हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (23 मार्च, 2026 से 27 मार्च, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
बिना तलाक शादीशुदा व्यक्ति लिव-इन में नहीं रह सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने 20 मार्च को यह टिप्पणी की कि कोई व्यक्ति जो पहले से विवाहित है और जिसका जीवनसाथी जीवित है, वह बिना पूर्व जीवनसाथी से तलाक लिए किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में कानूनी रूप से नहीं रह सकता।
जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी उस रिट याचिका को खारिज करते हुए की, जो एक ऐसे जोड़े द्वारा दायर की गई थी (दोनों अलग-अलग लोगों से विवाहित थे), जिसमें उन्होंने शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप न करने और सुरक्षा प्रदान करने के लिए निर्देश (मैंडमस) की मांग की थी।
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'किसी निजी व्यक्ति द्वारा सरकारी कर्मचारियों पर हमला 'नैतिक पतन' का अपराध': बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि किसी निजी व्यक्ति द्वारा सरकारी कर्मचारियों पर हमला, खासकर किसी गैर-कानूनी आंदोलन के दौरान, 'नैतिक पतन' (Moral Turpitude) से जुड़ा अपराध माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि ऐसे काम सामाजिक कर्तव्य का उल्लंघन दिखाते हैं और सार्वजनिक व्यवस्था को कमज़ोर करते हैं। इसलिए ये 'दुराचार' और समाज के मान्य मानकों के विपरीत आचरण की श्रेणी में आते हैं।
जस्टिस रजनीश आर. व्यास एक आरोपी द्वारा दायर आपराधिक अर्जी पर सुनवाई कर रहे थे। आरोपी ने दंगा करने, सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे अपराधों में अपनी सज़ा पर रोक लगाने की मांग की थी। अर्जी देने वाले ने दलील दी कि जब तक उसकी सज़ा पर रोक नहीं लगती, तब तक वह 'महाराष्ट्र नगर निगम अधिनियम' की धारा 10(1)(a) के तहत पार्षद के तौर पर नामित होने के लिए अयोग्य माना जाएगा। यह धारा उन लोगों को अयोग्य ठहराती है, जिन्हें 'नैतिक पतन' से जुड़े अपराधों में दोषी ठहराया गया हो। अर्जी देने वाले ने तर्क दिया कि विचाराधीन अपराध 'नैतिक पतन' की श्रेणी में नहीं आता और उसने पिछले न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हर अपराध ऐसी अयोग्यता का कारण नहीं बनता।
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अनुच्छेद 226 के तहत आपराधिक कोर्ट के आदेश को चुनौती नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी आपराधिक अदालत द्वारा पारित न्यायिक आदेश को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दाखिल कर चुनौती नहीं दी जा सकती। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एक याचिका खारिज कर दी, जिसमें लखनऊ के स्पेशल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (कस्टम) द्वारा फरवरी 2026 में पारित आदेश को रद्द करने की मांग की गई।
सुनवाई के दौरान राज्य ने याचिका की सुनवाई योग्य होने पर प्रारंभिक आपत्ति उठाई और नीता सिंह बनाम राज्य, 2024 के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट, आपराधिक अदालतों के न्यायिक आदेशों के खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिकाओं पर विचार नहीं कर सकता। राज्य ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में उचित उपाय केवल संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत ही उपलब्ध है।
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यूनिवर्सिटी शिक्षक 'पब्लिक ऑफिस' नहीं, क्वो वारंटो याचिका नहीं चलेगी: एमपी हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यूनिवर्सिटी में शिक्षक, प्रोफेसर या रीडर 'पब्लिक ऑफिस' के दायरे में नहीं आते इसलिए उनके खिलाफ क्वो वारंटो याचिका दायर नहीं की जा सकती। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। मामला एक यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस के लेक्चरर की नियुक्ति को चुनौती देने से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि नियुक्त व्यक्ति के पास आवश्यक शैक्षणिक योग्यता नहीं थी और उसने गलत प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए।
