इलाहाबाद हाईकोट
'अपनी पसंद या जाति' का जांच अधिकारी मांगना अस्वीकार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति यह मांग नहीं कर सकता कि किसी मामले की जांच उसके मनपसंद अधिकारी द्वारा या किसी विशेष जाति/समुदाय के अधिकारी द्वारा ही की जाए। कोर्ट ने कहा कि ऐसी मांगें कानून के खिलाफ हैं।जस्टिस अब्दुल शाहिद की पीठ ने SC/ST Act से जुड़े मामले में यह टिप्पणी करते हुए आपराधिक कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाई। इस मामले में शिकायतकर्ता ने पुनः जांच की मांग करते हुए विशेष रूप से अनुसूचित जाति के पुलिस अधिकारी से जांच कराने की मांग की थी।कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि...
फर्जी दूतावास चलाने के आरोपी को राहत, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दी जमानत
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में गाजियाबाद में फर्जी दूतावास चलाने और खुद को 'रॉयल एडवाइजर' (शाही सलाहकार) बताते हुए 'कॉन्सुलर' कार्यालय संचालित करने के आरोपी 49 वर्षीय व्यक्ति को जमानत दी।जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव की सिंगल बेंच ने आरोपी हर्षवर्धन जैन को यह राहत प्रदान की। जैन को उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने पिछले वर्ष जुलाई में गिरफ्तार किया था।अभियोजन के अनुसार, आरोपी ने खुद को वेस्ट आर्कटिका नामक गैर-मौजूद देश का राजनयिक बताकर कथित कांसुलेट संचालित किया और विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर लोगों से...
वकील अपने क्लाइंट्स के हितों को आगे बढ़ाने के लिए PIL याचिकाकर्ता नहीं बन सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि कोई भी वकील, जिसके पास उसके क्लाइंट्स अपनी शिकायतों के निवारण के लिए आते हैं, उसे खुद याचिकाकर्ता बनकर अपने क्लाइंट्स के हितों को आगे बढ़ाने वाली जनहित याचिका (PIL) दायर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।यह देखते हुए कि ऐसा आचरण पेशेवर कदाचार माना जा सकता है, चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने एक वकील द्वारा दायर की गई PIL याचिका वापस लिए जाने के आधार पर खारिज की। इस याचिका में वकील ने प्रतिवादियों को यह निर्देश देने की...
बिजली तक पहुंच अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिजली कनेक्शन चाहने वाली बहू की मदद की
इस बात पर ज़ोर देते हुए कि बिजली कनेक्शन पाना भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकार है, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे वैवाहिक विवाद के बीच एक नई घरेलू बिजली कनेक्शन के लिए एक बहू द्वारा दायर आवेदन पर कार्रवाई करें।जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रीति शर्मा द्वारा दायर एक रिट याचिका पर यह आदेश पारित किया।संक्षेप में मामलायाचिकाकर्ता (शर्मा) प्रतिवादी नंबर 7 की...
परेशान करने वाला चलन, जांच अधिकारी दबाव में काम कर रहे हैं: हाईकोर्ट ने 'यूपी गैर-कानूनी धर्मांतरण कानून' के तहत 'झूठी' FIRs की कड़ी आलोचना की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को राज्य में 'उत्तर प्रदेश गैर-कानूनी धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021' के तहत झूठी FIRs दर्ज किए जाने के "परेशान करने वाले चलन" की कड़ी निंदा की।यह देखते हुए कि 2021 के कानून के तहत FIRs "धड़ाधड़" दर्ज की जा रही हैं, जो बाद में झूठी साबित होती हैं, कोर्ट ने राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को निर्देश दिया कि वह एक व्यक्तिगत हलफनामा दायर कर बताएं कि ऐसे मामलों में क्या कार्रवाई की जा रही है।जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने ये टिप्पणियां...
