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O7 R11 सीपीसी | वाद को खारिज करने की शक्ति का प्रयोग तभी किया जाना चाहिए जब न्यायालय इस "निश्चित निष्कर्ष" पर पहुंचता है कि मुकदमा सुनवाई योग्य नहीं है या कानून के तहत वर्जित है: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि आदेश 7 नियम 11 सीपीसी के तहत वाद को खारिज करने की शक्ति का प्रयोग तभी किया जाना चाहिए जब न्यायालय इस "निश्चित निष्कर्ष" पर पहुंचता है कि मुकदमा या तो सुनवाई योग्य नहीं है या कानून के तहत वर्जित है।जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल की पीठ ने कहा कि आदेश 7 नियम 11 सीपीसी विभिन्न आधारों को सूचीबद्ध करता है जिन पर वाद को खारिज किया जा सकता है।पीठ ने पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान उक्त अवलोकन किया गया, जिसमें याचिकाकर्ता के आवेदन (मूल प्रतिवादी) को आदेश 7 नियम 11...
राजस्थान हाईकोर्ट ने बाल विवाह के साथी के साथ रहने के लिए माता-पिता के दबाव से सुरक्षा के लिए महिला को पुलिस से संपर्क करने के लिए कहा
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐसी महिला की याचिका पर सुनवाई की, जिसका बाल विवाह किया गया और उसके माता पिता उसके बाल विवाह के साथी के साथ रहने के लिए महिला पर दबाव डाल रहे हैंं। महिला ने अब अलग रहने की इच्छा जताई और अदालत से गुहार लगाई कि उसके माता पिता को उक्त दबाव बनाने से रोका जाए और उसे सुरक्षा दी जाए। अदालत ने महिला को उचित सुरक्षा के लिए पुलिस अधीक्षक, जोधपुर (ग्रामीण) के समक्ष अभ्यावेदन दायर करने का निर्देश दिया।महिला ने इस शिकायत के साथ अदालत का दरवाजा खटखटाया कि उसके माता-पिता उस व्यक्ति के...
पति की दुर्घटना में मृत्यु के बाद पुनर्विवाह करने वाली पत्नी को कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत दिए जाने वाले मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि मृतक की पत्नी का पुनर्विवाह उसे कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 के तहत पति की मृत्यु की एवज में मुआवजे का दावा करने से वंचित नहीं करता है। अदालत ने कहा कि निचली अदालत द्वारा दी गई मुआवजे की राशि मृतक की कम उम्र और दावेदारों की संख्या को देखते हुए अनुचित नहीं कहा जा सकता।जस्टिस अरुण भंसाली ने बीमा कंपनी की पहली अपील को खारिज करते हुए कहा,"जहां तक मृतक की पत्नी के पुनर्विवाह पर विवाद का संबंध है, वह उसे पति की मृत्यु के कारण मुआवजे का दावा करने से वंचित नहीं करता है।...
"बताएं ऐसा क्यों किया": MMRDA द्वारा कथित अवैध स्ट्रक्चर को अदालत की सुनवाई से 15-30 मिनट पहले ध्वस्त किए जाने पर बॉम्बे हाईकोर्ट स्तब्ध
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MMRDA) की "जल्दबाजी" में कथित अनधिकृत स्ट्रक्चर को खंडपीठ द्वारा मामले की सुनवाई से आधा घंटा पहले से भी कम समय में ध्वस्त करने पर कड़ी आपत्ति जताई।याचिकाकर्ता कंपनी ने दावा किया कि MMRDA द्वारा 1879 वर्ग फुट की स्ट्रक्चर को 2007 में ऋण वसूली न्यायाधिकरण द्वारा आयोजित एक सार्वजनिक नीलामी में खरीदे जाने के बाद 'अवैध' रूप में ब्रांडेड किया जा रहा था, जबकि उक्त स्ट्रक्चर कम से कम 15 वर्षों से अस्तित्व में थी।जस्टिस एए सैयद और जस्टिस अभय...
"बहस का एक एजेंडा था": एनबीएसए ने 'जी न्यूज' को मुस्लिम आबादी पर बहस के वीडियो को हटाने का आदेश दिया
न्यूज ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (एनबीडीएसए) ने सोमवार को जी न्यूज को एक शो को हटाने का निर्देश दिया, जिसे पिछले साल मुस्लिम आबादी के मुद्दे पर "कुदरत बहाना है, मुस्लिम आबादी बढ़ाना है?" शीर्षक से प्रसारित किया गया था। उपरोक्त कार्यक्रम के प्रसारण के कारण जी न्यूज के खिलाफ की गई शिकायतों का निस्तारण करते हुए एनबीडीएसए चेयरपर्सन जस्टिस एके सीकरी ने कहा,"हालांकि प्राधिकरण का मानना है कि मीडिया किसी भी विषय पर बहस करने और अपनी पसंद के किसी भी पैनलिस्ट को आमंत्रित करने के लिए...
