सेवा में तीन साल से कम शेष होने के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता: गुवाहाटी हाइकोर्ट
Amir Ahmad
16 Jan 2026 4:17 PM IST

गुवाहाटी हाइकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के समय उसकी सेवा में तीन साल से कम अवधि शेष होने के आधार पर उसके आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना मनमाना है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
चीफ जस्टिस अशुतोष कुमार और जस्टिस अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि मृतक कर्मचारी की शेष सेवा अवधि के आधार पर किया गया यह वर्गीकरण न तो तार्किक है और न ही इसका उद्देश्य से कोई सीधा संबंध है।
हाइकोर्ट ने कहा,
“हम पाते हैं कि मृत कर्मचारी की बची हुई सेवा अवधि के आधार पर किया गया वर्गीकरण न तो समझ में आने योग्य है और न ही इसका उस उद्देश्य से कोई तार्किक संबंध है, जिसे हासिल करने की बात कही गई।”
खंडपीठ ने यह भी टिप्पणी की कि धोखाधड़ी या दुरुपयोग सेवा अवधि चाहे जितनी भी शेष हो, किसी भी स्थिति में हो सकता है। केवल उन्हीं मामलों में अनुकंपा नियुक्ति सीमित कर देना, जहां मृत कर्मचारी के पास तीन साल की सेवा बची हो, इससे धोखाधड़ी की संभावना कम नहीं होती।
अदालत ने कहा कि सेवा अवधि और धोखाधड़ी की आशंका के बीच कोई तार्किक कारण-कार्य संबंध नहीं है।
यह फैसला राज्य सरकार द्वारा दायर एक रिट अपील और उससे जुड़ी अन्य अपीलों पर सुनाया गया।
राज्य ने एकल पीठ के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें 1 जून, 2015 के कार्यालय ज्ञापन की धारा 1 को रद्द कर दिया गया। इस धारा के तहत यह प्रावधान था कि यदि सेवा में रहते किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु हो जाए और उसकी सेवानिवृत्ति में तीन साल से कम समय बचा हो, तो उसके आश्रित अनुकंपा नियुक्ति के पात्र नहीं होंगे।
राज्य सरकार ने दलील दी थी कि अनुकंपा नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत मेरिट आधारित सार्वजनिक रोजगार का अपवाद है और यह कोई निहित अधिकार नहीं है।
सरकार ने यह भी कहा कि 1 जून 2015 का ज्ञापन अब 14 सितंबर 2017 की नई योजना से प्रतिस्थापित हो चुका है, जिसमें अनुकंपा नियुक्ति के स्थान पर अनुकंपा पारिवारिक पेंशन योजना लागू की गई।
हालांकि, हाइकोर्ट ने कहा कि तीन साल की सीमा तय करने के पीछे राज्य की ओर से कोई समकालीन और ठोस कारण सामने नहीं रखा गया।
अदालत ने कहा कि केवल यह कह देना कि यह प्रशासनिक नीति का हिस्सा है, पर्याप्त नहीं है। कार्यपालिका को भी अनुच्छेद 14 के मानकों का पालन करना होगा।
हाइकोर्ट ने अपने फैसले में कहा,
“नीतिगत वर्गीकरण मनमाना, तर्कहीन या भेदभावपूर्ण नहीं हो सकता। अनुकंपा नियुक्ति भले ही पूर्ण अधिकार न हो, लेकिन जब यह लाभ नीति के तहत दिया जाता है तो वह भी संवैधानिक जांच से परे नहीं हो सकता।”
अदालत ने एकल पीठ द्वारा कार्यालय ज्ञापन की धारा 1 को असंवैधानिक घोषित किए जाने को पूरी तरह सही ठहराया और मामलों को पुनर्विचार के लिए भेजने के आदेश की पुष्टि की।
हालांकि, हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित निजी पक्षों को कोई झूठी उम्मीद नहीं पालनी चाहिए।
अदालत ने कहा कि अधिकारी पुनर्विचार करते समय समय के लंबे अंतराल को एक महत्वपूर्ण पहलू मानेंगे, क्योंकि अत्यधिक देरी के बाद की गई सिफारिशें न्यायिक जांच में टिक नहीं भी सकती हैं।
इन सभी कारणों से हाइकोर्ट ने राज्य सरकार की सभी अपीलों को खारिज कर दिया।