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सह-मालिक की सहमति न होने पर बिजली कनेक्शन देने से मना नहीं किया जा सकता: गुजरात हाईकोर्ट
गुजरात हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि किसी संपत्ति पर मालिकाना हक या कब्ज़े के अधिकार का सवाल, किसी ऐसे उपभोक्ता को बिजली कनेक्शन देने से जुड़ा नहीं है, जो अन्यथा इसके लिए हकदार है। कोर्ट ने आगे कहा कि कोई कंपनी किसी उपभोक्ता को बिजली कनेक्शन देने के लिए संपत्ति के अन्य सह-मालिकों की सहमति पर ज़ोर नहीं दे सकती।
मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता ने एक ज़मीन के लिए बिजली कनेक्शन मांगा था, लेकिन बिजली कंपनी ने एक सूचना भेजकर कहा कि उस ज़मीन पर स्थित एक कुआं किसी अन्य व्यक्ति की भी संयुक्त संपत्ति है, इसलिए आगे बढ़ने के लिए उसकी सहमति ज़रूरी है।
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बच्चे की कस्टडी पिता के पास हो तो हैबियस कॉर्पस याचिका नहीं चलेगी: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि जब बच्चा अपने प्राकृतिक अभिभावक (नेचुरल गार्जियन) के पास हो और उसके जीवन या सुरक्षा को कोई तात्कालिक खतरा न हो तो ऐसे मामलों में हैबियस कॉर्पस याचिका सुनवाई योग्य नहीं होती। जस्टिस सुमीत गोयल ने यह फैसला एक मां की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें उसने अपनी 9 वर्षीय बेटी की कस्टडी पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
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गैर-कानूनी तरीके से नौकरी से निकालना अपने आप में नौकरी पर वापस रखने या पिछले वेतन का हकदार नहीं बनाता: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह साफ किया कि अगर यह पाया जाता है कि किसी को गैर-कानूनी तरीके से नौकरी से निकाला गया तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसे अपने आप ही नौकरी पर वापस रखने या पिछले वेतन का हक मिल जाएगा।
जस्टिस शैल जैन ने इसलिए प्रोप्राइटरशिप फर्म द्वारा गैर-कानूनी तरीके से नौकरी से निकाले गए कर्मचारियों को नौकरी पर वापस रखने और पिछले वेतन देने से मना किया। उन्होंने इसके लिए काफी समय बीत जाने का हवाला दिया, खासकर तब जब कई कर्मचारी पहले ही रिटायरमेंट की उम्र तक पहुंच चुके थे और उन्होंने अपनी कानूनी कार्रवाई को पूरी लगन से आगे नहीं बढ़ाया।
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मजिस्ट्रेट द्वारा केस भेजे बिना सेशंस कोर्ट ड्रग्स एंड कॉस्मैटिक्स एक्ट के तहत अपराधों का संज्ञान नहीं ले सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि सेशंस कोर्ट ड्रग्स एंड कॉस्मैटिक्स एक्ट के तहत अपराधों का सीधा संज्ञान तब तक नहीं ले सकता, जब तक कि मैजिस्ट्रेट द्वारा केस उसे न भेजा जाए, जैसा कि CrPC की धारा 193 के तहत ज़रूरी है। कोर्ट ने पाया कि एक्ट में ऐसी कोई स्पष्ट व्यवस्था न होने के कारण, जो सीधे संज्ञान की अनुमति देती हो, CrPC के तहत वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
जस्टिस एन.जी. जमादार एक फार्मास्युटिकल फर्म और उसके पार्टनर्स द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें ड्रग्स एंड कॉस्मैटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 27(d) के तहत अपराध के लिए शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई। यह मुकदमा 2016 में एक सरकारी अस्पताल के स्टोर से ड्रग्स इंस्पेक्टर द्वारा लिए गए एक सैंपल से जुड़ा था, जिसके बारे में बाद में रिपोर्ट आई कि वह "मानक गुणवत्ता का नहीं" था।
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POSH Act पर अहम फैसला: ICC रिपोर्ट के आधार पर ही सजा दे सकता है नियोक्ता, अलग जांच जरूरी नहीं- बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि नियोक्ता आंतरिक शिकायत समिति (ICC) की रिपोर्ट के आधार पर ही कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। इसके लिए अलग से विभागीय जांच या चार्जशीट जरूरी नहीं है।
जस्टिस आर आई छागला और जस्टिस अद्वैत एम सेठना की खंडपीठ ने यह फैसला IIT Bombay के एक प्रोफेसर की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें उन्होंने यौन उत्पीड़न के आरोप साबित होने के बाद अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को चुनौती दी थी।