घरेलू स्तर पर कपड़े सिलने वाली पत्नी भरण-पोषण की हकदार; वेल्डर-पति पर्याप्त आय वाले कुशल कामगार की तरह : राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने भरण पोषण (Maintenance) से संबंधित एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि पति, जो एक वेल्डर है, लगभग एक कुशल कामगार की तरह है और इस प्रकार यह नहीं माना जा सकता कि वह याचिकाकर्ता-पत्नी को भरण पोषण देने के लिए पर्याप्त कमाई नहीं कर रहा है। अदालत ने यह भी कहा कि भले ही याचिकाकर्ता-पत्नी घरेलू रूप से कपड़े सिल रही हो और उसके पास कुछ आय का स्रोत हो तो भी पति अपने दो बच्चों के साथ पत्नी को भरण-पोषण का भुगतान करने के लिए ज़िम्मेदार है।डॉ.जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी ने आपराधिक पुनरीक्षण...
राजस्थान हाईकोर्ट ने गरीबी रेखा से नीचे के परिवार से संबंधित अपराधी को 7 दिन की पैरोल के लिए 2 लाख रुपए का निजी बॉन्ड भरने, 1 लाख रुपए की राशि का जमानतदार पेश करने के लिए कहा
राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्य को गरीबी रेखा से नीचे (बी.पी.एल.) परिवार से संबंधित एक दोषी को 7 दिन की पैरोल के लिए 2 लाख रुपए का निजी बॉन्ड, 1 लाख रुपए का जमानतदार पेश करने के लिए कहा है।हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता के भाई की जमानत बॉन्ड भरने की आवश्यकता को माफ कर दिया।याचिकाकर्ता को 29.09.2021 को राजस्थान कैदी रिहाई पर पैरोल नियम, 1958 के नियम 18 के तहत 7 दिनों की पैरोल प्रदान की गई थी, जिसमें 2,00,000 रुपये की राशि के रूप में निजी बॉन्ड भरने और 1,00,000/- रुपये की राशि का दो...
पति की क्रूरता के कारण वैवाहिक घर छोड़ना परित्याग नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट ने पूर्व पत्नी को भरण-पोषण की मंजूरी दी
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि अपने पति के आचरण के कारण क्रूरता से पीड़ित महिला को यह नहीं कहा जा सकता कि उसने उसे छोड़ दिया है या स्वेच्छा से दूर रह रही है। अदालत ने कहा कि पति द्वारा बनाई गई परिस्थितियां यदि अनुकूल नहीं हैं तो पत्नी को दूर करने के लिए बाध्य हैं।याचिकाकर्ता-पत्नी का मामला यह है कि प्रतिवादी-पति बैंक ऑफ बड़ौदा में शाखा प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं और प्रति माह रु.90,000/- की आय कर रहा है। उसने प्रस्तुत किया कि ट्रायल कोर्ट ने उसे मासिक भरण पोषण से केवल इस आधार पर इनकार कर दिया कि...
आईएएफ सार्जेंट का पत्नी और बेटी को भरण-पोषण देने से इनकार करना उचित नहीं; प्रतिदिन के खर्च और शिक्षा बहुत महंगी है : राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान समय में जबकि शिक्षा बहुत महंगी हो गई है और जीवन में प्रतिदिन के खर्च के लिए भी उचित राशि की आवश्यकता होती है, ऐसे में पत्नी और बेटी को भरण-पोषण से वंचित करना उचित नहीं है।कोर्ट ने याचिकाकर्ता, जो भारतीय वायु सेना में एक सार्जेंट है, को निर्देश दिया है कि वह अपनी पत्नी व बेटी को भरण-पोषण के तौर पर प्रतिमाह 15,000 रुपये की राशि का भुगतान करे। याचिकाकर्ता ने फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 19(4) रिड विद सीआरपीसी की धारा 397 और 401 के तहत वर्तमान आपराधिक...
