Transfer Of Property Act में प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने का हक़ नहीं रखने की Condition होने पर ट्रांसफर के बाद में हक़ उत्पन्न होना
Shadab Salim
21 Jan 2025 9:25 AM IST

इस एक्ट की धारा 43 के प्रावधानों में यह भी शामिल है कि अन्तरक अन्तरण के पश्चात् अन्तरित सम्पत्ति में हित अर्जित कर सकता है। यह सम्पत्ति ही अनुपोषण की विषयवस्तु होगी। अन्तरक द्वारा बाद में अर्जित कोई अन्य सम्पति जो न तो अन्तरण की विषयवस्तु थी और न ही जिसे अन्तरित करने को प्रव्यंजना अन्तरक ने की थी अनुपोषण की विषयवस्तु नहीं होगी, भले ही इसकी प्राप्ति मिथ्याव्यपदेशन जाहिर होने के बाद हुई हो। इसी प्रकार यदि अन्तरक ने एक हैसियत से सम्पत्ति अन्तरित की थी तथा दूसरी हैसियत से सम्पत्ति अर्जित करता है जैसे न्यासी के रूप में तो भी यह सिद्धान्त लागू नहीं होगा
अन्तरण के उपरान्त अन्तरक को मिलने वाली सम्पत्ति अन्तरण के अनुपोषण की विषय वस्तु होगी और यह महत्वपूर्ण नहीं होगा कि वह सम्पत्ति अन्तरितों के हितों को पूर्ण करने के लिए पर्याप्त है अथवा नहीं। जितनी भी सम्पत्ति उपलब्ध होगी वह अनुपोषण के लिए उपयोग में लायी जाएगी जब तक कि उसकी पूर्णतः संतुष्टि न हो जाए। यदि अनुपोषण हो जाने के पश्चात् कुछ अवशिष्ट बचता है तो यह अन्तरक की अपनी सम्पत्ति होगी।
उदाहरणार्थ 'अ' ने 'ब' को मकान का 1/2 हिस्सा देने की प्रव्यंजना की पर अन्तरण के समय मकान में केवल 1/4 भाग ही उसके पास था। बाद में सम्पूर्ण मकान उसने प्राप्त कर लिया। अन्तरितों को मकान में केवल 1/4 भाग ही और मिलेगा, क्योंकि 1/4 उसे पहले से ही प्राप्त हो चुका था. इस प्रकार (14) मकान में आधा भाग उसे मिल जाएगा और शेष अन्तरक के पास ही रहेगा।
इस धारा के प्रयोजनार्थ यह भी महत्वपूर्ण नहीं है कि अन्तरक किस प्रकार बाद में सम्पत्ति प्राप्त करता है, परन्तु यह आवश्यक है कि सम्पत्ति का अर्जन विधि पूर्वक हो। अन्तरक उत्तराधिकार। अन्तरण- नीलामी पंचाट या किसी अन्य प्रक्रिया द्वारा सम्पत्ति प्राप्त कर सकता है।
अन्तरण के उपरान्त अन्तरक द्वारा उपाप्त सम्पत्ति स्वतः अन्तरितों के पास उसके हितों को पूर्ति हेतु नहीं चली जाती है।
इसके पहले कि अन्तरिती अपने हितों की पूर्ति हेतु उस सम्पत्ति का उपयोग कर सके निम्नलिखित शर्तों का पूर्ण होना आवश्यक है:
अन्तरक द्वारा उपात सम्पत्ति अन्तरितों के पास न तो स्वतः जाएगी और न ही उस पर थोपी जा सकेगी। सम्पत्ति का अन्तरक से अन्तरितों के पास पहुँचना अन्तरितों के विकल्प पर निर्भर करेगा। जब तक वह विकल्प का प्रयोग नहीं करेगा अथवा सम्पत्ति की मांग नहीं करेगा, सम्पति अन्तरक के पास ही रहेगी और अन्तरितों का उस सम्पत्ति में हित केवल समाश्रित हित रहेगा। इसका कारण यह है कि ऐसी स्थिति में अन्तरिती को मिलने वाला उपचार एकमात्र यही नहीं है। यदि यह चाहे तो अन्य विधियों जैसे हर्जाना या क्षतिपूर्ति या संविदा के विखण्डन द्वारा भी उपचार प्राप्त कर सकता है। वह अपनी इच्छानुसार अपने उपचार का चुनाव करता है। अपने इस विकल्प का प्रयोग अन्तरितों संविदा के अस्तित्व में रहने के दौरान कभी भी कर सकता है पर संविदा भंग के पश्चात् विकल्प का प्रयोग नहीं कर सकेगा।
