जम्मू और कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट
गलती से अधिक वेतन मिलने पर राशि वसूली नहीं की जा सकती, लेकिन कर्मचारी गलत लाभ की निरंतरता की मांग नहीं कर सकते: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी कर्मचारी को गलतीवश अधिक वेतन प्रदान किया गया हो और बाद में उस गलती का पता चल जाए व उसे सुधारा जाए तो उस कर्मचारी द्वारा उस गलती के लाभ को जारी रखने की मांग पूरी तरह से अनुचित है और स्वीकार नहीं की जा सकती।जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस पुनीत गुप्ता की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं का यह तर्क सही है कि चूंकि उन्होंने अधिक वेतन पाने में कोई धोखाधड़ी या गलत प्रस्तुति नहीं की थी, इसलिए उनसे पहले से भुगतान की गई राशि की वसूली नहीं की जा सकती। लेकिन इसके साथ...
कृषि भूमि सुधार अधिनियम के तहत भूमि पर कब्जे के अधिकार के निर्धारण पर विवादों का निपटारा सिविल कोर्ट नहीं कर सकते: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि जहां किसी मुकदमे में कब्जे के अधिकार का दावा किया जाता है या उस पर विवाद होता है और इसे कृषि सुधार अधिनियम के तहत नियुक्त अधिकारी या प्राधिकारी को संदर्भित किया जा सकता है तो सिविल कोर्ट को ऐसे विवाद का निपटारा करने से रोक दिया जाता है।याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि निचली अदालतों ने आदेश 7 नियम 11 सीपीसी के तहत मुकदमे को खारिज करने में गलती की है। इसने कहा कि कृषि सुधार अधिनियम का गलत इस्तेमाल किया गया और वादी के स्वामित्व और कब्जे के दावे को सिविल न्यायालय द्वारा...
शस्त्र लाइसेंस जारी करने वाले प्राधिकारी को कई FIR के बावजूद लाइसेंस खारिज करने से पहले पुलिस रिपोर्ट प्राप्त करनी चाहिए और जांच करनी चाहिए: जम्मू एंड कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू एंड कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि आवेदक के खिलाफ अपने शस्त्र लाइसेंस के नवीनीकरण की मांग करने वाले के खिलाफ कई एफआईआर दर्ज हैं, तो भी लाइसेंसिंग प्राधिकरण शस्त्र लाइसेंस के नवीनीकरण से इनकार करने से पहले संबंधित पुलिस स्टेशन से पुलिस सत्यापन रिपोर्ट मांगने के लिए बाध्य है। लाइसेंसिंग प्राधिकरण ने इस आधार पर लाइसेंस का नवीनीकरण करने से इनकार कर दिया था कि याचिकाकर्ता ने पुलिस से उचित चरित्र प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया है, इसके अलावा शस्त्र अधिनियम के तहत किए गए अपराधों सहित कई...
घोषणा किए जाने के 2 वर्ष के भीतर कोई निर्णय पारित नहीं किया जाता है तो भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही समाप्त हो जाएगी: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि यदि घोषणा किए जाने के दो वर्ष के भीतर कोई निर्णय पारित नहीं किया जाता है तो भूमि अधिग्रहण की पूरी कार्यवाही समाप्त हो जाएगी, जब तक कि न्यायालय द्वारा उस पर रोक न लगा दी जाए।याचिकाकर्ता ने इस आधार पर कार्यवाही को चुनौती दी थी कि उसकी भूमि सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहित की गई थी लेकिन कोई अंतिम निर्णय पारित नहीं किया गया, जिससे संपूर्ण अधिग्रहण कार्यवाही प्रभावित हुई।जस्टिस संजय धर की पीठ ने प्रतिवादियों को 2013 के अधिनियम के प्रावधानों के तहत संबंधित भूमि के...
30 साल की शादी में क्रूरता का कोई सबूत नहीं मिला: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने आत्महत्या के उकसावे के मामले में पति की बरी याचिका को बरकरार रखा
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी पर्याप्त और विश्वसनीय सबूत या किसी भी पूर्व शिकायत, प्राथमिकी, या 30 साल की शादी पर क्रूरता की लगातार गवाही के अभाव में, यह साबित नहीं किया जा सकता है कि आरोपी ने मृतक-पत्नी की आत्महत्या के लिए उकसाया या उकसाया है।अदालत IPC की धारा 306 के तहत आरोपियों को आरोपों से बरी करने के फैसले के खिलाफ राज्य द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह तर्क दिया गया कि आरोपी की क्रूरता, विशेष रूप से दूसरी बार शादी करने के बाद, मृतक की आत्महत्या का कारण बनी। जस्टिस एमए...