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बिजली चोरी के मामलों में आदेश पारित करने से पहले अथॉरिटी को आरोपी के साथ प्रतिकूल सामग्री साझा करनी चाहिए: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि बिजली अधिनियम की धारा 135 के तहत बिजली की कथित चोरी के मामलों में मूल्यांकन करने वाली अथॉरिटी का यह कर्तव्य है कि वह मूल्यांकन आदेश पारित करने से पहले उपभोक्ता को प्रतिकूल सामग्री से अवगत कराए और सुनवाई का अवसर प्रदान करे।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी भी नागरिक दायित्व का निर्धारण भले ही वह धारा 135 के तहत हो, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए किया जाना चाहिए और इसे किसी यांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से नहीं किया जा सकता।
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बकाया न चुकाने पर सिविल जेल भेजने से पति की मासिक भरण-पोषण देने की ज़िम्मेदारी खत्म नहीं होती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि किसी व्यक्ति को उसकी पत्नी या बच्चों को भरण-पोषण (Maintenance) न देने के कारण सिविल जेल भेजने से उसकी आगे का मासिक भरण-पोषण का बकाया चुकाने की कानूनी ज़िम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।
जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की बेंच ने साफ किया कि CrPC की धारा 300 के तहत 'डबल जिओपार्डी' (दोहरी सज़ा) का सिद्धांत, 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005' के तहत भरण-पोषण के आदेशों को लागू करने के मामले में बिल्कुल भी लागू नहीं होता।
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ग्राम पंचायतों पर अंतरिम व्यवस्था: सरपंच रहेंगे प्रशासक, पर बड़े फैसलों पर रोक- बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र में ग्राम पंचायतों से जुड़े एक अहम मामले में अंतरिम राहत देते हुए कहा कि कार्यकाल पूरा कर चुके सरपंच फिलहाल प्रशासक के रूप में काम कर सकते हैं, लेकिन वे कोई नीतिगत या बड़े वित्तीय फैसले नहीं ले सकेंगे।
जस्टिस रविंद्र घुगे और जस्टिस अभय मंत्री की खंडपीठ ने 18 मार्च को यह आदेश देते हुए राज्य सरकार के उस निर्णय पर रोक नहीं लगाई, जिसके तहत करीब 14,500 ग्राम पंचायतों में चुनाव होने तक मौजूदा या पूर्व सरपंचों को प्रशासक नियुक्त किया गया।
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नोटिस न मिलने से ट्रांसफर आदेश स्वतः अवैध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 24 के तहत मुकदमे के ट्रांसफर से पहले नोटिस जारी न करना अपने आप में आदेश को अवैध नहीं बनाता, जब तक यह साबित न हो कि इससे संबंधित पक्ष को वास्तविक नुकसान (प्रेजुडिस) हुआ है।
जस्टिस योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि यदि किसी मामले को सक्षम अदालत में विधिसम्मत तरीके से ट्रांसफर कर दिया गया और इससे किसी पक्ष को नुकसान नहीं हुआ तो केवल तकनीकी आधार पर आदेश रद्द नहीं किया जा सकता।
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IPC की धारा 498A की हर सजा को नैतिक अधमता नहीं माना जा सकता: हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत हर दोषसिद्धि को स्वतः 'नैतिक अधमता' (मोरल टरपिट्यूड) का अपराध नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि हर मामला अपने तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
यह टिप्पणी जस्टिस संदीप मौदगिल ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें भारतीय स्टेट बैंक के एक पूर्व शाखा प्रबंधक को सेवा से हटा दिया गया था। बैंक ने यह कार्रवाई इस आधार पर की थी कि धारा 498ए के तहत उनकी सजा 'नैतिक अधमता' के दायरे में आती है।
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Hindu Marriage Act के तहत जनजातियों को बहुविवाह की खुली छूट नहीं: मध्य प्रदेश हाइकोर्ट का स्पष्ट फैसला
मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) की धारा 2(2) के तहत अनुसूचित जनजातियों को दी गई छूट का मतलब यह नहीं है कि वे बिना किसी परंपरा के बहुविवाह को उचित ठहरा सकें।
