हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (12 जनवरी, 2026 से 16 जनवरी, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
खरीदार को पत्नी के दावे की जानकारी होने पर हिंदू पत्नी पति द्वारा बेची गई प्रॉपर्टी से भरण-पोषण का दावा कर सकती है: केरल हाईकोर्ट
केरल हाईकोर्ट की फुल बेंच ने हाल ही में फैसला सुनाया कि एक हिंदू पत्नी अपने पति की प्रॉपर्टी के मुनाफे से मेंटेनेंस पाने की हकदार है, भले ही प्रॉपर्टी ट्रांसफर हो गई हो, अगर ट्रांसफर मेंटेनेंस के लिए कानूनी कार्यवाही शुरू होने के बाद किया गया हो या अगर इस बात का सबूत हो कि ट्रांसफर लेने वाले को बिक्री के समय उसके दावे के बारे में पता था।
जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी, जस्टिस पी.वी. कुन्हीकृष्णन और जस्टिस जी. गिरीश की बेंच ने साफ किया कि ऐसे मामलों में पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार को ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 39/हिंदू मेंटेनेंस एंड एडॉप्शन एक्ट की धारा 28 का संरक्षण और विशेषाधिकार मिलेगा, जो उस प्रॉपर्टी के ट्रांसफर की परवाह किए बिना किसी अचल संपत्ति के मुनाफे से तीसरे व्यक्ति के मेंटेनेंस के अधिकार की सुरक्षा से संबंधित है।
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लोक अदालत में समझौता पक्षकारों की स्वतंत्र सहमति से ही संभव, वकील को बिना लिखित अधिकार समझौता करने का हक नहीं: गुवाहाटी हाइकोर्ट
गुवाहाटी हाइकोर्ट ने नेशनल लोक अदालत में दर्ज किए गए समझौते की वैधता पर अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत कोई भी समझौता तभी मान्य होगा जब वह पक्षकारों द्वारा स्वयं अपनी स्वतंत्र सहमति से किया गया हो।
जस्टिस संजय कुमार मेधी ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वकील द्वारा बिना किसी लिखित प्राधिकार के किया गया समझौता कानूनी रूप से वैध नहीं माना जा सकता और न ही उसे अनिवार्य माना जा सकता है।
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बच्चे के प्राइवेट पार्ट से लिंग रगड़ना POCSO Act के तहत 'पेनिट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट' नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी की सज़ा में बदलाव किया
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पेनिट्रेशन के सबूत के बिना किसी बच्चे के प्राइवेट पार्ट से पुरुष के प्राइवेट पार्ट को रगड़ना, प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेस एक्ट (POCSO Act) की धारा 3 के तहत "पेनिट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट" नहीं माना जाएगा।
जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने कहा, “आरोपी के लिंग को PW1 के प्राइवेट पार्ट से रगड़ना, साफ तौर पर एक्ट की धारा 3 के क्लॉज़ (a) से (d) के तहत नहीं आता है। इसलिए रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर POCSO Act की धारा 3 के तहत पेनिट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट या धारा 5 के तहत गंभीर पेनिट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट का मामला नहीं बनता है।”
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एक बार जब कोई मामला फाइनल हो जाता है तो ट्रायल कोर्ट उसे दोबारा नहीं खोल सकता या स्पष्टीकरण के लिए हाईकोर्ट को रेफर नहीं कर सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार जब ट्रायल कोर्ट किसी मामले पर अंतिम फैसला दे देता है तो उसके पास उस मामले को दोबारा खोलने, उस पर फिर से विचार करने या उसी मामले को हाई कोर्ट को रेफर करने का अधिकार क्षेत्र नहीं होता है, खासकर जब आदेश फाइनल हो गया हो और उचित कानूनी उपायों से उसे चुनौती न दी गई हो।
चीफ जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस रजनेश ओसवाल की बेंच ने कहा कि किसी तय मामले पर दोबारा बहस की अनुमति देना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, और जो वादी किसी प्रतिकूल आदेश को चुनौती देने में विफल रहा है, उसे कार्यवाही के बाद के चरण में अप्रत्यक्ष रूप से उसी मुद्दे को उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
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सेवा में तीन साल से कम शेष होने के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता: गुवाहाटी हाइकोर्ट
