केवल एक ही वारिस हो और कोई प्रतिस्पर्धी दावा न हो, वहां उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए ज़मानत की आवश्यकता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
22 March 2026 7:47 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 375 के तहत उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने के लिए ज़मानत की शर्त हर मामले में बिना सोचे-समझे नहीं लगाई जा सकती। कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में केवल एक ही वारिस हो, या किसी एक वारिस को प्रमाण पत्र जारी करने पर कोई आपत्ति न हो, वहां ऐसी शर्तें नहीं लगाई जानी चाहिए।
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 372 उन आवेदनों के बारे में बताती है, जो उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए ज़िला जज के समक्ष किए जा सकते हैं। धारा 373 ऐसे आवेदनों की प्रक्रिया बताती है और धारा 374 आवेदन की सामग्री बताती है।
अधिनियम की धारा 375 ज़िला जज को यह अधिकार देती है कि वह ऐसे मामलों में, जिन्हें वह उचित समझे, प्रमाण पत्र प्राप्त करने वाले व्यक्ति पर बॉन्ड के रूप में सुरक्षा संबंधी शर्तें लगा सके।
अधिनियम की धारा 375 का हवाला देते हुए जस्टिस मनीष कुमार निगम ने कहा,
“कोई शर्त तब लगाई जाती है, जब कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि यह किसी भी उद्देश्य के लिए आवश्यक है, जिसमें किसी ऋण का भुगतान, कोई अन्य दावेदार, वैधानिक अधिकारियों को कोई बकाया आदि शामिल हैं। हालांकि, किसी शर्त को लगाने पर विचार प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। किसी शर्त पर बिना सोचे-समझे ज़ोर नहीं दिया जा सकता, विशेष रूप से ऐसी स्थितियों में जहाँ लाभार्थी एकमात्र लाभार्थी हो, या अन्य उपयुक्त मामलों में, यदि लाभार्थी मृतक का स्वाभाविक वारिस हो और अन्य दावेदारों की ओर से कोई आपत्ति न हो।”
याचिकाकर्ता और प्रतिवादी सगी बहनें हैं और अपनी माँ की कानूनी वारिस हैं। वादी-याचिकाकर्ता ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 372 के तहत एक मामला दायर किया, जिसमें अपने पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने की प्रार्थना की गई। प्रतिवादी उपस्थित हुई और उसने याचिकाकर्ता के पक्ष में अपनी सहमति दी। तदनुसार, सिविल जज ने आवेदन स्वीकार की और निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता उस राशि के लिए एक सुरक्षा बॉन्ड और एक व्यक्तिगत बॉन्ड जमा करती है, जिसके लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी किया जा रहा है तो उसे प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाए।
इस शर्त को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
अदालत ने टिप्पणी की,
“ISA की धारा 375 को देखने से यह साफ़ पता चलता है कि सिक्योरिटी/ज़मानत/क्षतिपूर्ति बॉन्ड की शर्त लगाने का मकसद उन लोगों को क्षतिपूर्ति देना या उनके हितों की रक्षा करना है, जो कर्ज़ और सिक्योरिटी के पूरे या किसी हिस्से के हकदार हो सकते हैं।”
यह मानते हुए कि यह शर्त सभी मामलों में बिना सोचे-समझे लागू नहीं की जा सकती, अदालत ने फ़ैसला दिया कि चूंकि सर्टिफ़िकेट लेने वाला केवल एक ही वारिस था और दूसरी बेटी ने याचिकाकर्ता के पक्ष में अपनी सहमति दी थी, इसलिए बॉन्ड की शर्त लगाने का कोई औचित्य नहीं था।
याचिकाकर्ता को बिना ज़मानत के उत्तराधिकार सर्टिफ़िकेट जारी करने का निर्देश देते हुए अदालत ने रिट याचिका स्वीकार की।
Case Title: Smt. Alka Singhania Versus Smt. Shilpi Agarwal 2026 LiveLaw (AB) 120

