IPC की धारा 498A की हर सजा को नैतिक अधमता नहीं माना जा सकता: हाईकोर्ट

Amir Ahmad

24 March 2026 2:04 PM IST

  • IPC की धारा 498A की हर सजा को नैतिक अधमता नहीं माना जा सकता: हाईकोर्ट

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत हर दोषसिद्धि को स्वतः 'नैतिक अधमता' (मोरल टरपिट्यूड) का अपराध नहीं माना जा सकता।

    हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि हर मामला अपने तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

    यह टिप्पणी जस्टिस संदीप मौदगिल ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें भारतीय स्टेट बैंक के एक पूर्व शाखा प्रबंधक को सेवा से हटा दिया गया था। बैंक ने यह कार्रवाई इस आधार पर की थी कि धारा 498ए के तहत उनकी सजा 'नैतिक अधमता' के दायरे में आती है।

    हाइकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वैवाहिक संबंधों के भीतर उत्पन्न होने वाले सभी विवादों को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि गंभीर दहेज उत्पीड़न और साधारण वैवाहिक विवादों के बीच फर्क करना आवश्यक है।

    जस्टिस मौदगिल ने कहा,

    “हर मामले को उसके तथ्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए, केवल धारा के आधार पर कोई व्यापक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।”

    अदालत ने यह भी कहा कि धारा 498ए का केंद्र बिंदु पति-पत्नी के बीच का संबंध और उसी दायरे में होने वाला व्यवहार है। इसलिए हर ऐसे मामले को समाज के खिलाफ अपराध मानकर 'नैतिक अधमता' की श्रेणी में रखना उचित नहीं है।

    मामले की पृष्ठभूमि में बताया गया कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ वर्ष 2000 में दहेज मृत्यु, आपराधिक विश्वासघात और क्रूरता के आरोपों में FIR दर्ज हुई थी। सेशन कोर्ट ने उन्हें दहेज मृत्यु और विश्वासघात के आरोपों से बरी कर दिया, लेकिन धारा 498ए में दोषी ठहराया। इसके बाद बैंक ने उन्हें सेवा से हटा दिया।

    हाइकोर्ट ने पाया कि बैंक का आदेश बिना किसी विस्तृत जांच, कारण बताओ नोटिस या कर्मचारी की बात सुने पारित किया गया। आदेश में केवल यह कहा गया कि यह अपराध 'नैतिक अधमता' से जुड़ा है, जो अदालत के अनुसार एक “यांत्रिक और मनमाना” निर्णय है।

    अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि 'नैतिक अधमता' का निर्धारण मामले की प्रकृति, परिस्थितियों और कर्मचारी के कर्तव्यों पर उसके प्रभाव के आधार पर होना चाहिए।

    हाईकोर्ट ने यह भी माना कि विभिन्न हाइकोर्टों में इस विषय पर एक समान दृष्टिकोण नहीं है। कुछ अदालतों ने धारा 498ए को नैतिक अधमता माना है, जबकि अन्य ने इसे परिस्थितियों पर निर्भर बताया है।अंततः हाईकोर्ट ने बैंक का सेवा समाप्ति आदेश रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि कर्मचारी को सभी लाभ 15 दिसंबर, 2018 से दिए जाएं, साथ ही 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी दिया जाए।

    यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून में सामान्यीकरण के बजाय हर मामले का मूल्यांकन उसके वास्तविक तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

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