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट पुलिस 'बर्बरता' के आरोप वाले मामले में कॉम्पैक्ट डिस्क (CD) रिकॉर्ड पेश करने का दिया निर्देश
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस को निर्देश दिया कि वह मक्खन दीन की मौत से संबंधित मामले में कॉम्पैक्ट डिस्क (CD) रिपोर्ट कोर्ट में पेश करे। मक्खन दीन ने इस साल फरवरी में कठुआ जिले के बिलावर क्षेत्र में पुलिस हिरासत में कथित रूप से प्रताड़ित किए जाने के बाद आत्महत्या कर ली थी।पीड़ित के परिवार ने अदालत का रुख करते हुए मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने की मांग की थी ताकि निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच हो सके।जस्टिस वसीम सादिक नार्गल की पीठ ने बिलावर पुलिस स्टेशन के थाना प्रभारी...
J&K हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद में दर्ज FIR खारिज की, आपसी समझौते का उल्लेख किया; कहा- धारा 528 BNSS, धारा 359 को ओवरराइड करती है
जम्मू एंड कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए माना कि इस प्रावधान का प्रभाव सर्वोपरि है और इसे BNSS की धारा 359 (CRPC की धारा 320 के अनुरूप) के अधीन नहीं पढ़ा जाना चाहिए। इस प्रकार जस्टिस मोहम्मद यूसुफ वानी ने आईपीसी की धारा 452 (अतिचार) और 376बी (वैवाहिक बलात्कार) के तहत दर्ज FIR को खारिज कर दिया, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि धारा 528 के तहत असाधारण शक्तियों का प्रयोग न्याय के उद्देश्यों को...
आरोपी को पासपोर्ट जारी करने के लिए 'अनापत्ति' केवल समक्ष आपराधिक कार्यवाही लंबित करने वाले न्यायालय द्वारा दी जा सकती है: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही लंबित है, उसे पासपोर्ट तभी दिया जा सकता है, जब संबंधित आपराधिक न्यायालय अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार पासपोर्ट जारी करने के लिए 'अनापत्ति' दे।याचिकाकर्ता ने अपने पासपोर्ट के नवीनीकरण के लिए पासपोर्ट कार्यालय से संपर्क किया, जिसे इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में प्रतिकूल उल्लेख है कि वह PC Act की धारा 5(डी) के साथ धारा 5(2) के तहत एडिशनल सेशन जज (भ्रष्टाचार निरोधक मामले) जम्मू के समक्ष दर्ज FIR में...
अदालतों की वैधता तर्कों के आधार पर स्थापित होनी चाहिए: जेएंडके हाईकोर्ट ने अनुचित आदेश पर न्यायिक अधिकारी के लिए रिफ्रेशर कोर्स की सिफारिश की
न्यायिक वैधता तर्कसंगत निर्णय लेने से उत्पन्न होने वाले मौलिक सिद्धांत पर जोर देते हुए, जम्मू एंड कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 151 के तहत एक रहस्यमय, अतार्किक आदेश पारित करने के लिए ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीश पर कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस विनोद चटर्जी कौल ने न केवल विवादित आदेश को खारिज कर दिया, बल्कि यह भी निर्देश दिया कि संबंधित पीठासीन अधिकारी को जम्मू-कश्मीर न्यायिक अकादमी के माध्यम से रिफ्रेशमेंट कोर्स के लिए प्रतिनियुक्त किया जाए।न्यायालय ने इस बात...
एक साथ यात्रा कर रहे अभियुक्तों से व्यक्तिगत रूप से बरामद किए गए प्रतिबंधित पदार्थ को जमानत के चरण में अलग से विचार किया जाना चाहिए: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि अभियुक्तों से व्यक्तिगत रूप से बरामद किए गए प्रतिबंधित पदार्थ भले ही वे एक साथ यात्रा कर रहे हों को जमानत के उद्देश्य से प्रत्येक अभियुक्त के लिए अलग से विचार किया जाना चाहिए।अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि प्रतिबंधित प्रतिबंधित पदार्थ ले जा रहे दोनों अभियुक्तों ने अपराध करने के लिए समान इरादे से काम किया था और एक साथ बरामद की गई मात्रा कमर्शियल मात्रा थी, जिसके कारण जमानत की कठोरता लागू होती है।जस्टिस सिंधु शर्मा की पीठ ने माना कि प्रतिबंधित पदार्थ की बरामदगी पर...
किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता से पीड़ित न होने वाली बेटी पिता से भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने एक पिता पर पूर्व जम्मू-कश्मीर CrPC Act की धारा 488 के तहत पारित भरण-पोषण आदेश के आधार पर लगाए गए दायित्व को कम कर दिया, जिसमें ट्रायल मजिस्ट्रेट ने उसे छह साल पहले अपनी वयस्क सक्षम बेटियों को भरण-पोषण देने का आदेश दिया।न्यायालय ने कहा कि दो अविवाहित वयस्क बेटियां जो सक्षम थीं और किसी भी शारीरिक या मानसिक विकलांगता से पीड़ित नहीं थीं, वे किसी भी दावे या तर्क के आधार पर CrPC की धारा 488 का हवाला देकर भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार नहीं थीं।जस्टिस राहुल भारती की पीठ ने कहा...
पुलिस अधीक्षक को तथ्यों का अधूरा खुलासा CrPC की धारा 154 का सख्त अनुपालन नहीं: जम्मू एंड कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू एंड कश्मीर हाईकोर्ट ने माना कि पुलिस अधीक्षक को तथ्यात्मक जानकारी न देना या मौखिक शिकायत करने वाले व्यक्ति का विधिवत शपथ-पत्र संलग्न न करना, धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने के उद्देश्य से धारा 154 सीआरपीसी का कड़ाई से अनुपालन प्रदर्शित नहीं करता है। याचिकाकर्ता ने सत्र न्यायालय द्वारा धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज करने के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी थी कि यह आदेश धारा 154 सीआरपीसी के तहत आदेश का कड़ाई से पालन किए बिना पारित किया गया था।जस्टिस संजय...
अगर कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण नहीं है तो आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का औचित्य यह नहीं हो सकता कि शिकायतकर्ता के पास सिविल उपचार मौजूद हैः जेएंडके हाईकोर्ट
जम्मू एंड कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने हाल ही में दोहराया कि जब तक शिकायत में लगाए गए आरोप अपराध का खुलासा करने में विफल हों या कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण न पाई जाए, आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का औचित्य यह नहीं हो सकता कि शिकायतकर्ता के पास सिविल उपचार मौजूद है।जस्टिस संजय धर ने कहा,“.. केवल यह तथ्य कि शिकायत किसी वाणिज्यिक लेनदेन या अनुबंध के उल्लंघन से संबंधित है, जिसके लिए सिविल उपाय उपलब्ध है, अपने आप में आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का आधार नहीं है। यह केवल तभी रद्द किया जा सकता है जब...
बुनियादी ढांचा परियोजना तकनीकी रूप से व्यवहार्य होगी या व्यापक जनहित में काम आएगी, इस पर सवाल न्यायिक पुनर्विचार के दायरे से बाहर: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू एंड कश्मीर हाईकोर्ट ने माना कि सरकार द्वारा बुनियादी ढांचा परियोजना की व्यवहार्यता के बारे में याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए तर्क के गुण-दोष पर इस न्यायालय द्वारा विचार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह परियोजना लागत, प्रवेश/निकास बिंदुओं के लिए प्रावधान, सुरक्षा, परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता और संबंधित पहलुओं के बारे में विशेषज्ञ निर्णयों पर अपीलीय प्राधिकारी नहीं है। याचिकाकर्ता ने अधिकारियों द्वारा शुरू किए गए कार्य के दायरे में प्रस्तावित परिवर्तन को इस आधार पर चुनौती दी थी कि यह तकनीकी...
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने अदालती कार्यवाही में देरी को खत्म करने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (न्याय श्रुति) नियम 2025 अधिसूचित किया
न्यायिक प्रक्रिया को डिजिटल बनाने की दिशा में एक बड़ी छलांग लगाते हुए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (न्याय श्रुति) नियम, 2025 अधिसूचित किया, जिससे केंद्र शासित प्रदेशों में ट्रायल, पूछताछ और अन्य न्यायिक कार्यवाही के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव आएगा।हाईकोर्ट द्वारा अपने रजिस्ट्रार जनरल शहजाद अज़ीम के माध्यम से जारी की गई अधिसूचना, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) के प्रावधानों के साथ संरेखित करते हुए जिला न्यायपालिका में इलेक्ट्रॉनिक और ऑडियो-विजुअल संचार के...