एक टेस्टिकल वाला व्यक्ति भारतीय नौसेना की सेवा के लिए अयोग्य नहीं : पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने माना है कि एक टेस्टिकल होना कोई विकलांगता नहीं है, जिसके एकमात्र आधार पर किसी उम्मीदवार को भारतीय नौसेना की सेवा के लिए अयोग्य घोषित किया जा सके। केंद्र द्वारा पारित एक आदेश में प्रतिवादी को नौसेना में नामांकन के लिए अयोग्य घोषित किया गया था, क्योंकि उसके पास एक ही टेस्टिकल है।जस्टिस जीएस संधावालिया और जस्टिस विकास सूरी की पीठ ने इस आदेश के संदर्भ में कहा, " यह दिखाने के लिए रिकॉर्ड में कुछ भी नहीं है कि यह विकलांगता उस तरह की है जो भारतीय नौसेना की सेवा के लिए...
विवाह समाप्त होने पर पति का परिवार स्त्रीधन नहीं रख सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि विवाह समाप्त करने का मतलब यह नहीं हो सकता कि महिला द्वारा वैवाहिक घर में ले जाने वाली सभी वस्तुओं को पति के परिवार द्वारा रख लिया जाए।जस्टिस एम नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने पूर्व पत्नी द्वारा अपने पूर्व पति और ससुराल वालों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 406 के तहत शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया।पीठ ने कहा,"निर्विवाद तथ्य यह है कि स्त्रीधन नौ लाख रुपये का भुगतान याचिकाकर्ता और उसके परिवार को किया गया है और वह राशि जो उनके पास रखी गई...
कलकत्ता हाईकोर्ट ने सीबीआई को राज्य के प्राथमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा कथित 'अवैध' नियुक्तियों की जांच करने का आदेश दिया
कलकत्ता हाईकोर्ट ने सोमवार को सीबीआई को राज्य के प्राथमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा सरकारी सहायता प्राप्त प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती की जांच करने का आदेश दिया।जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय ने सीबीआई को 2014 में शिक्षकों की पात्रता परीक्षा के आधार पर बोर्ड द्वारा शिक्षकों की कथित अवैध भर्ती की जांच शुरू करने के लिए एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया। इसके अलावा, प्राथमिक शिक्षा बोर्ड के सचिव रत्न चक्रवर्ती बागची और अध्यक्ष माणिक भट्टाचार्य को भी सोमवार शाम 5 बजे बाद में सीबीआई के सामने पेश होने...
नाना-नानी के साथ नाबालिग की कस्टडी अवैध नहीं, खासकर जब पति ने पहली शादी के होते हुए ही पुनर्विवाह किया हो: गुजरात हाईकोर्ट
गुजरात हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस विपुल एम पंचोली और जस्टिस राजेंद्र एम सरीन शामिल हैं, ने माना है कि नाबालिग के अपने नाना-नानी के साथ कस्टडी को अवैध कस्टडी या अवैध कंन्फाइनमेंट नहीं माना जा सकता है, यह देखते हुए कि नाबालिग के पति / पिता ने अपनी पहली पत्नी के साथ विवाह के निर्वाह के दरमियान ही पुनर्विवाह किया था। पहली पत्नी ही उक्त नाबालिग की मां थी।यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर की गई थी, जिसमें पुलिस प्राधिकरण को कॉर्पस (9 साल की उम्र के नाबालिग समीर) को पेश करने और...
मध्यस्थता समझौते की गैर-मौजूदगी में भी, मामले को MSMED अधिनियम की धारा 18 के तहत मध्यस्थता के लिए संदर्भित किया जा सकता है: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा कि पार्टियों के बीच मध्यस्थता समझौते के अभाव में मामले को सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 (MSMED अधिनियम) की धारा 18 के तहत मध्यस्थता के लिए भेजा जा सकता है।जस्टिस लिसा गिल की एकल पीठ ने दोहराया कि एमएसएमईडी अधिनियम एक विशेष अधिनियम होने के कारण मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (ए एंड सी एक्ट) पर प्रभावी होगा। कोर्ट ने कहा कि भले ही मध्यस्थता द्वारा विवादों के समाधान के लिए पार्टियों के बीच एक समझौता हुआ हो, अगर एक विक्रेता को MSMED...
पितृत्व का निर्धारण विवादास्पद मुद्दा नहीं है जब विवाह का तथ्य ही विवादित हो: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने भरण-पोषण की याचिका में डीएनए टेस्ट कराने का आदेश रद्द किया
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने भरण-पोषण की मांग करने वाले एक मामले में फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर रिविजन याचिका पर विचार करते हुए कहा है कि चूंकि प्रतिवादी द्वारा विवाह को ही विवादित बताया गया है तो ऐसे में पितृत्व निर्धारित करने के लिए डीएनए टेस्ट कराने के आदेश की आवश्यकता नहीं है। फैमिली कोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता ने एक याचिका दायर भरण-पोषण दिलाए जाने की मांग की थी, इसी याचिका के जवाब में प्रतिवादी ने याचिकाकर्ता के बच्चे के पितृत्व का निर्धारण कराने के लिए डीएनए टेस्ट कराने की मांग की...
