सरोगेसी कानून में आयु सीमा वैध, पहली कोशिश असफल होने के आधार पर छूट नहीं दी जा सकती: गुवाहाटी हाइकोर्ट

Amir Ahmad

13 Jan 2026 1:45 PM IST

  • सरोगेसी कानून में आयु सीमा वैध, पहली कोशिश असफल होने के आधार पर छूट नहीं दी जा सकती: गुवाहाटी हाइकोर्ट

    गुवाहाटी हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरोगेसी से संबंधित कानून में तय की गई आयु सीमा पूरी तरह संवैधानिक है। इसमें केवल इस आधार पर इसमें छूट नहीं दी जा सकती कि दंपति की पहली सरोगेसी कोशिश असफल हो गई। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत कठिनाइयां चाहे जितनी भी वास्तविक हों, वे जनहित में बनाए गए वैधानिक प्रावधानों को शिथिल करने या निरस्त करने का आधार नहीं बन सकतीं।

    इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस अशुतोष कुमार और जस्टिस अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने की। अदालत ने कहा कि सरोगेसी कानून के तहत लगाए गए प्रतिबंध वैध राज्य हितों को साधने के लिए हैं, उनका उद्देश्य से सीधा संबंध है और उन्हें न तो अत्यधिक कहा जा सकता है और न ही दमनकारी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक न्याय केवल सहानुभूति के आधार पर नहीं किया जा सकता।

    यह फैसला एक विवाहित दंपति द्वारा दायर याचिका पर आया, जिसमें उन्होंने सरोगेसी के लिए अयोग्य ठहराए जाने को चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे मेडिकल रूप से प्राकृतिक गर्भधारण में असमर्थ हैं और उन्हें पहले अदालत की अनुमति से सरोगेसी का प्रयास करने की इजाजत दी गई थी। हालांकि, वह प्रयास मेडिकल कारणों से असफल हो गया। इसके बाद 14 मार्च, 2023 को कानून में संशोधन लागू हुआ और उसी दौरान याचिकाकर्ता दंपति सरोगेसी अधिनियम, 2021 की धारा 4(iii)(b)(I) के तहत निर्धारित अधिकतम आयु सीमा पार कर चुके थे।

    जब दंपति ने एक बार फिर सरोगेसी की अनुमति मांगी तो संबंधित प्राधिकरणों ने उन्हें यह कहते हुए मना कर दिया कि वे अब वैधानिक रूप से अयोग्य हैं और संशोधित फॉर्म-2 की शर्तों का पालन नहीं करते। इस निर्णय को याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी। उनका तर्क था कि प्रजनन से जुड़ी स्वतंत्रता व्यक्तिगत गरिमा और निजता का हिस्सा है, वे पहले योग्य थे और पहली कोशिश का असफल होना उनके नियंत्रण से बाहर था। उन्होंने यह भी दलील दी कि संशोधित नियमों के जरिए उनके माता-पिता बनने के अधिकार को स्थायी रूप से खत्म नहीं किया जा सकता।

    इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने फॉर्म-2 में किए गए संशोधन को भी भेदभावपूर्ण बताया, क्योंकि इसमें कुछ श्रेणियों की अविवाहित महिलाओं को डोनर गैमीट्स की अनुमति दी गई, लेकिन विवाहित जोड़ों को इससे वंचित किया गया।

    हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि यह स्थापित सिद्धांत है कि किसी भी लाभ के लिए पात्रता उसी तारीख को देखी जाती है, जिस दिन उस लाभ का दावा किया जाता है, जब तक कि कानून में इसके विपरीत कोई प्रावधान न हो। अदालत ने कहा कि पहली सरोगेसी कोशिश का असफल होना दुर्भाग्यपूर्ण जरूर है, लेकिन इससे यह अधिकार नहीं बन जाता कि बाद में बदले गए कानूनों की अनदेखी कर नई सरोगेसी प्रक्रिया शुरू की जाए।

    अदालत ने यह भी कहा कि सरोगेसी में आयु सीमा का सीधा संबंध स्वास्थ्य, दीर्घायु और बच्चे के दीर्घकालिक कल्याण से है। वैध अपेक्षा के सिद्धांत को भी खारिज करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि कोई भी वैध अपेक्षा किसी स्पष्ट वैधानिक प्रावधान के विरुद्ध लागू नहीं की जा सकती। संसद को यह अधिकार है कि वह भविष्य के लिए आयु सीमा तय करे और कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो पहले असफल हो चुके सरोगेसी प्रयासों वाले दंपतियों को नई पात्रता शर्तों से छूट देता हो।

    डोनर गैमीट्स के उपयोग पर विवाहित जोड़ों के लिए लगाए गए प्रतिबंध को भी अदालत ने सही ठहराया। हाइकोर्ट ने कहा कि यह एक नीतिगत निर्णय है, जिसका उद्देश्य बच्चे और इच्छुक माता-पिता के बीच आनुवंशिक संबंध सुनिश्चित करना है और इस प्राथमिकता को तय करना संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में नियमों का पिछली तारीख से लागू होना नहीं माना जा सकता, क्योंकि याचिकाकर्ता संशोधन लागू होने के बाद एक नई सरोगेसी प्रक्रिया शुरू करना चाहते थे। केवल इस आधार पर कि उन्होंने पहले कभी सरोगेसी का प्रयास किया, उन्हें वर्तमान कानून से छूट नहीं दी जा सकती, खासकर जब वह प्रक्रिया पहले ही असफल हो चुकी थी और उसे जारी प्रक्रिया नहीं माना जा सकता।

    अंत में याचिकाकर्ताओं की व्यक्तिगत कठिनाइयों को स्वीकार करते हुए भी हाईकोर्ट ने दोहराया कि केवल व्यक्तिगत पीड़ा के आधार पर जनहित में बनाए गए कानून को न तो रद्द किया जा सकता है और न ही उसमें ढील दी जा सकती है। इन कारणों से याचिका खारिज कर दी गई।

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