हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (23 फरवरी, 2026 से 27 फरवरी, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
प्रशिक्षण पूरा किए बिना असम राइफल्स से मुक्त होने पर बहाली का अधिकार नहीं: गुवाहाटी हाइकोर्ट
गुवाहाटी हाइकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जिस अभ्यर्थी ने न तो अपना प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया हो और न ही असम राइफल्स अधिनियम, 2006 के तहत औपचारिक रूप से बल का सदस्य बना हो उसे सेवा में पुनर्बहाली का अधिकार प्राप्त नहीं है, विशेषकर तब जब उसने स्वयं लिखित आवेदन और शपथपत्र देकर सेवा से मुक्त होने का अनुरोध किया हो। जस्टिस उन्नी कृष्णन नायर और जस्टिस यारेनजुंगला लोंगकुमेर की खंडपीठ ने एकलपीठ के निर्णय को बरकरार रखते हुए अभ्यर्थी की अपील खारिज की।
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सह-आरोपियों को बाद में जमानत न मिलना, पहले से मिली जमानत रद्द करने का आधार नहीं: दिल्ली हाइकोर्ट
दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी सह-आरोपी को बाद में जमानत से वंचित किया जाना पहले से जमानत पा चुके आरोपी की जमानत रद्द करने के लिए अपने आप में उपरांत उत्पन्न परिस्थिति नहीं माना जा सकता, जब तक यह आरोप न हो कि आरोपी ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया, या मिली हुई स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने यह टिप्पणी करते हुए उस याचिका को खारिज किया, जिसमें 6.05 करोड़ रुपये के कथित धोखाधड़ी और जालसाजी मामले में एक आरोपी को दी गई अग्रिम जमानत को रद्द करने की मांग की गई। इस मामले की जांच आर्थिक अपराध शाखा, दिल्ली पुलिस द्वारा की जा रही है।
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S. 183 BNSS | पीड़िता का बयान दोबारा रिकॉर्ड करने का निर्देश सिर्फ़ 'बहुत खास हालात' में ही दिया जा सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में साफ़ किया कि मजिस्ट्रेट के सामने BNSS की धारा 183 के तहत बयान दोबारा रिकॉर्ड करने का निर्देश सिर्फ़ बहुत खास हालात में ही दिया जा सकता है।
जस्टिस राजीव गुप्ता और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने कहा, "...यह पावर कोई रूटीन या ऑटोमैटिक पावर नहीं है, बल्कि हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट इसका इस्तेमाल प्रोसेस के गलत इस्तेमाल को रोकने, न्याय के मकसद को पूरा करने या गंभीर प्रोसेस में गड़बड़ियों को ठीक करने के लिए करता है, जिससे न्याय में गड़बड़ी हो सकती है।"
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शराब पॉलिसी केस में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत सभी आरोपी बरी, कोर्ट ने CBI जांच पर उठाए गंभीर सवाल
राउज एवेन्यू कोर्ट ने शुक्रवार को चर्चित आबकारी नीति मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी (AAP) के सीनियर नेता मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को आरोपमुक्त किया। स्पेशल जस्टिस जितेंद्र सिंह ने अपने आदेश में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की जांच पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रस्तुत आरोपपत्र में गंभीर त्रुटियाँ और विरोधाभास हैं।
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क्या शुरुआती पढ़ाई के दौरान फीस न देने पर किसी स्टूडेंट को स्कूल से निकाला जा सकता है? बॉम्बे हाईकोर्ट का जवाब
वर्तमान समय में पढ़ाई की अहमियत पर ज़ोर देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक 13 साल की लड़की की मदद की, जिसे फीस न देने पर उसके स्कूल से निकाल दिया गया था। नागपुर सीट पर बैठे जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस राज वाकोडे की डिवीजन बेंच ने बच्चों के फ्री और ज़रूरी शिक्षा के अधिकार एक्ट, 2009 के तहत स्कूल के काम को 'गैर-कानूनी और मनमाना' माना। इसलिए भंडारा ज़िले के फादर एग्नेल स्कूल को क्लास 7वीं में लड़की को फिर से एडमिशन देने का आदेश दिया और स्टूडेंट के माता-पिता को दो हफ़्ते के अंदर 23,900 रुपये की फीस भरने का भी आदेश दिया।