एनआई एक्ट की धारा 147- 'नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत हर अपराध कंपाउंडेबल है': कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट (Karnataka High Court) ने हाल ही में कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (Negotiable Instruments Act) की धारा 147 के तहत हर अपराध को कंपाउंडेबल बनाती है और पक्षकारों पर अपराध को कम करने के लिए कोई रोक नहीं है।जस्टिस एच.बी. प्रभाकर शास्त्री ने आरोपी अरुण विंसेंट राजकुमार और शिकायतकर्ता एस माला द्वारा दायर संयुक्त आवेदनों को स्वीकार कर लिया, जिसमें अपराध को कम करने की मांग की गई थी और निचली अदालत द्वारा अधिनियम की धारा 138 के तहत अभियुक्त को दी गई सजा को रद्द करने के लिए सहमति...
कई वर्षों के अंतराल के बाद सेटल्ड सीनियारिटी को अनसेटल्ड नहीं किया जा सकता हैः मद्रास हाईकोर्ट ने पूर्वव्यापी पदोन्नति के लिए निरीक्षक की याचिका खारिज की
मद्रास हाईकोर्ट ने पूर्वव्यापी पदोन्नति के लिए एक पुलिस निरीक्षक की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इस तरह के विलंबित दावों की सुनवाई करने से सेटल्ड स्थिति अस्थिर हो जाएगी। अदालत ने दोहराया कि कई वर्षों के अंतराल के बाद सेटल्ड पोजीशंस को अनसेटल नहीं किया जा सकता है।याचिका को किसी भी योग्यता से रहित पाते हुए जस्टिस एसएम सुब्रमण्यम की पीठ ने कहा, "कर्मचारी, जो अपने अधिकारों को लेकर सोए रहे, अपनी शिकायतों के निवारण के लिए किसी सुबह उठकर अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकते हैं...।"वर्तमान मामले में,...
नाबालिग यौन उत्पीड़न पीड़िता और उसकी मां ने बदली 'परिस्थितियों' में बयान बदला: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में सुनवाई के दौरान नाबालिग यौन उत्पीड़न पीड़िता और उसकी मां के मुकर जाने के बाद नाबालिग लड़की का यौन उत्पीड़न करने और उससे शादी करने के आरोपी को जमानत दे दी।जस्टिस के नटराजन की एकल पीठ ने आरोपी हनुमंथप्पा द्वारा दायर याचिका को स्वीकार कर लिया और उसे दो लाख रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के दो जमानतदारों के निष्पादन पर जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।आरोपी को दो अक्टूबर, 2020 को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), 1860 की धारा 376, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण...
स्मार्त ब्राह्मण नहीं एक धार्मिक संप्रदाय: मद्रास हाईकोर्ट
मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि स्मार्त ब्राह्मण केवल एक जाति/समुदाय थे, यह बिना किसी ऐसी विशेषता के है, जो उन्हें तमिलनाडु राज्य के अन्य ब्राह्मणों से अलग करता था। इस प्रकार, उन्हें एक धार्मिक संप्रदाय के रूप में पहचाना नहीं जा सकता और वे संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत लाभ के हकदार नहीं हैं।मदुरै खंडपीठ के जस्टिस आर विजयकुमार स्मार्त ब्राह्मण समुदाय के कुछ सदस्यों द्वारा संचालित एक संस्था के लिए अल्पसंख्यक दर्जा का दावा करने वाले एक आवेदन पर विचार कर रहे थे। यह देखते हुए कि अपीलकर्ता यह...
मध्यस्थता के लिए भेजे जाने के बावजूद विवाद का समाधान नहीं होने पर पक्षकार अदालत शुल्क की वापसी का दावा नहीं कर सकता: केरल हाईकोर्ट
केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में यह व्यवस्था दी है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 89 के तहत समझौते के लिए केवल एक पक्ष का संदर्भ केरल कोर्ट शुल्क और सूट मूल्यांकन अधिनियम की धारा 69 ए के तहत प्रदान किए गए अदालत शुल्क की वापसी का तब तक हकदार नहीं होगा, जब तक कि समझौता संबद्ध पक्षों के बीच नहीं किया गया हो।न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने कहा कि हालांकि सीपीसी की धारा 89 के तहत वर्णित विवादों के निपटारे में 'मध्यस्थता' भी शामिल है, लेकिन एक पक्ष अदालत शुल्क की वापसी का हकदार नहीं है, क्योंकि...

















