आधार और वोटर आईडी जन्मतिथि का निर्णायक प्रमाण नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Amir Ahmad

14 Jan 2026 2:55 PM IST

  • आधार और वोटर आईडी जन्मतिथि का निर्णायक प्रमाण नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 13 जनवरी को एक अहम फैसले में कहा कि आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड किसी व्यक्ति की जन्मतिथि का निर्णायक और अंतिम प्रमाण नहीं माने जा सकते।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि ये दस्तावेज़ स्व-घोषणा के आधार पर तैयार किए जाते हैं और इनका उद्देश्य केवल पहचान सुनिश्चित करना होता है, न कि जन्मतिथि जैसे सेवा संबंधी तथ्यों का निर्धारण करना।

    जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें धार जिले के अतिरिक्त कलेक्टर द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी गई थी।

    अतिरिक्त कलेक्टर ने हिरालाल बाई नामक महिला की अपील स्वीकार करते हुए उनकी सेवानिवृत्ति को गलत ठहराया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें आंगनवाड़ी सहायिका के पद पर पुनः बहाल कर दिया गया और याचिकाकर्ता को सेवा से हटा दिया गया, क्योंकि उस केंद्र पर आंगनवाड़ी सहायिका का केवल एक ही स्वीकृत पद था।

    याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उनकी नियुक्ति महिला एवं बाल विकास विभाग की नीति के अनुसार चयन प्रक्रिया के बाद जून, 2018 में की गई। इससे पहले उसी पद पर हिरालाल बाई कार्यरत थीं और विभागीय सेवा अभिलेखों के अनुसार 62 वर्ष की आयु पूर्ण करने पर उन्हें सेवानिवृत्त कर दिया गया। इस सेवानिवृत्ति आदेश को उस समय हिरालाल बाई ने कभी चुनौती नहीं दी। पद रिक्त होने के बाद विधिवत विज्ञापन जारी कर चयन प्रक्रिया पूरी की गई और याचिकाकर्ता की नियुक्ति हुई।

    करीब दो वर्ष बाद हिरालाल बाई ने अपील दायर कर यह दावा किया कि उनकी जन्मतिथि सेवा अभिलेखों में गलत दर्ज है। उन्होंने कहा कि उनकी वास्तविक जन्मतिथि 5 मार्च 1955 नहीं, बल्कि 1 जनवरी 1964 है और इसके समर्थन में उन्होंने आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड का हवाला दिया।

    हिरालाल बाई की ओर से यह तर्क दिया गया कि जब अपीलीय प्राधिकरण ने उनकी सेवानिवृत्ति को निरस्त कर दिया तो विभाग उस आदेश का पालन करने के लिए बाध्य है, विशेषकर जब आंगनवाड़ी सहायिका का केवल एक ही स्वीकृत पद है।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि हिरालाल बाई 5 मार्च, 2017 को सेवा अभिलेखों में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर सेवानिवृत्त हुई थीं।

    न्यायालय ने दोहराया कि कोई भी कर्मचारी, जो सेवा के दौरान अपनी जन्मतिथि को स्वीकार करता है और उसे अंतिम रूप लेने देता है, वह सेवानिवृत्ति के बाद उस प्रविष्टि को चुनौती नहीं दे सकता।

    अदालत ने यह भी कहा कि अपीलीय प्राधिकरण ने देरी और लापरवाही के सिद्धांत को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया, जो सेवा कानून में घातक माना जाता है। सेवानिवृत्ति के साथ ही नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध समाप्त हो जाता है। सेवानिवृत्ति के बाद लंबे समय पश्चात तय हो चुके मामलों को फिर से खोलना न केवल प्रशासनिक अस्थिरता पैदा करता है, बल्कि तीसरे पक्ष के साथ भी अन्याय करता है, जैसा कि इस मामले में हुआ।

    हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि सेवा मामलों में आधिकारिक सेवा अभिलेखों में दर्ज जन्मतिथि को सही मानने की एक मजबूत धारणा होती है और उसी के आधार पर सेवा अवधि, वरिष्ठता और सेवानिवृत्ति तय की जाती है। ऐसी प्रविष्टियों को चुनौती समय पर और ठोस, निर्विवाद साक्ष्यों के साथ ही दी जा सकती है। आधार कार्ड और वोटर आईडी जैसे दस्तावेज़ इस उद्देश्य के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

    अदालत ने यह भी गंभीरता से नोट किया कि याचिकाकर्ता को बिना कोई सुनवाई का अवसर दिए ही सेवा से हटा दिया गया, जबकि ऐसे प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक आदेश, जिनके नागरिक परिणाम होते हैं, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों, विशेष रूप से 'ऑडी आल्टरम पार्टेम' यानी पक्ष को सुने जाने के अधिकार का पालन करना अनिवार्य है।

    इन सभी कारणों से हाईकोर्ट ने अपीलीय प्राधिकरण के आदेश को शून्य और अवैध करार देते हुए निरस्त कर दिया तथा याचिकाकर्ता की सेवा समाप्ति को अस्थिर ठहराया।

    अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को आंगनवाड़ी सहायिका के पद पर पुनः बहाल किया जाए।

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