गुवाहाटी हाइकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के समय उसकी सेवा में तीन साल से कम अवधि शेष होने के आधार पर उसके आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना मनमाना है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
चीफ जस्टिस अशुतोष कुमार और जस्टिस अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि मृतक कर्मचारी की शेष सेवा अवधि के आधार पर किया गया यह वर्गीकरण न तो तार्किक है और न ही इसका उद्देश्य से कोई सीधा संबंध है।
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5,000 से कम पक्षी होने के बावजूद भी पोल्ट्री फार्म रिहायशी इलाके से 50 मीटर के दायरे में नहीं चल सकता: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि पोल्ट्री फार्म के लिए जगह के नियम पाले जा रहे पक्षियों की संख्या से अलग लागू होते हैं, और किसी भी पोल्ट्री फार्म—चाहे छोटा हो या बड़ा—को रिहायशी इलाके के 500 मीटर के दायरे में चलाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कांगड़ा जिले में रिहायशी घरों से सिर्फ 50-60 मीटर की दूरी पर बने एक पोल्ट्री फार्म को तुरंत बंद करने का आदेश दिया।
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जमानती अपराधों में बरी होने के खिलाफ अपील सिर्फ़ हाईकोर्ट में होती है, सेशंस कोर्ट में नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में एक सेशंस कोर्ट द्वारा दिए गए दोषसिद्धि का आदेश रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को लापरवाही से मौत का कारण बनने का दोषी ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए बरी के आदेश को चुनौती देते हुए सेशंस कोर्ट में गलत तरीके से अपील दायर की थी, जबकि सेशंस कोर्ट के पास ऐसी अपील पर सुनवाई करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।
अपीलकर्ता, के. केशवा ने सेशंस कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसने ट्रायल कोर्ट के बरी होने के खिलाफ राज्य की अपील को स्वीकार कर लिया। सेशंस कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 279, 337, 338 और 304-A के तहत अपराधों के लिए दोषी ठहराया।
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HMA | पहली शादी के रहते दूसरी शादी पहली पत्नी की मौत पर जायज़ नहीं हो जाती: उड़ीसा हाईकोर्ट
उड़ीसा हाईकोर्ट ने माना कि एक हिंदू आदमी का अपनी पहली शादी के रहते दूसरी शादी करना, जो शुरू से ही अमान्य है, पहली पत्नी की मौत पर जायज़/कानूनी नहीं हो जाती। एक पुराने सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी की फ़ैमिली पेंशन देने की अर्ज़ी पर फ़ैसला करते हुए जस्टिस दीक्षित कृष्ण श्रीपाद और जस्टिस चित्तरंजन दाश की डिवीज़न बेंच ने कहा – “इस मामले में माना कि अपील करने वाले ने दूसरी औरत के साथ पहली शादी के रहते हुए मृतक कर्मचारी से शादी की थी। यह काम अपने आप में हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 17 और पहले के इंडियन पैनल कोड, 1862 (IPC) की सेक्शन 495 के तहत सज़ा के लायक दो शादी का जुर्म है। तथाकथित 'दूसरी पत्नी' को फ़ैमिली पेंशन देना, गैर-कानूनी कामों को बढ़ावा देने जैसा है।”
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झूठी FIR दर्ज कराने वालों पर पुलिस के लिए मुकदमा चलाना अनिवार्य, पालन न करने पर IOs को अवमानना का सामना करना पड़ेगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट
एक महत्वपूर्ण आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य की पुलिस मशीनरी को सख्त निर्देश दिया कि वे उन व्यक्तियों/सूचना देने वालों के खिलाफ अनिवार्य रूप से मुकदमा शुरू करें, जो झूठी या दुर्भावनापूर्ण फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराते हैं।
जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की बेंच ने कहा कि अगर जांच में पता चलता है कि FIR झूठी जानकारी पर आधारित थी तो IO "कानूनी रूप से बाध्य" है कि वह BNSS की धारा 215(1)(a) (CrPC की धारा 195(1)(a) के बराबर) के तहत सूचना देने वाले के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज करे।