जस्टिस विवेक जैन की पीठ ने कहा कि यह प्रावधान केवल जनजातीय परंपराओं और मान्यताओं की रक्षा के लिए है, न कि बहुविवाह जैसे प्रथाओं को मनमाने ढंग से अपनाने की अनुमति देने के लिए।
Ski and Snowboard India के मामलों को संभालने वाली एड-हॉक कमेटी भंग करने का आदेश सही: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को सिंगल जज के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें Ski and Snowboard India के मामलों को संभालने के लिए एक एड-हॉक कमेटी नियुक्त करने के इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन (IOA) का कदम रद्द कर दिया गया था।
चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की डिवीज़न बेंच ने इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन द्वारा दायर अपील खारिज की, जबकि रिटर्निंग ऑफिसर की फीस के भुगतान के संबंध में विवादित आदेश में कुछ बदलाव किए।
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पति की मृत्यु के बाद एक्स-पार्टी तलाक रद्द नहीं हो सकता: इलाहाबाद हाइकोर्ट का अहम फैसला
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पति या पत्नी की मृत्यु के बाद एक्स-पार्टी तलाक के डिक्री को रद्द नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में मुकदमा आगे नहीं बढ़ सकता और इसे पुनर्जीवित करना कानूनन संभव नहीं है। जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने यह निर्णय देते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें 30 साल पुराने तलाक को बहाल कर दिया गया था।
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हाईवे निर्माण में दखल नहीं दे सकता वक्फ ट्रिब्यूनल: पटना हाइकोर्ट का सख्त फैसला
पटना हाइकोर्ट ने बड़ा फैसला देते हुए कहा कि राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े भूमि अधिग्रहण मामलों में वक्फ ट्रिब्यूनल को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने साफ किया कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 अपने आप में पूर्ण कानून है। इसी के तहत भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया संचालित होती है।
जस्टिस बिबेक चौधरी की एकल पीठ ने बिहार राज्य वक्फ ट्रिब्यूनल, पटना के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को समस्तीपुर जिले में कब्रिस्तान और मस्जिद दर्ज जमीन पर हाईवे निर्माण से रोका गया था।
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RTI Act के तहत जानकारी देने में जानबूझकर देरी या बाधा हो तभी लगेगा जुर्माना: इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सूचना के अधिकार कानून (RTI Act) को लेकर एक अहम फैसला देते हुए कहा कि केवल देरी या कमी के आधार पर दंड नहीं लगाया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित न हो कि सूचना देने में जानबूझकर बाधा डाली गई या दुर्भावना से देरी की गई तब तक दंड नहीं लगाया जा सकता।
जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने कहा कि RTI Act, 2005 की धारा 20 के तहत दंड लगाने से पहले आयोग को यह संतोष करना जरूरी है कि संबंधित अधिकारी ने बिना उचित कारण के सूचना देने से इनकार किया, गलत जानकारी दी जानकारी नष्ट की या जानबूझकर बाधा उत्पन्न की।
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बेटे-बेटी की शादी तय करने के लिए पैरोल नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि किसी दोषी कैदी को केवल अपने बच्चों की शादी तय करने या उसके लिए प्रयास करने के आधार पर पैरोल नहीं दी जा सकती। अदालत ने यह भी कहा कि जिन कैदियों के खिलाफ अन्य आपराधिक मामले लंबित हैं, वे कानूनन पैरोल के हकदार नहीं हैं। यह फैसला पूर्व विधायक अंगद यादव की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राजीव भारती की खंडपीठ ने दिया।
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रजिस्ट्रार, सब-रजिस्ट्रार 'कोर्ट' नहीं, रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत कार्यवाही में लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 लागू नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत रजिस्ट्रार और सब-रजिस्ट्रार 'कोर्ट' नहीं हैं। इसलिए रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत होने वाली कार्यवाहियों पर लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 लागू नहीं होगी।