बेटी की शादी 'पवित्र दायित्व': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोषी को दी 7 दिन की अस्थायी जमानत
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि बेटी का विवाह हिंदू जीवन पद्धति में एक पवित्र दायित्व है। इसी आधार पर अदालत ने एक दोषी व्यक्ति को अपनी बेटी की शादी में शामिल होने के लिए 7 दिन की अस्थायी जमानत प्रदान की।जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्र की पीठ ने यह आदेश देश राज नामक व्यक्ति की याचिका पर दिया, जिसने अपनी सजा के खिलाफ अपील लंबित होने के दौरान यह राहत मांगी थी।मामले में याचिकाकर्ता को 2023 में लखनऊ सेशन कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष...
गवाह बुलाने के लिए शिकायतकर्ता भी दे सकता है आवेदन: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी की आपत्ति खारिज की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य मामलों में भी शिकायतकर्ता CrPC की धारा 311 (BNSS की धारा 348) के तहत अदालत से गवाह बुलाने या दस्तावेज प्रस्तुत कराने की मांग कर सकता है। इसके लिए लोक अभियोजक द्वारा आवेदन देना अनिवार्य नहीं है।जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने यह फैसला देते हुए आरोपी की याचिका खारिज की, जिसमें ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी।मामला लखनऊ सेशन कोर्ट में चल रहे हत्या के मुकदमे से जुड़ा है। यहां शिकायतकर्ता ने अभियोजन साक्ष्य बंद होने और आरोपी का...
भविष्य की योजना के लिए ज़मीन सिर्फ़ रिज़र्व रखना, अधिग्रहित ज़मीन का 'उपयोग' नहीं माना जाएगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया ज़मीन वापस करने का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि ज़मीन का कोई भी असल विकास या उपयोग किए बिना, उसे सिर्फ़ "भविष्य की योजना" के लिए रिज़र्व रखना, यूपी शहरी योजना और विकास अधिनियम, 1973 की धारा 17 के तहत 'उपयोग' नहीं माना जाएगा।यूपी शहरी योजना और विकास अधिनियम, 1973 की धारा 17 के तहत राज्य सरकार को विकास कार्यों के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत ज़मीन अधिग्रहित करने का अधिकार दिया गया। उप-धारा (1) का परंतुक यह प्रावधान करता है कि यदि ज़मीन मालिक आवेदन करता है तो राज्य सरकार ज़मीन को उसके मूल मालिक को वापस कर...
धोखा देने के इरादे के बिना जन्मतिथि में मामूली अंतर धोखाधड़ी नहीं है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी स्कूल के टीचर की बर्खास्तगी रद्द की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि किसी सरकारी कर्मचारी के अलग-अलग एजुकेशनल रिकॉर्ड में जन्मतिथि में सिर्फ़ मामूली अंतर होना—जिसमें धोखाधड़ी, गलतबयानी या जानबूझकर कुछ छिपाने का कोई तत्व न हो—उसे 'धोखाधड़ी या जानबूझकर की गई गलतबयानी' नहीं माना जाएगा, जिससे उसकी नियुक्ति रद्द हो जाए।जस्टिस मंजू रानी चौहान की बेंच ने इस तरह जून 2019 में मऊ में एक सरकारी असिस्टेंट टीचर के खिलाफ जारी बर्खास्तगी का आदेश रद्द किया, और राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे उसे तुरंत अपनी ड्यूटी फिर से शुरू करने की...
जमीन अधिग्रहण पर बड़ा झटका: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- सिर्फ प्रशासनिक सुविधा से तत्कालता प्रावधान लागू नहीं किया जा सकता
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमीन अधिग्रहण मामलों में अहम फैसला देते हुए कहा कि केवल प्रशासनिक सुविधा या आवश्यकता के आधार पर भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 17 (तत्कालता प्रावधान) लागू नहीं की जा सकती।जस्टिस संगीता चंद्रा और जस्टिस बृज राज सिंह की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि इस प्रावधान का उपयोग तभी किया जा सकता है, जब वास्तविक, ठोस और प्रमाणित आपात स्थिति हो, जिसे अधिसूचना में स्पष्ट कारणों के साथ दर्ज किया जाए।अदालत ने कहा,“सिर्फ प्रशासनिक आवश्यकता या सुविधा, चाहे वह कितनी भी जरूरी क्यों न लगे, कानून...
