प्रेम संबंध में विफलता और शादी से इनकार स्वतः ही आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला नहीं: गुवाहाटी हाइकोर्ट

Amir Ahmad

10 Jan 2026 7:24 PM IST

  • प्रेम संबंध में विफलता और शादी से इनकार स्वतः ही आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला नहीं: गुवाहाटी हाइकोर्ट

    गुवाहाटी हाइकोर्ट ने हाल ही में महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया कि किसी प्रेम संबंध का टूट जाना या शादी करने से मना कर देना, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने एक व्यक्ति के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी पर एक नाबालिग लड़की को जान देने के लिए मजबूर करने का आरोप था।

    जस्टिस अंजन मोनी कलिता ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री नहीं है, जो यह दर्शाती हो कि आरोपी ने मृतका को उकसाया या उसे ऐसी स्थिति में धकेला था जहाँ आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प न बचा हो।

    अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि आरोपी और मृतका के बीच प्रेम संबंध था और दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बने थे। मृतका के व्हाट्सएप संदेशों से यह स्पष्ट हुआ कि आरोपी ने आत्महत्या से मात्र दो दिन पहले उससे शादी करने से मना कर दिया और किसी दूसरी लड़की से विवाह करने की बात कही। हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल शादी से इनकार करना भारतीय दंड संहिता की धारा 107 के तहत 'उकसावा' नहीं माना जा सकता।

    जस्टिस कलिता ने जोर देकर कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के लिए एक स्पष्ट आपराधिक मंशा का होना अनिवार्य है, जो इस मामले में प्रथम दृष्टया नजर नहीं आती।

    भले ही हाइकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप को हटा दिया हो, लेकिन उसने आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म और POCSO Act की धारा 6 के तहत दर्ज आरोपों को बरकरार रखा है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें इन धाराओं के तहत संज्ञान लिया गया। मृतका के पिता द्वारा दर्ज FIR में आरोप लगाया गया कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर पिछले दो वर्षों से शारीरिक संबंध बनाए। जांच के दौरान मिले दस्तावेजों और जन्म प्रमाण पत्र से यह स्पष्ट हुआ कि जब यह कृत्य शुरू हुआ, तब मृतका नाबालिग थी, जिसके कारण पोक्सो की धाराएं प्रभावी होती हैं।

    अदालत ने अपने निर्णय में यह भी उल्लेख किया कि आत्महत्या के मामलों में कोर्ट को मृतका के व्यवहारिक इतिहास और आरोपी की गतिविधियों का गहन विश्लेषण करना चाहिए। इस मामले में कोर्ट ने पाया कि मृतका के अत्यधिक संवेदनशील होने का कोई पूर्व इतिहास नहीं था। हालांकि आरोपी अपने कृत्यों के बारे में अनुचित व्यवहार कर रहा था, लेकिन उसका यह व्यवहार मृतका को आत्महत्या के लिए मजबूर करने के कानूनी मापदंडों पर खरा नहीं उतरता।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि अवसाद या दुख के कारण उठाया गया कदम स्वतः ही दूसरे पक्ष को अपराधी नहीं बना देता जब तक कि जानबूझकर की गई किसी सहायता या षड्यंत्र का प्रमाण न मिले।

    गुवाहाटी हाइकोर्ट ने याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए IPC की धारा 306 के तहत लिए गए संज्ञान को रद्द कर दिया। हालांकि, आरोपी को अब धारा 376 (दुष्कर्म), धारा 417 (धोखाधड़ी) और POCSO Act की धारा 6 के तहत मुकदमे का सामना करना होगा। कोर्ट ने माना कि यौन संबंधों की निरंतरता और पीड़िता के नाबालिग होने के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं, जो सुनवाई के लिए आधार प्रदान करते हैं। इस आदेश के साथ ही अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि प्रेम संबंधों के दुखद अंत को हमेशा आपराधिक उकसावे के रूप में नहीं देखा जा सकता।

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