क्या राज्य विधान के तहत विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति UGC के नियमों के विपरीत हो सकती है?
Himanshu Mishra
23 Jan 2025 11:48 AM

भारत में उच्च शिक्षा का स्तर बनाए रखने और शैक्षणिक संस्थानों के संचालन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grants Commission - UGC) ने नियम बनाए हैं।
इनमें कुलपति (Vice-Chancellor) की नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता और प्रक्रिया का उल्लेख है। Gambhirdan K. Gadhvi v. State of Gujarat (2022) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य विधान (State Legislation) के तहत भी कुलपति की नियुक्ति UGC के नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकती।
UGC के नियमों का कानूनी महत्व (Legal Significance of UGC Regulations)
UGC अधिनियम, 1956 के तहत बनाए गए नियम केंद्र सरकार के अधीन हैं और इन्हें संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। इन नियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालयों में समन्वय और शैक्षणिक मानकों का निर्धारण करना है।
UGC विनियम, 2010 और 2018, कुलपति की नियुक्ति के लिए आवश्यक योग्यता और चयन प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हैं। इनमें कहा गया है कि कुलपति के पास विश्वविद्यालय प्रणाली में प्रोफेसर के रूप में कम से कम दस वर्षों का अनुभव होना चाहिए।
UGC नियम यह भी निर्धारित करते हैं कि चयन समिति (Search Committee) में UGC के अध्यक्ष या उनके नामांकित सदस्य शामिल होने चाहिए। ये प्रावधान सुनिश्चित करते हैं कि नियुक्ति पारदर्शी और निष्पक्ष हो।
राज्य विधान और UGC नियमों के बीच टकराव (Conflict Between State Legislation and UGC Regulations)
गुजरात के सरदार पटेल विश्वविद्यालय अधिनियम, 1955 (SPU Act) में कुलपति की नियुक्ति के लिए स्पष्ट योग्यता का उल्लेख नहीं है।
यह चयन समिति पर छोड़ दिया गया है कि वह अपनी मर्जी से पात्रता मानदंड निर्धारित करे। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चिंता व्यक्त की और कहा कि इस तरह की स्थिति से मनमानी, भाई-भतीजावाद और पक्षपात को बढ़ावा मिल सकता है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब UGC नियम केंद्रीय कानून के तहत आते हैं और राज्य सरकार को केंद्रीय वित्तीय सहायता मिल रही हो, तो राज्य और विश्वविद्यालयों को इन नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय (Key Judicial Precedents)
इस मामले में, कोर्ट ने कई पुराने फैसलों का हवाला दिया। Annamalai University v. Secretary to Government (2009) और Kalyani Mathivanan v. K.V. Jeyaraj (2015) में यह स्पष्ट किया गया था कि UGC के नियम सभी राज्यों और उनके विश्वविद्यालयों पर बाध्यकारी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि शिक्षा विषय समवर्ती सूची (Concurrent List) में आता है, और इस कारण केंद्रीय कानून को प्राथमिकता दी जाएगी। अगर राज्य कानून और UGC नियमों में टकराव होता है, तो केंद्रीय कानून लागू होगा।
कुलपति की नियुक्ति में पारदर्शिता और योग्यता का महत्व (Importance of Transparency and Eligibility in Appointment)
कोर्ट ने कहा कि कुलपति का पद विश्वविद्यालय के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह पद केवल शैक्षणिक योग्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नेतृत्व क्षमता और प्रशासनिक कौशल भी महत्वपूर्ण हैं। कुलपति को उच्च शिक्षा प्रणाली की जरूरतों को समझने और संस्थान को सही दिशा में ले जाने में सक्षम होना चाहिए।
UGC के विनियम यह सुनिश्चित करते हैं कि चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो और किसी भी प्रकार की मनमानी से बचा जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और विश्वविद्यालयों को यह सलाह दी कि वे इन नियमों के अनुसार अपने कानूनों में संशोधन करें।
कोर्ट का निष्कर्ष (Court's Conclusion)
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि सरदार पटेल विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति UGC के नियमों के विपरीत थी। नियुक्त व्यक्ति न तो आवश्यक योग्यता रखते थे और न ही उनकी नियुक्ति एक सही ढंग से गठित चयन समिति द्वारा की गई थी।
कोर्ट ने इस नियुक्ति को रद्द करते हुए राज्य सरकार और विश्वविद्यालयों को UGC नियमों का पालन करने की सख्त हिदायत दी।
भविष्य के लिए संदेश (Message for the Future)
इस फैसले ने उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण स्थापित किया है।
कोर्ट ने यह उम्मीद जताई कि राज्य सरकारें UGC नियमों के अनुसार अपने कानूनों में संशोधन करेंगी ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की अनियमितता और पक्षपात को रोका जा सके।
Gambhirdan K. Gadhvi मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय यह स्पष्ट करता है कि उच्च शिक्षा प्रणाली में UGC नियमों का पालन अनिवार्य है। यह न केवल विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को मजबूत करता है बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और गुणवत्ता को भी सुनिश्चित करता है।