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नाबालिग की अभिरक्षा को लेकर माता-पिता के बीच विवाद में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका ग्राह्य नहीं: हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट ने एक पिता द्वारा अपनी नाबालिग पुत्री की पेशी और अभिरक्षा की मांग को लेकर दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि माता-पिता के बीच अभिरक्षा विवाद की स्थिति में उचित उपाय सक्षम अभिभावक न्यायालय के समक्ष ही उपलब्ध है।
चीफ जस्टिस जी. एस. संधावालिया और जस्टिस बिपिन सी. नेगी की खंडपीठ ने कहा कि जब नाबालिग का ठिकाना स्पष्ट रूप से ज्ञात हो, तो उस स्थान पर अधिकार क्षेत्र रखने वाले न्यायालय से ही राहत मांगी जानी चाहिए।
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पहली पत्नी के रहते हुआ विवाह शून्य, उसकी मृत्यु के बाद भी दूसरी पत्नी को फैमिली पेंशन का अधिकार नहीं: दिल्ली हाइकोर्ट
दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी पुरुष का दूसरा विवाह उसकी पहली शादी के रहते हुआ है तो वह विवाह कानूनन शून्य माना जाएगा। ऐसी दूसरी पत्नी को सेना पेंशन नियमावली 1961 के तहत फैमिली पेंशन का अधिकार नहीं मिलेगा, भले ही बाद में पहली पत्नी का निधन हो जाए।
जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) की धारा 11 के अनुसार, यदि विवाह के समय पति या पत्नी में से किसी की पूर्व वैध शादी विद्यमान है तो दूसरा विवाह शून्य है।
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CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण सिर्फ़ एक बार नहीं, बार-बार और लगातार मिलने वाला अधिकार: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि मेंटेनेंस देने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से है। साथ ही बेरोज़गारी, पैसे की तंगी, या दूसरी कार्रवाई के पेंडिंग होने के बहाने इससे बचा नहीं जा सकता। इसके अलावा, भरण-पोषण का कानूनी आधार इस सिद्धांत पर टिका है कि पत्नी, नाबालिग बच्चे, और डिपेंडेंट माता-पिता उस व्यक्ति के स्टेटस और साधनों के हिसाब से गुज़ारा पाने के हकदार हैं, जो कानूनी तौर पर उनका गुज़ारा करने के लिए ज़िम्मेदार है।
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शादीशुदा बेटी अगर अकेली कानूनी वारिस है तो वह एक्स-ग्रेटिया और लीव एनकैशमेंट पाने की हकदार: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने माना कि अगर शादीशुदा बेटी मृतक की अकेली कानूनी वारिस है तो वह लीव एनकैशमेंट और एक्स-ग्रेटिया पेमेंट पाने की हकदार है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीज़न बेंच ने 14 नवंबर 1972 के नोटिफिकेशन का ज़िक्र करते हुए कहा,
"यह नोटिफिकेशन शादीशुदा बेटी को इससे बाहर नहीं करता। यह नियम मरने वाले के कानूनी वारिसों के बीच झगड़े को सुलझाने के लिए बनाया गया, मतलब अगर मरने वाले के एक से ज़्यादा बेटे/बेटी हैं तो सबसे बड़ा बेटा ही एक्स-ग्रेसिया पाने का हक़दार है। दूसरा, अगर सबसे बड़ी बेटी शादीशुदा है तो वह एक्स-ग्रेसिया पाने के लिए बेटे को हटा सकती है। तीसरा, इस बात पर नोटिफिकेशन में कुछ नहीं कहा गया कि अगर शादीशुदा बेटी के अलावा कोई वारिस नहीं है तो एक्स-ग्रेसिया किसे मिलेगा। इसका मतलब है, अगर शादीशुदा बेटी मरने वाले की अकेली कानूनी वारिस है तो उसे इससे बाहर नहीं रखा गया।"
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स्क्रीनिंग स्टेज पर छूट लेने वाला रिज़र्व कैंडिडेट जनरल कैटेगरी में माइग्रेशन का दावा नहीं कर सकता: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि मल्टी-टियर सिलेक्शन प्रोसेस के स्क्रीनिंग स्टेज पर छूट लेने वाला रिज़र्व कैटेगरी का कैंडिडेट बाद में फ़ाइनल मेरिट में मिले ज़्यादा मार्क्स के आधार पर जनरल कैटेगरी में माइग्रेशन का दावा नहीं कर सकता।
याचिका खारिज करते हुए जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा, "कोई रिज़र्व कैटेगरी का कैंडिडेट जो एग्जाम प्रोसेस के किसी भी स्टेज पर, जिसमें प्रीलिमिनरी/स्क्रीनिंग स्टेज भी शामिल है, छूट लेता है, उसके बाद अनरिज़र्व्ड वैकेंसी के लिए अलॉटमेंट का दावा नहीं कर सकता।"
