'किसी निजी व्यक्ति द्वारा सरकारी कर्मचारियों पर हमला 'नैतिक पतन' का अपराध': बॉम्बे हाईकोर्ट
Shahadat
27 March 2026 8:46 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि किसी निजी व्यक्ति द्वारा सरकारी कर्मचारियों पर हमला, खासकर किसी गैर-कानूनी आंदोलन के दौरान, 'नैतिक पतन' (Moral Turpitude) से जुड़ा अपराध माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि ऐसे काम सामाजिक कर्तव्य का उल्लंघन दिखाते हैं और सार्वजनिक व्यवस्था को कमज़ोर करते हैं। इसलिए ये 'दुराचार' और समाज के मान्य मानकों के विपरीत आचरण की श्रेणी में आते हैं।
जस्टिस रजनीश आर. व्यास एक आरोपी द्वारा दायर आपराधिक अर्जी पर सुनवाई कर रहे थे। आरोपी ने दंगा करने, सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे अपराधों में अपनी सज़ा पर रोक लगाने की मांग की थी। अर्जी देने वाले ने दलील दी कि जब तक उसकी सज़ा पर रोक नहीं लगती, तब तक वह 'महाराष्ट्र नगर निगम अधिनियम' की धारा 10(1)(a) के तहत पार्षद के तौर पर नामित होने के लिए अयोग्य माना जाएगा। यह धारा उन लोगों को अयोग्य ठहराती है, जिन्हें 'नैतिक पतन' से जुड़े अपराधों में दोषी ठहराया गया हो। अर्जी देने वाले ने तर्क दिया कि विचाराधीन अपराध 'नैतिक पतन' की श्रेणी में नहीं आता और उसने पिछले न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हर अपराध ऐसी अयोग्यता का कारण नहीं बनता।
कोर्ट ने कहा कि कोई काम नैतिक है या अनैतिक, यह तय करने के लिए यह देखना ज़रूरी है कि समाज या समुदाय उस काम को किस नज़र से देखता है। अगर समाज किसी काम को 'नैतिक पतन' से जुड़ा मानता है तो किसी व्यक्ति का निजी तौर पर उसे सही मानना, उस काम को नैतिक नहीं बना देता और न ही उसे दोषमुक्त करता है।
कोर्ट ने सेशंस कोर्ट के निष्कर्षों की जांच की। इन निष्कर्षों में यह साबित हुआ कि आरोपी ने एक गैर-कानूनी भीड़ बनाई, सार्वजनिक सड़कों को रोका था, बसों और पुलिस की गाड़ियों पर पत्थर फेंके थे और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात पुलिसकर्मियों को चोट पहुंचाई। कोर्ट ने यह भी पाया कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया और सरकारी कर्मचारियों पर उनके आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते समय हमला किया गया।
कोर्ट ने फैसला दिया कि अर्जी देने वाले का आचरण—जिसमें हिंसक आंदोलन में हिस्सा लेना, लोगों की आवाजाही में रुकावट डालना, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और सरकारी कर्मचारियों पर हमला करना शामिल था—स्पष्ट रूप से 'नैतिक पतन' से जुड़ा काम था। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकारी कर्मचारी शासन-प्रशासन का एक अहम हिस्सा होते हैं और किसी निजी व्यक्ति द्वारा कानून को अपने हाथ में लेकर उन पर हमला करना, ऐसे आचरण को दिखाता है जिसे समाज नैतिक रूप से निंदनीय मानेगा।
न्यायालय ने टिप्पणी की,
“…आवेदक का यह कृत्य नैतिक अधमता (Moral Turpitude) का कृत्य माना जा सकता है, क्योंकि यह निराधार था और उस सामाजिक कर्तव्य का उल्लंघन था, जो एक नागरिक का अपने साथी नागरिकों या समाज के प्रति होता है... सरकारी कर्मचारी संस्था की रीढ़ होते हैं और किसी निजी व्यक्ति द्वारा विरोध प्रदर्शन के लिए या कानून को अपने हाथ में लेकर उन पर किया गया कोई भी हमला, नैतिक अधमता का अपराध माना जाएगा।”
न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि दोषसिद्धि पर रोक लगाना असाधारण राहत है और इसे अधिकार के तौर पर नहीं दिया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि धारा 10(1)(a) के तहत वैधानिक रोक स्पष्ट है और आवेदक दोषसिद्धि को निलंबित करने लायक कोई भी असाधारण मामला पेश करने में विफल रहा है।
तदनुसार, हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि पर रोक लगाने की अर्जी यह कहते हुए खारिज की कि नैतिक अधमता से जुड़े अपराधों के लिए दी गई दोषसिद्धि में इस चरण पर कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
Case Title: Deelip Gopalsingh Thakur v. State of Maharashtra [Criminal Application No. 921 of 2026 in Appeal/344/2023]

