लोक अदालत में समझौता पक्षकारों की स्वतंत्र सहमति से ही संभव, वकील को बिना लिखित अधिकार समझौता करने का हक नहीं: गुवाहाटी हाइकोर्ट

Amir Ahmad

17 Jan 2026 12:24 PM IST

  • लोक अदालत में समझौता पक्षकारों की स्वतंत्र सहमति से ही संभव, वकील को बिना लिखित अधिकार समझौता करने का हक नहीं: गुवाहाटी हाइकोर्ट

    गुवाहाटी हाइकोर्ट ने नेशनल लोक अदालत में दर्ज किए गए समझौते की वैधता पर अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत कोई भी समझौता तभी मान्य होगा जब वह पक्षकारों द्वारा स्वयं अपनी स्वतंत्र सहमति से किया गया हो।

    जस्टिस संजय कुमार मेधी ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वकील द्वारा बिना किसी लिखित प्राधिकार के किया गया समझौता कानूनी रूप से वैध नहीं माना जा सकता और न ही उसे अनिवार्य माना जा सकता है।

    अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम का मुख्य उद्देश्य विवादों का ऐसा समाधान निकालना है, जो दोनों पक्षों को पूरी तरह स्वीकार्य हो। इसके लिए पक्षकारों की भौतिक उपस्थिति और उनकी स्पष्ट रजामंदी अनिवार्य शर्त है।

    हाइकोर्ट ने इस मुद्दे की गहराई से जांच करने के लिए आयोग के रिकॉर्ड भी मंगवाए ताकि यह देखा जा सके कि क्या वकील को समझौता करने या हस्ताक्षर करने के लिए याचिकाकर्ता द्वारा कोई विशेष अधिकार पत्र दिया गया। रिकॉर्ड की जांच के बाद जस्टिस मेधी ने पाया कि वहां ऐसा कोई भी दस्तावेज मौजूद नहीं था जो वकील को समझौते के लिए अधिकृत करता हो।

    यह मामला असम राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के समक्ष लंबित एक अपील से जुड़ा था। एक कंपनी ने रिट याचिका दायर कर लोक अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके वकील ने समझौता स्वीकार कर लिया। कंपनी का तर्क था कि लोक अदालत की कार्यवाही के दौरान उनका कोई भी अधिकृत अधिकारी वहां मौजूद नहीं था और उनके वकील ने बिना किसी लिखित अनुमति के रियायतें दे दी थीं। हाइकोर्ट ने इस दलील को सही माना और कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता एक कंपनी है, इसलिए केवल उसके अधिकृत प्रतिनिधि ही समझौता करने के लिए कानूनी रूप से सक्षम हो सकते हैं।

    हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना पक्षकारों की वास्तविक भागीदारी और उनकी स्वतंत्र सहमति के किया गया कोई भी फैसला अधिनियम के मूल उद्देश्यों को विफल करता है। कोर्ट ने कहा कि वकील को मिले सामान्य निर्देशों या संदेशों के आधार पर किए गए समझौते को कानून की नजर में पुख्ता नहीं माना जा सकता।

    इस निष्कर्ष के साथ ही हाइकोर्ट ने लोक अदालत द्वारा पारित आदेश रद्द किया। साथ ही कोर्ट ने राज्य उपभोक्ता आयोग को निर्देश दिया कि वह इस अपील को पुनः बहाल करे और 2018 से लंबित इस मामले का गुण-दोष के आधार पर कानून के अनुसार जल्द से जल्द निस्तारण करे।

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