आरोप पत्र में दस्तावेजों की सूची दाखिल करना CrPC की धारा 294 का पर्याप्त अनुपालन नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने माना कि केवल दस्तावेजों की सूची दाखिल करना सीआरपीसी की धारा 294 का पर्याप्त अनुपालन नहीं है।न्यायालय ने माना कि प्रतिकूल पक्ष को उन दस्तावेजों की सूची प्रदान करके नोटिस देना आवश्यक है, जिन्हें BNSS की धारा 330 के अनुसार प्रतिकूल पक्ष द्वारा स्वीकार या अस्वीकार किया जाना है, जो CrPC की धारा 294 के समतुल्य है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि पक्ष को उन दस्तावेजों के बारे में पता हैस जिन्हें स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए उक्त पक्ष को कहा गया।न्यायालय को यह निर्धारित...
नए पते की जानकारी दिए बिना बटालियन छोड़ने पर अनिवार्य रिटायरमेंट वैध, नियोक्ता कर्मचारी की तलाश नहीं कर सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 326 दिनों की अवधि के लिए छुट्टी के दौरान बिना अनुमति के बटालियन से लगातार अनुपस्थित रहने के कारण याचिकाकर्ता पर लगाए गए सेवा से अनिवार्य रिटायरमेंट (Compulsory Retirement) का आदेश बरकरार रखा।याचिकाकर्ता CRPF कांस्टेबल है। उसने तर्क दिया कि प्रतिवादी नंबर 3 द्वारा जारी आदेश एकपक्षीय जांच पर आधारित है और याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। प्राधिकारी द्वारा जो भी नोटिस भेजा गया, वह प्राप्त नहीं हो सका, क्योंकि उसने अपनी बीमारी के कारण अपना आवासीय पता बदल लिया...
अभियुक्त को इस आधार पर निरोधात्मक हिरासत में नहीं रखा जा सकता कि उसे जमानत पर रिहा करने से जनता का विश्वास प्रभावित होता है: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस तथ्य के आधार पर कि किसी व्यक्ति को न्यायालय से जमानत मिल गई, निरोधात्मक हिरासत लगाने का आधार नहीं हो सकता कि उसे जमानत पर रिहा करने से जनता के विश्वास पर प्रभाव पड़ेगा।प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि चूंकि उक्त मामले में निरोधक हिरासत में लिया गया व्यक्ति जमानत पाने में “सफल” रहा, इसलिए सामान्य कानून अपर्याप्त साबित हुआ।जस्टिस राजेश सेखरी की पीठ ने कहा कि किसी अपराध में शामिल अभियुक्त को सक्षम न्यायालय से जमानत पर रिहा करने का अधिकार है। यदि वह जमानत के लिए...
अधिकारी पिछले वर्षों के खाली पदों के आधार पर सीनियरिटी का दावा नहीं कर सकते: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया कि प्रशासनिक अधिकारी पिछली वर्षों की खाली पड़ी पदों के आधार पर वरिष्ठता (Seniority) का दावा नहीं कर सकते। सेवा में पदोन्नति की वास्तविक तिथि ही पदक्रम (Hierarchy) निर्धारित करने का एकमात्र मान्य आधार है।जस्टिस रजनेश ओसवाल और जस्टिस संजय धर की खंडपीठ ने 1992 और 1999 बैच के जम्मू और कश्मीर प्रशासनिक सेवा (JKAS) अधिकारियों से जुड़ी वरिष्ठता संबंधी याचिकाओं को खारिज करते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के फैसले को...
कर्मचारी को गलत तरीके से दिए गए SRO लाभ की वसूली वेतन से राशि निकालकर नहीं की जा सकती: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि यदि विभाग द्वारा स्व-नियामक संगठन (SRO) योजना के तहत कर्मचारी को बिना किसी धोखाधड़ी या गलत बयानी के गलत तरीके से लाभ दिया जाता है तो विभाग को किसी भी समय कर्मचारी या पेंशनभोगी के वेतन से इसे वसूलने की स्वतंत्रता नहीं है।प्रतिवादी की रिटायरमेंट के बाद सेवा पुस्तिका देखने पर अपीलकर्ता विभाग को पता चला कि उसे SRO 149/1973 के तहत गलत तरीके से लाभ दिया गया, जिसे निरस्त कर दिया गया और विभाग ने उसके वेतन से इसे वसूलना शुरू कर दिया।चीफ जस्टिस ताशी राबस्तान, जस्टिस एमए...