जस्टिस इरशाद अली ने फैसला सुनाया: “रजिस्ट्रार, एडिशनल रजिस्ट्रार या सब-रजिस्ट्रार के कार्यालय को 'कोर्ट' नहीं माना जा सकता। तदनुसार, रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत होने वाली कार्यवाही में लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 में निहित प्रावधान लागू नहीं होगा। लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 स्पष्ट रूप से समय सीमा (Limitation Period) को बढ़ाने की शक्ति केवल 'कोर्ट' को देती है, न कि अन्य अधिकारियों को।”
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CrPC की धारा 482 याचिका NIA कोर्ट द्वारा डिस्चार्ज से इनकार के खिलाफ स्वीकार्य नहीं, भले ही राज्य पुलिस ने शेड्यूल अपराध की जांच की हो: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) एक्ट के तहत एक स्पेशल कोर्ट द्वारा डिस्चार्ज से इनकार करने वाले आदेश के खिलाफ CrPC की धारा 482 या BNSS की धारा 528 के तहत दायर याचिका स्वीकार्य नहीं है, भले ही राज्य पुलिस ने शेड्यूल अपराध की जांच की हो। कोर्ट ने माना कि ऐसे आदेशों के खिलाफ उपाय NIA Act, 2008 की धारा 21(1) के तहत एक वैधानिक अपील दायर करना है।
इस प्रकार, जस्टिस बृज राज सिंह की बेंच ने मोहम्मद फैजान और 2 अन्य द्वारा दायर याचिका खारिज की, जिसमें उन्होंने स्पेशल जज NIA/एडिशनल सेशन जज, लखनऊ द्वारा जुलाई 2025 में डिस्चार्ज से इनकार करने वाले आदेश और दिसंबर 2022 के संज्ञान आदेश को चुनौती दी थी। उन्होंने IPC की धारा 121-A, 153-A और 295-A के तहत मामले की पूरी कार्यवाही को रद्द करने की भी प्रार्थना की थी।
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ग्राम पंचायत से नगर निगम में शामिल किए गए कर्मचारियों को 'समान काम के लिए समान वेतन' का अधिकार: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि ग्राम पंचायतों से नगर निगम में शामिल किए गए कर्मचारी, यदि नियमित कर्मचारियों के समान ही काम करते हैं, तो वे वेतन में समानता (बराबरी) के हकदार हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी परिस्थितियों में 'समान काम के लिए समान वेतन' से इनकार करना भेदभाव के समान है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करता है।
जस्टिस जी. एस. कुलकर्णी और जस्टिस आरती साठे की डिवीज़न बेंच 28 कर्मचारियों द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इन कर्मचारियों को मूल रूप से ग्राम पंचायतों द्वारा नियुक्त किया गया। बाद में 2009 में वसई-विरार शहर नगर निगम के गठन के बाद उन्हें निगम में शामिल कर लिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने, जो सफाई कर्मचारी, क्लर्क और चपरासी के रूप में काम कर रहे थे, यह तर्क दिया कि निगम के नियमित कर्मचारियों के समान ही काम करने के बावजूद, उन्हें केवल न्यूनतम मजदूरी दी जा रही थी और नियमित वेतनमान तथा भत्तों का लाभ नहीं दिया जा रहा था। नगर निगम ने यह तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं को शुरू में ग्राम पंचायतों द्वारा बिना उचित भर्ती प्रक्रियाओं का पालन किए, एकमुश्त वेतन (Lump Sum) के आधार पर नियुक्त किया गया। इसलिए वे नियमित वेतनमान के हकदार नहीं थे।
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केवल एक ही वारिस हो और कोई प्रतिस्पर्धी दावा न हो, वहां उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए ज़मानत की आवश्यकता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 375 के तहत उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने के लिए ज़मानत की शर्त हर मामले में बिना सोचे-समझे नहीं लगाई जा सकती। कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में केवल एक ही वारिस हो, या किसी एक वारिस को प्रमाण पत्र जारी करने पर कोई आपत्ति न हो, वहां ऐसी शर्तें नहीं लगाई जानी चाहिए।
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 372 उन आवेदनों के बारे में बताती है, जो उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए ज़िला जज के समक्ष किए जा सकते हैं। धारा 373 ऐसे आवेदनों की प्रक्रिया बताती है और धारा 374 आवेदन की सामग्री बताती है।