नोटिस न मिलने से ट्रांसफर आदेश स्वतः अवैध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
24 March 2026 5:40 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 24 के तहत मुकदमे के ट्रांसफर से पहले नोटिस जारी न करना अपने आप में आदेश को अवैध नहीं बनाता, जब तक यह साबित न हो कि इससे संबंधित पक्ष को वास्तविक नुकसान (प्रेजुडिस) हुआ है।
जस्टिस योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि यदि किसी मामले को सक्षम अदालत में विधिसम्मत तरीके से ट्रांसफर कर दिया गया और इससे किसी पक्ष को नुकसान नहीं हुआ तो केवल तकनीकी आधार पर आदेश रद्द नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया,
“नोटिस का अभाव अपने आप में ट्रांसफर आदेश को निरस्त नहीं करता, जब तक कि ठोस रूप से यह न दिखाया जाए कि इससे पक्षकार को नुकसान हुआ है।”
मामले में याचिकाकर्ता (प्रतिवादी) ने आदेश 7 नियम 10 सीपीसी के तहत आवेदन देकर कहा कि वाद गलत अदालत में दायर हुआ। इसे स्मॉल कॉज कोर्ट में जाना चाहिए, इसलिए वादपत्र (प्लेंट) वापस किया जाए।
हालांकि ट्रायल कोर्ट ने कहा कि मामला पहले ही सिविल जज (सीनियर डिवीजन), बलिया की अदालत में ट्रांसफर हो चुका है, जिसे ऐसे मामलों की सुनवाई का अधिकार है।
याचिकाकर्ता ने इस आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण दायर किया, जो खारिज हो गया। इसके बाद उन्होंने हाइकोर्ट में यह तर्क दिया कि क्षेत्राधिकार की कमी को ट्रांसफर से नहीं, बल्कि वादपत्र वापस कर ही ठीक किया जा सकता है। साथ ही उन्होंने कहा कि ट्रांसफर बिना नोटिस के किया गया, इसलिए यह अवैध है।
अदालत ने कहा कि आदेश 7 नियम 10 सीपीसी एक प्रक्रिया संबंधी प्रावधान है। इसे धारा 24 सीपीसी की व्यापक शक्तियों के साथ पढ़ा जाना चाहिए।
हाइकोर्ट ने कहा कि जिला जज को धारा 24 के तहत किसी भी चरण में वाद ट्रांसफर करने की व्यापक शक्ति है और इसका उपयोग क्षेत्राधिकार की कमी को दूर करने के लिए भी किया जा सकता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर मामले में वादपत्र लौटाना जरूरी नहीं है। यदि ट्रांसफर के जरिए मामला सक्षम अदालत में पहुंच गया तो केवल औपचारिकता के लिए वादपत्र लौटाने की आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह देखने का मुख्य आधार यह है कि क्या ट्रांसफर से किसी पक्ष को वास्तविक नुकसान हुआ है। इस मामले में याचिकाकर्ता को कार्यवाही की जानकारी थी और उन्होंने ट्रांसफर के बाद लिखित बयान भी दाखिल किया था।
इसलिए अदालत ने माना कि उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ और ट्रांसफर आदेश वैध है।
अंततः हाइकोर्ट ने याचिका खारिज की और ट्रांसफर ऑर्डर बरकरार रखा।