किसानों को राहत पर बड़ी टिप्पणी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- देरी के आधार पर दावा खारिज करना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किसानों के हित में अहम फैसला देते हुए कहा कि केवल देरी के आधार पर मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना के तहत दावे खारिज करना, बिना कारणों पर विचार किए, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने कहा कि भले ही योजना में दावा दाखिल करने की अधिकतम समय सीमा 75 दिन निर्धारित हो, लेकिन यदि देरी के पीछे उचित कारण हों तो अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे उन कारणों पर विचार करें।अदालत ने स्पष्ट कहा,“यदि देरी के कारणों पर...
BNSS की धारा 106 के तहत संपत्ति कुर्क करने के लिए पुलिस को पहले से नोटिस देना ज़रूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में फैसला दिया कि BNSS की धारा 106 के तहत पुलिस द्वारा संपत्ति कुर्क करने के लिए संबंधित व्यक्ति को पहले से कोई नोटिस देना ज़रूरी नहीं है। कोर्ट ने धारा 106 और धारा 107 के बीच अंतर स्पष्ट किया। धारा 107 में विशेष रूप से यह प्रावधान है कि मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को नोटिस जारी करेगा, जिसकी संपत्ति BNSS की धारा 107 के तहत कुर्क की जानी है।BNSS की धारा 106 पुलिस को ऐसी किसी भी संपत्ति को ज़ब्त करने का अधिकार देती है, जिसके बारे में यह आरोप हो या संदेह हो कि वह चोरी की है,...
आवंटित प्लॉट सौंपने में देरी का मामला: हाईकोर्ट ने KDA को लगाई फटकार, मुख्यमंत्री को दिए अधिकारियों की लापरवाही की जांच के निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री आदित्य योगीनाथ से KDA अधिकारियों की कथित लापरवाही की जांच करने को कहा है। इन अधिकारियों पर आवंटित ज़मीन का कब्ज़ा, अब 90 साल के हो चुके उसके पट्टेदार को सौंपने में 41 साल की देरी करने का आरोप है।जस्टिस संदीप जैन 90 साल के वादी के मामले की सुनवाई कर रहे थे। यह वादी सबसे ज़्यादा बोली लगाने वाला था और उसे 1984 में 999 साल का पट्टा मिला था, लेकिन कानपुर विकास प्राधिकरण (KDA) ने कई बार अनुरोध किए जाने के बाद भी उसे ज़मीन का कब्ज़ा नहीं सौंपा।बेंच ने टिप्पणी की, ...
संयुक्त परिवार के अस्तित्व की धारणा के आधार पर सह-काश्तकारी की अनुमति नहीं दी जा सकती, यह साबित करना होगा कि प्लॉट पैतृक है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि संयुक्त परिवार के अस्तित्व की धारणा के आधार पर सह-काश्तकारी (Co-Tenancy) की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि संबंधित पक्ष को यह साबित करना होगा कि प्लॉट पैतृक है। साथ ही प्लॉट की पहचान और रिकॉर्ड में उसकी निरंतरता भी साबित करनी होगी।जस्टिस चंद्र कुमार राय ने फैसला सुनाते हुए कहा,“विचाराधीन प्लॉट का पैतृक होना साबित नहीं हो सका, और न ही प्लॉट की पहचान व रिकॉर्ड में उसकी निरंतरता स्थापित हो पाई। ऐसे में केवल इस आधार पर सह-काश्तकारी की अनुमति नहीं दी जा...
क्रूरता/उत्पीड़न से कोई सीधा संबंध न होने तक 'दहेज हत्या' का अपराध सिर्फ़ कीमती चीज़ों की मांग करने पर लागू नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि IPC की धारा 304-B (दहेज हत्या) के तहत अपराध साबित करने के लिए पीड़िता की मौत और दहेज से जुड़े उत्पीड़न या क्रूरता के बीच 'स्पष्ट संबंध' होना ज़रूरी है।जस्टिस मनीष माथुर की बेंच ने आगे कहा कि जहाँ सिर्फ़ चीज़ों या कीमती सामान की मांग का किसी ऐसे उत्पीड़न या क्रूरता से कोई संबंध न हो, जिसके कारण मौत हुई हो, वहां IPC की धारा 304-B और धारा 498-A (साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-B के साथ पढ़ी जाने पर) के प्रावधान लागू नहीं होंगे।इस तरह बेंच ने मेवा लाल और पीड़िता...
