एक बार जब कोई मामला फाइनल हो जाता है तो ट्रायल कोर्ट उसे दोबारा नहीं खोल सकता या स्पष्टीकरण के लिए हाईकोर्ट को रेफर नहीं कर सकता: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
Shahadat
16 Jan 2026 7:31 PM IST

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार जब ट्रायल कोर्ट किसी मामले पर अंतिम फैसला दे देता है तो उसके पास उस मामले को दोबारा खोलने, उस पर फिर से विचार करने या उसी मामले को हाई कोर्ट को रेफर करने का अधिकार क्षेत्र नहीं होता है, खासकर जब आदेश फाइनल हो गया हो और उचित कानूनी उपायों से उसे चुनौती न दी गई हो।
चीफ जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस रजनेश ओसवाल की बेंच ने कहा कि किसी तय मामले पर दोबारा बहस की अनुमति देना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, और जो वादी किसी प्रतिकूल आदेश को चुनौती देने में विफल रहा है, उसे कार्यवाही के बाद के चरण में अप्रत्यक्ष रूप से उसी मुद्दे को उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
यह मामला निसार अहमद काकापोरा और अन्य बनाम एजाज अहमद काडू नामक सिविल मुकदमे से संबंधित है, जो सिविल जज (सीनियर डिवीजन), बिजबेहारा की अदालत में लंबित है। यह मुकदमा मकान मालिकों और उनके किराएदार के बीच बेदखली, कब्जे की वसूली, किराए के बकाया और मेस्ने प्रॉफिट से संबंधित है।
मुकदमे के लंबित रहने के दौरान, ट्रायल कोर्ट ने जम्मू और कश्मीर आवासीय और वाणिज्यिक किरायेदारी अधिनियम, 2012 के तहत एक सिविल कोर्ट में मुकदमे की स्वीकार्यता के संबंध में एक मुद्दा तय किया। उक्त मुद्दे पर 20.02.2023 के आदेश के माध्यम से वादियों के पक्ष में अंतिम फैसला किया गया।
इसके बाद सिविल रिवीजन नंबर 04/2024 (मनोज कुमार बनाम दारा सिंह) में एक सिंगल जज द्वारा पारित 16.05.2024 के आदेश पर भरोसा किया गया, जिसमें जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की अनुसूची V में जम्मू-कश्मीर मकान और दुकानें किराया नियंत्रण अधिनियम को शामिल न करने के संबंध में टिप्पणियां की गईं, जिससे पुनर्गठन के बाद इसकी निरंतर प्रयोज्यता के बारे में सवाल उठे।
उपरोक्त आदेश का हवाला देते हुए ट्रायल कोर्ट ने मुकदमे की स्वीकार्यता पर स्पष्टीकरण के लिए हाईकोर्ट को एक रेफरेंस भेजा।
वादियों के वकील ने तर्क दिया कि रेफरेंस पूरी तरह से अमान्य था, क्योंकि मुद्दे पर पहले ही फैसला हो चुका था और मामला अंतिम बहस के लिए लंबित था। यह तर्क दिया गया कि एक बार जब 20.02.2023 का आदेश फाइनल हो गया तो ट्रायल कोर्ट के पास मुद्दे पर दोबारा विचार करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था। नोटिस दिए जाने के बावजूद, प्रतिवादियों की ओर से कोई पेश नहीं हुआ।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें मानते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार अंतिम रूप से तय किए गए मुद्दे को उसी कोर्ट द्वारा दोबारा नहीं खोला जा सकता। अगर कोई नाराज़ है तो सही उपाय यह है कि वह ऊपरी फोरम में आदेश को चुनौती दे।
कोर्ट ने साफ किया कि उसकी टिप्पणियां सिर्फ़ रेफरेंस का जवाब देने तक सीमित हैं। उसने 20.02.2023 के ट्रायल कोर्ट के आदेश की वैधता की जांच नहीं की। उसने यह भी कहा कि सिविल रिवीजन नंबर 04/2024 में उठाया गया बड़ा मुद्दा उन कार्यवाही में अलग से देखा जाएगा।
रेफरेंस को अमान्य मानते हुए हाईकोर्ट ने उसी के अनुसार जवाब दिया और निर्देश दिया कि आदेश की एक कॉपी जानकारी के लिए ट्रायल कोर्ट को भेजी जाए।
Case-Title: Nisar Ahmad Kakapori and Anr vs Aijaz Ahmad Kadoo& Anr.2025