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शादी के बाद राज्य परिवर्तन से महिलाओं का आरक्षण अधिकार समाप्त नहीं होता: एमपी हाइकोर्ट
मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने अहम फैसला देते हुए कहा कि जो महिलाएं विवाह से पहले किसी अन्य राज्य की निवासी थीं और शादी के बाद मध्य प्रदेश में स्थायी रूप से आकर बस गईं, उन्हें केवल इस आधार पर “प्रवासी” नहीं माना जा सकता। यदि उनका जाति वर्ग दोनों राज्यों में मान्यता प्राप्त आरक्षित श्रेणी में आता है तो उन्हें मध्य प्रदेश में सेवा और आरक्षण से जुड़े सभी लाभ मिलेंगे।
जस्टिस जय कुमार पिल्लई की पीठ ने स्पष्ट किया कि विवाह के बाद मध्य प्रदेश की स्थायी निवासी बन चुकी महिलाओं को राज्य की निवासी मानते हुए आरक्षण संबंधी लाभ दिए जाने चाहिए, बशर्ते वे निर्धारित वैधानिक शर्तों को पूरा करती हों।
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रिहायशी बिल्डिंग में वकील का ऑफिस 'कमर्शियल एक्टिविटी' नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मंगलवार (13 जनवरी) को कहा कि रिहायशी बिल्डिंग में मौजूद वकील के ऑफिस को कमर्शियल एक्टिविटी नहीं माना जा सकता। जस्टिस जीएस अहलूवालिया की बेंच ने कहा; "जैसा कि पहले ही बताया गया, विवादित कमरा किसी कमर्शियल बिल्डिंग में नहीं, बल्कि एक रिहायशी बिल्डिंग में है। इसलिए किसी भी तरह से यह नहीं कहा जा सकता कि रिहायशी बिल्डिंग में मौजूद वकील का ऑफिस एक कमर्शियल एक्टिविटी है।"
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पति को पत्नी और उसके साथ रहने वाले बच्चे को मेंटेनेंस देना होगा, भले ही दूसरा बच्चा उसके साथ रहता हो: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पति की अपनी पत्नी और उसके साथ रहने वाले नाबालिग बच्चे को मेंटेनेंस देने की कानूनी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ इसलिए कम नहीं हो जाती कि उनकी शादी का दूसरा बच्चा उसके साथ रह रहा है।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा, "सिर्फ़ इसलिए कि एक बच्चा याचिकाकर्ता-पति की कस्टडी में है, यह अपने आप में उसे प्रतिवादी नंबर 1-पत्नी और उसके साथ रहने वाले नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण करने की ज़िम्मेदारी से मुक्त करने का आधार नहीं हो सकता।"
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I-PAC कार्यालय से कुछ भी जब्त नहीं हुआ: ED के बयान के बाद TMC की याचिका कलकत्ता हाईकोर्ट ने निस्तारित की
प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा कोलकाता हाईकोर्ट को यह बताने के बाद कि 8 जनवरी को I-PAC और उसके निदेशक प्रतीक जैन के कार्यालय से कोई भी दस्तावेज़ या उपकरण जब्त नहीं किए गए, कलकत्ता हाईकोर्ट ने बुधवार को तृणमूल कांग्रेस (TMC) की उस याचिका का निपटारा कर दिया जिसमें पार्टी ने कथित रूप से जब्त किए गए अपने गोपनीय राजनीतिक डेटा की सुरक्षा की मांग की थी।
जस्टिस सुव्रा घोष के समक्ष सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने कहा कि ED ने कुछ भी जब्त नहीं किया है और कथित तौर पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ही फाइलें और उपकरण अपने साथ ले गई थीं। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि पंचनामा से स्पष्ट होता है कि 8 जनवरी को I-PAC या उसके निदेशक के कार्यालय से कोई जब्ती नहीं हुई।
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स्थायी कार्यात्मक दिव्यांगता वाला नाबालिग 'कुशल श्रमिक' के रूप में मुआवजे का हकदार: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि दुर्घटना के बाद 100% स्थायी कार्यात्मक दिव्यांगता से पीड़ित बेरोज़गार नाबालिग को भी मोटर वाहन अधिनियम के तहत “कुशल श्रमिक (Skilled Workman)” के रूप में मुआवजा दिया जाना चाहिए।
जस्टिस संदीप जैन ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) द्वारा दिए गए मुआवजे को बढ़ाने संबंधी अपील पर सुनवाई करते हुए कहा— “भले ही यह मान लिया जाए कि दुर्घटना के समय दावा करने वाला केवल 16 वर्ष का था और किसी भी प्रकार की आय अर्जित नहीं कर रहा था, फिर भी उसे कुशल श्रमिक के आधार पर मुआवजा पाने का अधिकार है।”