पीड़िता की गवाही पर भरोसा कायम, मां का बयान न होना घातक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1984 दुष्कर्म मामले में सजा बरकरार रखी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1984 के दुष्कर्म मामले में आरोपी की सजा बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और अटूट है, तो अन्य गवाहों के बयान न होने से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता।जस्टिस मनोज बजाज की पीठ ने आजमगढ़ के एडिशनल सेशन कोर्ट के वर्ष 1986 के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपी की अपील खारिज की। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत दोषी मानते हुए 7 साल की कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई।मामले के अनुसार, 7 अक्टूबर 1984 को 15 वर्ष से...
ग्राम न्यायालय भी तय कर सकते हैं भरण-पोषण के मामले: इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया कि ग्राम न्यायालयों को भरण-पोषण से जुड़े मामलों की सुनवाई और निष्पादन करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 से 128 तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 से 147 के तहत आने वाले मामलों पर भी ग्राम न्यायालय निर्णय ले सकते हैं।जस्टिस अब्दुल शाहिद की पीठ ने यह टिप्पणी एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें उसने अपने भरण-पोषण आदेश के क्रियान्वयन के लिए लंबित प्रार्थना पत्र के शीघ्र...
गलत कानून के तहत की गई नियुक्तियां रद्द, प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन बर्खास्तगी में दखल देने का आधार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि किसी ऐसे कानून के तहत की गई नियुक्तियां, जो उस संस्थान पर लागू नहीं होता—वे रद्द मानी जाएंगी। ऐसे कर्मचारियों की बर्खास्तगी के आदेशों को केवल इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि आदेश में बर्खास्तगी के कारणों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।यह देखते हुए कि नियुक्तियाँ संस्थान पर लागू होने वाले कानूनी प्रावधानों के तहत नहीं की गईं, जस्टिस मंजू रानी चौहान ने कहा:“ऐसी परिस्थितियों में भले ही अधिकार क्षेत्र की कमी और विवादित आदेश के कारणों का स्पष्ट उल्लेख न होने...
डीएम ने बंद किए 'अमर उजाला' को सरकारी विज्ञापन, हाईकोर्ट ने कहा- 'तानाशाही आदेश चौथे स्तंभ की स्वायत्तता पर चोट करते हैं'
'अमर उजाला' अखबार को राहत देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में संभल के ज़िलाधिकारी (DM) को निर्देश दिया कि वह इस मामले में 'व्यावहारिक' दृष्टिकोण अपनाएं, जिसमें अखबार ने आरोप लगाया था कि उन्हें सरकारी विज्ञापन नहीं दिए जा रहे हैं।'अमर उजाला' का पक्ष यह था कि संबंधित डीएम ने एक गुरुद्वारा विवाद से जुड़ी खबर के आधार पर आदेश पारित किया था। हालांकि, याचिकाकर्ता ने बाद में स्पष्टीकरण (Corrigendum) प्रकाशित करके अपना पक्ष साफ कर दिया था, फिर भी आदेश पारित कर दिया गया, जिसके बाद उन्हें सरकारी...
'एसिड हमले एक अलग ही श्रेणी के होते हैं': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार किया, रिपोर्ट में देरी पर पुलिस को फटकारा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि जिन मामलों में एसिड का इस्तेमाल हमले के हथियार के तौर पर किया जाता है, वे अपराध में इस्तेमाल हथियार की प्रकृति के कारण 'एक अलग ही श्रेणी' के होते हैं।गहन जांच की ज़रूरत को देखते हुए जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने रिट याचिका खारिज की। इस याचिका में संपत्ति विवाद को लेकर किए गए सुनियोजित एसिड हमले से जुड़ी FIR को रद्द करने की मांग की गई।मामले के खास तथ्यों से परे हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस विभाग के प्रति अपनी "गहरी नाराज़गी" भी ज़ाहिर...


