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BNSS की धारा 187 के तहत पुलिस रिमांड के लिए सिर्फ़ असली कस्टडी गिनी जाएगी, अंतरिम जमानत पर बिताया गया समय नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 187 के तहत पुलिस रिमांड की ज़्यादा से ज़्यादा मंज़ूर अवधि की गिनती करने के लिए सिर्फ़ उस समय को गिना जा सकता है, जब कोई आरोपी असल में कस्टडी में होता है और अंतरिम जमानत पर बिताया गया समय कस्टडी नहीं माना जा सकता।
जस्टिस प्रतीक जालान ने केरल हाईकोर्ट के फिसल पीजे बनाम केरल राज्य (2025) के फ़ैसले का ज़िक्र किया, जिसमें यह माना गया कि जिस समय के दौरान आरोपी व्यक्ति को टेम्पररी/अंतरिम जमानत पर रिहा किया गया, उसे कानूनी जमानत की अवधि की गिनती करने के लिए नहीं गिना जाना चाहिए, क्योंकि सिर्फ़ आरोपी द्वारा बिताई गई असल हिरासत की अवधि को ही गिना जाना चाहिए।
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अनरजिस्टर्ड निकाहनामा, शादी की फोटो या सर्विस रिकॉर्ड में नाम न होना पेंशन से वंचित करने का आधार नहीं: गुजरात हाइकोर्ट
गुजरात हाइकोर्ट ने अहमदाबाद नगर निगम को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि केवल इस आधार पर फैमिली पेंशन से इनकार करना कि निकाह रजिस्टर्ड नहीं था विवाह की तस्वीरें नहीं हैं या कर्मचारी के सर्विस रिकॉर्ड में पत्नी का नाम दर्ज नहीं है, अत्यंत अनुचित और अन्यायपूर्ण है। अदालत ने निगम को याचिकाकर्ता को मृत कर्मचारी की विधिक पत्नी मानते हुए पेंशन लाभ देने का निर्देश दिया।
जस्टिस मौलिक जे. शेलट ने कहा, “यह समझ से परे है कि केवल इस कारण कि दंपति की तस्वीर प्रस्तुत नहीं की गई, निगम यह निष्कर्ष निकाल ले कि विवाह हुआ ही नहीं। इसी प्रकार यह कहना भी अत्यंत अनुचित और अन्यायपूर्ण है कि यदि कर्मचारी ने जीवनकाल में अपनी दूसरी शादी की सूचना सेवा पुस्तिका में दर्ज नहीं कराई, तो याचिकाकर्ता को विधिक पत्नी नहीं माना जा सकता।”
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सिर्फ़ रिश्ता टूटना आत्महत्या के लिए उकसाने का 'उकसाना' नहीं: दिल्ली हाई कोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि सिर्फ़ रिश्ता टूटना भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 108 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं है। जस्टिस मनोज जैन ने कहा, "हालांकि, आजकल टूटे हुए रिश्ते और दिल टूटना आम बात हो गई, लेकिन सिर्फ़ रिश्ता टूटना अपने आप में उकसाने का मामला नहीं हो सकता ताकि यह BNS की धारा 108 (इसी तरह की IPC की धारा 306) के तहत उकसाने का मामला बन सके।"
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सरकारी कर्मचारियों, पुलिस को बिना इजाज़त छुट्टी पर जाने का कोई अधिकार नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने माना कि किसी सरकारी कर्मचारी या पुलिस वाले को बिना पहले से इजाज़त छुट्टी पर जाने और बाद में जमा हुई छुट्टियों में से गैरहाज़िरी को एडजस्ट करने का कोई अधिकार नहीं है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीज़न बेंच ने एक हेड कांस्टेबल की इस बात को खारिज किया कि उसकी गैरहाज़िरी को मौजूद छुट्टियों के बैलेंस में एडजस्ट किया जा सकता है।
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धर्म त्यागे बिना 'नो कास्ट, नो रिलीजन' प्रमाणपत्र नहीं मिल सकता: मद्रास हाइकोर्ट
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने हाल ही में एक व्यक्ति की नो कास्ट, नो रिलीजन प्रमाणपत्र जारी करने की मांग खारिज की। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक संबंधित व्यक्ति विधि सम्मत रीति-रिवाजों के अनुसार अपना धर्म त्याग नहीं करता, तब तक ऐसा प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जा सकता।
जस्टिस कृष्णन रामासामी ने कहा, “जब तक याचिकाकर्ता हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अपना धर्म त्याग नहीं करता, तब तक उसके अनुरोध पर विचार नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में इस प्रकार का प्रमाणपत्र जारी करने का प्रश्न ही नहीं उठता।”
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कुंडली न मिलने का बहाना बनाकर शादी से इनकार, जबकि पहले बनाए शारीरिक संबंध और दिए बार-बार आश्वासन BNS की धारा 69 लागू: दिल्ली हाइकोर्ट
