ग्राम पंचायत से नगर निगम में शामिल किए गए कर्मचारियों को 'समान काम के लिए समान वेतन' का अधिकार: बॉम्बे हाईकोर्ट
Shahadat
22 March 2026 8:29 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि ग्राम पंचायतों से नगर निगम में शामिल किए गए कर्मचारी, यदि नियमित कर्मचारियों के समान ही काम करते हैं, तो वे वेतन में समानता (बराबरी) के हकदार हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी परिस्थितियों में 'समान काम के लिए समान वेतन' से इनकार करना भेदभाव के समान है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करता है।
जस्टिस जी. एस. कुलकर्णी और जस्टिस आरती साठे की डिवीज़न बेंच 28 कर्मचारियों द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इन कर्मचारियों को मूल रूप से ग्राम पंचायतों द्वारा नियुक्त किया गया। बाद में 2009 में वसई-विरार शहर नगर निगम के गठन के बाद उन्हें निगम में शामिल कर लिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने, जो सफाई कर्मचारी, क्लर्क और चपरासी के रूप में काम कर रहे थे, यह तर्क दिया कि निगम के नियमित कर्मचारियों के समान ही काम करने के बावजूद, उन्हें केवल न्यूनतम मजदूरी दी जा रही थी और नियमित वेतनमान तथा भत्तों का लाभ नहीं दिया जा रहा था। नगर निगम ने यह तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं को शुरू में ग्राम पंचायतों द्वारा बिना उचित भर्ती प्रक्रियाओं का पालन किए, एकमुश्त वेतन (Lump Sum) के आधार पर नियुक्त किया गया। इसलिए वे नियमित वेतनमान के हकदार नहीं थे।
कोर्ट ने "समान काम के लिए समान वेतन" के सिद्धांत की जांच की और दोहराया कि यह एक सुस्थापित संवैधानिक सिद्धांत है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 से निकलता है।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
"...याचिकाकर्ताओं के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता और/या उन्हें नियमित कर्मचारियों की तुलना में कम वेतन या वेतनमान नहीं दिया जा सकता, जबकि वे समान काम कर रहे हैं। ऐसा करना भेदभाव के समान होगा, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत याचिकाकर्ताओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।"
कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि ग्राम पंचायतों में हुई मूल नियुक्ति के आधार पर वेतन में समानता से इनकार करना उचित ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने यह नोट किया कि नगर निगम में शामिल होने के बाद याचिकाकर्ताओं ने कई वर्षों तक अपनी सेवाएं जारी रखीं और वे नियमित कर्मचारियों के समान ही काम कर रहे थे। निगम की ओर से ऐसा कोई मामला पेश नहीं किया गया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा किए गए काम की प्रकृति नियमित कर्मचारियों के काम से अलग थी।
अदालत ने टिप्पणी की,
“याचिकाकर्ताओं को इतनी कम मज़दूरी/वेतनमान देना—जो बिना किसी विवाद के नगर निगम के साथ उन्हीं शर्तों और नियमों पर काम कर रहे हैं जो ग्राम पंचायतों में उनकी मूल नियुक्ति के समय लागू थे—उन्हें अन्य नियमित कर्मचारियों के बराबर वेतन और उनके वैध सेवा लाभों से वंचित करने जैसा है।”
तदनुसार, हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार की और नगर निगम को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं को नियमित कर्मचारियों के बराबर वेतन दे। अदालत ने निगम को यह भी निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर वेतन का बकाया। साथ ही 8% प्रति वर्ष की दर से ब्याज की गणना करे और उसका भुगतान करे।
Case Title: Gajanan Namdeo Oge & Ors. v. Vasai-Virar City Municipal Corporation & Ors. [Writ Petition No. 9442 of 2019]

