पति को पत्नी और उसके साथ रहने वाले बच्चे को मेंटेनेंस देना होगा, भले ही दूसरा बच्चा उसके साथ रहता हो: दिल्ली हाईकोर्ट

Shahadat

14 Jan 2026 8:13 PM IST

  • पति को पत्नी और उसके साथ रहने वाले बच्चे को मेंटेनेंस देना होगा, भले ही दूसरा बच्चा उसके साथ रहता हो: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पति की अपनी पत्नी और उसके साथ रहने वाले नाबालिग बच्चे को मेंटेनेंस देने की कानूनी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ इसलिए कम नहीं हो जाती कि उनकी शादी का दूसरा बच्चा उसके साथ रह रहा है।

    जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा,

    "सिर्फ़ इसलिए कि एक बच्चा याचिकाकर्ता-पति की कस्टडी में है, यह अपने आप में उसे प्रतिवादी नंबर 1-पत्नी और उसके साथ रहने वाले नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण करने की ज़िम्मेदारी से मुक्त करने का आधार नहीं हो सकता।"

    बेंच ने तर्क दिया कि मेंटेनेंस की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ इसलिए नहीं बंट जाती कि हर माता-पिता के पास एक बच्चे की कस्टडी है।

    इसमें आगे कहा गया,

    "अगर पत्नी काम नहीं कर रही है और उसकी आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है तो पति पर पत्नी और उसकी कस्टडी में रहने वाले नाबालिग बच्चे को मेंटेनेंस देने की कानूनी ज़िम्मेदारी बनी रहती है, भले ही दूसरा बच्चा उसके साथ रह रहा हो।"

    कोर्ट पति द्वारा दायर एक क्रिमिनल रिवीजन याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें फैमिली कोर्ट द्वारा पारित अंतरिम मेंटेनेंस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें प्रतिवादियों के पक्ष में ₹20,000/- प्रति माह देने का आदेश दिया गया।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि दोनों पक्ष माता-पिता की ज़िम्मेदारियां निभा रहे हैं, जिसमें एक बच्चा दोनों में से हर एक के साथ रह रहा है। इस स्थिति में मेंटेनेंस का पूरा बोझ उस पर डालना बहुत ज़्यादा और अनुचित है।

    असहमत होते हुए हाईकोर्ट ने कहा,

    "कोर्ट निश्चित रूप से इस बात को ध्यान में रखेगा कि एक बच्चा याचिकाकर्ता-पति के साथ रह रहा है और वह उस बच्चे का खर्च उठा रहा है। यह कारक मेंटेनेंस की उचित राशि का आकलन करने के लिए प्रासंगिक है, लेकिन यह अपने आप में पति की मेंटेनेंस देने की ज़िम्मेदारी को खत्म नहीं करता है।"

    इस तरह मामले के तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने अंतरिम मेंटेनेंस में बदलाव किया और याचिकाकर्ता को अपनी पत्नी और बच्चे को अंतरिम मेंटेनेंस के तौर पर ₹17,500/- प्रति माह की एकमुश्त राशि देने का निर्देश दिया।

    Case title: P v. A

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