दिल्ली हाइकोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति शादी का बार-बार आश्वासन देकर शारीरिक संबंध स्थापित करता है और बाद में कुंडली न मिलने का हवाला देकर विवाह से इनकार कर देता है तो यह भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) की धारा 69 के तहत अपराध के दायरे में आ सकता है। यह धारा छल या झूठे आश्वासन के माध्यम से स्थापित यौन संबंध को दंडनीय ठहराती है।
जस्टिस स्वरना कांता शर्मा ने ऐसे ही एक मामले में आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज की। आरोपी के विरुद्ध दुष्कर्म से संबंधित प्रावधानों के साथ-साथ BNS की धारा 69 के तहत FIR दर्ज की गई।
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साथी चुनने का अधिकार संवैधानिक, अंतरधार्मिक संबंधों पर रोक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद ने अंतरधार्मिक जोड़ों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 अंतरधार्मिक विवाह या सहजीवन संबंधों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जीवनसाथी चुनने का अधिकार और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित है।
जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा, “किसी व्यक्ति को अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ चाहे वह किसी भी धर्म का हो, रहने का अधिकार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है। किसी के निजी संबंध में हस्तक्षेप करना उसकी स्वतंत्र पसंद के अधिकार पर गंभीर अतिक्रमण होगा। यदि कानून दो व्यक्तियों को चाहे वे समान लिंग के ही क्यों न हों, शांतिपूर्वक साथ रहने की अनुमति देता है तो दो बालिग व्यक्तियों के स्वेच्छा से साथ रहने पर न तो कोई व्यक्ति, न परिवार और न ही राज्य आपत्ति कर सकता है।”
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मृतक का भाई CrPC के तहत 'पीड़ित', मर्डर की सज़ा के खिलाफ पति की अपील में हिस्सा ले सकता है: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने माना कि किसी मृतक व्यक्ति का भाई क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 2(wa) के तहत “पीड़ित” माना जाता है और अपराध से जुड़ी क्रिमिनल कार्रवाई में उसकी सुनवाई का हक है।
जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस डॉ. अंशुमान की डिवीजन बेंच एक मृतक महिला के भाई की इंटरवेंशन एप्लीकेशन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दोषी पति की सज़ा के खिलाफ दायर अपील में पार्टी रेस्पोंडेंट के तौर पर शामिल होने की मांग की गई।
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पूर्णकालिक दायित्व निभाने वाले विधि अधिकारियों को केवल संविदा नहीं कहा जा सकता, वे मेडिकल लाभ व अर्जित अवकाश के हकदार: पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि हरियाणा सरकार द्वारा नियुक्त सहायक एडवोकेट जनरल (AAG) और डिप्टी एडवोकेट जनरल (DAG) को केवल संविदा नियुक्ति का नाम देकर मूल सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे अधिकारियों को अवकाश यात्रा रियायत, मेडिकल प्रतिपूर्ति और अर्जित अवकाश सहित अन्य लाभ दिए जाने चाहिए।
जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा, “याचिकाकर्ता AAG/DAG के रूप में राज्य सरकार के अन्य विधि अधिकारियों की तुलना में अधिक दायित्व और कार्यभार निभा रहे हैं। वे न केवल अदालतों में राज्य का पक्ष रखते हैं बल्कि विभागों को विधिक राय देना लिखित उत्तरों का परीक्षण करना और अन्य प्रशासनिक कार्य भी करते हैं।”
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पति का पत्नी को छोड़ना और भरण-पोषण न देना, शादी टूटने का विरोध करने का अधिकार खो देता है: राजस्थान हाईकोर्ट
शादी टूटने की इजाज़त देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि पति का कानूनी कार्रवाई को पूरी तरह से छोड़ना, कानूनी निर्देशों का जानबूझकर उल्लंघन करना और कोर्ट के आदेश के अनुसार भरण-पोषण का लगातार भुगतान न करना, लगातार मानसिक क्रूरता है, जिससे पत्नी के लिए पति के साथ रहने की उम्मीद करना नामुमकिन हो जाता है।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की डिवीजन बेंच ने कहा कि पति द्वारा जानबूझकर अपनी शादी की ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ कानूनी ज़िम्मेदारियों को छोड़ना, मामले का विरोध करने के उसके अधिकार को खोने जैसा है।