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आधार और वोटर आईडी जन्मतिथि का निर्णायक प्रमाण नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 13 जनवरी को एक अहम फैसले में कहा कि आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड किसी व्यक्ति की जन्मतिथि का निर्णायक और अंतिम प्रमाण नहीं माने जा सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि ये दस्तावेज़ स्व-घोषणा के आधार पर तैयार किए जाते हैं और इनका उद्देश्य केवल पहचान सुनिश्चित करना होता है, न कि जन्मतिथि जैसे सेवा संबंधी तथ्यों का निर्धारण करना। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें धार जिले के अतिरिक्त कलेक्टर द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी गई थी।
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तलाक के समय पिता को सौंपे गए बेटे की कस्टडी पर बाद में 'श्रेष्ठ अधिकार' का दावा नहीं कर सकती मां: गुजरात हाइकोर्ट
गुजरात हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें नाबालिग बेटे की कस्टडी की मांग कर रही मां की याचिका को खारिज कर दिया गया था। हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक के समय मां ने अपनी पूरी सहमति और समझ के साथ बेटे की कस्टडी पिता को सौंपी थी, ऐसे में वह बाद में यह कहकर “श्रेष्ठ कस्टडी अधिकार” का दावा नहीं कर सकती कि बच्चा कम उम्र का है और उसे मां के साथ ही रहना चाहिए। यह अपील उस फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर की गई, जिसमें मां की स्थायी कस्टडी की मांग अस्वीकार करते हुए उसे केवल मुलाकात के अधिकार दिए गए।
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BNSS की धारा 35 पुलिस को बिना रजिस्टर्ड केस के व्यक्तियों को बुलाने या पूछताछ करने का अधिकार नहीं देती: मद्रास हाईकोर्ट
मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि पुलिस के पास बिना रजिस्टर्ड केस के किसी व्यक्ति को बुलाने या उससे पूछताछ करने का अधिकार नहीं है। जस्टिस सुंदर मोहन ने इस तरह डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस द्वारा जारी नोटिस रद्द किया, जिसमें एक पत्रकार को बुलाया गया और उससे एक लेख के बारे में स्पष्टीकरण मांगा गया, जिसमें कथित तौर पर पुलिस के खिलाफ मानहानिकारक बयान थे। जज ने कहा कि यह धारा सिर्फ पुलिस को बिना वारंट के किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार देती है और बिना केस दर्ज किए किसी व्यक्ति से पूछताछ करने का अधिकार नहीं देती।
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परीक्षा का पहला चरण पास करने के लिए OBC कोटा का फायदा उठाने वाला उम्मीदवार बाद में अनारक्षित कैटेगरी में शिफ्ट नहीं हो सकता: एमपी हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि जो उम्मीदवार परीक्षा के पहले चरण के लिए OBC कैटेगरी के तहत आरक्षण का फायदा उठाता है, वह बाद में परीक्षा के दूसरे चरण में अनारक्षित कैटेगरी में जाने की मांग नहीं कर सकता, अगर वह OBC उम्मीदवार के तौर पर दूसरा चरण पास नहीं कर पाता।
ऐसा करते हुए कोर्ट ने महिला की याचिका खारिज की, जिसने 2023 पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा का पहला चरण OBC कैटेगरी के तहत पास करने के बाद दूसरे चरण में अनारक्षित कैटेगरी में जाने की मांग की थी, क्योंकि वह OBC कैटेगरी का कट-ऑफ पूरा नहीं कर पाई।
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पीएम केयर्स फंड कानूनी संस्था, लेकिन RTI Act के तहत उसे प्राइवेसी का अधिकार: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को मौखिक रूप से टिप्पणी की कि पीएम केयर्स फंड, एक कानूनी या सरकारी संस्था होने के बावजूद, सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) के तहत प्राइवेसी के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की डिवीजन बेंच ने कहा कि भले ही यह फंड एक राज्य हो, लेकिन सिर्फ इसलिए कि यह एक पब्लिक अथॉरिटी है। कुछ सार्वजनिक काम करता है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह अपने प्राइवेसी के अधिकार को खो देता है।
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सरोगेसी कानून में आयु सीमा वैध, पहली कोशिश असफल होने के आधार पर छूट नहीं दी जा सकती: गुवाहाटी हाइकोर्ट
