धारा 482 का उत्तराधिकारी है। यह हाई कोर्ट (High Courts) को आपराधिक मामलों में हस्तक्षेप करने की एक विशेष, अंतर्निहित शक्ति (Inherent Power) देता है जब नियमों का कड़ाई से पालन करने से अनुचित परिणाम हो सकता है।"अंतर्निहित शक्ति" क्या है? (What is "Inherent Power"?) कानूनी अर्थों में "अंतर्निहित शक्ति" उस असाधारण अधिकार को संदर्भित करती है जो हाई कोर्ट (High Courts) के पास होता है, इसलिए नहीं कि यह कानून...




