संविदा के अस्तित्व में रहने के दौरान-अन्तरितो द्वारा विकल्प का प्रयोग हो पर्याप्त नहीं है, अपितु यह भी आवश्यक है कि विकल्प का प्रयोग उस समय किया जाए जब अन्तरण की संविदा अस्तित्व में हो अर्थात् वह भंग न हुई हो। संविदा उस समय समाप्त हो जाती है जब अन्तरिती अपना उपचार किसी अन्य रीति से प्राप्त कर लेता है अथवा संविदा शून्य घोषित कर दी जाती है। उदाहरणस्वरूप, यदि उसने प्रतिकर या हर्जाना प्राप्त कर लिया है या प्राप्त सम्पत्ति वापस कर दिया है तो संविदा समाप्त मानी जाएगी और इसी के साथ हो अन्तरितो का सम्पत्ति प्राप्त करने का अधिकार भी समाप्त हो जाता है। जहाँ अन्तरितों ने अपने अधिकारों के प्रवर्तन हेतु कोर्ट से डिक्री प्राप्त कर लिए हैं, संविदा उस समय समाप्त समझी जाएगी जब डिक्री पूर्ण रूप से निष्पादित हो जाए। यदि संविदा मूलतः शून्य है तो उसे अस्तित्वयुक्त नहीं माना जाएगा।
जहाँ एक पट्टाकर्ता कोई सरकारी सम्पत्ति पट्टाधारी को प्रदान करता है और बाद में सरकार उस सम्पति को पट्टाकर्ता की सम्पत्ति घोषित कर देती है तो पट्टाकर्ता का पट्टा समाप्त हो जाएगा पर पट्टाधारी इस घोषणा का लाभ पाने का अधिकारी नहीं होगा क्योंकि पट्टाकर्ता को सम्पत्ति उसी हैसियत में नहीं प्राप्त हुई थी जिस हैसियत से उसने उसे अन्तरित किया था।
इस धारा का दूसरा पैराग्राफ स्पष्ट रूप से यह उल्लिखित करता है कि अन्तरिती अपने इस अधिकार का प्रयोग एक ऐसे अन्तरितों के विरुद्ध नहीं कर सकेगा जिसने सम्पत्ति को सद्भाव में से प्रतिफल प्राप्त किया हो तथा पूर्ववर्ती अन्तरिती के हितों का जिसे ज्ञान न रहा हो। यह अपवाद इस अवधारणा पर आधारित है कि पूर्ववर्ती अन्तरिती का विकल्प एक व्यक्तिगत विकल्प है, यह भूमि के साथ-साथ चलने वाला अधिकार नहीं है। इसलिए यदि पाश्चिक अन्तरिती को इस विकल्प का ज्ञान नहीं था और उसने सद्भाव में प्रतिफल देकर सम्पत्ति प्राप्त किया है तो विधि उसे संरक्षण प्रदान करेगी। इस प्रकार की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब सम्पत्ति प्राप्त होने के तुरन्त बाद अन्तरिती अपने विकल्प का प्रयोग नहीं करता है। सम्पत्ति प्राप्ति और विकल्प के प्रयोग के बीच लम्बे अन्तराल की अवस्था में ही ऐसी स्थिति साधारणतः उत्पन्न होती है।
चेता बहेड़ा बनाम पूर्णचन्द्र के वाद में अन्तरक 'क' ने यह व्यपदेशन किया कि वह सम्पत्ति अन्तरित करने के लिए प्राधिकृत है जबकि वह प्राधिकृत नहीं था। उसने बन्धक द्वारा उस सम्पत्ति को एक व्यक्ति 'ख' के पक्ष में अन्तरित किया। बाद में सम्पत्ति 'क' को ही मिल गयी जिसे उसने एक अन्य व्यक्ति को 'ग' के पक्ष में अन्तरित कर दिया। 'ग' को पूर्ववर्ती संव्यवहार की सूचना नहीं थी। यह अभिनिर्णीत हुआ कि 'ग' इस पैराग्राफ का लाभ पाने का अधिकारी है। पूर्ववर्ती अन्तरिती को इस धारा के प्रथम पैरा का लाभ नहीं प्रदान किया गया।
जहाँ अन्तरण की विषयवस्तु अनन्तरणीय अधिकार वाली भूमिधरी सम्पत्ति हो तो, ऐसी सम्पत्ति का क्रेता सम्पत्ति में कोई अधिकार प्राप्त नहीं करेगा। अन्तरण की तिथि से ही पट्टेदार विक्रेता का उक्त सम्पत्ति पर अधिकार समाप्त हो जाएगा। ऐसी सम्पत्ति सरकार में निहित हो जाएगी। भूमिधरी अधिकार के आधार पर विक्रेता स्थानापन्न की माँग नहीं कर सकेगा। ऐसे मामलों में धारा 43 का उपबन्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा।
इस प्रकार के पट्टे का सृजन राज्य भू सहिंता के अन्तर्गत एक विशिष्ट प्रयोजन हेतु किया जाता है। पट्टागृहीता से यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि ऐसी सम्पत्ति को वह प्रतिफल के एवज में हस्तान्तरित कर दे। इसी लिए ऐसी सम्पत्ति के विक्रय पर प्रतिबन्ध लगा है। यदि सम्पत्ति का विक्रय, पट्टा सृजन के 10 वर्ष की अवधि के अन्दर किया गया है तो ऐसा विक्रय भू सहिंता के अन्तर्गत शून्य होगा। धारा 43 सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम का संरक्षण पट्टेदार के अन्तरितों को ऐसे मामलों में नहीं मिलेगा।