गुवाहाटी हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरोगेसी से संबंधित कानून में तय की गई आयु सीमा पूरी तरह संवैधानिक है। इसमें केवल इस आधार पर इसमें छूट नहीं दी जा सकती कि दंपति की पहली सरोगेसी कोशिश असफल हो गई। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत कठिनाइयां चाहे जितनी भी वास्तविक हों, वे जनहित में बनाए गए वैधानिक प्रावधानों को शिथिल करने या निरस्त करने का आधार नहीं बन सकतीं।
इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस अशुतोष कुमार और जस्टिस अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने की। अदालत ने कहा कि सरोगेसी कानून के तहत लगाए गए प्रतिबंध वैध राज्य हितों को साधने के लिए हैं, उनका उद्देश्य से सीधा संबंध है और उन्हें न तो अत्यधिक कहा जा सकता है और न ही दमनकारी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक न्याय केवल सहानुभूति के आधार पर नहीं किया जा सकता।
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सिविल जज मुस्लिम शादी खत्म करने का आदेश नहीं दे सकते, फैमिली कोर्ट ही सक्षम फोरम: गुवाहाटी हाईकोर्ट
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल जज के पास तलाक के रूप में मुस्लिम शादी को खत्म करने को प्रमाणित करने और तलाक का घोषणात्मक आदेश देने का अधिकार क्षेत्र नहीं है और सक्षम कोर्ट फैमिली कोर्ट या फैमिली कोर्ट न होने पर डिस्ट्रिक्ट कोर्ट होगा।
ऐसा करते हुए हाईकोर्ट ने सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के एक आदेश बरकरार रखा, जिसने अपीलीय कोर्ट – सिविल जज (जूनियर डिवीजन) द्वारा पारित आदेश खारिज कर दिया, जिसने एक वैवाहिक मुकदमे में एक व्यक्ति को तलाक के रूप में घोषणात्मक राहत दी और लिखित तलाक की पुष्टि के लिए एक आदेश भी दिया था। अपीलीय कोर्ट के आदेश के खिलाफ पति ने हाई कोर्ट में अपील की।
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वकील-मुवक्किल विशेषाधिकार | कोर्ट वकीलों को क्लाइंट के निर्देश पर फाइल किए गए डॉक्यूमेंट्स का सोर्स बताने के लिए मजबूर नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किसी वकील को क्लाइंट द्वारा दिए गए डॉक्यूमेंट का सोर्स बताने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह विशेषाधिकार प्राप्त बातचीत के दायरे में आता है, जब तक कि धोखाधड़ी का कोई प्रथम दृष्टया न्यायिक निष्कर्ष न हो।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि जब कोई क्लाइंट कानूनी बचाव के लिए अपने वकील को कोई डॉक्यूमेंट देता है तो डॉक्यूमेंट के ओरिजिन से जुड़ा ऐसा काम प्रोफेशनल गोपनीयता का हिस्सा होता है।
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S.48 UP Municipality Act | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'नगरपालिका' अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया बताते हुए जारी किए दिशा-निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने खास प्रक्रिया के दिशा-निर्देश दिए , जिनका पालन राज्य सरकार को उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम, 1916 की धारा 48 के तहत नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष को हटाने से पहले करना होगा। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ऐसा हटाना सिर्फ शुरुआती जांच और कारण बताओ नोटिस के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि आरोपों को तय करने और गवाहों से जिरह सहित एक "पूरी जांच" ज़रूरी है।
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प्रेम संबंध में विफलता और शादी से इनकार स्वतः ही आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला नहीं: गुवाहाटी हाइकोर्ट
गुवाहाटी हाइकोर्ट ने हाल ही में महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया कि किसी प्रेम संबंध का टूट जाना या शादी करने से मना कर देना, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने एक व्यक्ति के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी पर एक नाबालिग लड़की को जान देने के लिए मजबूर करने का आरोप था।
जस्टिस अंजन मोनी कलिता ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री नहीं है, जो यह दर्शाती हो कि आरोपी ने मृतका को उकसाया या उसे ऐसी स्थिति में धकेला था जहाँ आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प न बचा हो।